यह आलेख ब्रिटिश शासन काल में मेवाड़ राज्य की आमेट जागीर में हुए उत्तराधिकार संबंधी विवाद पर आधारित है जिसके माध्यम से यह समझने का प्रयास किया गया है कि ब्रिटिश पॉलिटिकल अधिकारी देशी राज्यों एवं जागीरों में किस प्रकार हस्तक्षेप करते थे।
भारत के बड़े से बड़े हिन्दू राजाओं एवं सामंतों में उत्तराधिकार के झगड़े चलते रहते थे जिससे राज्य एवं जागीर के शत्रु इन झगड़ों का लाभ उठाने का प्रयास करते थे। इस स्थिति के कारण राज्य और जागीर दोनों की शक्ति क्षीण होती थी। मुगलों ने राजाओं एवं जागीरदारों की इसी कमजोरी का लाभ उठाकर भारत पर अधिकार किया था। बाद में अंग्रेजों ने भी यही नीति अपनाई।
ई. 1818 की आंग्ल-मेवाड़ संधि (Anglo-Mewar Treaty) के पश्चात् कर्नल टॉड ने मेवाड़ के प्रशासन (Administration) को पुनः संगठित किया। 19वीं शताब्दी के मध्य तक यद्यपि मेवाड़ के महाराणा ब्रिटिश पोलीटिकल एजेंट (Political Agent) के पूर्ण प्रभाव में आ चुके थे, तथापि मेवाड़ के सामंतों (Feudal Lords/Barons) को न तो महाराणा ही नियंत्रण में कर सके और न ब्रिटिश सत्ता ही उन्हें पूरी तरह नियंत्रित कर सकी।
आंग्ल-मेवाड़ संधि की धारा 9 में यह स्पष्ट कहा गया था कि ब्रिटिश सरकार मेवाड़ के आंतरिक मामलों (Internal Affairs) में हस्तक्षेप नहीं करेगी[1]; किन्तु मेवाड़ के सामंतों को नियंत्रित करने के लिए ब्रिटिश सरकार लगातार मेवाड़ के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करती रही।[2] यहाँ तक कि वे सामंतों के उत्तराधिकार के मामलों (Succession Cases) में भी हस्तक्षेप करने लगे।
ऐसे मामलों में जहाँ किसी सामंत की निःसंतान मृत्यु हो जाती, वहाँ उनका सदा ही यह प्रयत्न रहता कि ब्रिटिश सत्ता के पक्षपाती सामंत को वहाँ थोप दिया जाए, चाहे वह वहाँ का कानूनी हकदार (Legal Heir) हो या नहीं। फिर येन-केन-प्रकारेण उसके पक्ष में तर्क प्रस्तुत किए जाते; किन्तु मेवाड़ के सामंतों ने शायद ही कभी ब्रिटिश सत्ता द्वारा थोपे गए व्यक्ति को स्वीकार किया हो। ई. 1857 में आमेट के रावत पृथ्वीसिंह की मृत्यु होने पर ब्रिटिश सरकार ने एक ऐसा ही प्रयास किया था, किन्तु इस बार भी ब्रिटिश सरकार को अपने प्रयासों में सफलता प्राप्त नहीं हुई।[3]
आमेट जागीर की पृष्ठभूमि और उत्तराधिकार का विवाद
मेवाड़ में आमेट जागीर के सामंत चूंडा (महाराणा लाखा के वरिष्ठ पुत्र) के पौत्र सिंहा के पुत्र जग्गा के वंशज थे तथा ‘जगावत’ कहलाते थे।[4] महाराणा स्वरूपसिंह के काल में आमेट के रावत पृथ्वीसिंह की उपस्थिति में आमेट का प्रशासन बेमाली के जागीरदार (Fief-holder) जालिमसिंह तथा मानावास के जागीरदार समर्थसिंह की सलाह से चलाया जाता था। 21 जनवरी 1857 को रावत पृथ्वीसिंह का निःसंतान देहांत हो गया।[5]
आमेट जागीर के सभी जगावतों ने विचार कर जिलोला के ठाकुर दुर्जनसिंह के वरिष्ठ पुत्र चत्रसिंह को आमेट की गद्दी पर बैठाना तय किया तथा तीन दिन तक चत्रसिंह ने ही स्वर्गीय रावत पृथ्वीसिंह का क्रिया-कर्म किया [6] किन्तु तीसरे ही दिन बेमाली के ठाकुर जालिमसिंह ने स्वर्गीय रावत की पत्नी को अपनी ओर मिलाया तथा ल्हासाणी के ठाकुर सुल्तानसिंह व उसके काका समर्थसिंह से बातचीत कर 23 जनवरी को अपने द्वितीय पुत्र अमरसिंह को आमेट की गद्दी पर बैठा दिया।[7]
अमरसिंह स्वर्गीय रावत का बहुत ही दूर का अर्थात् 15-16 पीढ़ी दूर का रिश्तेदार था, जबकि चत्रसिंह स्वर्गीय रावत के बहुत ही नजदीक का अर्थात् 4-5 पीढ़ी का रिश्तेदार था।[8] अतः बेमाली के ठाकुर जालिमसिंह ने इस गद्दीनशीनी (Enthronement) को तुरंत कानूनी रूप देने के लिए स्वर्गीय रावत की पत्नी को सलाह देकर, रावत की विधवा पत्नी की ओर से महाराणा स्वरूपसिंह के पास एक प्रार्थना-पत्र भिजवाया; जिसमें अमरसिंह को आमेट जागीर का स्वामी तथा स्वर्गीय रावत का उत्तराधिकारी स्वीकार करने की प्रार्थना की गई थी। इस पर महाराणा ने तलवार-बंधाई (Succession Fee) की रकम तय करने का आदेश दे दिया।[9]
इधर जिलोला के ठाकुर दुर्जनसिंह ने, जो स्वर्गीय रावत का नजदीकी रिश्तेदार था, अपने पुत्र चत्रसिंह को आमेट की गद्दी पर बैठाने हेतु महाराणा के पास प्रार्थना-पत्र भेजा ।[10]
आमेट जागीर के सम्बन्ध में महाराणा की दुविधा
चूंकि इस समय महाराणा एक विचित्र स्थिति से गुजर रहे थे— एक ओर तो सामंतों से चाकरी (Feudal Service), छटुंद (Tax) और तलवार-बंधाई के प्रश्न को लेकर मतभेद चल रहे थे, तो दूसरी ओर ब्रिटिश सरकार भी महाराणा से खुश नहीं थी।[11] ऐसी स्थिति में महाराणा किसी एक पक्ष को स्वीकृति देकर दूसरे पक्ष को अपने विरुद्ध नहीं करना चाहते थे। अतः दोनों पक्षों को प्रसन्न करने के लिए महाराणा ने गुप्त रूप से चत्रसिंह को आमेट जागीर पर अधिकार करने की स्वीकृति प्रदान कर दी ।[12]
इस प्रकार महाराणा की स्वीकृति प्राप्त कर 10 मई 1857 को चत्रसिंह अपने आदमियों को लेकर आमेट पहुँचा और आमेट पर आक्रमण कर दिया। इस लड़ाई में अमरसिंह का भाई पद्मसिंह तथा अन्य दो सरदार मारे गए और कुछ अन्य व्यक्ति घायल हुए। आमेट पर चत्रसिंह का अधिकार हो गया तथा अमरसिंह अपने परिवार को लेकर वहाँ से भाग खड़ा हुआ।
स्वर्गीय रावत पृथ्वीसिंह की विधवा पत्नी ने भी अमरसिंह के साथ भाग कर चारभुजा के मंदिर में शरण ली और वहाँ से उसने एजेंट गवर्नर जनरल, राजपूताना (Agent to the Governor-General – AGG) के नाम एक प्रार्थना-पत्र भेजा; [13] जिसमें बताया गया कि स्वर्गीय रावत ने उसे मरते समय कहा था कि मेरे मरने के बाद जालिमसिंह का लड़का अमरसिंह ठिकाने का मालिक होगा।[14] इसी तरह का एक पत्र उसने मेवाड़ के पोलीटिकल एजेंट कप्तान शावर्स के नाम भी भेजा।
7 जून 1857 को रावत अमरसिंह, स्वर्गीय रावत की पत्नी सहित कंवारिये के किले में जा पहुँचे, जो सलूम्बर की जागीर का एक छोटा-सा किला था। यहाँ पर अमरसिंह के पक्ष वालों की जमीयत (Feudal Levy/Troops) इकट्ठी होने लगी और इधर आमेट में चत्रसिंह भी अपना पक्ष मजबूत करने लगा।[15] कुछ समय बाद अमरसिंह स्वर्गीय रावत की विधवा पत्नी को लेकर सलूम्बर चला गया।
ल्हासाणी और देवगढ़ के ठिकानों की सीमा के प्रश्न को लेकर लल्हासाणी के ठाकुर सुल्तानसिंह और देवगढ़ के रावत रणजीतसिंह के बीच दुश्मनी चल रही थी और चूंकि सुल्तानसिंह बेमाली के ठाकुर जालिमसिंह का सहायक था, अतः देवगढ़ के रावत ने चत्रसिंह का पक्ष लिया। इधर महाराणा और सामंतों के बीच चल रहे बखेड़े में मानावास का समर्थसिंह और बेमाली का जालिमसिंह महाराणा के विरोधियों में थे, जिन पर सलूम्बर का रावत केसरीसिंह पूरा भरोसा रखता था। अतः सलूम्बर के रावत ने अमरसिंह का पक्ष लिया।
इस प्रकार आमेट जागीर के उत्तराधिकार के प्रश्न को लेकर मेवाड़ में सामंतों के दो गुट (Two Factions of Feudal Lords) बन गए।[16] चत्रसिंह के पक्ष में देवगढ़ का रावत रणजीतसिंह, कोठारिया का रावत जोधसिंह, कानोड़ का रावत उम्मेदसिंह, बदनौर का ठाकुर प्रतापसिंह, भैंसरोड़गढ़ का रावत अमरसिंह आदि थे, जबकि अमरसिंह के पक्ष में सलूम्बर का रावत केसरीसिंह, भींडर का ठाकुर हमीरसिंह, गोगुंदा का लालसिंह, कुराबड़ का ईश्वरीसिंह, बागौर का शेरसिंह, बनेड़ा का राजा गोविन्दसिंह, ल्हासाणी का सुल्तानसिंह आदि थे।
1857 का विद्रोह और आमेट जागीर मामले का स्थगन
स्वर्गीय रावत की पत्नी द्वारा दिए गए प्रार्थना-पत्र पर पोलीटिकल एजेंट और एजेंट गवर्नर जनरल विचार कर ही रहे थे कि अमरसिंह ने आमेट जागीर के गाँवों में लूटमार करना आरंभ कर दिया।[17] इसी बीच भारत में सिपाही विद्रोह (Sepoy Mutiny) आरंभ हो गया था। महाराणा स्वरूपसिंह चत्रसिंह को स्थायी रूप से आमेट की तलवार बंधवाना चाहते थे, किन्तु अमरसिंह के पक्ष वालों ने खैरवाड़ा के असिस्टेंट पोलीटिकल एजेंट कर्नल ब्रुक से कहा कि यदि आमेट की गद्दी पर अमरसिंह के अतिरिक्त किसी अन्य व्यक्ति को बैठाया गया तो मेवाड़ में भी विद्रोह आरंभ हो जाएगा।[18]
यद्यपि 1857 के विद्रोह में राजस्थान के अधिकांश राजवंश ब्रिटिश सत्ता के समर्थक थे, किन्तु उनके सामंत ब्रिटिश सत्ता से घृणा करते थे।[19] मेवाड़ के सामंत इसलिए क्रुद्ध थे कि महाराणा ने ब्रिटिश सत्ता की सहायता से सामंतों की सेवाओं को रकम की अदायगी (Cash Payment) के रूप में बदलना चाहा था, जो सामंती प्रथा (Feudal System) के लिए एक नई बात थी जिससे उनकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुँच रही थी।[20]
इस असंतोषपूर्ण वातावरण में जब 28 मई 1857 को नसीराबाद के सिपाहियों ने विद्रोह कर दिया, तब 3 जून को नीमच की सेना भी भड़क उठी। नीमच की सेना के विद्रोह की खबर ने सामंतों के असंतोष की अग्नि में घी का काम किया। मेवाड़ की जनता में काफी जोश था। ऐसी परिस्थिति में मेवाड़ के पोलीटिकल एजेंट कैप्टन शावर्स ने महाराणा को सलाह दी कि आमेट के उत्तराधिकार का मामला कुछ समय के लिए स्थगित (Postponed) कर दिया जाए।[21] महाराणा ने पोलीटिकल एजेंट की सलाह को मानकर ब्रिटिश सरकार को अपनी ओर से पूर्ण सहायता दी। इस प्रकार आमेट के उत्तराधिकार का मामला कुछ समय के लिए शांत हो गया।
शम्भूसिंह का काल और कर्नल निक्सन का हस्तक्षेप
सिपाही विद्रोह शांत हो जाने के बाद महाराणा अपने शासन को पुनः व्यवस्थित करने में लग गए और इसी बीच ई. 1861 में उनका देहांत हो गया तथा महाराणा शम्भूसिंह मेवाड़ की गद्दी पर आरूढ़ हुए। बेमाली का ठाकुर जालिमसिंह, जो कि अमरसिंह का पिता था, महाराणा के प्रमुख सलाहकारों में से था। अतः उसने महाराणा को अपने पक्ष में कर आमेट के उत्तराधिकार के प्रश्न को पुनः उठाया।
महाराणा शम्भूसिंह ने ई. 1865 में अमरसिंह को आमेट का वास्तविक अधिकारी स्वीकार कर उसे दरबार में आमेट की गद्दी पर बैठने का अधिकार दे दिया तथा चत्रसिंह को आमेट छोड़ने का आदेश दिया[22]; किन्तु चत्रसिंह ने महाराणा के आदेश की कोई परवाह नहीं की। मेवाड़ के सामंत पुनः दो दलों में विभक्त हो गए तथा दोनों दलों में संघर्ष अवश्यंभावी (Inevitable) प्रतीत होने लगा।[23]
इस उत्तेजनापूर्ण वातावरण के कारण महाराणा को अपने निर्णय में परिवर्तन करना पड़ा। महाराणा ने अमरसिंह को खालसा (Crown Lands) के गाँवों में से मेजा की जागीर, जिसकी आय 20,000 रुपये वार्षिक थी, दी तथा उसे प्रथम श्रेणी के सामंतों (First-Class Nobles) में सम्मिलित कर लिया। इसके साथ ही महाराणा ने चत्रसिंह को आदेश दिया कि वह आमेट की जागीर में से कुछ गाँव जिनकी आय 8,000 रुपये वार्षिक हो, अमरसिंह को दे दे। किन्तु चत्रसिंह ने आमेट के किसी भी गाँव को अलग करने से इनकार कर दिया।[24]
ई. 1871 में अमरसिंह ने अपने पिता जालिमसिंह और कुछ फौज सहित आमेट जागीर के गाँवों में लूटमार आरंभ कर दी। चत्रसिंह ने तुरंत ही इसकी सूचना महाराणा को दी। महाराणा शम्भूसिंह, प्रथम तो अमरसिंह के पक्ष में थे और दूसरा वे इस झगड़े को शांत करने में सर्वथा असमर्थ थे। अतः मेवाड़ के तत्कालीन पोलीटिकल एजेंट कर्नल निक्सन ने हस्तक्षेप किया। कर्नल निक्सन चत्रसिंह से मिले तथा 22 सितंबर 1871 को चत्रसिंह से एक लिखित समझौता (Written Agreement) करवा लिया।[25]
इस समझौते के अंतर्गत चत्रसिंह ने आमेट की जागीर में से टुंगच (जिसकी आय 4,000 रुपये वार्षिक थी) तथा सोडास (जिसकी आय 3,500 रुपये वार्षिक थी), अमरसिंह को देना स्वीकार किया; किन्तु उन्होंने इसके लिए दो शर्तें रखीं:
- अमरसिंह उसे (चत्रसिंह को) तीन लाख रुपये क्षतिपूर्ति (Compensation) के दे; जिसमें से दो लाख रुपये तो आमेट के गाँवों में जो लूटमार की उसकी क्षतिपूर्ति तथा एक लाख रुपये आमेट से रोकड़ (Cash) और आभूषण ले जाने की क्षतिपूर्ति हेतु। इस प्रकार कुल तीन लाख रुपये उसे (चत्रसिंह को) दिए जाएँ।
- अमरसिंह उपर्युक्त दो गाँवों (टुंगच और सोडास) का उपभोग केवल अपने जीवन-पर्यंत (Lifelong) करेगा, अर्थात् उसकी मृत्यु के बाद उपर्युक्त दोनों गाँव पुनः आमेट में मिला लिए जाएँगे।
तत्पश्चात चत्रसिंह ने महाराणा को प्रसन्न करने के लिए बेदला के राव से यह भी वादा किया कि जो 8,000 रुपये वार्षिक के गाँव उन्होंने अमरसिंह को देने का समझौता किया है, वह उसे बढ़ाकर 10,000 रुपये कर देंगे और यदि उन गाँवों से 10,000 रुपये वार्षिक आय नहीं होगी, तो इस राशि को पूरा करने के लिए वह शेष रकम रोकड़ दे देंगे।[26]
महाराणा ने इस समझौते के अनुसार आदेश जारी कर दिए; किन्तु इस आदेश में, चत्रसिंह ने जिन दो शर्तों पर आमेट की जागीर में से दो गाँव देने का समझौता किया था, उनका कहीं उल्लेख नहीं किया गया। अतः चत्रसिंह ने महाराणा के इस आदेश को मानने से इनकार कर दिया।[27]
इस संबंध में चत्रसिंह को कई बार लिखा गया, किन्तु चत्रसिंह का कहना था कि वह केवल पोलीटिकल एजेंट के पास 22 सितंबर 1871 को किए गए समझौते को पूरा करने के लिए तैयार है।
इसके प्रत्युत्तर में अमरसिंह ने मांग रखी कि 10 मई 1857 को जब चत्रसिंह ने आमेट पर आक्रमण किया था, उसमें उसका भाई तथा अन्य दो सरदार मारे गए थे, जिसकी क्षतिपूर्ति के लिए चत्रसिंह 4,14,697 रुपये दे।[28]
सामंतों की सभा और महकमा खास का फैसला
इन परिस्थितियों में पोलीटिकल एजेंट ने पुनः हस्तक्षेप किया और महाराणा को कहा कि इस मामले पर मेवाड़ के सामंतों की राय ले ली जाए।
अतः 22 अक्टूबर 1873 को बेदला का बख्तसिंह, कोठारिया का किशोरसिंह, सलूम्बर का जोधसिंह, देवगढ़ का किशनसिंह, देलवाड़ा का फतेसिंह, गोगुंदा का मानसिंह, कानोड़ का उम्मेदसिंह, बान्सी का मानसिंह, पारसोली का लक्ष्मणसिंह, बागौर का सोहनसिंह तथा लावा का माधोसिंह उदयपुर में एकत्रित हुए और निर्णय लिया कि पोलीटिकल एजेंट ने जो 22 सितंबर 1871 को चत्रसिंह से समझौता किया है, वह सर्वथा उचित है; केवल दोनों पक्षों की ओर से क्षतिपूर्ति की मांग अनुचित है, जिसकी ओर कोई ध्यान न दिया जाए।[29]
इसके तुरंत बाद ही महाराणा तीर्थ करने चतुर्भुज चले गए और कुछ ही दिनों बाद 5 नवंबर 1873 को चत्रसिंह का देहांत हो गया [30] तथा आमेट की गद्दी पर उनका अवयस्क (Minor) पुत्र शिवनाथसिंह बैठा।
अमरसिंह, महाराणा और पोलीटिकल एजेंट को लगातार पत्र देता रहा; जिसमें उसका कहना था कि महाराणा के कार्तिक सुदि 12 संवत् 1928 के आदेशानुसार वह आमेट के गाँवों पर अधिकार कर लेगा। उसके व्यवहार में उद्दंडता दिखाई दे रही थी। इस पर उसे आदेश दिया गया कि वह उदयपुर छोड़कर बाहर नहीं जाए।
तत्पश्चात 6 फरवरी 1874 को पोलीटिकल एजेंट ने ‘महकमा खास’ (Chief Administrative Court/Council) को लिखा कि चूंकि अब चत्रसिंह का देहांत हो चुका है, अतः आमेट के उत्तराधिकार के संबंध में अंतिम निर्णय लेकर मामले को सदा के लिए समाप्त किया जाए।[31]
इस पर महकमा खास ने निर्णय दिया कि टुंगच तथा सोडास गाँव अमरसिंह को सौंप दिए जाएँ तथा इन गाँवों में महाराणा का कर्मचारी और दोनों पक्षों का एक-एक कर्मचारी एक वर्ष तक राजस्व (Revenue) एकत्रित करने के लिए रहेंगे तथा वर्ष के अंत में यदि आय कम होगी, तो उसका भुगतान रोकड़ से किया जाएगा। इन गाँवों का आमेट से अलग होने की वजह से आमेट को ‘छटुंद’ की रकम से मुक्त समझा जाए और वह रकम अमरसिंह से वसूल की जाए।[32]
महकमा खास ने यह भी आदेश दिया कि यह फैसला अंतिम है और यदि अमरसिंह ने बखेड़ा खड़ा करने की कोशिश की, तो जो गाँव उसे खालसा से दिए गए हैं, वे जब्त (Confiscated) कर लिए जाएँगे। महकमा खास के इस निर्णय को ब्रिटिश सरकार ने स्वीकार कर लिया ।[33]
आमेट जागीर के उत्तराधिकार में ऐतिहासिक दृष्टिकोण
आमेट का उत्तराधिकार संबंधी यह मामला इतना अधिक महत्वपूर्ण था कि उदयपुर राज्य के इतिहास के सभी उल्लेखनीय विद्वानों ने इसका उल्लेख किया है। ओझाजी, [34] कविराज श्यामलदास, [35] डॉ. देवीलाल पालीवाल [36] आदि ने इस समस्या के विभिन्न पक्षों को प्रकट किया है।
कविराज श्यामलदास ने इस घटना से संबंधित ब्यौरा कुछ संक्षिप्त दिया है। ओझाजी ने अपेक्षाकृत कुछ विस्तार से उल्लेख अवश्य किया है, किन्तु संभवतः उन्हें ब्रिटिश सरकार की इस घटना से संबंधित पत्रावलियाँ (Files/Records) उपलब्ध नहीं हो सकी थीं और इसीलिए वे तत्कालीन पोलीटिकल एजेंट की कूटनीतिज्ञता (Diplomacy) को न भांप सके। इसी कारण उन्होंने पोलीटिकल एजेंट द्वारा अमरसिंह के पक्ष में किए गए प्रयासों का उल्लेख तक नहीं किया है।
डॉ. पालीवाल ने तथ्यों को न तो क्रमबद्ध रूप से ही प्रस्तुत किया है और न तिथिबद्ध रूप से। डॉ. पालीवाल ने चत्रसिंह की मृत्यु-तिथि और पोलीटिकल एजेंट के कहने पर महाराणा द्वारा बुलाई गई सामंतों की सभा (Council of Nobles) की तिथि का भ्रामक रूप से वर्णन किया है।[37]
चत्रसिंह की मृत्यु 5 नवंबर 1873 को हुई थी, [38] जबकि आमेट के उत्तराधिकार संबंधी विवाद को निपटाने हेतु मेवाड़ के सामंतों की सभा 22 अक्टूबर 1873 को संपन्न हुई थी।[39]
डॉ. पालीवाल ने इस सामंत सभा का उल्लेख चत्रसिंह की मृत्यु के बाद किया है। [40] इसके अतिरिक्त इस विवाद का अंतिम निर्णय महकमा खास द्वारा किया गया था और महकमा खास का यह निर्णय चत्रसिंह की मृत्यु के बाद हुआ था। [41]
महकमा खास के इसी निर्णय को संभवतः डॉ. पालीवाल ने सामंत सभा का निर्णय समझ लिया है, इसी कारण उन्होंने सामंत सभा के निर्णय को ही इस समस्या का अंतिम समाधान मान लिया है। डॉ. पालीवाल ने पोलीटिकल एजेंट के इस उत्तराधिकार संबंधी झगड़े के निवारण हेतु किए गए प्रयत्नों का उल्लेख तो अवश्य किया है, किन्तु उन्होंने पोलीटिकल एजेंट द्वारा ही अमरसिंह का समर्थन करने संबंधी एक भी तथ्य का ब्यौरा प्रस्तुत नहीं किया है।
वास्तव में ई. 1857 में मेवाड़ के तत्कालीन पोलीटिकल एजेंट ने आमेट के वास्तविक उत्तराधिकारी चत्रसिंह का पक्ष न लेकर अमरसिंह का पक्ष लिया था। पोलीटिकल एजेंट के इस दृष्टिकोण का विस्तृत ब्यौरा, असिस्टेंट पोलीटिकल एजेंट द्वारा पोलीटिकल एजेंट को लिखे गए पत्र दिनांक 4 जून 1857 में दिया गया है; जिसमें असिस्टेंट पोलीटिकल एजेंट ने पोलीटिकल एजेंट के दृष्टिकोण का न केवल विरोध किया है, बल्कि इसे ब्रिटिश सरकार के हितों का विरोधी कहा है। [42]
वास्तव में इसी पोलीटिकल एजेंट ने वैध उत्तराधिकारी (Legitimate Heir) चत्रसिंह का विरोध कर अमरसिंह को आमेट की गद्दी पर प्रतिष्ठित करने का असफल प्रयास किया था।
अमरसिंह, जो वास्तव में आमेट के दिवंगत रावत पृथ्वीसिंह का बहुत ही दूर का रिश्तेदार था, को आरंभ में ही दबा दिया जाना चाहिए था; किन्तु ब्रिटिश पदाधिकारियों के सद्भावपूर्ण रुख ने अमरसिंह को उत्साहित किया, जिससे वह निरंतर आमेट की गद्दी प्राप्त करने के प्रयत्नों में लगा रहा और अंत में इन ब्रिटिश पदाधिकारियों के सहयोग से ही, उसे दंड मिलने की अपेक्षा मेजा की जागीर तथा टुंगच व सोडास नामक दो गाँव प्राप्त हो गए।
अमरसिंह के प्रति ब्रिटिश पदाधिकारियों की कितनी कृपा थी, इसका पता इससे चलता है कि उत्तराधिकार संबंधी अंतिम निर्णय के पश्चात् भी (जिसमें चत्रसिंह व उनके पुत्र को आमेट का उत्तराधिकारी स्वीकार कर लिया गया था), मेवाड़ स्थित पोलीटिकल एजेंट अमरसिंह को आमेट का वास्तविक उत्तराधिकारी मानता रहा। 16 फरवरी 1874 को पोलीटिकल एजेंट द्वारा, एजेंट गवर्नर जनरल को लिखे गए पत्र में उसने अमरसिंह को पृथ्वीसिंह का गोद लिया हुआ उत्तराधिकारी (Adopted Heir) लिखा है; [43] जबकि इससे बहुत पूर्व यह निर्णय हो चुका था कि पृथ्वीसिंह का वास्तविक उत्तराधिकारी चत्रसिंह था।
स्वयं महाराणा, मेवाड़ के सामंतों की सभा और महकमा खास द्वारा चत्रसिंह को आमेट का ठाकुर स्वीकार कर लिए जाने के पश्चात् तक ब्रिटिश पदाधिकारियों के पत्र-व्यवहार में अमरसिंह को आमेट का वास्तविक उत्तराधिकारी माना जाता रहा। स्मरण रहे, ऐसे अनेक अवसरों पर भी ब्रिटिश पदाधिकारियों ने कानूनी और वास्तविक उत्तराधिकारियों को वंचित करने के प्रयास किए थे। सलूम्बर के रावत केसरीसिंह की मृत्यु के पश्चात् उत्पन्न उत्तराधिकार विवाद में ब्रिटिश पदाधिकारियों का निंदनीय हस्तक्षेप सर्वविदित है।[44]
ब्रिटिश नीति का आलोचनात्मक मूल्यांकन
आमेट के उत्तराधिकार संबंधी विवाद में ब्रिटिश पदाधिकारियों ने स्वर्गीय रावत की पत्नी द्वारा पोलीटिकल एजेंट और गवर्नर जनरल को लिखे गए पत्र का सहारा लिया था; जिसमें स्वर्गीय रावत की पत्नी ने लिखा था कि स्वर्गीय रावत ने मरते समय उससे अमरसिंह को गोद लेने की बात कही थी। किन्तु स्वर्गीय रावत की पत्नी के इस कथन में सच्चाई प्रतीत नहीं होती, क्योंकि यदि स्वर्गीय रावत ने मरते समय ऐसी इच्छा प्रकट की होती, तो रावत के मरते ही रावत की पत्नी अमरसिंह को बुलाकर स्वर्गीय रावत के अंतिम क्रिया-कर्म करने को कहती।
इतना ही नहीं, अमरसिंह का पिता, बेमाली का ठाकुर जालिमसिंह, रावत की मृत्यु के समय वहाँ उपस्थित था; वह कभी यह मौका चूकने वाला नहीं था। यदि स्वर्गीय रावत की ऐसी इच्छा होती, तो जालिमसिंह तुरंत अपने पुत्र अमरसिंह को बुला लेता। अतः यह स्पष्ट है कि स्वर्गीय रावत ने मरते समय ऐसी कोई इच्छा व्यक्त नहीं की थी।
वास्तविकता यह है कि रावत की मृत्यु के बाद चत्रसिंह ने स्वर्गीय रावत का तीन दिन तक क्रिया-कर्म किया, जिस पर स्वर्गीय रावत की पत्नी ने इन तीन दिनों में कोई आपत्ति नहीं की और न ही जालिमसिंह ने कोई एतराज किया। इससे यह स्पष्ट है कि स्वर्गीय रावत ने मरते समय अमरसिंह को गोद लेने की कोई इच्छा प्रकट नहीं की थी।
यह तो बाद में जालिमसिंह द्वारा रचे गए षड्यंत्र (Conspiracy) का परिणाम था; जिसके अंतर्गत जालिमसिंह ने स्वर्गीय रावत की पत्नी को अपनी ओर मिलाकर तीसरे दिन अपने पुत्र अमरसिंह को आमेट की गद्दी पर बैठा दिया। और जब आमेट की गद्दी के वास्तविक हकदार चत्रसिंह ने आमेट पर अधिकार किया, तब जालिमसिंह ने ही स्वर्गीय रावत की पत्नी से उक्त पत्र लिखवाया था; जिसका सहारा लेकर ब्रिटिश पदाधिकारी अमरसिंह को स्वर्गीय रावत पृथ्वीसिंह का गोद लिया हुआ उत्तराधिकारी मानते रहे।
इससे उत्साहित होकर अमरसिंह लगातार आमेट प्राप्त करने का प्रयत्न करता रहा और अंत में ब्रिटिश पदाधिकारियों के सहानुभूतिपूर्ण रुख के कारण ही उसे मेजा की जागीर प्राप्त हुई। इस पर भी जब वह शांत नहीं हुआ, तो उसे आमेट की जागीर में से टुंगच व सोडास नामक गाँव दिलवाए गए।
मेवाड़ के पोलीटिकल एजेंट ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट (Annual Report) 1865-66 में लिखा है कि अमरसिंह की गद्दीनशीनी निःसंकोच रूप से कानूनी थी, यह तथ्य इस बात से स्पष्ट है कि जब चत्रसिंह ने आमेट पर आक्रमण किया, उस समय स्वर्गीय रावत की पत्नी भी अमरसिंह के साथ भाग खड़ी हुई थी। [45]
कितनी असंगतिपूर्ण है यह दलील! स्वर्गीय रावत की पत्नी का अमरसिंह के साथ भाग जाना यह सिद्ध नहीं करता कि अमरसिंह आमेट का कानूनी हकदार था। यह तथ्य किसी से छुपा नहीं है कि अमरसिंह का पिता जालिमसिंह स्वर्गीय रावत का घनिष्ठ मित्र था तथा उसकी सलाह से ही आमेट का प्रशासन चलाया जाता था। अतः रावत पृथ्वीसिंह की मृत्यु के बाद जालिमसिंह के लिए स्वर्गीय रावत की पत्नी को अपनी ओर मिलाना कोई कठिन कार्य नहीं था।
स्वर्गीय रावत की पत्नी ने जालिमसिंह के षड्यंत्र में शामिल होकर अमरसिंह को आमेट की गद्दी पर बैठा दिया, यह तथ्य चत्रसिंह से छुपा हुआ नहीं था। अतः जब चत्रसिंह ने आमेट पर आक्रमण किया, तब सभी षड्यंत्रकारियों का वहाँ से भागना आवश्यक था क्योंकि किसी एक का भी वहाँ रहना खतरे से खाली नहीं था।
इसके अतिरिक्त स्वर्गीय रावत की पत्नी स्वयं जानती थी कि अमरसिंह की गद्दीनशीनी एक षड्यंत्र का परिणाम था जिसकी वह स्वयं साझेदार थी; अतः उसका आमेट में रहना जिंदगी से हाथ धोना था और इसीलिए वह अमरसिंह के साथ आमेट जागीर छोड़कर चली गई थी। अतः पोलीटिकल एजेंट की यह दलील केवल अमरसिंह का पक्ष लेने के उद्देश्य से दी गई है, जो कदापि तार्किक नहीं है।
मेवाड़ में सामंतों की निःसंतान मृत्यु हो जाने के पश्चात् उनके उत्तराधिकार के मामलों में ब्रिटिश पदाधिकारियों की नीति में न तो कहीं समानता दिखाई देती है और न ही उनकी नीति का कोई विशेष आधार। यदि कोई आधार दिखाई देता है तो वह स्वयं ब्रिटिश शासन का स्वार्थ (Self-interest of British Rule)।
सामान्यतया ऐसे अवसरों पर गोद लिए जाने वाले उत्तराधिकारी को वंचित करने के ध्येय से ब्रिटिश पदाधिकारी वंश-वृक्ष (Genealogical Tree/Family Tree) प्रस्तुत कर अपने द्वारा समर्थित उम्मीदवार को स्वर्गीय सामंत का नजदीकी रिश्तेदार बताकर उसका समर्थन करते थे [46] और यदि ब्रिटिश पदाधिकारियों द्वारा समर्थित उम्मीदवार स्वर्गीय सामंत का दूर का रिश्तेदार होता, तो उसे ‘गोद लिया हुआ उत्तराधिकारी’ कह कर उसका समर्थन करते।
आमेट जागीर के उत्तराधिकार की समस्या में उन्होंने ठीक ऐसा ही रुख अपनाया था। इस समस्या में उन्होंने वंश-वृक्ष की पूर्णतया अवहेलना की, क्योंकि यहाँ पर उनके द्वारा समर्थित उम्मीदवार अमरसिंह स्वर्गीय रावत का बहुत ही दूर का रिश्तेदार था। अतः इस अवसर पर उन्होंने स्वर्गीय रावत की पत्नी के इस कथन को अधिक महत्व प्रदान किया कि स्वर्गीय रावत ने मरते समय अमरसिंह को गोद लेने की इच्छा व्यक्त की थी, जबकि इस कथन में सत्यता का लेशमात्र भी अंश नहीं था।
वस्तुस्थिति यह थी कि अमरसिंह न तो गोद ही लिया गया था और न ही चत्रसिंह की तुलना में स्वर्गीय रावत का नजदीकी रिश्तेदार था। चत्रसिंह ने निर्विरोध रूप से स्वर्गीय रावत के उत्तराधिकारी के रूप में तीन दिन तक उनका अंतिम क्रिया-कर्म किया। किन्तु ब्रिटिश पदाधिकारियों ने अमरसिंह को न केवल आमेट का असली हकदार माना, बल्कि महकमा खास के निर्णय के पश्चात् भी चत्रसिंह को ‘दरबार के षड्यंत्रों के फलस्वरूप आमेट की गद्दी हड़पने वाला’ मानते रहे। कितनी निंदनीय और आपत्तिजनक थी ब्रिटिश पदाधिकारियों की नीति।
[1] एचीसन: ट्रीटीज, एंगेजमेंट्स एंड सनद्स, खण्ड 3, पृ. 17-18
[2] (अ) कंसल्टेशन – 28 अक्टूबर 1817, नं. 26; (ब) कंसल्टेशन – 24 अप्रैल 1818, नं. 18
[3] प्रकाश चन्द्र व्यास, मेवाड़ की एक जागीर – आमेट: उत्तराधिकार संबंधी समस्या (1859) और ब्रिटिश नीति, राजस्थान हिस्ट्री कांग्रेस।
[4] (अ) वाल्टर: चीफ्स ऑफ मेवाड़, पृ. 22; (ब) चीफ्स एंड लीडिंग फैमिलीज इन राजपूताना, पृ. 24-26; (स) ओझा: उदयपुर राज्य का इतिहास, भाग दूसरा, पृ. 899
[5] वीर विनोद, पृ. 196
[6] वीर विनोद, पृ. 196
[7] (अ) राजपूताना एजेंसी रिकॉर्ड – 79-मेवाड़-1871-1908; (ब) कंसल्टेशन – पोलीटिकल बी, अप्रैल 1875, नं. 34-37; (स) वाल्टर: चीफ्स ऑफ मेवाड़, पृ. 22
[8] वीर विनोद, पृ. 1959
[9] वीर विनोद, पृ. 1960
[10] (अ) वाल्टर: चीफ्स ऑफ मेवाड़, पृ. 22; (ब) वीर विनोद, पृ. 1960
[11] राजपूताना एजेंसी रिकॉर्ड, 173-मेवाड़-1857, पृ. 447-52
[12] (अ) कंसल्टेशन – पोलीटिकल बी, अप्रैल 1875, नं. 34-37; (ब) राजपूताना एजेंसी रिकॉर्ड, 79-मेवाड़-1871-1908; (स) वाल्टर: चीफ्स ऑफ मेवाड़, पृ. 22; (द) ओझा: उदयपुर राज्य का इतिहास, भाग दूसरा, पृ. 901
[13] (अ) कंसल्टेशन – पोलीटिकल बी, अप्रैल 1875, नं. 34-37; (ब) राजस्थान राज्य अभिलेखागार – सन् 1857 की फाइल नं. 3
[14] वीर विनोद, पृ. 1963
[15] वीर विनोद, पृ. 1964
[16] वीर विनोद, पृ. 1961
[17] (अ) कंसल्टेशन – पोलीटिकल बी, अप्रैल 1875, नं. 34-37; (ब) राजस्थान राज्य अभिलेखागार – ई. 1857 की फाइल नं. 3, खण्ड 2
[18] (अ) राजपूताना agency रिकॉर्ड, 79-मेवाड़-1871-1908; (ब) वीर विनोद, पृ. 1964
[19] 1857 में राजस्थान (सार्वजनिक संपर्क कार्यालय, जयपुर द्वारा प्रकाशित), पृ. 2
[20] (अ) शावर्स: ए मिसिंग चैप्टर ऑफ द इंडियन म्यूटिनी, पृ. 50; (ब) 1857 में राजस्थान, पृ. 5
[21] शावर्स: ए मिसिंग चैप्टर ऑफ द इंडियन म्यूटिनी, पृ. 15
[22] (अ) कंसल्टेशन – पोलीटिकल बी, अप्रैल 1875, नं. 34-37; (ब) राजपूताना एजेंसी रिकॉर्ड, 79-मेवाड़-1871-1908
[23] (अ) राजस्थान राज्य अभिलेखागार, सन् 1875 की फाइल नं. 3; (ब) कंसल्टेशन – पोलीटिकल बी, अप्रैल 1875, नं. 34-37; (स) राजपूताना एजेंसी रिकॉर्ड, 79-मेवाड़-1871-1908
[24] (अ) कंसल्टेशन – पोलीटिकल बी, अप्रैल 1875, नं. 34-37; (ब) वीर विनोद, प्रासंगिक पृष्ठ; (स) ओझा: उदयपुर राज्य का इतिहास, भाग दूसरा, प्रासंगिक पृष्ठ
[25] कंसल्टेशन – पोलीटिकल बी, अप्रैल 1875, नं. 34-37
[26] (अ) राजस्थान राज्य अभिलेखागार, 1857 की फाइल नं. 3; (ब) राजपूताना एजेंसी रिकॉर्ड, 79-मेवाड़-1871-1908; (स) कंसल्टेशन – पोलीटिकल बी, अप्रैल 1875, नं. 34-37
[27] (अ) राजस्थान राज्य अभिलेखागार, 1857 की फाइल नं. 3; (ब) कंसल्टेशन – पोलीटिकल बी, अप्रैल 1875, नं. 34-37
[28] (अ) राजस्थान राज्य अभिलेखागार, 1857 की फाइल नं. 3; (ब) कंसल्टेशन – पोलीटिकल बी, अप्रैल 1875, नं. 34-37
[29] कंसल्टेशन – पोलीटिकल बी, अप्रैल 1875, नं. 34-37
[30] (अ) राजस्थान राज्य अभिलेखागार, 1857 की फाइल नं. 3; (ब) कंसल्टेशन – पोलीटिकल बी, अप्रैल 1875, नं. 34-37
[31] (अ) राजपूताना एजेंसी रिकॉर्ड, 79-मेवाड़-1871-1908; (ब) कंसल्टेशन – पोलीटिकल बी, अप्रैल 1875, नं. 34-37
[32] कंसल्टेशन – पोलीटिकल बी, अप्रैल 1875, नं. 34-37
[33] कंसल्टेशन – पोलीटिकल बी, अप्रैल 1875, नं. 34-37
[34] ओझा: उदयपुर राज्य का इतिहास, भाग दूसरा, पृ. 765-766, 793-794 तथा 899-901
[35] वीर विनोद, पृ. 1958-64
[36] डॉ. देवीलाल पालीवाल: मेवाड़ एंड द ब्रिटिश, पृ. 90-92
[37] डॉ. देवीलाल पालीवाल: मेवाड़ एंड द ब्रिटिश, पृ. 91
[38] कंसल्टेशन – पोलीटिकल बी, अप्रैल 1875, नं. 34-37
[39] कंसल्टेशन – पोलीटिकल बी, अप्रैल 1875, नं. 34-37
[40] डॉ. देवीलाल पालीवाल: मेवाड़ एंड द ब्रिटिश, पृ. 91-92
[41] कंसल्टेशन: पोलीटिकल बी, अप्रैल 1875, नं. 34-37
[42] राजस्थान राज्य अभिलेखागार, 1857 का बस्ता नं. 3, खण्ड 2
[43] कंसल्टेशन – पोलीटिकल बी, अप्रैल 1875, नं. 34-37
[44] राजस्थान हिस्ट्री कांग्रेस प्रोसीडिंग्स – अजमेर सेशन 1970, पृ. 42-50
[45] कंसल्टेशन – जनरल बी, सितंबर 1878, नं. 117-118; मेवाड़ एजेंसी रिपोर्ट 1865-66 और 1866-67, पैरा 13
[46] राजस्थान हिस्ट्री कांग्रेस प्रोसीडिंग्स – अजमेर सेशन 1970, पृ. 45



