भाटी गोयन्ददास का मारवाड़ की राजनीति में महत्व

भाटी गोयन्ददास (गोविन्ददास) ने साधारण राजपूत परिवार में जन्म लिया किंतु अपनी स्वामिभक्ति, शौर्य एवं बुद्धि-चातुर्य के बल पर वह मारवाड़ राज्य (Princely State of Marwar) की शासन व्यवस्था में एक प्रमुख व्यक्ति बन गया।

1. भाटी गोयन्ददास का मारवाड़ की राजनीति में महत्व

भाटी गोयन्ददास (Bhati Goyand Das) उसने जागीरदारों की वरिष्ठता के नियमों व दरबारी शिष्टाचारों-डावी व जीमणी मिसलों- की व्यवस्था के स्थान पर मारवाड़ की मुख्य खांपों के जागीरदारों को सिरायत पद से नवाजा।

कुरब कायदे, विभिन्न प्रकार की ताजीमें, सिरोपाव के विभिन्न स्तर, अगवानी के नियम-कायदे, भाईबंट की व्यवस्था को बदला तथा जागीरदारों के साथ मारवाड़ के राजा का संबंध बदलकर मुखिया एवं मालिक का बनाया।

भाटी गोयन्ददास ने मारवाड़ राज्य की केन्द्रीय सत्ता को शक्तिशाली बना कर, जागीरदारों को अधीनस्थ मानकर राजा की सर्वोच्च सत्ता को मारवाड़ में स्थापित करने का प्रयास, राव मालदेव के बाद भाटी गोविन्ददास ने किया। राव मालदेव ने मारवाड़ के जागीरदारों को चाकर बनाना चाहा और उसकी विस्तारवादी नीति के कारण मारवाड़ रियासत की भौगोलिक सीमा अत्यंत विस्तृत हुई परंतु उनके जीवन के अंतिम पड़ाव पर रियासत सिमट कर पूर्व की तरह हो गई।

गोयन्ददास ने मारवाड़ की राजस्व व्यवस्था, प्रशासनिक तंत्र को बदल कर मुग़लिया सल्तनत के अनुसार भारी बदलाव यहाँ किया। मुगलों की प्रशासनिक व्यवस्थाओं के अनुसार 36 कारखानों की व्यवस्था का सूत्रपात उन्हीं की सूझबूझ थी। इस बात का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि माला सांदू [1] जैसे विद्वान भी गोयन्ददास के साथ काम करते थे।

2. मारवाड़ राज्य के विस्तार में भाटी गोयन्ददास की भूमिका

भाटी माना (Bhati Mana) के गोयन्ददास (Goyand Das) और सुरताण (Surtan) दो पुत्र हुए। मारवाड़ के शासन प्रबन्ध में दोनों भाटियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही थी। गोयन्ददास का राजा सूरसिंह (Maharaja Sursingh) पर बड़ा अहसान रहा। वि.सं. 1655 में गोयन्ददास ने ही बुरहानपुर (Burhanpur) जाकर बादशाह को समझाबुझाकर सोजत (Sojat) का पट्टा पुनः महाराजा के नाम लिखवाया और उनके छोटे भाई शक्तिसिंह को सोजत छोड़नी पड़ी।[2] इसके अलावा जैतारण व मेड़ता (Merta) भी गोयन्ददास की सूझबूझ के कारण सूरसिंह के नाम बादशाह अकबर ने किया।

गोयन्ददास ने मुगलों और मेवाड़ में संधि कराने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उसकी अनेक उपलब्धियों में 14 गाँव चाणोद के व 84 गाँव खोड के, जो सिरोही (Sirohi) व मेवाड़ (Mewar) क्षेत्र में थे मारवाड़ में मिला लिये, जिसका श्रेय केवल भाटी गोयन्ददास को ही जाता है। इसके अलावा सिरोही के देवड़ों के साथ जो वैमनस्य राव चन्द्रसेन (Rao Chandrasen)  के समय से था, उसे विवाह संबंधों में बदलकर सौहार्द्रपूर्ण रिश्ते राठौड़ों व देवड़ों में पुनः स्थापित किये। [3]

2.1 उत्तराधिकार संघर्ष और कूटनीति

सवाईराजा सूरसिंह के छोटे भाई शक्तिसिंह ने अपनी पुत्री का विवाह जहांगीर (Jahangir) से करके बादशाह से नजदीकियां प्राप्त कर ली थी और उसने जोधपुर राज्य प्राप्त करने का प्रयास प्रारम्भ कर दिया था। स्वामिभक्त [4] गोयन्ददास ने शक्तिसिंह को मार्ग से हटाने का षड्यंत्र रचा और वह उसमें सफल रहा। [5]

विश्वेश्वरनाथ रेउ ने भाटी गोयन्ददास का नाम शुद्ध रूप में गोविन्ददास लिख कर मारवाड़ के इतिहास में विशेष उल्लेख किया है। उसने मारवाड़ के महाराजा और जागीरदारों का सम्बन्ध स्वामी-सेवक की तरह स्थापित किया। जागीरदारों की पत्नियों-ठुकरानियों के, राजपरिवार में होने वाले शादी, ब्याह, शोक समारोह में आने की प्रथा गोयन्ददास ने समाप्त की।

जागीरदारों को उनकी जागीर बंदगियों के कारण मिलती थी और जनानी ड्योढ़ी में उनकी पत्नियों को उचित आव-आदर एवं जनाना बैठकों में उनकी प्रतिष्ठा के अनुसार बैठने का स्थान नहीं दिया जाता था, इसलिए भाटी गोविन्ददास ने जागीरदारों के जनाना सरदारों के, राजपरिवार में मनाये जाने वाले किसी भी समारोह में सम्मिलित होने पर रोक लगा दी।

2.2 राजशाही पदों और उत्तरदायित्वों का पुनर्गठन

राजकार्य के लिये दीवान, बख्शी, खानसामा, हाकिम, दफ्तरी, दारोगा, पोतेदार, वाकनवीस, खबरनवीस आदि पदों पर नियुक्तियां की गईं। खवासों, पासवानों को जिम्मेदारियां निश्चित की गईं। महाराजा की ढाल व तलवार रखने का काम खीचियों [6] को, चंवर और मोरछल रखने का काम धांधलों को, जलूसी पंखा का काम गहलोतों को, ड्योढ़ी के प्रबन्ध का काम शोभावतों [7] को और हाथी पर जब महाराजा सवारी करें तब महावत का काम असायचों को सौंपा गया। राजा सूरसिंह के शासनकाल में गोयन्ददास भाटी ने सारा राज्य का प्रबन्ध बादशाही ढंग से कर दिया। [8]

3. ऐतिहासिक स्रोत और लोक-किंवदंतियाँ

जगदीशसिंह गहलोत के संग्रह से प्राप्त एक रजिस्टर में भाटी गोयन्ददास के पूर्वजों की जानकारी के साथ उनके जन्म स्थान का भी पता चलता है। [9]

इन किंवदंतियों का आधार यहां का ग्रामीण परिवेश रहा है। बारहटों, रावों, भाटों द्वारा गोयन्ददास भाटी के संबंध में कई कहानियां सैकड़ों वर्षों से सुनाई जाती रही हैं।

3.1 भाटी गोयन्ददास की वंशानुगत पृष्ठभूमि

भाटी गोयन्ददास की कहानी शुरू करने के लिये हमें जोधपुर के संस्थापक राव जोधा (Rao Jodha) के शासनकाल में झांकना होगा जहाँ उसके पूर्वजों का इतिहास जुड़ा हुआ है। जैसलमेर के रावल केहर का पोता और राजकुमार कलकरण का पुत्र भाटी जैसाजी देरावर [10] नगर के एक छोटे से दुर्ग में शांतिपूर्वक रहते थे।

राव रिड़मल (Rao Ridmal) को धोखे से चित्तौड़ में राणा कुम्भा ने मार डाला। यह घटना वि.सं. 1495 कार्तिक वदी 30 (ई. सन् 1438, 2 नवम्बर) की है। पन्द्रह वर्षों तक राव जोधा मंडोर (Mandore) पर अधिकार करने के लिये परिश्रम करते रहे और अपने भाई-बंधुओं व संबंधियों से सहायता मांगकर जब अपने आपको सक्षम पाया तब उन्होंने पुनः मण्डोर को लेने का निश्चय किया।

राव जोधा ने जैसलमेर के रावल केहरजी [11] के पौत्र भाटी जैसा से सहायता करने को कहा। इसके अलावा मण्डोर पर अधिकार प्राप्त करने के लिये अपने भाइयों बंधुओं, मालानी (Malani) के राठौड़ों, सिवाना के जैतमालोतों, पोकरणा राठौड़ों, सेतरावा के देवराजोतों, सांखला, हड़बू, रूपा के सांखलों, इंदवातो के इंदों, सेतरावा के गोगादे चौहानों [12] से सहायता मांगी।

भाटी जैसाजी ने राठौड़ जोधा को कहा यदि मैं आपको सहायता करूँ और मण्डोर का राज वापस मिल जाये तो राज्य का चौथा भाग मुझे देना होगा। जोधा ने विपत्ति का समय देखकर इसका इकरारनामा कर दिया। जब उन्हें अपनी बपौती का राज्य फिर, सभी की सहायता से मिल गया तो जैसाजी को उन्होंने जोधपुर की उत्तर दिशा में कई गाँव दिए जिनमें गाँव पळो धौ एक था।

राव जोधा जैसाजी भाटी के जंवाई भी थे, उन्होंने अपनी रानी लाला भटियाणी [13] की मार्फत अपने हाथ से लिखा इकरारनामा वापस प्राप्त करके, उसे नष्ट कर दिया।

3.2 सांखला खांप से वैमनस्य और शेरशाह सूरी काल का संघर्ष

यह कहानी आगे बढ़ाने के लिए उसी देशकाल की गतिविधियों में रहना होगा। जैसाजी पुत्र अणदा मारवाड़ में ही अपने जागीर के गांव में रहा। अणदाजी भाटी का एक पुत्र नीम्बाजी, गाँव उचियारड़े में रहता था, जिसको बहुत लम्बी दाढ़ी थी। इसी गाँव में सांखला राजपूत रहते थे, उन्होंने किसी उत्सव पर ‘खाजरू’ (बकरा) बलिदान हेतु मंगवाया जिसकी भी लम्बी दाढ़ी थी। सांखला नवयुवक उस दाढ़ी वाले बकरे की तुलना भाटी नीम्बाजी से करके शरारतें करने लगे।

बकरे का बलिदान करते हुए भी सांखलों ने हंसी-मजाक में कहा कि यह बकरा तो साक्षात् नीम्बाजी भाटी लगता है, दोनों की दाढ़ी एक जैसी लगती है। उस उत्सव में भाटियों का पोळपात बारहठ [14] ‘भींव’ भी उपस्थित था, उसे अपने यजमान का सांखलों द्वारा इस प्रकार अपमान करना असह्य हो गया। उसने वहां से जाना ही ठीक समझा और नाई के पास जाकर अपना सिर व मूंछें मुण्डवा कर नीम्बाजी के पास गया। नीम्बाजी ने बारहठजी से पूछा, “आप भदर किसके पीछे हुए हैं?”

भींवजी ने रोष जताते हुए कहा “जो जीवित ही मर गया, आप जैसा भाटी-आप ही के पीछे भदर हुआ हूँ।”

नीम्बाजी ने कहा कि “मैं तो जिन्दा बैठा हूँ, बात खोलकर बतावें तो समझ आए।” तब बारहठजी ने नीम्बाजी को बताया कि कल जिस बकरे का बलिदान सांखलों ने किया उसकी तुलना आपसे करके, उसका झटका किया गया।” नीम्बाजी के गुस्से का पार न था, उन्होंने अपनी तलवार निकाली और सांखलों पर पिल पड़े। सांखला खांप का उन्होंने खात्मा करने का निश्चय कर लिया था। सांखले उनके अचानक हमले से बेखबर रासरंग में डूबे थे, अतः वे ज्यादातर मारे गये। [15]

एक सांखला अपने प्राण बचाकर बादशाह शेरशाह के पास आगरा पहुंचा और वहाँ किसी अमीर के पास नौकरी करने लगा। वह रात दिन निंबा भाटी से बदला लेने का उपाय सोचने लगा। बादशाह ने एक दिन उसी अमीर को जोधपुर पर अधिकार करने का हुक्म दिया, जिसके यहाँ वह सांखला नौकर था। उस पठान का नाम जलालखां जलवानी था। उसने ताजादम फौज लेकर मारवाड़ की तरफ प्रस्थान किया।

उस सांखला ने मन ही मन एक षड्यंत्र विचार कर लिया और पहले ही मारवाड़ के बदलू¹⁵ [16] गाँव जा पहुँचा जहाँ से उसका मालिक अमीर जलाल खां गुजरने वाला था। जब वह सेना सहित बदलू गांव पहुँचा तो उसने अपने सेवक सांखला को देखकर प्रसन्नता व्यक्त की।

उसने अमीर को निवेदन किया “हजूर गुनाह माफ करें, मैं कुछ अर्ज करना चाहता हूँ, यदि इजाजत हो तो अर्ज करूँ”, इस पर जलालखां जलवानी ने उसे निर्भय होकर अपनी बात कहने का हुक्म दिया, तब उसने अपने षड्यंत्र को साकार होते जानकर झुककर सलाम करते हुए कहा, “हजूर ! गुस्ताखी माफ करायें! यहाँ से कुछ दूर उचियारड़ा गाँव में दुष्ट भाटी रहता है, जिसने मेरे पूरे वंश का कत्ल कर दिया था यदि आप उस अपराधी को दंड देते हुए जायें तो मेरे कलेजे में ठंडक पड़ जायेगी और मेरे पूर्वज भी आपको आशीष देंगे।”

जलाल खां अपनी सेना के साथ उचियारड़ा जा पहुँचा और अपनी तोपें नीम्बाजी के कुटुम्ब पर झोंक दी। नीम्बाजी का सारा कुटुम्ब सांखला के षड्यंत्र के कारण मारा गया। [17] नीम्बाजी स्वयं सुमेल गिरि के युद्ध में घायल हो चुके थे, उन्हें घायल अवस्था में कुछ राजपूत युवक रणक्षेत्र से उठा लाये थे, सो वे भी मारे गये। [18]

4. भाटी गोयन्ददास का जन्म और प्रारंभिक जीवन (Birth and Early Life of Goyanddas)

नीम्बाजी का पुत्र माना किसी प्रकार अपनी जान बचाकर उचियारड़ा से भाग निकला और केलावा गाँव के कांकड़ पर एक झोंपड़ी बनाकर किसी प्रकार अपने दिन व्यतीत करने लगा। वह अपनी पहचान छिपाकर सांखलों से बचकर रहता था, इसलिये गाँव में वह मेहनत मजदूरी करता था।

उसकी पत्नी उन दिनों गर्भ से थी और उसको यह चिंता सता रही थी कि वह प्रसव हेतु किसे बुलायेगा, साथ ही प्रसव के बाद सुहावड़ [19] की व्यवस्था करना भी उसके लिए असंभव था। ऐसी विपत्ति में उसे अपनी पत्नी का गर्भधारण करना और पूरे दिनों होना उसके लिये बड़ी चिंता का विषय था।

एक रात जब मांनाजी की पत्नी को प्रसव पीड़ा होने लगी तब उसने रसोई में जाकर बर्तनों को खंगाला तो पाया कि घर में कुछ भी शेष नहीं था। उनकी पत्नी ने चूल्हे पर गर्म पानी चढ़ाने की हिदायत दी और गाँव से किसी दाई को बुलाने को कहा। मांनाजी झोंपड़ी से बाहर देखते हैं कि कांकड़ पर एक ऊंटों का टोळा आया हुआ है और अनेक व्यापारी ठहरे हुए हैं।

मांनाजी ने सोचा दाई को तो बाद में ले आऊंगा, पहले इन व्यापारियों के डेरे से चोरी करके घी, आटे का जुगाड़ कर लूं। उस डेरे में एक अंधा जाट शकुनी सोया हुआ था, उसने अपने पास में सोये हुए चाकर को जगा कर कहा कि डेरे के बाईं तरफ कोई चोर चोरी करने की नीयत से आया लगता है।

मांनाजी भाटी शकुनी की बात को सुनकर दाहिनी तरफ ऊंटों के टोळे में जाकर छुप गये, तभी उसे अपनी झोंपड़ी से थाली बजने की शुभ आवाज सुनाई दी।

शकुनी जाट ने जैसे ही थाली की आवाज सुनी उसने अपने ज्ञान के आधार पर उस पल जन्मे बालक के भविष्य के संबंध में बोलते हुए कहा, “यदि यह बालक राजपूत के घर जन्मा है तो राजकाज में उसका बड़ा नाम होगा और राजा भी उससे पूछकर काम करेगा और यदि जाट के घर थाली बजी है तो यह बालक बड़ा होनहार होगा और गाँव में उसका डाला हुआ नमक पड़ेगा। बुद्धि चातुर्य में यह बालक बेजोड़ होगा और सदियों तक इसका नाम रहेगा।”

शकुनी की भविष्यवाणी को सुनकर मांनाजी भाटी ऊंटों की कतार से बाहर आये और शकुनी का हाथ थामते हुए उसके सामने बैठकर बड़ी अनुनय भरी वाणी में बोले- “हे गुणी चौधरी! आपके मुंह में घी शक्कर, परन्तु आप जिस बालक के संबंध में ऐसी भविष्यवाणी कर रहे थे उसका बाप तो दरिद्रता के मारे दो चार सेर अनाज चुराने की बदनीयती से इस डेरे में छुपा हुआ था, भला उसका जाया बालक भाग्यवान कैसे हो सकता है?”

मांनाजी भाटी ने अपनी आप बीती कह सुनाई जिसे उस टोले के व्यापारी ने भी सुन लिया तब उसने रहम खाकर मांनाजी को थोड़ा अनाज दे दिया।

मांनाजी अनाज की गठड़ी बांधकर जैसे ही मुड़े, शकुनी ने फिर उनसे कहा— “मैंने जो तुम्हें कहा है, उसे भूलना मत, जिस पल-घड़ी इस बालक का जन्म हुआ है उसका चमत्कार तो तुम्हें तुरन्त मिलेगा और तुम्हारी दरिद्रता शीघ्र मिटेगी।”

4.1 गुप्त धन की प्राप्ति और नामकरण

मांनाजी घर आये तो देखा कि बिना किंवाड़ां के दरवाजे वाले झोंपड़े के सामने एक चारपाई दरवाजे के सामने खड़ी की हुई थी और उसके ऊपर एक पर्दा लटक रहा था। बाहर कदमों की पदचाप सुनकर काले कपड़े पहने हुए अणछी दादी बाहर आई जो उसके घर से कुछ दूर रहती थी।

मांनाजी को देखकर डांटते हुए बोली— “अपनी पत्नी को इस तरह तड़फते हुए छोड़कर कहां चले गये थे? तुम मर्दजात हो ही ऐसे। यह तो ठीक था कि मैं अपनी बकरी को ढूंढ़ते हुए यहाँ से निकली तो झोंपड़े से ठकुरानी के कराहने की आवाज सुनकर मैं मौके पर पहुँच गई वर्ना, इस अबला को क्या न सहना पड़ता? इसकी नहीं तो होने वाले बच्चे का तो सोचते।”

मांनाजी भाटी ने शर्मिंदा होते हुए कहा, “क्या करूं दादी आपके घर की तरफ ही जा रहा था कि मुझे याद आया कि घर में तो एक दाना भी नहीं है इसलिये इसका इंतजाम करने में लग गया और देरी हो गई।”

दादी ने उलाहना देते हुए कहा— “मैं तुम्हारे भरोसे नहीं थी, अभी तो मैंने सब कुछ कर दिया, उसका मुंह ऐंठा भी करवा दिया है, परन्तु सुबह जापे का सारा सामान मुझे लाकर दो, उसे कूट-छान कर सुहावड़ तैयार करनी होगी। अगर वह खायेगी नहीं तो बेटे को दूध कहां से पिलाएगी?”

मांनाजी ने धीरे से कहा, “हाँ दादी कुछ करता हूँ।” तभी अणछी दादी ने उसे एक माटी का ढक्कन लगा पात्र थमा दिया और कहा घर के बाहर सवा हाथ खड्ढा खोदकर आंवळ को भंडार कर आ-जाओ।

उत्सुकतावश वह उस पात्र का ढक्कन खोलने लगा, तभी दादी ने डांटते हुए कहा “यह तुम्हारे देखने की चीज नहीं है, इस पर कपड़ा बांधकर जैसा कहा वैसा करो।”

मांनाजी ने बाहर एकान्त में जाकर खड्ढा खोदना शुरू किया और बड़े परिश्रम से अपने हाथ से मिट्टी निकालने लगा तभी उसका हाथ एक कठोर वस्तु से लगा और खोदने पर उसे एक तांबे का कलश नजर आया, जिसे उसने बाहर निकालकर देखा तो वह सोने की मोहरों से भरा हुआ था।

जैसे-तैसे आंवळ के पात्र को उस खड्ढे में भंडारा किया और कलश से कुछ मोहरें हाथ में से लेकर उस खड्ढे में डाल दी और हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हुए मांनाजी ने कहा, “हे धरती मां, आपने मेरी व्यथा को समझकर यह धन मुझे दया करके दिया है मैं इसका सदुपयोग ही करूँगा और इस बच्चे की परवरिश में ही खर्च करूँगा।”

मांना भाटी के दिन फिर गये और वह सुख से अपने परिवार के साथ रहने लगा। सोने की मोहरें बेचकर बकरियों का एवड़ खरीदा, घर में गाय भैंसें लाकर बांधी और चढ़ने के लिये एक घोड़ी लाया। घर में आये मेहमान को खूब आव-आदर देता था और किसी को खाना खिलाये बिना जाने नहीं देता था। चारणों का भी आव-आदर वह परंपरा अनुसार करता था।

अब घर में सब कुछ था, लक्ष्मी जैसी पत्नी और रिद्धि-सिद्धि का वास उसके घर में था, परन्तु जब भी वह अपने पुत्र को निहारता उसके मुंह पर उदासी छा जाती। बालक शरीर में खूब हष्ट-पुष्ट था, परन्तु रंग का काला-कलूट था। उसका बदसूरत चेहरा देखकर वह भगवान से मन ही मन लड़ाई करता कि पुत्र दिया तो ऐसा कुरूप क्यों दिया ?

अपने पुत्र का नाम मांनाजी ने गोयन्दा (गोविन्दा) रखा। धीरे-धीरे बालक बड़ा होने लगा। दिन के साथ वर्ष भी गुजरते गये, बालक गोयन्ददास सात-आठ बरस का हो गया, राइकों के साथ गोयन्ददास भी एवड़ चराने जाने लगा। मांनाजी भाटी राइकों [20] से बहुत स्नेह करते थे और उन्हें अपने वंश का भाईबंधु मानकर बड़े स्नेह से व्यवहार करते थे।

4.2 खींवसर ठकुरानी का व्यंग्य

बालक गोयन्ददास भी अपनी छोटी सी लाठी को हाथ में लेकर राइकों को साथ लेकर एवड़ चराने जाने लगा। एक दिन गोयन्ददास अपने एवड़ के साथ सबसे पीछे-पीते रास्ते पर चल रहा था। तभी पीछे कुछ घुड़सवार और पीछे पींजस में खींवसर [21] की ठकुरानी आ रही थी।

केलावा गांव के पास जब मार्ग में एक काले कलुटे बालक को बकरियों के पीछे-पीछे जाते देखा तो एक घुड़सवार ने उससे कहा, “अरे ऐ छोकरा बकरियां मार्ग से हटा ले।”

गोयन्ददास ने मुड़कर लाठी को जमीन में गाड़ते हुए और दोनों पांवों को चौड़ा करके जवाब दिया, “अरे ऐ किसको कह रहे हो, मैं राजपूत का बेटा हूँ और मेरा नाम गोयन्ददास भाटी है। बकरियां नहीं हटेंगी, मारग बहुत चौड़ा है आगे क्यों नहीं निकलते?”

तभी पींजस में बैठी खींवसर ठकुरानी ने थोड़ा परदा हटाकर बाहर देखने की कोशिश की कि ऐसा कौन सा बालक है जो निर्भय होकर जबान चला रहा है, उन्होंने देखा कि अति काला कुरूप लड़का छोटी पगड़ी बांधे हाथ में लाठी थामे जवाब-सवाल कर रहा है।

ठकुरानी ने अपनी दासी से गोयन्ददास की तरफ घृणा से देखते हुए लगभग उसे सुनाते हुए कहा, “कौन दोहितों की भूखी राजपूतानी होगी जो इस काले भुजंग को अपना जंवाई बनाकर दही देगी। [22] गोयन्ददास ने सारी बात सुन ली और मन में गांठ बांध ली तथा मस्ती से अपनी बकरियों को चराने लगा।

5. राजकुमार सूरसिंह से मिलन और राजसेवा में प्रवेश

कुछ बरस और बीत गये। गोयन्ददास पहले से लम्बा और हष्ट-पुष्ट हो गया। चौदह पन्द्रह वर्ष की आयु में भी वह हमेशा की तरह जंगल में बकरियाँ चरा रहा था। उसी समय जोधपुर के महाराजकुमार सूरसिंह [23] शिकार करते हुए सुअर के पीछे घोड़ा दौड़ाते हुए केलावा के पहाड़ के पास आ निकले, जहाँ वह बकरियाँ चरा रहा था। गोयन्ददास ने अपने हाथ में गुलेल थाम रखी थी और कन्धे पर मांटी की बगती [24] लटकाई हुई थी।

महाराजकुमार सूरसिंह ने गोयन्ददास को अपने पास बुलाया और पानी पिलाने को कहा। उसने तुरन्त जवाब देते हुए कहा, “आप पसीने से तरबतर हैं और शरीर तपा हुआ है इसलिये ठंडा जल पीना उचित नहीं होगा। आप घोड़े से नीचे उतरें और पेड़ की शीतल छाया में विश्राम करें और फिर जल का सेवन करें।”

महाराजकुमार को उस बालक की बातों ने प्रभावित किया और वे घोड़े से नीचे उतरे। गोयन्ददास घोड़े की लगाम पकड़ कर खींचने लगा और उसे छायादार वृक्ष से दूर एक कैर के खूंटे से बांध दिया।

महाराजकुमार ने घोड़े को धूप में बांधते देख उसे टोका तो गोयन्ददास ने जवाब दिया, “घोड़ा भी पसीने से तरबतर है और यदि उसे पेड़ की ठंडी छांव में बांध दिया गया तो उसका शरीर जकड़ जायेगा। इसलिये इसका थोड़ी देर तक हवा में पसीना सूखने दें और उसके बाद छाया में बांध देंगे।”

महाराजकुमार ने थोड़ी देर पेड़ के नीचे विश्राम किया, तब तक वह पास में चर रहे सांडियों के टोळे के पीछे चल रहे ओठी [25] राइके से तेहटा [26] मांग लाया और उसे साफ करते हुए अपनी बगती से पानी उंडेल कर उन्हें पीने को दिया।

महाराजकुमार उसकी सेवा से बहुत प्रसन्न हुए और पूछा, “बालक तुम्हारा नाम क्या है? उसने हाथ जोड़ कर कहा नाम तो भगवान का होता है, पर मेरे मां-बाप ने मेरा नाम गोयन्ददास भाटी रखा है।”

उन्होंने पूछा कि गुलेल से क्या करते हो तो उसने तपाक से गुलेल में एक गोल पत्थर डालकर तानते हुए बताया “मैं खरगोश का शिकार इसी से करता हूँ।”

महाराजकुमार ने उसके बुद्धि चातुर्य और सयाने व्यवहार से बहुत खुश होकर कहा, “तुम्हारे माता-पिता कहां हैं? मैं उनसे मिलना चाहता हूँ और क्या तुम मेरे साथ जोधपुर चल सकते हो?”

गोयन्ददास ने कहा “फिर मेरी बकरियां कौन चरायेगा और मेरे पिताजी के लिये हमेशा शिकार कौन लायेगा?”

महाराजकुमार ने उसे आश्वासन दिया कि यदि वह साथ चलने को तैयार हो तो उनके भरण-पोषण की व्यवस्था भी राज से की जायेगी। वे गोयन्ददास को लेकर उसकी ढाणी गये और मांनाजी भाटी से मिलकर उनसे गोयन्ददास को मांग लिया। मांनाजी को जाट शकुनी की बात सच होती नजर आई और उसने खुशी-खुशी अपने पुत्र को महाराजकुमार की सेवा में जाने की सहमति दे दी।

गोयन्ददास झोंपड़े के अंदर गया और अपनी मां के चरण स्पर्श करके जोधपुर जाने की इजाजत ली। ठकुराइन ने अपने पुत्र के माथे को चूमा और सजल नेत्रों से उसके मुंह पर हाथ फेरते हुए विदा किया। रास्ते में खाने के लिये एक पोटली में कुछ बांध कर उसे दे दिया। तब तक महाराजकुमार के अन्य बिछड़े सैनिक भी आ पहुँचे थे।

गोयन्ददास को एक सैनिक के साथ घोड़े पर बिठाया और वे जोधपुर की तरफ सरपट चल पड़े। उसकी तकदीर ने पलटा खाया, बकरियां चराते-चराते वह जोधपुर के दुर्ग तक अपनी योग्यता से पहुंचने वाला था। गोयन्ददास मन में कल्पनाएं कर रहा था कि उसे जोधपुर जाने पर राजाजी के दर्शन होंगे जिनके सम्बन्ध में अपने पिता से कई कहानियां सुन चुका था। जोधपुर के गढ़ को देखने का रोमांच भी उसे कम नहीं हो रहा था।

5.1 बीसलपुर के हवलदार के रूप में प्रथम सफलता

महाराजकुमार ने गोयन्ददास को कुछ दिनों तक शिकारखाने में रखा और फिर हवलदार का पद देकर अपने हाथ खर्च के गांव बीसलपुर, जो जोधपुर से 9 कोस पूर्व में पड़ता था, भेज दिया। वहाँ भी उसने अपने हुनर का कमाल दिखाया, अपने सुप्रबंध से बीसलपुर की आय की जमाबंदी में बढ़ोत्तरी की और योग्य राजपूत तथा अच्छी नस्ल के घोड़ों को रखकर महाराजकुमार सूरसिंह की सरकार को अन्य भाइयों की सरकार से श्रेष्ठ बनाकर दिखा दिया। दी

वाली पर सभी हवाले के हवलदार मय कणवारिये [27] जोधपुर पहुंचे। गोयन्ददास ने बीसलपुर जागीर का लेखा-जोखा महाराजकुमार के समक्ष पेश किया जिसे देखकर वे बहुत खुश हुए और राजा उदयसिंहजी के सम्मुख बुलाकर उसे सिरोपाव दिलाया। अपनी जिंदगी की पहली सफलता व सभा का सम्मान पाकर गोयन्ददास को भविष्य में बड़े काम करने की प्रेरणा मिली। गोयन्ददास की फिर से नियुक्ति बीसलपुर में की गई। कुछ दिनों बाद उसे समाचार मिला कि मोटा राजा उदयसिंहजी बादशाह अकबर के निमंत्रण पर जाने वाले हैं।

वि. संवत् 1654 को मोटा राजा उदयसिंह ने महाराजकुमार सूरसिंह के साथ लाहोर की ओर प्रस्थान किया, जहाँ बादशाह अकबर की इच्छा से सूरसिंह का विवाह कछवाहा दुर्जनशाल की कन्या [28] से कर दिया गया। गोयन्ददास ने, एक बार जब राजा उदयसिंहजी का काफिला बीसलपुर के पास से गुजर रहा था तब, महाराजकुमार सूरसिंह को निवेदन किया कि आपकी तरफ से बीसलपुर में राजाजी को यदि गोठ दी जाये तो सारी सामग्री का प्रबन्ध अल्पदाम में और तुरन्त की जा सकेगी।

महाराजकुमार ने अपने पिता को अपनी जागीर के गांव में ठहर कर गोठ लेने की अर्ज की तो राजा उदयसिंहजी ने तुरन्त स्वीकृति दे दी। जब राजा का लवाजमा प्रस्तावित डेरे पर पहुंचा तो वहां की सुचारु व्यवस्था और हर वस्तु अपने स्थान पर उपलब्ध देखकर राजा उदयसिंहजी भी बहुत प्रभावित हुए। भाटी गोयन्ददास ने जिम्मेदारियों का बंटवारा अपने अधीनस्थ कर्मचारियों में कर दिया था और आस-पास के गांवों से दूध-दही पहले से ही मंगवा लिया गया था। घोड़ों के लिये अस्तबलों की अलग से व्यवस्था थी और खासा रसोड़ा भी राजपरिवार के लिये सभी तैयारियां कर चुका था।

विभिन्न प्रकार के शिकार के मांस, सूलें, बूंदें तैयार हो रही थी और बिना किसी हल्ले के सभी व्यवस्थाएं सुचारू रूप से शांति से चल रही थी। राजा उदयसिंह ने देखा कि अस्तबल में आते ही घोड़ों को गुड़ फिटकरी [29] देने की व्यवस्था पूर्व में की हुई थी और हरे चारे की माकूल व्यवस्था थी। हर तम्बू के बाहर सेवक हाथ बांध खड़े थे। कड़ावों में पानी गरम हो रहा था। भील, खाजरुओं की खाल उतार रहे थे और कनात के पीछे बड़ी-बड़ी देगों में भोजन पक रहा था। गांव के कुम्हार ऊंटों की खालों में तालाब से पानी लाकर कड़ावों में छानकर भर रहे थे।

6. मोटा राजा उदयसिंह की सेवा और शाही दरबार की कूटनीति

उदयसिंह ने मन ही मन विचार किया कि इस सब व्यवस्था के पीछे गोयन्ददास भाटी की ही सूझबूझ है। उन्होंने ठान लिया कि ऐसा चतुर आदमी तो मेरे पास होना चाहिये। गोयन्ददास ने राजा की आंखों के भावों को भांप लिया था और भोजन करते हुए भी गोयन्ददास को उन्होंने कई अप्रत्यक्ष प्रश्न पूछे और उसकी मंशा जानने का प्रयत्न किया। खासे के (राजा के) थाल में विविध प्रकार के व्यंजनों का स्वाद अनूठा था और इतने कम समय में इतनी बड़ी व्यवस्था को देखकर राजा उदयसिंहजी अचंभित थे। राजाजी ने उसकी पीठ थपथपाते हुए कहा, “भाटी मैं चाहता हूँ कि तुम भी मेरे साथ चलो, तुम्हारी व्यवस्था को देखकर मैं बहुत खुश हूँ।”

गोयन्ददास ने हाथ जोड़ते हुए अर्ज किया, ‘अन्नदाता, महाराजकुमार साहब इजाजत बख्श देंगे तो मेरी “ना” थोड़े ही है।” उसके जवाब एवं चतुराई से उदयसिंहजी प्रसन्न हुए। गोयन्ददास तुरन्त महाराजकुमार सूरसिंह के डेरे में गया और उन्हें निवेदन किया, “मरुधराधीश आप द्वारा दी गई गोठ से बहुत प्रसन्न हैं और मुझ नाचीज चाकर की सेवाओं से भी वे खुश नजर आये हैं, मेरी इच्छा तो नहीं पर वे आपसे मुझको मांग लेंगे। मैं अपने लिये नहीं, आपके हित के लिये राजाजी के साथ उनकी हाजरी में रहूँगा तो आपका भविष्य में कुछ फायदा अवश्य ही करूँगा।”

गोयन्ददास ने महाराजकुमार को विश्वास दिलाया कि स्वामिभक्ति सदा उनके प्रति अडिग रहेगी, इसलिए उसका राजाजी के साथ रहने में ही उनका हित है, इस बात को उसने अच्छी तरह महाराजकुमार के गले उतार दिया।

अभी यह बातचीत चल ही रही थी कि राजा उदयसिंह ने महाराजकुमार को अपने डेरे में बुलाने के लिये किसी सेवक को भेजा। वे मानसिक रूप से गोयन्ददास को देने को तैयार होकर गये थे। जैसे ही उन्होंने महाराजकुमार से गोयन्ददास की प्रशंसा करना शुरू किया सूरसिंह ने बड़ी नम्रता से अपने पिता को निवेदन किया “अगर आप नाराज न हों तो आपसे अर्ज करना चाहता हूँ कि गोयन्ददास आपकी हाजरी में रहे तो ज्यादा अच्छा रहेगा। आपके साथ रहकर बादशाह अमीरों की सोबत उसे मिलेगी, तो हमारी रियासत के लिये भी एक होनहार वफादार राजपूत तैयार होगा।”

महाराजकुमार के जवाब से राजा उदयसिंह अति प्रसन्न थे क्योंकि उनके मुंह की बात और मन की बात अपने आप हो रही थी। गोयन्ददास, राजा उदयसिंहजी के साथ चल दिया। उदयसिंह ने गोयन्ददास को अपने साथ पाकर बड़ी प्रसन्नता व्यक्त की और लाहोर जाते ही उन्हें एक योग्य वकील के पास शिक्षित होने के लिये रख दिया। वकील भी गोयन्ददास की हाजिर जवाबी और स्मरण शक्ति से बहुत प्रभावित हुआ। गोयन्ददास अक्सर अपने वकील के साथ बादशाह अकबर (Akbar) के अर्थमंत्री राजा टोडरमल (Raja Todarmal) से मिलने जाते थे।

6.1 राजा टोडरमल की प्राण-रक्षा और वचन

कई बार टोडरमल भी उसकी चतुराई से अत्यधिक प्रभावित हुए। कालान्तर में जिस वकील के पास गोयन्ददास को रखा गया था, वह रोगग्रस्त हो गया और उसकी जिम्मेदारी संभालने लायक वह हो ही चुका था अतः वह धीरे-धीरे वकील की तरह काम करने लग गया। राजा टोडरमल के साथ पालकी में गोयन्ददास भी आने-जाने लगा, एक दिन टोडरमल की पालकी किसी सुनसान जगह के पास से जा रही थी, रात का समय था किसी दुष्ट ने तलवार से उन पर हमला कर दिया।

दुश्मन ने सोचा कि पालकी में टोडरमल अकेले हैं, परन्तु रात के अंधेरे में काले कलूटे गोयन्ददास का पालकी में होना उसे नजर न आया। गोयन्ददास ने उसके वार को अपने हाथों पर झेल लिया। फिर भी थोड़े बहुत दोनों जख्मी हुए और हमलावर अंधेरे का लाभ उठाकर भाग निकला। [30]

भाटी की सतर्कता से टोडरमल की जान बची, उसने गोयन्ददास से प्रसन्न होते हुए कहा, “आज से पहले भगवान की दी हुई आयु के कारण जिन्दा था और आज के बाद तुम्हारी दी हुई जिन्दगी से जीऊंगा। बोलो मुझसे क्या मांगते हो? जो मांगोगे वह तुम्हें मिलेगा।”

गोयन्ददास ने उनके चरणों को छूते हुए कहा “मैं अपने लिये कुछ नहीं चाहता पर अपने मालिक के लिये आपसे वचन मांगता हूँ कि “महाराजकुमार सूरसिंह पाटवी पुत्र नहीं हैं, मैं उनके लिये जोधपुर राज्य की गद्दी मांगता हूँ।” राजा टोडरमल ने चिंतित होते हुए परेशानी में जवाब दिया, “भाटी तुमने बहुत बड़ी व अनहोनी मांग की है, फिर भी मैं कोशिश करूँगा कि अपना वचन निभा सकूं।”

भाटी गोयन्ददास को मन ही मन विश्वास था कि टोडरमल अपने पासे समय आने पर अवश्य खोलेगा। मोटा राजा उदयसिंहजी संवत 1651 की आषाढ़ सुद 15 शुक्रवार 11 जुलाई ई. सन् 1595 [31] को लाहोर में देवलोक हुए। किंवदंतियों में ऐसा अक्सर सुना गया कि लाहोर में मोटा राजा उदयसिंहजी के अदीठ फोड़ा [32] हुआ जिसके कारण वे दिन-दिन उसके दर्द से तड़पने लगे।

राजा टोडरमल ने मोटा राजा की अंतिम घड़ी नजदीक देख गोयन्ददास से कहा, “सूरसिंह से कहना कि जब उसके पिता का देहान्त हो तो मुण्डन न करावे और जब बादशाह मातमपोशी के लिये डेरे आयें, तब सबसे पहले उठकर बादशाह की अगवानी करे। उन्होंने वैसा ही किया। जब बादशाह शोक-मिलन हेतु उनके डेरे आये [33] तो जोधपुर राजगद्दी का उत्तराधिकारी घोषित किया। राजा टोडरमल ने अपने प्रभाव से गुप्त रूप से सूरसिंह का नाम फरमान में लिखाकर भाटी गोयन्ददास को दे दिया।

सूरसिंह को बादशाह ने सवाई राजा की उपाधि दी इस सबके पीछे गोयन्ददास की राजनीति ने काम किया था। इस सच्चाई को सूरसिंह अच्छी तरह समझते थे। सूरसिंह के अन्य भाई, मन ही मन उनके राजा बनने पर दुखी थे पर सबसे ज्यादा नाराज किशनसिंहजी थे जिन्होंने कालान्तर में किशनगढ़ राज्य की नींव रखी।

7. प्रतिशोध और विवाह संबंध

एक दिन सवाई राजा सूरसिंह ने गोयन्ददास को कहा, “अब तुम शादी क्यों नहीं कर लेते?” गोयन्ददास ने कुछ सोचकर कहा, “जहाँ मैं विवाह करना चाहता हूँ अगर आप मेरा तोरण बंधवा दें तो आपका अहसान मानूंगा।” सवाई राजा ने आश्चर्य के साथ पूछा, “गोयन्ददास तुम कहां विवाह करना चाहते हो, स्पष्ट रूप से मुझे बताओ। [34]

गोयन्ददास ने हाथ जोड़कर नम्रतापूर्वक निवेदन किया, “अन्नदाता अगर आप मुझे विवाहित देखना ही चाहते हैं तो मेरा विवाह बगड़ी ठाकुर की लड़की से करवा दें।” सवाई राजा सूरसिंह ने बगड़ी के ठाकुर बाघसिंहजी को संदेश भेजकर जोधपुर बुलवाया और उन्हें अपनी पुत्री का विवाह गोयन्ददास से करने की बात कही।

इस पर ठाकुर बाघसिंहजी ने पास रखी पानी की जरजरी का ढक्कन खोला और दाहिने हाथ की हथेली में जल डाला। सवाई राजा सूरसिंह को समझ में नहीं आ रहा था कि उनके प्रश्न का जवाब देने के बदले ठाकुर हथेली में जल क्यों भर रहे हैं?

ठाकुर बाघसिंह जैतावत ने राजाजी के चरणों को एक हाथ से छूते हुए कहा “मैं हजूर के चरणों की सौगंध खाकर तीन हजार तलाक देता हूँ, [35] मैं तो क्या मेरी सम्पूर्ण जैतावत खांप, जैसा भाटियों सहित समस्त भाटियों को अपनी बेटी न देने का आज अभी से प्रण लेता हूँ” और उन्होंने धरती पर जल छोड़ दिया। सवाई राजा सूरसिंह अवाक से देखते रह गये और उन्हें ऐसी परिस्थिति में क्या करना चाहिये कुछ समझते न बना। बगड़ी ठाकुर ने झुककर मुजरा किया और दौलतखाने से सीख लेकर चल पड़े।

गोयन्ददास भी पीछे खड़ा सब कुछ देख सुन रहा था। वह भी असमंजस में था। उसने तुरन्त सामने आकर सवाई राजा को उस असहज स्थिति से बाहर निकालते हुए कहा, “अन्नदाता! बगड़ी के ठाकुर ने आपके चरणों की सौगंध खाकर प्रण किया है इसलिये अब मैं भी उनके प्रण का आदर करते हुए मेरे निवेदन को वापस लेता हूँ। सूरसिंह ने उसकी पीठ थपथपाते हुए कहा, “मारवाड़ में तेरे लिये गिनायतों की कमी नहीं है, एक ठाकुर ने प्रण लिया है, सबने तो नहीं, बोल तेरी दूसरी पसंद कौन है? वहीं पर तेरा विवाह कराने का मैं आज से प्रण लेता हूँ।”

गोयन्ददास के कानों में खींवसर की ठकुरानी का व्यंग्य आज भी गूंज रहा था, उसने सवाई राजा सूरसिंह को निवेदन किया, “अन्नदाता! हो सके तो मुझे खींवसर के ठाकुर की लड़की से विवाह करा दिरावें पर यह कैसे संभव होगा, यह आपको सोचना है।”

सवाई राजा सूरसिंह ने राजतेज व अपने प्रभाव के साथ दबाव का प्रयोग करते हुए खींवसर ठाकुर को अपनी पुत्री का विवाह गोयन्ददास से करने का आग्रह, आदेश के रूप में किया। उस सयम खींवसर के ठाकुर करमसोत हरीसिंहजी [36] थे। यह ज्ञात नहीं होता कि यह विवाह हो पाया या नहीं।

गोयन्ददास भाटी ने नारवा के देवीसिंह की अल्पायु पुत्री ओमकंवर से विवाह करने का प्रयास बुढ़ापे में किया और छल-बल से नारवां पर फौज भेजकर हमला करवाया। [37]

7.1 खींवसर में तोरण और रत्नावती का प्रसंग

गोयन्ददास के अहम् को संतुष्टी मिली कि कम से कम उसका अपमान करने वाली एक ठकुरानी से तो वह अपना बदला ले पा रहा है। ब्याह की तैयारियाँ जोर शोर से होने लगी।

गोयन्ददास की बारात में मारवाड़ के बड़े-बड़े जागीरदार सेठ साहुकार भी गये। मुहूर्त के अनुसार निकासी हुई। मोड़ तुर्रा कलंगी बंधाकर काले कलूटे गोयन्ददास विवाह के लिये खींवसर जाने को विदा हुए। तोरण दस्तूर करने के लिए गोयन्ददास हाथी के होदे चढ़े। खींवसरगढ़ की सिरे पोळ होते हुए हाथी चढ़े दुल्हेराजा सासू – आरती के लिये जनानी ड्योढ़ी पर पहुंचे।

ठकुरानी को गोयन्ददास की शक्ल देखकर वह सारी घटना स्मरण हो आई। ठकुरानीजी ने दुल्हे राजा को अपनी हथेली से दही दिया।[38] बगड़ी के ठकुरानीजी भी अपनी बहन की पुत्री के विवाह पर खींवसर आये हुए थे। उन्होंने ड्योढ़ी पर खड़े साक्षात राहू के रंग रूप के जंवाई को देखकर अपना माथा पीट लिया और अपनी बहन से कहा “क्या अपनी चांद जैसी रत्नावती के लिये यही भैंसासुर बचा था?”

उधर खींवसर के ठाकुर हरिसिंहजी ने भी तोरण पर आये जंवाई को देखकर अपनी बेबसी और लाचारी को भुलाकर बरातियों के सामने जल हाथ में लेकर संकल्प छोड़ा और कहा, “आज के बाद हमारे घराने की कोई भी कन्या जैसा भाटियों की खांप में कभी नहीं जायेगी।” जनानी ड्योढ़ी में फेरों के बाद दुल्हन को जनवासे के लिये विदा किया गया, जहाँ खोल भराई की रस्म होगी। रत्नावती को मां व मांसी ने अपनी छाती से लगा कर विदा किया और उसको समझाया कि “विधाता के लेख जो लिखे हैं, उन्हें कोई मिटा नहीं सकता।”

जनवासे के लिये ढोल-ढमाके के साथ दुल्हा-दुल्हन को विदा किया गया। बरातियों ने पूरे रास्ते भर मांडा बरसाया।[39] दुल्हन की डोली जनवासे तक पहुंची और दासियों ने जैसे ही डोली का परदा हटाया, तो देखकर सभी चीख पड़ी क्योंकि कुंवरी रत्नावती के मुंह से सफेद झाग निकल रहे थे और आंखें पथरा चुकी थी। रत्नावती ने अपने पिता के निर्णय को तो स्वीकार किया, पर अपने पीहर की ड्योढ़ी को लांघते ही जहर खा लिया। बाद में शायद दुल्हन को बचा लिया गया। [40]

सवाई राजा सूरसिंह ने मालानी के महेचों पर भी दबाव डाला कि वे अपने कुटुम्ब की लड़कियों का विवाह गोविन्ददास भाटी व उनके भाई-भतीजों के साथ करें। [41]

8. भाटी गोयन्ददास द्वारा शाही पट्टा फाड़ना और मारवाड़ की रक्षा

सवाई राजा सूरसिंह का जोधपुर की राजगद्गी पर बैठना उनके बड़े भाई किशनसिंहजी को अच्छा नहीं लगा, यहाँ तक कि उनके नौकर-चाकर और उनके हरिजन तक यह आस लगाकर बैठे थे कि महाराजकुमार किशनसिंहजी ही बड़े होने के नाते जोधपुर की राजगद्दी पर बैठेंगे। कहानी-किस्सों में तो इस प्रसंग को सुना जाता रहा है, परन्तु जगदीशसिंहगहलोत ने भी इस प्रसंग को अपने लेख में इस प्रकार लिखा है, “यहाँ तक कि किशनसिंह के हरिजन ने बादशाही हरिजन से कहा हमारा बड़ा अनर्थ हुआ है, क्या करें और किससे कहें और कौन हमारी सुने? बादशाही हरिजन ने कहा यहाँ तो मेरा कुछ बस नहीं चलता। कई सप्ताह

बाद बादशाह शिकार के लिये अपने लवाजमे के साथ गये तब उस हरिजन को भी पाखाना सफाई के लिये साथ लिया गया। एक दिन जब बादशाह पाखाना में थे तब बादशाह को सुनाते हुए हरिजन अपनी पत्नी से कनात के पीछे बतियाने लगा पहले बादशाह सलामत के न्याय पर लोगों का दृढ़ विश्वास था, परन्तु आजकल हमारे बादशाह सलामत भी वजीर के कहने में आकर बहुत बड़ा अन्याय कर दिया। हरिदान हरिजन की पत्नी ने जोर से पूछा— अरे मुझे भी बताओ ऐसा अन्याय किसके साथ हुआ?

हरिजन ने कहा— अब बताने से क्या फायदा जोधपुर के छोटे कुंवर को राज दे दिया और राजगद्दी के हकदार किशनसिंहजी को कुछ भी नहीं दिया। उनकी दुराशीष तो लगेगी ही।” बादशाह सब कुछ सुन रहे थे। वे शिकार भूल गये और वापस राजधानी चलने का आदेश हुआ। वापस आकर उन्होंने वजीर टोडरमल को आदेश दिया कि जोधपुर का पट्टा किशनसिंह को लिख दो। राजा टोडरमल को समझ नहीं आई कि किसने क्या कहा, परन्तु उन्हें तो बादशाह की आज्ञा का पालन करना पड़ा।

सूरसिंह के नाम का पट्टा खारिज किया गया और किशनसिंह के नाम का पट्टा लेकर उनका आदमी राजी-राजी रास्ते पर जा रहा था, तभी गोयन्ददास को देखकर वह पट्टा उन्हें दिखाकर उसने कहा, “गोयन्ददास बादशाही पट्ट्टा ऐसा होता है, शायद आपका काम नहीं पड़ा होगा।” गोयन्ददास ने उसके हाथ से पट्टा लेकर पढ़ा तो उसके हाथों के तोते उड़ गये। भाटी गोयन्ददास ने आव देखा न ताव पट्टे के टुकड़े-टुकड़े करके फाड़ डाला और भागकर सीधा टोडरमल के यहाँ गया।

टोडरमल ने गोयन्ददास की हरकत को सुनकर माथा ठोक लिया और कहा- “तूने ये क्या गजब कर दिया”

गोयन्ददास ने कहा “आप बेफिकर रहें, इसका जवाब बादशाह को मैं दे दूंगा।”

इतने में ही बादशाह की तरफ से टोडरमल को बुलावा आ गया। बादशाह अत्यधिक क्रोध में लाल-पीले हो रहे थे जैसे ही टोडरमल के साथ गोयन्ददास को देखा तो उन्होंने कहा ‘तुमने शाही फरमान को ही नहीं फाड़ा है, उस आसमान को फाड़ा है, जिसके नीचे तुमने शरण ली है।”

गोयन्ददास ने अत्यन्त नम्रता और आत्मविश्वास भरे स्वर में जवाब देते हुए कहा, “आलमपनाह मेरे सौ गुनाह माफ करने का हुकम फरमावें तो हजूर को हकीकत पेश करूँ।”

बादशाह ने भाटी गोयन्ददास की दलील को सुनना ठीक समझा और आदेश दिया, “क्या कहना चाहते हो? जो माबदौलत ने सुना उससे अलग है।”

गोयन्ददास ने बड़ी चतुराई से शब्दों का खेल खेलते हुए कहा, “जहाँपनाह मैंने तो कोई शाही फरमान नहीं फाड़ा है, देखिये आलमपनाह के दस्तखत और शाही मोहर तो अखण्ड मेरे दिल के करीब मेरे माथे पर चढ़कर पगड़ी में सुरक्षित रखी है, जहाँ मैं अपने इष्ट देव कृष्ण भगवान की मूर्ति रखता हूँ।”

कहते हुए उसने शाही मुहर एवं बादशाह के हस्ताक्षर वाला कागज टुकड़ा पेश किया और तीर निशाने पर लगा देख आगे बोला, “हजूर मेरे मालिक के दुश्मन का नाम जरूर फाड़ा है, क्योंकि जो आलमपनाह के शाही फरमान की हिफाजत नहीं कर सकते, वे नौ-कौटी मारवाड़ की रक्षा कैसे कर पायेंगे? आपने पहले मारवाड़ को सूरसिंह को लिख दिया था, वह फैसला आपने अपनी अक्ल व समझ से किया था…. हजूर ने पाखाने में बैठकर वह फैसला नहीं किया था।”

बादशाह ने कहा, “हां हमारे सब फैसले अपने खुद के होते हैं….. हम तुम्हारी दलीलों से रजामन्द हैं।” इस प्रकार वापस मारवाड़ का राज्य सूरसिंह का रहा। [42]

9. भाटी गोयन्ददास को जागीर प्राप्ति

राजा सूरसिंह के लिए गोयन्ददास की यह चतुराई अहसान योग्य थी, वरना जोधपुर का राज तो किशनसिंहजी को चला ही गया था। उस खुशी में राजा सूरसिंह ने गोयन्ददास को ब्याह रचाने का आग्रह किया और उसने अपने मन की बात बताते हुए ब्याह रचाकर पुराने अपमान का बदला लेना चाहा था।

राजा सूरसिंह किसी तरह भाटी गोयन्ददास का अहसान उतारना चाहते थे। एक दिन गढ़ पर बुलाकर पूछा “तुम्हें कहां तक दिखता है?”

उसने जवाब में कहा, “यहाँ से मेड़ता तो मुझे अच्छी तरह नजर आ रहा है।” राजा ने दीवान को हुकम दिया कि मेड़ता का परगना गोयन्ददास को लिख दो। दीवान ने राजा का आदेश तो ले लिया लेकिन कोई कार्यवाही नहीं की। कुछ दिन गुजर जाने के बाद गोयन्ददास ने राजा को फिर याद दिलाया कि दीवानजी शायद भूल गये हैं। बार-बार कहने पर दीवानजी ने मेड़ता परगना गोयन्ददास के नाम लिख दिया। उसमें उन्होंने यह भी लिख दिया कि “मेड़ता भाटी गोयन्ददास को इनायत हुआ है सो कुम्हारों के दो घर खालसा रखकर बाकी सब परगने में उसका सब अमल करा देना।”

राजा सूरसिंह ने फरमान में दीवान की अनोखी भाषा देखकर पूछा, “दीवानजी आपने यह क्या लिख दिया है?

दीवान ने हाथ जोड़ते हुए अर्ज किया “जो सत्य है वही लिखा है” ……आपके पूर्वजों ने अनेक गांव जागीर के रूप में बख्शे हैं परन्तु आज तक पूरा परगना किसी को नहीं मिला है। मारवाड़ में परगने हैं ही कितने और लेने वाले इस भाटी जैसे बहुत हैं। जब यूं परगने इनायत होने लगे तो एक दिन आपके पास क्या रहेगा? आप कहां के राजा रहेंगे और मैं कहां का दीवान कहलाऊंगा? वैसी परिस्थिति आने पर मैं इन कुम्हारों के घर से खप्पर लेकर कुछ खाने को मांग लाया करूँगा और हम उसी से गुजारा करेंगे।” [43]

दीवान की सच्ची बात सुनकर राजा सूरसिंह सोच में पड़ गये और तुरन्त निर्णय लेते हुए गोयन्ददास को उसकी बपोती के उजड़े गांव उचियारड़े के पास अन्य कई गांव देने की स्वीकृति दी। गोयन्ददास ने लवेरा⁴² गांव को अपने रहने के लिए ठीक समझा और उसे प्रधान [44] का पद भी मिला।

मारवाड़ में गोयन्ददास ने प्रधान बनते ही, बुद्धि चातुर्य से सारे राज्य का प्रबन्ध अपने हाथ में ले लिया। मारवाड़ के राज्य की सभी व्यवस्थाओं, कायदों और कानूनों को बदलकर मुग़लिया सल्तनत की व्यवस्थाओं को लागू करना प्रारम्भ किया और सारे मारवाड़ में उसका दबदबा निरंतर बढ़ता गया। उन दिनों मारवाड़ में निम्न कहावत प्रचलित हुई—

“गोयन्ददास गरजियो सूरांहदे वारे।

कोई थापै, केई उथपै, मेवासा मारे।।”

अर्थात् गोयन्ददास राजा सूरसिंह के साथ सम्पूर्ण मारवाड़ में गरजा। मारवाड़ में वही किसी को स्थापित करता है और जब चाहे उखाड़ फेंकता है तथा मेवासा अर्थात् मेणों व भीलों के गांवों में भी उसका आतंक था।

10. दुश्मनी और दुखद अंत

गोयन्ददास एक मामूली घर से अपनी चतुराई, हुनर व योग्यता से जोधपुर गढ़ तक पहुंचा। बादशाही हकूमत तक उसकी पैरवी थी। मारवाड़ में उसका डाला नमक गिरता था। सूरसिंह के प्रति अपनी स्वामिभक्ति के कारण उसने किशनसिंहजी [45]को अपना प्रबल दुश्मन बना लिया। किशनसिंह (Maharaja Kishansingh) का गोयन्ददास से नाराज होना सही भी था क्योंकि उसने बादशाह के शाही फरमान को फाड़ दिया था।

दूसरा अपराध भाटी ने यह किया कि महाराजकुमार किशनसिंह को उनके पिता मोटा राजा उदयसिंह (Mota Raja Udai Singh)  से गांव दूधोड़, जो सोजत परगने में था और उसके साथ अन्य कई गांव जागीर में मिले थे, उनको भी गोयन्ददास ने सवाई राजा सूरसिंह से कहकर जब्त करवा दिया था। किशनसिंह, गोयन्ददास से बदला लेने की फिराक में हमेशा रहते थे परन्तु उनका कोई दाव नहीं लगता था।

एक बार किशनसिंह को अपने मन की करने का मौका मिला। जब अजमेर में बादशाह जहांगीर की सवारी आई तो उनकी अगवानी के लिए जोधपुर से सवाई राजा सूरसिंह और भाटी गोयन्ददास गये। उसी अवसर पर किशनसिंहजी भी अजमेर आये। एक सुनसान रात को किशनसिंहजी ने षड्यन्त्र कर अपने कुछ आदमियों को गोयन्ददास के तम्बू में भेजा। उस समय गोयन्ददास लोटा लेकर शौच करके आ रहा था कि किशनसिंहजी के राजपूतों ने उस पर हमला कर दिया। उसने लगभग 16 शत्रुओं को अपने लोटे से मार गिराया, परन्तु अन्त में भाटी गोयन्ददास की उन्होंने हत्या कर दी। [46]

सवाई राजा सूरसिंह को गोयन्ददास के मारे जाने का समाचार मिला तो वे विचलित हो उठे, उन्होंने अपने पुत्र गजसिंह से कहा कि किशनसिंह ने मेरे डेरे पर ऐसी बेहूदगी करके गोयन्ददास को मारा है सो वह भी जीते जी जाने न पावे अतः महाराजकुमार गजसिंहजी (Maharajkumar Gajsingh) ने कुछ फौज के साथ उनका पीछा किया और किशनगढ़ के रास्ते पर किशनसिंह को, सगतसिंह के बेटे रामकरण और अन्य 80 दुश्मनों को मार गिराया। इस प्रकार मारवाड़ के एक स्वामिभक्त का दुखद अन्त हुआ।

10.1 भाटी गोयन्ददास की हवेली का ऐतिहासिक उल्लेख

महाराजा तख्तसिंहजी की ख्यात में एक बात की और जानकारी मिलती है कि संवत् 1914 में जब अकस्मात गोपाल पोळ के पास पहाड़ में रखे बारूद पर बिजली गिरी थी उस समय गोपाल पोळ के पास ही गोयन्ददास की हवेली भी थी जो उस धमाके के साथ उड़ गयी थी। उस धमाके में चामुण्डा माताजी का मंदिर भी उड़ गया था परन्तु चामुण्डा माताजी की मूर्ति यथावत अपने स्थान पर रही।[47]

संदर्भ (Refrences)


[1] रतनरासो ग्रंथ के रचयिता कुंभकरण का दादा माला सांदू भी प्रारम्भ में गोयन्ददास की सेवा में रहा। संदर्भ-कुंभकरण सांदू, ले. नारायणसिंह सांदू, पृ. 22, प्रकाशक-म.मा.पु. प्रकाश, जोधपुर।

[2] जोधपुर राज्य की ख्यात— रघुवीरसिंह व मनोहरसिंह राणावत, पृष्ठ 133.

[3] दत्ताणी युद्ध में मारे जाने वाले शहीदों के भाई-भतीजों का रिश्ता मेवाड़ की कन्याओं के साथ निश्चित किया गया। मालानी के राठौड़ों के साथ जोधपुर के शासकों का जो मन मुटाव था उसे भी गोयन्ददास के प्रयासों से सुलझा दिया गया।

[4] सवाई राजा सूरसिंह के महाराजकुमार गजसिंह को एक बार शीतला माता का प्रकोप हुआ तब गोयन्ददास ने अपने ज्येष्ठ पुत्र मोहनदास को महाराजकुमार पर अंवारकर उनकी पीड़ा को टालने का टोटका किया। जिससे गजसिंह तो स्वस्थ हो गया और मोहनदास की मृत्यु हो गई। इस प्रकार उसने अपने पुत्र की बलि तांत्रिक के कहने पर दी और अपनी स्वामिभक्ति का परिचय दिया जिससे महाराजकुमार गजसिंहजी को जीवनदान मिला। संदर्भ–नैणसी री ख्यात, भाग-2, पृ. 155

[5] शक्तिसिंह लाल किले में घोड़े से उतरकर बादशाह से मिलने गया हुआ था। गोयन्ददास ने गुप्त रूप से घोड़े की काठी व लगाम पर अत्यन्त तेज जहर का लेप करवा दिया। शक्तिसिंह ज्योंही हांना पकड़कर घोड़े पर चढ़ा और लगाम को थामा, उसके स्पर्श से जहर उसके शरीर में प्रवेश कर गया और उसकी मृत्यु हो गई। जोधपुर की ख्यात-रघुवीरसिंह मनोहरसिंह, पृ. 128-129.

[6] रणसींहा खांडा रखने का अधिकार परंपरा से खीचियों को था तथा पाग पर लपेटे का कुरब इन्हें था। संदर्भ-जोशी आइधनजी हाथ लिखि ख्यात” पृ. 124-125।

[7] शोभावत जेतमाल राठौड़ों की एक खांप है और पाल इनका मुख्य ठिकाना था। जनानी ड्योढ़ी का प्रबन्ध शोभावतों के पास रहता था।

[8] मारवाड़ का इतिहास, लेखक पं. विश्वेश्वरनाथ रेउ, पृ. 182, भाग-प्रथम।

[9] डॉ. महेन्द्रसिंह नगर, मारवाड़ का चाणकय: भाटी गोयन्ददास (बात भाटी गोयंददास की)वैचारिकी, जनवरी-मार्च 2008, पृ. 60-79.

[10] देरावर का किला उस जमाने में अपनी एक अलग पहचान रखता था। बाड़मेर व जैसलमेर जिलों में राजपूतों में देरावरसिंह नाम रखे जाने की परंपरा रही है। देरावर नाम सिवाय इन जिलों के हिन्दुस्तान के किसी अन्य राज्य में नहीं रखा जाता है। सन् 852 में देरावर का किला बनवाया गया था। देरावर सिंह नाम रखना यहाँ पर बड़े शान की बात समझी जाती है। सन् 853 में भाटी अपनी राजधानी देरावर से लुद्रवा ले गए। (पूगल का इतिहास, लेखक हरीसिंह भाटी, पृ. 63).

[11] रावल केहर को केसरी भी कहते थे। इनके राज्याभिषेक का वर्ष जैसलमेर की ख्यात में नहीं लिखा है परन्तु इनके पाटवी पुत्र लक्ष्मणजी वि.सं. 1652 में राजगद्दी पर बैठे। इनके वंशज ‘केलण’ भाटी कहलाये। संदर्भ–पूगल का इतिहास, लेखक–हरीसिंह भाटी, पृ. 67।

[12] मारवाड़ का इतिहास, लेखक विश्वेश्वरनाथ रेउ, पृ. 86, भाग एक; जोधपुर ख्यात-पृष्ट संख्या 150 एवं मारवाड़ का इतिहास, जगदीशसिंह गहलोत, पृ. 114.

[13] राव जोधा के दस रानियां थी, उनमें लाला भटियानी का नाम भी मिलता है। राणीमंगा भाटों की बही, सम्पादक- डॉ. कुं. महेन्द्रसिंह नगर, पृ. 11।

[14] रतनू चारण भाटियों के पोळबारहठ कहलाते हैं और भाटी उनका बड़ा आव-आदर करते हैं।

[15] जगदीशसिंह गहलोत द्वारा हस्तलिखित लेख ‘भाटी गोविन्ददास’ रजिस्टर में इस घटना का वर्णन किया गया है। यह रजिस्टर महाराजा मानसिंह पुस्तक प्रकाश में जगदीशसिंह गहलोत संग्रह में सुरक्षित है।

[16] बदलू जोधपुर से 66 किलोमीटर उत्तर पूर्व की ओर है।

[17] मुहता नैणसी की ख्यात में लिखा है कि संवत 1600 में एक घमासान युद्ध मालदेवजी व शेरशाह के बीच जैतारण के पास सुमेर गिरि के निकट युद्ध हुआ था, उसमें नीम्बाजी घायल होकर रणक्षेत्र में पड़ा था।

[18] इस युद्ध में राठौड़ जैता, राठौड़ खींवकरण उदावत, राठौड़ पंचायण करमसोत, सोनगरा अखैराजोत और भाटी निम्बा वीरगति को प्राप्त हुए। संदर्भ–मारवाड़ का इतिहास, पं. विश्वेश्वरनाथ रेउ, भाग प्रथम, पृ. 121

[19] मारवाड़ की परम्परा के अनुसार प्रसूता स्त्री के लिए सूंठ, अजवाइन, गोंद, पीपरामूल, घी, देशी खांड, सफेद भाटा, इत्यादि के मिश्रण से लड्डू बनाये जाते हैं इसे सुहावड़ कहते हैं, इन्हें एक महीने तक प्रसूता को खिलाया जाता है।

[20] भाटियों में राव तणुराव (805-812 ई.) तनोट में हुए उनके वंशज माकड़ के पुत्रों मोहले व महेपा के वंशज माकड़ सुथार हुए और तणुराव के एक पुत्र आल के चार पुत्र हुए जिनमें से प्रथम पुत्र का नाम देवासी था और उसके वंशज देवासी राइके हुए। संदर्भ–पूगल का इतिहास, लेखक–हरीसिंह भाटी, पृ. 22.

[21] खींवसर करमसोत राठौड़ों का ठिकाना था जो जोधपुर से 85 किलोमीटर उत्तर दिशा में है।

[22] ठकुरानी के इस कथन का भाव सुन्दरी बाई के एक कवित्त से बहुत मिलता जुलता है–

जसोमत वारो, अति कीनौ लडगारो।

साते चोर भयो कारो ताको कौन बेटी दहेगो।।

खींवसर व बगड़ी की ठकुरानियों द्वारा गोविन्ददास का उपहास करने के संदर्भ का वर्णन किया गया है। इसके अतिरिक्त एक और किंवदंती की जानकारी ठाकुर भवानीसिंहजी बगड़ी ने मुझे पिछले दिनों दी। उनके अनुसार खींवसर ठाकुर और बगड़ी के ठाकुर बाघसिंहजी दोनों साढू थे और उस पिंजस में बगड़ी व खींवसर की दोनों ठकुरानियाँ जो आपस में बहनें थी साथ-साथ जा रही थी।

जब उनका काफिला केलावा गांव की सीमा से गुजर रहा था तब एक नाडी पर बकरियां पानी पी रही थी उनके साथ वह काला-कलूटा गोविन्ददास भी जानवरों की तरह नीचे झुककर मुंह से पानी पी रहा था। उसे देखकर बगड़ी की ठकुरानी ने भी अपने पिंजस में बैठे ही कहा कि— “ऐसे कालभूषण्ड बदसूरत लड़के को कौन सास दही देगी। ऐसे जंवाई से तो अच्छा हो लड़की को कुएं में धकेल दिया जाये।”

इन दोनों संदर्भों में कौनसा वाकया सही है यह प्रश्न भूतकाल के गर्भ में पीछे छूट चुका है। इस संदर्भ में ज्यादा सच्चाई नजर आती है क्योंकि बचपन से ही बकरियों के साथ रहते हुए उस बालक ने भेड़-बकरियों के तौर-तरीकों को स्वाभाविक रूप से अपना लिया होगा।

गोविन्ददास को बचपन में ही उनके पूर्वज ठाकुर बाघसिंहजी अपने साथ बगड़ी ले गये और वहाँ महाराजकुमार सूरसिंह को एक दिन गोठ पर बुलाया गया। वहाँ पर गोविन्ददास की चतुराई व कामकाज को देखकर बाघसिंहजी से महाराजकुमार ने गोविन्ददास को मांग लिया और तब से वह जोधपुर उनके साथ गया।

[23] सूरसिंह मोटा राजा उदयसिंह का पुत्र था।

[24] बगती–माटी का गोल चपटा जल का पात्र, जिसका मुंह रस्सी से बंधा होता था और उसी रस्सी से कंधे पर लटकी रहती थी।

[25] ऊंटों – सांडियों को चराने वाले राइकों को राजस्थानी भाषा में ओठी कहा जाता है। इसी प्रकार ऊंट पर सवार व्यक्ति को भी ओठी कहते हैं। इस संदर्भ में एक दोहा है–

“ऊँडा आसण ओठिया, ज्ञाणी पाग नराह।

वां लारे चढ़ जावसों, लांछौ मेल घरांह।।”

[26] राईका का सांडणियों का दूध दूहने के लिये पीतल का एक गोल पात्र (कटोरदान का नीचे का हिस्सा बिना ढक्कन का) काली ऊन के गूंथे हुए छींके में डालकर अपने कंधे से हमेशा लटकाये रखता है उसे राजस्थानी भाषा में तेहटा कहा जाता है। इसी तेहटे में दूध निकालकर वे पीते हैं और रात को इसी पात्र में दूध गर्म करते हैं और उसमें अधकूटा बाजरा डालकर उसकी खीर बनाकर राईके के साथ बैठकर भोजन करते हैं “मौका पड़ने पर वे तेहटे को ठंडी रातों में बजाते हुए गीत गाते हैं। तेहटे को बजाते हुए गाये गये उनके गीत बड़े सुरीले और मय भरे होते हैं।

[27] कणवार— जागीरदार की तरफ से जागीर के गांवों में शासनप्रबन्ध, काश्तकारों के धान के लाटों की निगरानी व वसूली एवं उनकी सुरक्षा के प्रबंध के लिये प्रतिनिधि जो हवलदार के रूप में गांव में नियुक्त होता था। उसके अधीन कणवारिया होते थे जो ‘कण’ (अन्न) काश्तकारों द्वारा चोरी न हो इस का प्रबन्ध रखते थे और लाटों (ढेरों) पर गुप्त निगरानी रखते थे। दीवाली के अवसर पर सभी कणवारिये जागीर का हिसाब किताब लेकर जागीर के मुख्यालय जाते थे।

[28] कछवाही रानी सोभागदे खण्डेला की थी और कालान्तर में महाराजा गजसिंह (प्रथम) की माता बनी। मारवाड़ का इतिहास भाग-एक, विश्वेश्वरनाथ रेउ, पृष्ठ संख्या 174, एवं राणीमंगा भाटों की बही, सम्पादक डॉ0 कुं. महेन्द्रसिंह नगर, पृष्ठ संख्या 37.

[29] लम्बी दूरी से आये घोड़ों की थकान दूर करने के लिये उन्हें आते ही गुड़ और फिटकरी मिलाकर देने की परम्परा थी जिससे थके हुए घोड़े फिर से ऊर्जावान हो जाते थे।

[30] जगदीशसिंह गहलोत ने अपने हस्तलिखित लेख में पृष्ठ 8 पर लिखा है— इस घटना का संक्षिप्त वर्णन अकबरनामा में भी मिलता है।

[31] अकबर बादशाह नाव में बैठकर मोटा राजा उदयसिंह के शव के साथ जहाँ रानियों ने सत किया उसे देखने के लिये गये। संदर्भ–जोधपुर राज्य की ख्यात, रघुवीरसिंह एवं मनोहरसिंह राणावत, पृष्ठ 123 व 133.

[32] पीठ पर जहरीला फोड़ा जिसे मरीज देख नहीं सकता है इसलिये उसे अदीठ कहा जाता है। यह ‘कैंसर’ का ही पर्याय है।

[33] जोधपुर राज्य की ख्यात— रघुवीरसिंह व डॉ0 मनोहरसिंह राणावत, पृष्ठ 128 पर लिखा है कि बादशाह ने महाराजकुमार ‘सूरसिंह’ को मातमपुरशी के समय कहा “थंहारे काज करीने म्हारी हजूर आवजो।” फिर पृष्ठ संख्या 131 पर लिखा है। बादशाह द्वारा संवत् 1627 वैशाख वदी 3 (तीज) बुधवार जुलाई 23, 1595 ई. को मोटा राजा का उत्तराधिकारी घोषित करके दो हजारी जात और सवा हजार असवार का मनसब सूरसिंह को दिया। उसके बाद उनका मनसब बढ़ाकर 3000 जात और 5000 सवार का कर दिया गया। संदर्भ–जहांगीर, पृष्ठ संख्या 356, विगत एक, पृष्ठ 95.

[34] बचपन में बकरियाँ चराते हुए गोयन्ददास को बगड़ी ठाकुर अपने साथ मारवाड़ में सोजत के पास बगड़ी गांव ले आये थे, जहाँ वह रात को हमेशा बगड़ी ठाकुर के कोट में जाता था। बगड़ी के ठाकुर ने भी उसे बड़े स्नेह से रखा था। वहाँ उसने बगड़ी ठाकुर की सुन्दर कन्या को, जो उसकी हम उम्र थी को देखा था, तबसे उसके मन में यह चाह उत्पन्न हुई कि यदि संभव हुआ तो वह बगड़ी ठाकुर की कन्या से ही विवाह करेगा। गुरांसा (गुरु) जब ठाकुर की पुत्री को पढ़ाते तब गोयन्ददास भी मिट्टी पर देखा-देखी लिखता था और इस तरह प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त की थी। वह उस कन्या के साथ खेलता और खाना खाकर मस्त रहता था।

[35] बगड़ी ठाकुर ने भाटियों से विवाह सम्बन्ध करने की तलाक ले ली थी परन्तु कालान्तर में जब आसोप राजा साहब की बहन का रिश्ता ठाकुर भैरूसिंहजी खेजड़ला (भाटी खांप) में तय होने जा रहा था तब आसोप राजा साहब ने बगड़ी के तत्कालीन ठाकुर भैरूसिंहजी से पूछा कि समय बदल गया है अगर आप सहमत होवें तो यह रिश्ता मैं भाटियों के ठिकाने खेजड़ला में करूँ? इस पर बगड़ी के ठाकुर भैरूसिंहजी ने कहा, “आपांरा बडेरा जोगा हा काम पड़ियां वे तीन हजार तलाक लोनी अर आप राव कूंपा रा वंशज हो आपणौ घर ओक है। समय देखतां थकां विचार करणी चाहिजे। खेजड़ला रा जोगा गिनायत है जूनी बातों ने भूलण में फायदौ है।” उसके बाद कूंपा के वंशज आसोप के राजा ने बहन का विवाह खेजड़ला के ठाकुर भैरूसिंहजी से किया। जिसकी जानकारी मुझे ठा. भवानीसिंहजी बगड़ी ने 15 जून 06 को व्यक्तिगत रूप से दी।

[36] खींवसर की ख्यात में ठाकुर हरीसिंहजी की पुत्री का विवाह गोयन्ददास के साथ करने का कोई उल्लेख नहीं मिलता है। पर यह लिखा है कि गोयन्ददास के भाई सुरताण के ऊपर महाराजा किशनसिंहजी ने संवत् 1669 में अपने आदमी भेजकर उसको मार डाला था। उस समय खींवसर के ठाकुर हरीसिंहजी ने सुरताण भाटी की सहायता करने की कोशिश की थी।

[37] खीचियों की ख्यात और खींची वंश प्रकाश के साथ सर्वे ऑफ खींची चौहान हिस्ट्री में पृष्ठ संख्या 367 पर लिखा है कि गोयन्ददास भाटी से नारवे के खींची देवीसिंह द्वारा अपनी कन्या ओमकंवर से उसका विवाह करने से इंकार कर दिये जाने पर मारवाड़ राज की फौज ने चढ़ाई कर दी। नारवा, इन्द्रोका, करवड़ आदि के सभी खींची भी इकट्ठे होकर मुकाबले में सामने आये और नारवे की सरहद से पहले लड़ाई हुई। परन्तु सर्वे ऑफ खींची चौहान हिस्ट्री में प्रो. ए.एच. निजामी ने अपनी भूमिका में लिखा है कि राजकीय फौज मय तोपों के गांव के पिचके व कुएं पर पहुंच गई और गढ़ी पर गोले बरसाये। दूतरफा लड़ाई में बहुत से लोग काम आये। अन्त में महाराजा साहब को अर्ज करने पर फौज वापस बुला ली गई। फलस्वरूप भाटियों से विवाह सम्बन्ध बंद करने की तलाक हुई जो कई पीढ़ियों तक रही। अभी भी अन्य भाटियों को छोड़कर जैसा भाटियों से खींचियों के विवाह सम्बन्ध नहीं होते हैं। यह जानकारी ठा. गोपालसिंहजी ने मुझे 20 जून 2006 को लिखित में दी।

[38] किंवदंती यह भी है कि जब सासू दही देने आई तो गोयन्ददास हाथी पर सवार था। सासू दुल्हे के नीचे उतरने का इन्तजार करने लगो तब गोयन्ददास ने उन्हें कहा कि दही देना हो तो आप हाथी पर दो सीढ़ियां चढ़ो और मैं दो सीढ़ियां नीचे उतरता हूँ। फिर समझाने पर गोयन्ददास नीचे उतरा तब सासूजी ने उसके लिलाड़ (ललाट) पर दही लगाया, तब उसने उन्हें उस कटाक्ष की याद दिलाई– ठा. भवानीसिंहजी बगड़ी द्वारा दी गई जानकारी।

[39] विवाह के पश्चात् जब दुल्हा दुल्हन जनवासे जाते हैं तब वर पक्ष द्वारा पूरे मार्ग पर न्यौछावर की जाती है, इसे मांडा बरसाना कहते हैं। राजपरिवारों में इस अवसर पर चांदी के हल्के-फुलके फूल दूल्हा-दुल्हन पर बरसाये जाते थे।

[40] यह जानकारी किंवदंती के आधार पर लिखी गई है। परन्तु लवेरा गांव में भाटी गोयन्ददास की जो 12 खम्भों वाली छतरी आज भी विद्यमान है, उसकी प्रतिमा पर जो लेख लिखा है उससे स्पष्ट होता है कि रत्नावती ने गोविन्ददास के मरने पर उसके साथ अग्निस्नान किया। यह लेख इस प्रकार है– “संवत् 1671 वर्षे जेठ मासे सुद आठम दिने राज मांनाजी सुत भाटी गोयन्ददास सरग भवती सती राठरी (राठौड़जी) रत्नावती….सर्गे महाभारतः … अजमेर समचे”। इस जानकारी से यह लगता है कि खींवसर की कंवरी रत्नावती ने विवाह के पश्चात् जहर खाया भी होगा तो उसे बचा लिया गया था और फिर उसने अपने पति के साथ हो स्वर्गारोहण किया था। संदर्भ–भाटी वंश का गौरवमय इतिहास, भाग-द्वितीय, ले. हुकमसिंह भाटी, पृष्ठ संख्या 30

[41] गोयन्ददास द्वारा महेचों में विवाह करने का सबूत मिलता है। भाटी गोयन्ददास की मृत्यु पर उसका पांचवां पुत्र पृथ्वीराज गद्दी का अधिकारी हुआ जो महेचीजी पूरां की कोख से जन्मा था। संदर्भ–नैणसी री ख्यात, भाग-2, पृ. 157 व जोधपुर राज्य री ख्यात, सम्पादक रघुवीरसिंह एवं मनोहरसिंह राणावत, पृ. सं. 149.

[42] लिखित ख्यातों एवं प्रकाशित इतिहास में उपरोक्त वर्णित तथ्य का उल्लेख नहीं मिलता है, फिर भी लोककंठों में सदियों से ऐसी किंवदंतियाँ प्रचलित रही हैं। इसमें कितनी सच्चाई है, इसका मौलिक आधार नहीं है, परन्तु जगदीशसिंह गहलोत ने अपने लेख में इस सत्य का उल्लेख कुछ अलग शब्दों में किया है। मैंने उसी वृत्तांत का अपने शब्दों में वर्णन किया है।

[43] लवेरा की ख्यात में लिखा है कि गोयन्ददास को लवेरा के साथ अनेक गांव मिले और उसने अपने भाई सुरताण को भी 15 हजार का पट्टा दिलाया। जगदीशसिंह गहलोत ने भाटी गोयन्ददास लेख में इसका उल्लेख किया है।

[44] ईस्वी संवत 1652 में सवाई राजा सूरसिंह ने लवेरा के अन्तर्गत 25 गांव उसे और प्रदान किये। लवेरा के साथ आसोप का पट्टा भी भाटी गोयन्ददास को ईस्वी संवत 1663 में दिया गया। साथ ही प्रधानगी भी उसे दी और देश दीवानगी भाटी रघुनाथ सुरताणोत को दी– नैणसी री ख्यात, भाग-2, पृ. 154-155 व जोधपुर राज्य री ख्यात, पृ. 156। लवेरा जागीर को एकेबड़ी ताजीम व हाथ का कुरब भी मिला हुआ था।

[45] बादशाह ने महाराजकुमार किशनसिंहजी को एक नये राज्य की स्थापना करने की सम्मति दी और उन्होंने अपने नाम पर किशनगढ़ नाम से राठौड़ राज्य की नींव रखी।

[46] लवेरा की ख्यात में ज्येष्ठ वदी नवमी संवत 1671 को इस घटना का होना लिखा है। जगदीशसिंह गहलोत के अनुसार यह मारवाड़ी संवत था जो श्रावण वदी एकम से बदल जाता है जबकि पंचांग में संवत 1672 लिखा है।

[47] भादवा वद 5 नाग पांचम रौ मेळौ चोखो हुवो नै श्री हजूर साहब जनांना समेत बाळसमंद में मेळो निजर गुदरायो। नै रात रा अकस्मात बीजळी पड़ी, भाटी गोयन्ददास री हवेली गोपाळ पोळ कनै जिण में हवद भाषर मै घोदीड़ो जिण में सोर मण 80.000 असी हजार हौ जिण ऊपर पड़ी सु झरणा ऊपरला कोट दो बड़ा हा जीं कनै, गोपा मोहन फतैपोळ नै पसवाड़ा रो कोट सोर सुं उडीया जिणां री पूठियां चौपासणी री नदी तांई गई। नै बोड़ा री घाटी पंचैटीया ऊपरला घर नै लला कोटड़ी मांला घर दब गया नै, किला में पोळां में आदमी 100 ओक सौ अंदाजै दबिया। नै चामुंडा रो मंदिर उड गयो नै श्रीजी रो कुदरत सुं चामुंडाजी बिराजीया वाहन समेत रया हिलोया ही नहीं। और पोकरणा ब्राह्मणा रा घर में आदमी 10 था सु नौ (9) तो दब गया नै 1 ओक बचियौ घायल हुवोड़ो। और आदमी 300 आसरै मरीया जिणां ने भाटा आगा कर-कर काढीया। संदर्भ–महाराजा तख्तसिंह री ख्यात, पृष्ठ 231।

Dr. Mohanlal Gupta
Dr. Mohanlal Guptahttps://rajasthanhistory.com
डॉ. मोहनलाल गुप्ता राजस्थान के जाने-माने इतिहासकार एवं लेखक हैं। उनकी सौ से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं तथा पत्र-पत्रिकाओं में हजारों आलेख प्रकाशित हुए हैं।

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