नाग कौन थे

नागौर शहर का नाम नागों पर क्यों पड़ा? नागौर शब्द से भान होता है कि इसे नागों ने बसाया किंतु ये नाग कौन थे? कहाँ से आए थे? भारत के इतिहास में कब से अपना स्थान बनाए हुए थे? इन शब्दों के उत्तर अब काल के प्रवाह में खो गए हैं किंतु फिर भी कुछ सांस्कृतिक उल्लेख नागों के अत्यंत प्राचीन अस्तित्व की ओर संकेत करते हैं।

नाग वंश की उत्पत्ति और इतिहास

नाग शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख रामकथा से जुड़ा हुआ है जहाँ लक्ष्मणजी को शेषनाग का अवतार माना गया है। यह शेषनाग सूर्यवंशी इक्ष्वाकुओं का ही एक अत्यंत प्राचीन राजा था। उसी के वंशज नाग हुए और कालांतर में आर्येतर क्षत्रियों के रूप में पहचाने गए। वस्तुतः ये आर्येतर नहीं थे, आर्य ही थे। रावण के पुत्र मेघनाद की पत्नी सुलोचना भी नागकन्या थी।

नागवंश और महाभारत के संबंध

महाभारत में राजा परीक्षित के पुत्र जनमेजय द्वारा नागयज्ञ करने का उल्लेख है। यह आख्यान चंद्रवंशी क्षत्रियों और नागवंशी क्षत्रियों के बीच चल रहे राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता की ओर संकेत करता है। श्रीकृष्ण और अर्जुन ने खाण्डव वन में नागों को ही नष्ट किया था। कालिया दमन के प्रसंग में भी श्रीकृष्ण ने कालिया नामक नाग का दमन किया था। पाण्डुपुत्र भीम को जब कौरवों ने नदी के गहरे जल में फैंक दिया था तब नागों ने ही उसके प्राणों की रक्षा की थी।

क्या नाग वास्तव में एक जाति थे

एक समय था जब भारतीय उपमहाद्वीन में नाग राजकुल उतने ही प्रभावशाली थे जितने कि सूर्यवंशी, चंद्रवंशी और यदुवंशी राजकुल थे। तभी तो महाराजा अग्रसेन ने नाग राजकुमारियों से विवाह किए थे। भारत में दर्जनों नगरों के नाम नागौर, नागपुर, नगरोटा, नागपत्तन और अहिच्छत्रपुर आदि से मिलते जुलते हैं जो नाग राजकुलों की सुदृढ़ स्थिति की ओर संकेत करते हैं।

अहिच्छत्रपुर का प्राचीन महत्व

नागौर को प्राचीन ऐतिहासिक संदर्भों में अहिच्छत्रपुर भी कहा गया है जिसका शाब्दिक अर्थ है- वह नगर जो नाग के फन की छाया में सुरक्षित है। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश के बरेली का प्राचीन नाम भी अहिच्छत्रपुर है।

नागों का भारत के विभिन्न क्षेत्रों में विस्तार

जोधपुर के निकट मण्डोर में नागाद्रि नाम की एक नदी बहती है, इस क्षेत्र पर भी कभी नाग राजवंश का शासन था जिसे मगध के गुप्तों ने अपने अधीन किया। महाराष्ट्र का नागपुर भी नाग नदी के किनारे बसा है।

इन नगरों एवं नदियों के नामों के बीच की समानता नागवंशी राजकुलों के विस्तृत प्रसार के प्रमाण हैं। अहि और नाग पर्यायवाची हैं, जो यह सिद्ध करते हैं कि ये स्थान एक ही विचारधारा और शासक वर्ग द्वारा विकसित किए गए थे। यह शब्द भारतीय इतिहास के उस स्वर्णिम अध्याय को दर्शाता है जब नाग जाति ने न केवल युद्ध कौशल में, बल्कि नगर नियोजन और कला (मथुरा और अमरावती कला) में भी अभूतपूर्व योगदान दिया था।

अतः यह केवल नाम का साम्य नहीं है, अपितु एक ही रक्त-वंश की सांस्कृतिक पदचाप है जो राजस्थान के रेतीले धोरों से लेकर उत्तर प्रदेश के उपजाऊ मैदानों और महाराष्ट्र के पठारों तक फैली हुई है।

नागौर शहर का नाम नागों पर क्यों पड़ा

नागौर को बसाने वाले नाग इन्हीं राजकुलों की एक बड़ी शाखा रहे होंगे। नागौर क्षेत्र में नागों की दो शाखाएं निवास करती थीं- कालिया और धौलिया। वस्तुतः इन शाखाओं के प्राचीन नाम सित (श्वेत) और असित (अश्वेत) थे। देहयष्टि एवं सांस्कृतिक उल्लेखों के साम्य के आधार पर प्रतीत होता है कि मारवाड़ क्षेत्र में पाए जाने वाले जाट सित नागों के वंशज हैं, मारवाड़ क्षेत्र सहित सम्पूर्ण उत्तर भारत में पाए जाने वाले महेश्वरी असित नागों के वंशज हैं, जबकि अग्रवाल महाराजा अग्रसेन एवं उनकी नागराकुमारियों के वंशज हैं।

इस पूरे सांस्कृतिक क्षेत्र में माली आदि जो भी जातियां टाक आदि लिखती हैं, वस्तुतः वे नागों की तक्षक शाखा के वंशज हैं।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

Dr. Mohanlal Gupta
Dr. Mohanlal Guptahttps://rajasthanhistory.com
डॉ. मोहनलाल गुप्ता राजस्थान के जाने-माने इतिहासकार एवं लेखक हैं। उनकी सौ से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं तथा पत्र-पत्रिकाओं में हजारों आलेख प्रकाशित हुए हैं।

Related Articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Stay Connected

21,585FansLike
2,651FollowersFollow
0SubscribersSubscribe
- Advertisement -spot_img

Latest Articles