मेवाड़ भील कोर की स्थापना ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा मेवाड़ के महाराणा की सहमति पर की गई थी। इससे मेवाड़ राज्य भीलों के उपद्रवों को शांत करने में काफी हद तक सफल हो गया।
मेवाड़ में मगरा नामक जिले का एक हिस्सा भोमट कहलाता था और यहाँ के सरदारों को ‘भोमट के सरदार’ कहा जाता था। भोमट के सरदारों की दो श्रेणियाँ थीं— भोमिया सरदार तथा गिरासिया सरदार। भोमिया वे सरदार थे, जिन्हें अपने उत्तराधिकार के मामले में महाराणा से कोई स्वीकृति नहीं लेनी पड़ती थी और न ही ये महाराणा की सेवा में उपस्थित होते थे। आवश्यकता पड़ने पर महाराणा उनसे केवल सैनिक सहायता प्राप्त कर सकता था। गिरासिया सरदार वे थे, जिन्हें अपने उत्तराधिकार के मामले में महाराणा से स्वीकृति लेनी पड़ती थी तथा उन्हें महाराणा की सेवा में उपस्थित होना पड़ता था। इनको राज्य की ओर से ‘खुराक’ और यदि घोड़ा हो तो उसके लिये ‘घास’ देने की प्रथा थी। भोमट के सरदार महाराणा को ‘भोम बराड़’ नामक कर देते थे। ¹
भोमट क्षेत्र में जवास, पाड़ा, व मादड़ी भोमिया सरदारों के तथा जुड़ा, ओगणा व पानरवा गिरासिया सरदारों के ठिकाने थे। इस क्षेत्र की अधिकांश आबादी मीणाओं व भीलों की थी। खेती व पशु-पालन के अतिरिक्त वे लूटमार करते थे। मार्ग-रक्षा का ‘बोलाई’ तथा गांवों की चौकसी का ‘रखवाली’ नामक कर इनको कदीम से प्राप्त होता रहा था। ² भोमट का समस्त क्षेत्र कई पालों³ में विभाजित था तथा प्रत्येक पाल का एक मुखिया होता था, जिसे ‘गमेती’ कहते थे।
मेवाड़-मुगल सन्धि (1615 ई.) के फलस्वरूप महाराणा की निर्बलता और तत्पश्चात् मराठों की लूट-मार के कारण उसकी बढ़ती शक्तिहीनता से लाभ उठाते हुए भोमट के सरदार पूर्ण रूप से स्वतन्त्र हो गए। ⁴ गिरासिया सरदारों में पानरवा का सरदार, अत्यधिक शक्तिशाली सरदार था और उसे ‘राणा’ की उपाधि प्राप्त थी। वह ओगणा, जूड़ा व उमरिया के सरदारों का मुखिया था। ⁵ यह समस्त क्षेत्र भिण्डर, कानोड़, सादड़ी और सलूम्बर के ठिकानों से घिरा हुआ था, अतः भोमट के सरदारों पर राजपूत सामन्तों का प्रभाव था तथा वे उनसे लूट का हिस्सा लेते थे और कभी-कभी इन राजपूत सामन्तों के सैनिक भी इन भीलों व मीणाओं के साथ लूटमार में सम्मिलित हो जाते थे। ⁶
भोमट के सरदारों के मुख्य हथियार तीर-कमान थे, किन्तु कुछ भील तलवार और चाकू भी अपने पास रखते थे। ये पहाड़ी इलाकों में छिपे रहते थे तथा मार्ग से गुजरने वाले असुरक्षित यात्रियों की टोह में रहते थे और ज्योंही कोई यात्री अपना माल असबाब लेकर भोमट के मार्ग से गुजरता, वे उसे लूट लेते थे।
आंग्ल-मेवाड़ सन्धि (1818 ई.) के पश्चात् कर्नल टॉड ने इस क्षेत्र के भीलों व मीणाओं को नियन्त्रित करने का प्रयत्न किया। उन्हें टॉड ने राज्य की आय में वृद्धि करने हेतु राज्य में लेने का प्रबन्ध करना चाहा। जो ‘बोलाई’ व ‘रखवाली’ नामक कर, भोमिया व गिरासिया सरदार प्राप्त करते थे, इस पर यहाँ के भीलों ने विद्रोह कर दिया तथा आसपास के गांवों में लूटमार आरम्भ कर दी। ⁷ कर्नल टॉड ने गांगा नामक गमेती को, जो नीमच की तरफ की पालों का मुखिया था, एक सौ रुपये मासिक देने का वादा किया तथा गांगा ने अपनी पालों के भीलों व मीणाओं को नियन्त्रित रखने का आश्वासन दिया, किन्तु यह प्रबन्ध स्थायी नहीं रह सका। जवास के राव का विद्रोह तीव्र होता गया, अतः उसका दमन करने के लिये कप्तान ब्लैक के नेतृत्व में एक ब्रिटिश सेना भेजी गयी। इस सैनिक कार्यवाही के फलस्वरूप यहाँ के सरदारों ने महाराणा की अधीनता स्वीकार कर ली ⁸ तथा बोलाई व रखवाली वसूल करने के अधिकार को त्यागने के लिए वे सहमत हो गये।
उपर्युक्त प्रबन्ध से भीलों का उपद्रव शान्त न हो सका, क्योंकि भीलों ने ब्रिटिश सेना के दबाव में आकर महाराणा की अधीनता स्वीकार की थी तथा ‘बोलाई व रखवाली’ कर वसूल करने के अधिकार को त्याग दिया था। अतः कप्तान ब्लैक के वहाँ से विदा होते ही भीलों ने पुनः लूटमार आरम्भ कर दी। ⁹ इस पर मेवाड़ के पोलिटिकल एजेण्ट कप्तान कॉब ने कर्नल लुम्ले के नेतृत्व में एक सेना भेज दी। ब्रिटिश सेना ज्योंही भोमट के क्षेत्र में घुसी, त्योंही कोलाकोट, दोलापानी व बसी के कामदार अपने अल्पवयस्क स्वामियों को छोड़कर भाग खड़े हुए। इस सेना ने इन क्षेत्रों पर अधिकार करते हुए आगे बढ़ी तथा जवास पर भी अधिकार कर लिया और इस क्षेत्र के सर्वाधिक विद्रोही जवास के राव के चाचा दौलतसिंह को वहां से निकाल दिया। सातोला के सरदार को, जो अपनी हवेली में अफीम के नशे में बेसुध पड़ा था, पकड़ कर उदयपुर लाया गया। ¹⁰ इस सैनिक कार्यवाही के फलस्वरूप भोमट का क्षेत्र पुनः महाराणा के प्रभुत्व में आ गया।
कर्नल लुम्ले के लौटते ही फरवरी 1826 में, महाराणा के कामदारों के अत्याचारों के कारण और महाराणा के सैनिकों द्वारा, जो इस क्षेत्र के थानों पर तैनात थे, हिंसात्मक कार्यवाहियों के फलस्वरूप तथा जवास के दौलतसिंह के द्वारा उकसाने पर भीलों ने पुनः विद्रोह कर दिया। उन्होंने जवास, ओगणा व पानरवा के थानों पर तैनात सैनिकों में से कुछ को मार डाला व शेष को वहां से भगा दिया। ¹¹ इन परिस्थितियों में कार्यवाहक पोलिटिकल एजेण्ट कर्नल सुदरलैण्ड की प्रार्थना पर ब्रिटिश सरकार ने कप्तान ब्लैक को भोमट में शान्ति स्थापित करने के लिये खैरवाड़ा भेजा ¹², किन्तु कप्तान ब्लैक को अपने उद्देश्यों में सफलता नहीं मिली। ¹³ कप्तान ब्लैक को असफलता से बचाने के लिये कप्तान कॉब ने ए.जी.जी. से मांग की कि उसकी सहायता के लिये 250 सैनिकों की एक ब्रिटिश सैनिक टुकड़ी भेजी जाय, किन्तु ए.जी.जी. ने कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के आदेशों के अन्तर्गत किसी राज्य के आन्तरिक उपद्रव को शान्त करने के लिये ब्रिटिश सैनिकों को भेजने की स्वीकृति नहीं दी ¹⁴ तथा गवर्नर जनरल ने आदेश दिया कि यदि सम्भव हो तो कप्तान ब्लैक को खैरवाड़ा से वापिस बुला लिया जाय। क्योंकि मेवाड़ के आन्तरिक भागों में व्यवस्था बनाये रखने का दायित्व महाराणा का है। ¹⁵ किन्तु तात्कालिक परिस्थितियों में कप्तान ब्लैक को खैरवाड़ा से वापिस बुलाना न तो ब्रिटिश सरकार के हित में था और न महाराणा के हित में।
विद्रोह का केन्द्र खैरवाड़ा था। कप्तान ब्लैक ने यहां के भीलों को नियन्त्रित करने का हर सम्भव प्रयास किया, किन्तु उसे सफलता नहीं मिली। भीलों ने महीकण्ठा के क्षेत्र में भी लूटमार प्रारम्भ कर दी जिससे कप्तान ब्लैक की कठिनाइयां बढ़ गयीं। अतः बम्बई की सरकार ने कप्तान ब्लैक की सहायता के लिये एक सेना भेजी। ¹⁶ कप्तान ब्लैक ने बम्बई की सेना को ईडर की सीमा पर तैनात कर, निर्देश दिया कि उसे आदेश मिलते ही भोमट प्रदेश में प्रवेश करे। किन्तु ज्योंही बम्बई की सेना को आदेश मिला, बम्बई की सेना रास्ता भूल गयी तथा मेवाड़ में भीलों की आबादी वाले क्षेत्रों में प्रवेश कर गयी, जहां भीलों ने उनका सारा सामान लूट लिया तथा भारी क्षति उठाकर इस सेना को वहां से लौटना पड़ा। ¹⁷
मेवाड़ के भोमट क्षेत्र में भीलों का विद्रोह दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा था। कप्तान ब्लैक अपने कार्यों में निरन्तर असफल होता जा रहा था। इन परिस्थितियों में 16 नवम्बर 1827 को कप्तान ब्लैक की मृत्यु हो गई, अतः उसके स्थान पर कर्नल स्पीयर्स को खैरवाड़ा में नियुक्त किया गया। ¹⁸ भीलों के बढ़ते हुए विद्रोह को देखते हुए सन् 1828 की शीत ऋतु में (जनवरी-फरवरी) स्वयं कर्नल स्पीयर्स, नीमच से मेजर वर्ग के अधीन 2,000 सैनिक लेकर भोमट के भीलों का दमन करने आया। कर्नल स्पीयर्स ने कोई सैनिक कार्यवाही नहीं की। उसने ‘मेल जोल के साथ शान्ति स्थापित’ करने के लिये भोमट के सरदारों से बातचीत आरम्भ की। अन्त में 27 फरवरी 1828 को जवास के दौलतसिंह सहित जुड़ा, ओगणा, व पानरवा के सरदारों ने ब्रिटिश सरकार की सर्वोच्चता स्वीकार कर ली। ¹⁹
इस प्रकार व्यवस्था स्थापित हो जाने के बाद खैरवाड़ा व पीण्डवाड़ा (सिरोही राज्य में) में कुछ ब्रिटिश सेना को छोड़कर शेष ब्रिटिश सेना नीमच लौट गयी। कर्नल स्पीयर्स के उत्तम प्रबन्ध के कारण ब्रिटिश सरकार ने भोमट में व्यवस्था स्थापित करने का कार्य उसे सौंप दिया, किन्तु महाराणा ने इस प्रदेश का शासन अपने हाथ में रखना चाहा ²⁰, अतः गवर्नर जनरल की आज्ञा के अनुसार भोमट के क्षेत्र से ब्रिटिश सेना हटाली गयी तथा इस प्रदेश की शासन व्यवस्था महाराणा को सौंप दी गई। ²¹ महाराणा ने चांद खां नामक व्यक्ति को एक छोटी सैनिक टुकड़ी देकर भोमट में शासन व्यवस्था हेतु भेजा। किन्तु नवम्बर 1830 में मेवाड़ एजेन्सी का कार्यालय, मेवाड़ से उठा देने पर चांदखां ने मेवाड़ सरकार की सेवा में रहने से इन्कार कर दिया। अतः महाराणा जवानसिंह ने तीन सिन्धी जमादारों को यहाँ व्यवस्था बनाये रखने हेतु भेजा, किन्तु ये सिन्धी जमादार इस क्षेत्र से अधिक से अधिक धन वसूल करने पर उतारू हो गये। फलतः भीलों ने पुनः विद्रोह कर दिया, तब महाराणा ने पुनः कर्नल स्पीयर्स को वहां का प्रशासन अपने हाथ में लेने की प्रार्थना की। ²²
कर्नल स्पीयर्स ने पुनः वहां पर व्यवस्था स्थापित कर, ब्रिटिश सरकार को सुझाव दिया कि भोमट के सुप्रबन्ध के लिये ब्रिटिश अधिकारियों के निरीक्षण में भीलों की एक सेना (भील कोर) स्थापित की जाय। ब्रिटिश सरकार ने इस प्रस्ताव को इस शर्त पर स्वीकार किया कि भील कोर का समस्त व्यय महाराणा दे तथा भोमट से प्राप्त होने वाली आय का केवल दसवां भाग महाराणा को दिया जाय ²³, किन्तु महाराणा जवानसिंह ने कहा कि इस प्रदेश की आय से ही भील कोर का खर्च दिया जा सकता है, उससे अधिक नहीं। ²⁴ महाराणा तो भील कोर के लिये, मेरवाड़ा व खैरवाड़ा की आय भी देने को तैयार हो गये। ²⁵ किन्तु इन परगनों से आय अनिश्चित व अनियमित रूप से प्राप्त होती थी, अतः ब्रिटिश सरकार ने महाराणा के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया तथा भील कोर स्थापित करने का प्रस्ताव स्थगित कर दिया गया।
मार्च 1839 में महाराणा ने भोमट के प्रदेश से भू-लगान वसूल करना चाहा। फलतः भीलों ने पुनः विद्रोह कर दिया तथा दरबार के दो थानों का विध्वंस कर तीसरे पर भी असफल आक्रमण किया। 3 मार्च को निम्बाहेड़ा की तरफ से एक शराब की गाड़ी आ रही थी, उसे लूट लिया। ²⁶ इस प्रकार महाराणा ने 500 सैनिकों की एक सेना भोमट की ओर भेजी, किन्तु उसे कोई सफलता प्राप्त नहीं हुई, तब महाराणा ने मेवाड़ के पोलिटिकल एजेण्ट कर्नल रॉबिन्सन से सहायता की मांग की ²⁷, किन्तु कर्नल रॉबिन्सन ने इसे मेवाड़ का आन्तरिक मामला कह कर सहायता देने से इन्कार कर दिया।
भोमट के क्षेत्र में भीलों का विद्रोह दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा था। अतः 16 जनवरी 1840 को मेहता रामसिंह ने पोलिटिकल एजेण्ट कर्नल रॉबिन्सन को लिखा कि भोमट के प्रदेश की घटनाओं को देखते हुए यहां भील कोर स्थापित करना आवश्यक हो गया है। मेवाड़ सरकार भोमट की आय के अतिरिक्त मेरवाड़ा व खैरवाड़ा की आय इस भील कोर के लिये देने को तैयार है। ²⁸ इस प्रकार कर्नल रॉबिन्सन ने ए. जी. जी. सुदरलैण्ड को लिखा कि मेरवाड़ा व खैरवाड़ा की आय अनियमित रूप से प्राप्त होती है, अतः इन दोनों क्षेत्रों की आय सेठ जोरावरमल की दुकान में जमा करादी जाय तथा सेठ जोरावरमल की दुकान से भील कोर के व्यय हेतु रकम प्राप्त करली जाय। ए. जी. जी. सुदरलैण्ड ने कर्नल रॉबिन्सन के प्रस्ताव को गवर्नर जनरल के पास प्रेषित करते हुए लिखा कि सेठ जोरावरमल की दुकान से रकम लेने की बजाय स्वयं पोलिटिकल एजेण्ट मेवाड़ के खिराज में से भील कोर का व्यय वहन करे अथवा मेरवाड़ा व खैरवाड़ा से मेवाड़ दरबार को होने वाली आय के खाते में से इस कोर का व्यय वहन किया जाय। ²⁹
गवर्नर जनरल लॉर्ड ऑकलैण्ड ने यद्यपि कर्नल सुदरलैण्ड को इस योजना को कार्यान्वित करने की अनुमति प्रदान कर दी, तथापि इसी समय लन्दन स्थित कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स ने भोमट में तैनात ब्रिटिश सैनिक अधिकारी कर्नल स्पीयर्स के उस प्रस्ताव को स्वीकृति प्रदान करदी, जो उसने 30 जून 1838 में प्रस्तुत किया था कि मेवाड़ भील कोर को शक्तिशाली बनाने के लिये ब्रिटिश सरकार डूंगरपुर, बांसवाड़ा, सीबन्दी के खिराज में से कुछ व्यय वहन करे। ³⁰ इस पर गवर्नर जनरल ने कर्नल सुदरलैण्ड को इस योजना पर पुनर्विचार करने का आदेश दिया। ³¹ 30 नवम्बर 1840 को ए. जी. जी. सुदरलैण्ड ने दो कोर स्थापित करने की योजना प्रस्तुत की— एक सिरोही में, जिसे जोधपुर लीजियन से सम्बद्ध करना था तथा दूसरी मेवाड़ भील कोर स्थापित करने के लिये। ³² सुदरलैण्ड की इस योजना पर अन्तिम आदेश देने से पूर्व गवर्नर जनरल ने निर्देश दिया कि महीकण्ठा के पोलिटिकल एजेण्ट, मेवाड़ के पोलिटिकल एजेण्ट तथा सुदरलैण्ड इस योजना के सम्बन्ध में एक संयुक्त प्रतिवेदन प्रस्तुत करें। ³³
मार्च 1841 में उपर्युक्त तीनों पदाधिकारियों का संयुक्त प्रतिवेदन ब्रिटिश सरकार को प्रस्तुत किया गया जिसमें दो वैकल्पिक कोर स्थापित करने की योजना थी, एक कोर पर 1,50,000 रुपये अनुमानित व्यय था तथा दूसरी पर 1,20,000 रुपये अनुमानित व्यय था। इस प्रतिवेदन में यह भी कहा गया था कि इस कोर में भीलों के अतिरिक्त दूसरी जाति के लोग भी भर्ती किये जा सकेंगे, किन्तु दूसरी जाति के लोगों की संख्या पूरी सेना के भाग से अधिक नहीं होगी और ज्यों-ज्यों भील इस सेवा के अभ्यस्त होते जायेंगे तथा अधिक से अधिक भील इस कोर में भर्ती होते जायेंगे त्यों-त्यों दूसरी जाति के लोगों का अनुपात भी घटता जायेगा।
मेवाड़ भील कोर का कमाण्डिंग ऑफिसर अपनी सैनिक सेवाओं के अतिरिक्त मेवाड़ के पोलिटिकल एजेण्ट के सहायक के रूप में भी कार्य करेगा। संयुक्त प्रतिवेदन में यह भी कहा गया था कि कप्तान हण्टर ने खैरवाड़ा में भीलों को भर्ती करने का कार्य आरम्भ कर दिया है तथा उसे सफलता भी मिली है। ³⁴ ब्रिटिश सरकार ने संयुक्त प्रतिवेदन में प्रस्तावित वह भील कोर, जिस पर 1,20,000 रुपये व्यय करने का अनुमान किया गया था, स्थापित करने की स्वीकृति प्रदान कर दी, जिसमें से 70,000 रुपये ब्रिटिश सरकार से तथा 50,000 रुपये मेवाड़ सरकार से लेना तय किया गया। कप्तान हण्टर को मेवाड़ भील कोर का कमाण्डिंग ऑफिसर नियुक्त किया गया तथा उसका मुख्य आवास खैरवाड़ा में रखा गया। ³⁵
इस प्रकार महाराणा सरदारसिंह द्वारा मेवाड़ भील कोर के लिये 50,000 रुपये देने की स्वीकृति देने पर खैरवाड़ा में भील कोर संगठित करने का कार्य आरम्भ हुआ। यह महाराणा सरदारसिंह के काल की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि कही जा सकती है।
सन्दर्भ (Footnotes):
- (क) टॉड, प्रथम भाग, पृ. 190-91; (ख) सी. ई. येटः गजेटियर ऑफ मेवाड़, पृ. 104; (ग) श्याम स्वरूप कुलश्रेष्ठ : मेवाड़ का राज्य प्रबन्ध, पृ. 11
- (क) कन्सलटेशन-17 अगस्त 1827 न.- 18; (ख) ओझा : उदयपुर राज्य का इतिहास, दूसरा भाग, पृ. 714
- इस पहाड़ी क्षेत्र में भीलों के मकानों के एक बड़े समुदाय को ‘पाल’ कहा जाता था।
- (क) कन्सलटेशन-12 जनवरी 1827 न.-25; (ख) कन्सलटेशन-19 फरवरी 1827 न.-17-18; (ग) कन्सलटेशन- 6 सितम्बर 1841 न.-33-35
- कन्सलटेशन 12 जून 1827 न.-66-67
- वही
- (क) जे. सी. ब्रुक हिस्ट्री ऑफ मेवाड़, पृ. 72; (ख) ओझा: उदयपुर राज्य का इतिहास, दूसरा भाग, पृ. 714
- कन्सलटेशन-5 मई 1826 न.-1-4
- कन्सलटेशन-17 जून 1827 न.-66-67
- कन्सलटेशन-17 जून 1827 न.-66-67
- कन्सलटेशन-5 मई 1826 न.-1-4
- (क) कन्सलटेशन 16 दिसम्बर 1826 न.-27-28; (ख) कन्सलटेशन 30 दिसम्बर 1826 न.-29-30. कप्तान ब्लैक ने स्थिति का अध्ययन कर यह सुझाव दिया था कि प्रत्येक पाल के मुखिया को कुछ भूमि दे दी जाय अथवा उन्हें कुछ रोकड़ भत्ता दे दिया जाय ताकि अपने कबीलों को व्यवस्थित रखने के लिये उनमें रुचि उत्पन्न हो सके। किन्तु ब्रिटिश सरकार ने इस सुझाव को स्वीकार नहीं किया था।
- कन्सलटेशन-9 फरवरी 1827 न.-17-18
- कन्सलटेशन-2 मार्च 1827 न.-71-72
- कन्सलटेशन-16 मार्च 1827 न 5
- कन्सलटेशन 8 जून 1827 न.-36
- वही
- (क) कन्सलटेशन 24 दिसम्बर 1827 न.-6-8; (ख) ओझा : उदयपुर राज्य का इतिहास, दूसरा भाग, पृ. 715
- (क) कन्सलटेशन 6 सितम्बर 1841 न.-33-35; (ख) ओझा : उदयपुर राज्य का इतिहास, दूसरा भाग, पृ. 715
- (क) कन्सलटेशन-3 दिसम्बर 1832 न.-35-37; (ख) ओझा : उदयपुर राज्य का इतिहास, दूसरा भाग, पृ 723
- (क) कन्सलटेशन 8 अगस्त 1838 न.-12-14; (ख) ओझा : उदयपुर राज्य का इतिहास, दूसरा भाग, पृ. 723
- (क) कन्सलटेशन 8 अप्रैल 1838 न.-63; (ख) कन्सलटेशन-17 अक्टूबर 1838 न.-73
- डिस्पेच टू कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स, न.-66, दिनांक 11 मार्च 1839, पैरा 41-43
- (क) जे. सी. ब्रुक हिस्ट्री ऑफ मेवाड़, पृ. 82-83; (ख) ओझा : उदयपुर राज्य का इतिहास, दूसरा भाग, पृ. 724
- (क) कन्सलटेशन-16 मार्च 1840 न.-23-25; (ख) बख्शीखाना, उदयपुर बही न.-22, मेहता रामसिंह का पत्र कर्नल स्पीयर्स के नाम, पोष सुदि 12 सं-1895 (28 दिसम्बर 1838)
- (क) कन्सलटेशन 11 सितम्बर 1839 न.-36; (ख) बख्शीखाना, उदयपुर बही न.-22, कर्नल रॉबिन्सन का पत्र महाराणा के नाम, दिनांक 9 मार्च 1839
- (क) कन्सलटेशन 11 सितम्बर 1839 न.-36; (ख) बख्शीखाना, उदयपुर बही न.-22, महाराणा का पत्र, कर्नल रॉबिन्सन के नाम, चैत्र सुदि 1 सं-1895 (26 मार्च 1838)
- कन्सलटेशन-16 मार्च 1840 न.-23
- कन्सलटेशन-16 मार्च 1840 न.-24-25
- डिस्पेच फ्रॉम द कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स, न.-11, दिनांक 25 मार्च 1840
- कन्सलटेशन-3 अगस्त 1840 न 7
- कन्सलटेशन-30 नवम्बर 1840 न-36
- कन्सलटेशन-30 नवम्बर 1840 न.-39
- कन्सलटेशन-3 मई 1841 न.-44
- (क) कन्सलटेशन 3 मई 1841 न.-45; (ख) बख्शीखाना, उदयपुर, बही न.-62 कर्नल रॉबिन्सन का पत्र, महाराणा सरदारसिंह के नाम, 23 जून 1841



