Saturday, March 2, 2024
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महाराजा सूरजमल को राज्य की प्राप्ति

यद्यपि सूरजमल विगत 14 वर्षों से भरतपुर राज्य का काम देख रहा था किंतु ई.1756 में राजा बदनसिंह की मृत्यु होने पर सूरजमल विधिवत् भरतपुर का राजा बना। उसे अनेक युद्धों में भाग लेने का तथा लम्बे समय तक राज्य प्रबन्ध करने का अनुभव प्राप्त था। नादिरशाह द्वारा दिल्ली पर आक्रमण किये जाने एवं भारी तबाही मचाने के बाद मुगल साम्राज्य बहुत कमजोर हो गया था। जयपुर राज्य भी ईश्वरीसिंह और माधोसिंह के झगड़े में काफी कमजोर तथा अस्त-व्यस्त हो गया था। सूरजमल ने इन्हीं परिस्थितियों का लाभ उठाया और दिल्ली तथा उसके आस-पास के क्षेत्रों को जमकर लूटा तथा अपने राज्य का विस्तार किया। सूरजमल ने नवोदित भरतपुर राज्य को व्यवस्थित हिन्दू राज्य में बदल दिया।

जवाहरसिंह का विद्रोह

सूरजमल की तीसरी रानी गंगा के दो पुत्र थे- जवाहरसिंह तथा रतनसिंह। जवाहरसिंह क्रोधी तथा उतावले स्वभाव का युवक था। उसे महारानी किशोरी देवी ने गोद ले लिया। राजा बदनसिंह के मरने के बाद सूरजमल ने जवाहरसिंह को डीग का किलेदार नियुक्त किया। साथ ही सूरजमल ने कुछ ऐसे संकेत दिये कि सूरजमल के बाद उसका अन्य पुत्र नाहरसिंह राज्य का उत्तराधिकारी होगा। इस पर जवाहरसिंह ने विद्रोह कर दिया तथा स्वयं को डीग का स्वतंत्र शासक घोघित किया दिया। इस पर सूरजमल ने जवाहरसिंह को समझाने का प्रयास किया किंतु जवाहरसिंह ने सूरजमल की बात मानने से मना कर दिया। इस पर सूरजमल ने जवाहरसिंह के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिये सेना भेजी। इस युद्ध में जवाहरसिंह बुरी तरह से घायल हो गया। बंदूक की एक गोली उसके पेट के निचले भाग में लगी तथा आर-पार हो गई। इससे जवाहरसिंह जीवन भर के लिये लंगड़ा हो गया। सम्भवतः महारानी किशोरी देवी ने दोनों के बीच समझौता करवाया तथा सूरजमल ने जवाहरसिंह का क्षमा कर दिया।

ब्रजभूमि पर अहमदशाह अब्दाली का आक्रमण

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 उस काल में एक तरफ तो बंगाल से अंग्रेज शक्ति पूर्व दिशा से उत्तरी भारत को दबाती हुई चली आ रही थी तथा दूसरी ओर पिण्डारी और मराठे दक्षिण दिशा से से उत्तरी भारत को रौंदने में लगे हुए थे। यह भारतीय इतिहास के मध्यकाल का अवसान था किंतु अफगानिस्तान की ओर से विगत कई शताब्दियों से आ रही मुस्लिम आक्रमणों की आंधी अभी थमी नहीं थी। ई.1757 में अफगान सरदार अदमदशाह दुर्रानी ने भारत पर चौथा आक्रमण किया। भारत के इतिहास में उसे अहमदशाह अब्दाली के नाम से भी जाना जाता है।

 जब दिल्ली की जनता को ज्ञात हुआ कि अहमदशाह अब्दाली दिल्ली पर आक्रमण करने वाला है तो दिल्ली की जनता मुगल बादशाह की राजधानी को छोड़कर अन्य स्थानों पर भाग गई। अधिकतर लोगों ने राजा सूरजमल द्वारा शासित क्षेत्रों में शरण ली। मथुरा पर उन दिनों सूरजमल का अधिकार था। इसलिये दिल्ली की जनता ने बड़ी संख्या में मथुरा में शरण ली। बादशाह ने जाटों और मराठों का सहयोग प्राप्त करने के लिये अपने दूत भिजवाये। सूरजमल ने तिलपत में मुगल सरदारों तथा नजीब खां रूहेला से लम्बी वार्त्ता की। सूरजमल चाहता था कि नजीब खां, रूहेलों, जाटों, राजपूतों और मुगलों की सेना को एकत्रित करके उनका नेतृत्व करे तथा मराठों को नर्बदा के पार जाने के लिये कह दिया जाये किंतु दिल्ली का वजीर इमादुलमुल्क, सूरजमल के विचारों से सहमत नहीं हुआ। इमादुलमुल्क नहीं चाहता था कि नजीब खां को जाटों तथा रूहेलों का साथ मिल जाये। इसलिये यह वार्त्ता विफल हो गई। इस पर सूरजमल अपने लड़के जवाहरसिंह को दिल्ली में छोड़कर स्वयं भरतपुर लौट गया।

अब्दाली तेज गति से दिल्ली की ओर बढ़ा। उधर नजीब खां, अहमदशाह अब्दाली से मिल गया और 17 जनवरी 1757 की रात्रि में वह यमुना को पार करके अब्दाली के पास चला गया। केवल अंताजी मानकेश्वर इस समय ऐसा वीर था जो अपनी छोटी सी सेना के साथ, अब्दाली का मार्ग रोककर खड़ा हुआ। उसे अब्दाली की सेना ने सरलता से परास्त कर दिया। उसका परिवार भरतपुर में होने के कारण सुरक्षित रहा। नजीब खां और अब्दाली की दोस्ती हुई जानकर वजीर इमादुलमुल्क ने अपने शत्रु सूरजमल से संधि कर ली और अपने परिवार को डीग भेज दिया। बादशाह आलमगीर द्वितीय ने अब्दाली के समक्ष समर्पण कर दिया। अब्दाली ने उससे एक करोड़ रुपये लिये तथा उसे हिन्दुस्तान का बादशाह और नजीब को उसके दरबार में अपना प्रतिनिधि नियुक्त किया गया। इसके बाद अहमदशाह के आदमियों ने दिल्ली को लूटना आरम्भ किया। एक महीने तक दिल्ली को लूटा और नष्ट किया गया। दिल्ली पूरे मध्यकाल में लुटती आई थी इसलिये भूखे-नंगे शहर में लूटने को बहुत कुछ बचा भी नहीं था। अहमदशाह तो अपार धन की आशा में भारत आया था। वह और अधिक बेचैन हो उठा।

भरतपुर की ओर

अहमदशाह अब्दाली ने सुन रखा था कि भारत में दो ही धनाढ्य व्यक्ति हैं- एक तो बंगाल का नवाब शुजाउद्दौला तथा दूसरा भरतपुर का राजा सूरजमल। उसे यह भी जानकारी थी कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने अपने खूनी पंजे नवाब शुजाउद्दौला की गर्दन में भलीभांति गाढ़ दिये हैं। अतः अहमदशाह अब्दाली भरतपुर के खजाने को लूटने के लिये व्याकुल हो उठा। वह भरतपुर की दाढ़ में से अंताजी मानकेश्वर के परिवार तथा वजीर इमादुल्मुल्क के परिवार को निकालना चाहता था। राजा नागरमल भी सूरजमल की शरण में था। अब सूरजमल ने जवाहरसिंह को मथुरा की रक्षा पर नियत किया और स्वयं डीग में जाकर मोर्चा बांधकर बैठ गया।

अब्दाली ने सूरजमल को आदेश भिजवाया कि वह कर देने के लिये स्वयं हाजिर हो और अब्दाली के झण्डे के नीचे रहकर सेवा करे। जिन इलाकों को सूरजमल ने हाल ही में अपने अधीन किया है, उन इलाकों को भी लौटा दे। इस पर सूरजमल ने व्यंग्य भरा जवाब भिजवाया-

जब बड़े-बड़े जमींदार हुजूर की सेवा में हाजिर होंगे, तब यह दास भी शाही ड्यौढ़ी का चुम्बन करेगा। मैं राजा नागरमल तथा अन्य लोग जो मेरी शरण लिये हुए हैं, उन्हें कैसे भिजवा सकता हूँ?

यह जवाब मिलने के बाद अब्दाली ने जाट राज्य पर आक्रमण करने के लिये दिल्ली से प्रस्थान किया।

बल्लभगढ़ का विनाश

 अहमदशाह अब्दाली ने सूरजमल के राज्य पर आक्रमण के लिये प्रस्थान किया। एक दिन राजकुमार जवाहरसिंह ने अचानक ही अब्दाली की सेना पर आक्रमण किया और उसके बहुत से सैनिकों को मारकर बल्लभगढ़ में जा बैठा। इस पर अब्दाली बल्लभगढ़ पर चढ़ बैठा। उसने दुर्ग पर अधिकार कर लिया। बल्लभगढ़ के दुर्ग में अब्दाली को केवल 12 हजार रुपये, सोने-चांदी के कुछ बर्तन, 14 घोड़े, 11 ऊँट और कुछ अनाज हाथ लगा। जवाहरसिंह अपने आदमियों के साथ रात के अंधेरे का लाभ उठाकर बल्लभगढ़ से जीवित ही निकल गया। इससे चिढ़कर अब्दाली ने बल्लभगढ़ के समस्त नर-नारियों को मार डाला। इन मनुष्यों के सिर काटकर गठरियों में बांध कर घोड़ों पर रख दिये गये। कुछ लोगों को पकड़कर घोड़ों के पीछे बांध दिया गया ताकि वे भी कटे हुए सिरों को उठा सकें।

 प्रातःकाल होने पर लोगों ने देखा कि प्रत्येक घुड़सवार एक घोड़े पर चढ़ा हुआ था। उसने उस घोड़े की पूंछ के साथ दस से बीस घोड़ों की पूंछों को बांध रखा था। समस्त घोड़ों पर लूट का सामान लदा हुआ था तथा बल्लभगढ़ से पकड़े गये स्त्री-पुरुष बंधे हुए थे। प्रत्येक आदमी के सिर पर कटे हुए सिरों की गठरियां रखी हुई थीं। अहमदशाह के सामने कटे हुए सिरों की मीनार बनायी गयी। जो लोग इन सिरों को अपने सिरों पर रख कर लाये थे, उनसे पहले तो चक्की पिसवाई गयी तथा उसके बाद उनके भी सिर काटकर मीनार में चिन दिये गये।

 जब अब्दाली बल्लभगढ़ पर आक्रमण करने गया तब उसने नजीबुद्दौला तथा जहानखां को 20 हजार सिपाही देकर निर्देश दिये-

‘उस अभागे जाट के राज्य में घुस जाओ। उसके हर शहर और हर जिले को लूटकर उजाड़ दो। मथुरा नगर हिन्दुओं का तीर्थ है। मैंने सुना है कि सूरजमल वहीं है। इस पूरे शहर को तलवार के घाट उतार दो। जहाँ तक बस चले, उसके राज्य में और आगरा तक कुछ मत रहने दो। कोई चीज खड़ी न रहने पाये। उसने अपने सैनिकों को आज्ञा दी कि मथुरा में एक भी आदमी जीवित न रहे तथा जो मुसलमान किसी विधर्मी का सिर काटकर लाये उसे पाँच रुपया प्रति सिर के हिसाब से ईनाम दिया जाये।’

चौमुहा की लड़ाई

इसके बाद अहमदशाह अब्दाली ने मथुरा पर आक्रमण किया। मथुरा से आठ मील पहले चौमुहा में जवाहरसिंह ने दस हजार जाट सैनिकों को लेकर अब्दाली का मार्ग रोका। नौ घण्टे तक दोनों पक्षों में भीषण लड़ाई हुई जिसमें जाट सैनिक परास्त हो गये। जाटों को भारी क्षति उठानी पड़ी। इसके बाद अब्दाली की सेना ने मथुरा में प्रवेश किया। 1 मार्च 1757 को अब्दाली मथुरा में घुसा, उस दिन होली के त्यौहार को बीते हुए दो ही दिन हुए थे। अहमदशाह के सिपाहियों ने माताओं की छाती से दूध पीते बच्चों को छीनकर मार डाला। हिन्दू सन्यासियों के गले काटकर उनके साथ गौओं के कटे हुए गले बांध दिये। मथुरा के प्रत्येक स्त्री-पुरुष को नंगा किया गया। जो पुरुष मुसलमान निकले उन्हें छोड़ दिया गया, शेष को मार दिया गया। जो औरतें मुसलमान थीं उनकी इज्जत लूट कर उन्हें जीवित छोड़ दिया गया तथा हिन्दू औरतों को इज्जत लूटकर मार दिया गया।

मथुरा में विध्वंस मचाकर 6 मार्च 1757 को अब्दाली ने वृंदावन की ओर रुख किया। वहाँ भी वही सब दोहराया गया जो बल्लभगढ़ और मथुरा में किया गया था। चारों ओर मनुष्यों के शवों के ढेर लग गये।

यह एक आश्चर्य की बात लग सकती है कि जिस समय अहमदशाह बल्लभगढ़, मथुरा और वृदावन में कत्ले आम मचा रहा था, सूरजमल डीग में बैठा था किंतु इसमें सूरजमल की सोची-समझी रणनीति काम कर रही थी। वह जानता था कि किले से बाहर निकलकर वह अफगानिस्तान से आई सेना का मुकाबला नहीं कर सकेगा किंतु यदि अफगानिस्तान की सेना डीग, कुम्हेर अथवा भरतपुर पर आक्रमण करती है तो उसे इन तीन दुर्गों के मकड़जाल में फांसकर मारा जा सकता है।

सर्वाधिक आश्चर्य की बात तो यह थी कि जो मराठे हिन्दू पदपादशाही स्थापित करने का स्वप्न देखते न थकते थे, उन्होंने इस विपत्ति में स्वयं को उत्तर भारत से दूर रखा। भगवान कृष्ण की जन्मस्थली और लीला स्थली बुरी तरह नष्ट-भ्रष्ट की गईं किंतु मराठों की धर्म के प्रति निष्ठा नहीं जाग सकी।

मथुरा और वृंदावन में हिन्दुओं का इतना रक्त बहा कि यमुना का पानी लाल हो गया। अब्दाली के आदमियों को वही पानी पीना पड़ा। इससे फौज में हैजा फैल गया और सौ-डेढ़ सौ आदमी प्रतिदिन मरने लगे। अनाज की कमी के कारण सेना घोड़ों का मांस खाने लगी। इससे घोड़ों की कमी होने लगी। अब्दाली ने इन बातों की परवाह किये बिना, 21 मार्च 1757 को आगरा पर आक्रमण किया। उसे ज्ञात हुआ था कि दिल्ली से बहुत से व्यापारी तथा अमीर, अपना धन लेकर आगरा भाग आये हैं। इसलिये अब्दाली जितनी जल्दी हो सके आगरा को लूटना चाहता था। उसके पंद्रह हजार घुड़सवार सैनिक आगरा में घुसकर लूट मचाने लगे। ठीक इसी समय सेना में हैजे का उग्र प्रकोप हुआ और अब्दाली के सैनिक अपने घरों को लौटने के लिये विद्रोह करने पर उतारू हो गये।

इस पर अब्दाली ने अपना अभियान समाप्त कर दिया और दिल्ली के बादशाह आलमगीर द्वितीय को संदेश भिजवाया कि हम अपना अभियान समाप्त करके दिल्ली लौट रहे हैं। अब्दाली ने सूरजमल को भी एक चिट्ठी भिजवाई कि यदि वह कर नहीं देगा तो उसके परिणाम बहुत भयंकर होंगे। अब्दाली ने एक और पत्र सूरजमल को लिखकर धमकाया कि यदि वह रुपये नहीं देगा तो भरतपुर, डीग तथा कुम्हेर के किले धरती में मिला दिये जायेंगे। इस पर सूरजमल ने अहमदशाह अब्दाली को अपना उत्तर भिजवाया-

हिन्दुस्तान के साम्राज्य में मेरी कोई महत्त्वपूर्ण स्थिति नहीं है। मैं रेगिस्तान में रहने वाला एक जमींदार हूँ और मेरी कोई कीमत नहीं है, इसलिये इस काल के किसी भी बादशाह ने मेरे मामलों में दखल देना अपनी प्रतिष्ठा के अनुरूप नहीं समझा। अब हुजूर जैसे एक शक्तिशाली बादशाह ने युद्ध के मैदान में मुझसे मिलने और मुकाबला करने का दृढ़ निश्चय किया है और इस नगण्य से व्यक्ति के विरुद्ध अपनी सेनाएं ला खड़ी की हैं। खाली यह कार्यवाही ही बादशाह की शान और बड़प्पन के लिये शर्मनाक होगी। इससे मेरी स्थिति ऊँची होगी तथा मुझ जैसे तुच्छ व्यक्ति के लिये यह अभिमान की वस्तु होगी। दुनिया कहेगी कि ईरान और तूरान के शाह ने बहुत ही ज्यादा डरकर, अपनी सेनाएं लेकर एक कंगाल बंजारे पर चढ़ाई कर दी। केवल ये शब्द ही राजमुकुट प्रदान करने वाले हुजूर के लिये कितनी शर्म की चीज होगी। फिर अंतिम परिणाम भी अनिश्चितता से पूरी तरह रहित नहीं है। यदि इतनी शक्ति और साज-सामान लेकर आप मुझ जैसे कमजोर को बरबाद कर देने में सफल भी हो जाएँ तो उससे आपको क्या यश मिलेगा ? मेरे बारे में लोग केवल यही कहेंगे, उस बेचारे की ताकत और हैसियत ही कितनी सी थी ! परंतु भगवान की इच्छा से, जो किसी को भी मालूम नहीं है, मामला कहीं उलट गया तो उसका परिणाम क्या होगा ? यह सारी शक्ति और प्रभुत्व, जो हुजूर के बहादुर सिपाहियों ने ग्यारह बरसों में जुटाया है, पल भर में गायब हो जायेगा।

यह अचरज की बात है कि इतने बड़े दिलवाले हुजूर ने इस छोटी सी बात पर विचार नहीं किया और इतनी सारी भीड़भाड़ और इतने बड़े  लाव-लश्कर के साथ इस सीधे-सादे तुच्छ से अभियान पर स्वयं आने का कष्ट उठाया। जहाँ तक मुझे और मेरे देश को कत्ल करने और बरबाद कर देने की धमकी भरा प्रचण्ड आदेश देने का प्रश्न है, वीरों को इस बात को कोई भय नहीं हुआ करता। सब को ज्ञात है कि कोई भी समझदार व्यक्ति इस क्षण-भंगुर जीवन पर तनिक भी भरोसा नहीं करता। रही मेरी बात, मैं जीवन के पचास सोपानों को पहले ही पार कर चुका हूँ और अभी कितने बाकी हैं, यह मुझे कुछ पता नहीं। मेरे लिए इससे बढ़कर वरदान और कुछ नहीं हो सकता कि मैं बलिदान के अमृत का पान करूँ। यह देर-सबेर योद्धाओं के अखाड़े में और युद्ध के मैदान में वीर सैनिकों के साथ करना ही पड़ेगा। और काल-ग्रन्थ के पृष्ठों पर अपना और अपने पूर्वजों का नाम छोड़ जाऊँ, जिससे लोग याद करें कि एक बेजोर किसान ने एक ऐसे महान और शक्तिशाली बादशाह से बराबरी का दम भरा, जिसने बड़े-बड़े राजाओं को जीतकर अपना दास बना लिया था और वह किसान लड़ते-लड़ते वीर गति को प्राप्त हुआ।

ऐसा ही शुभ संकल्प मेरे निष्ठावान अनुयायियों और साथियों के हृदय में भी विद्यमान है। यदि मैं चाहूँ भी कि आपके दैवी दरबार की देहरी पर उपस्थित होऊँ, तो भी मेरे मित्रों की प्रतिष्ठा मुझे ऐसा करने नहीं देगी। ऐसी दशा में यदि न्याय के निर्झर हुजूर मुझे, जो कि तिनके सा कमजोर है, क्षमा करें और अपना ध्यान किन्हीं और महत्त्वपूर्ण अभियानों पर लगायें तो उससे आपकी प्रतिष्ठा या कीर्ति को कोई हानि नहीं पहुंचेगी। मेरे इन तीन किलों (भरतपुर, डीग और कुम्हेर) के बारे में जिन पर हुजूर को रोष है और जिन्हें हुजूर के सरदारों ने मकड़ी के जाले सा कमजोर बताया है, सचाई की परख असली लड़ाई के बाद ही हो पायेगी। भगवान ने चाहा तो वे सिकन्दर के गढ़ जैसे ही अजेय रहेंगे।

कुदरतुल्लाह नामक एक लेखक ने अपने ग्रंथ जाम-ए-जहान-नामा में प्रसंग लिखा है जिसमें अहमदशाह अब्दाली के साथ सूरजमल से चली समझौता वार्त्ता की चर्चा संक्षेप में की गई है-

धन से भरपूर राजकोष, सुदृढ़ दुर्गों, बहुत बड़ी सेना और प्रचुर मात्रा में युद्ध सामग्री के कारण सूरजमल ने अपना स्थान नहीं छोड़ा और वह युद्ध की तैयारी करता रहा। उसने अहमदशाह के दूतों से कहा- अभी तक आप लोग भारत को नहीं जीत पाये हैं। यदि आपने एक अनुभव शून्य बालक इमादुलमुल्क गाजीउद्दीन को जिसका कि दिल्ली पर अधिकार था, अपने अधीन कर लिया, तो इसमें घमण्ड की क्या बात है ! यदि आपमें सचमुच कुछ दम है, तो मुझ पर चढ़ाई करने में इतनी देर किस लिये ? शाह जितना समझौते का प्रयास करता गया, उतना ही उस जाट का अभिमान और धृष्टता बढ़ती गई। उसने कहा, मैंने इन किलों पर बड़ा रुपया लगाया है। यदि शाह मुझसे लड़े तो यह उसकी मुझ पर कृपा होगी क्योंकि तब दुनिया भविष्य में यह याद रख सकेगी कि एक बादशाह बाहर से आया था और उसने दिल्ली जीत ली थी, पर वह एक मामूली से जमींदार के मुकाबले में लाचार हो गया। जाटों के किलों की मजबूती से डरका शाह वापस चला गया।  दिल्ली में बादशाह मुहम्मदशाह की बेटी से अपना और बादशाह आलमगीर की बेटी से अपने पुत्र का विवाह करके और नजीब खां रूहेला को भारत में अपना सर्वोच्च प्रतिनिधि नियुक्त करके वह कान्धार लौट गया।

जब अहमदशाह आगरा से दिल्ली को लौट रहा था, तब पूरे मार्ग के दौरान सूरजमल के आदमी उसे समझौता वार्त्ता में उलझाये रहे। अंत में उसे दस लाख रुपये देने का आश्वासन दिया गया। जब अहमदशाह दिल्ली पहुंच गया तब सूरजमल को विश्वास हो गया कि अब यह अफगानिस्तान लौट जायेगा, इसलिये समस्त प्रकार की वार्त्ता बंद कर दी गई तथा उसे एक भी रुपया नहीं दिया गया। इस प्रकार अहमदशाह अब्दाली को भरतपुर, डीग और कुम्हेर को लूटे बिना ही तथा भरतपुर से कोई रुपया लिये बिना ही, अफगानिस्तान लौट जाना पड़ा।

लूट का सामान

 जब अहमदशाह अब्दाली अफगानिस्तान को लौटा तो उसके साथ भारत से लूटा गया माल हजारों ऊँटों, हाथियों और बैलों पर लदा था। अब्दाली का अपना सामान 28,000 ऊँटों, खच्चरों, बैलों और गाड़ियों पर लदा था। 200 ऊँट उस सामान से लदे थे जो दिल्ली के मरहूम बादशाह मुहम्मदशाह (द्वितीय) की विधवा स्त्रियों की सम्पत्ति थी। ये विधवाएं भी अब अब्दाली के साथ अफगानिस्तान जा रही थीं। 80,000 घुड़सवार और पैदल उसके अनुयायी थे जिनके पास अपना-अपना लूट का माल था। उसके घुड़सवार पैदल चल रहे थे क्योंकि घोड़ों पर लूट का माल लदा हुआ था। जिस-जिस रास्ते से यह कारवां गुजरता था, उस रास्ते पर एक भी घोड़ा, हाथी, गधा, खच्चर तथा बैल आदि पशु नहीं बचता था, समस्त भारवाहक पशु अब्दाली के आदमियों द्वारा छीन लिये जाते थे और उन पर लूट का माल लाद दिया जाता था।

भरतपुर की तोपों की संख्या में वृद्धि

जदुनाथ सरकार ने फॉल ऑफ दी मुगल एम्पायर में लिखा है कि अहमदशाह अब्दाली अपने साथ बड़ी संख्या में तोपें खींचकर लाया था। जब वह अफगानिस्तान को लौटने लगा तो उसने बड़ी संख्या में तोपों को दिल्ली में ही छोड़ दिया क्योंकि उन्हें खींचने वाले पशुओं पर तो अब लूट का माल लदा हुआ था। जब अब्दाली दिल्ली से निकल गया तो राजा सूरजमल उन तोपों को दिल्ली से खींचकर अपने किलों में ले आया। दिल्ली में किसी के पास एक तलवार तक न रही।

दिल्ली का दुर्भाग्य

कहने को तो अब भी मुगल बादशाह आलमगीर (द्वितीय) दिल्ली के तख्त पर बैठा था किंतु सच्चाई यह थी कि दिल्ली को पूरी तरह उसके दुर्भाग्य के हवाले कर दिया गया था। अहमदशाह अब्दाली के प्रस्थान के तुरंत बाद दिल्ली में दिमागी बुखार की महामारी फैली। इसी के साथ आंखों में संक्रमण का रोग फैल गया। नवम्बर 1757 में दिल्ली में जोरों को भूकम्प आया जिसके कारण बहुत बड़ी संख्या में घर गिर गये और लोग मर गये। खाने की चीजें बहुत महंगी हो गईं और दवाइयां तो ढूंढने पर भी नहीं मिलती थीं। शहर में लुटेरों और चोरों के झुण्ड आ बसे जो राहगीरों को दिन दहाड़े लूट लेते थे। सदियों से भारत की राजधानी रही दिल्ली, खण्डहरों और शवों की नगरी बनकर रह गई।

दिल्ली और लाहौर पर मराठों का अधिकार

अहमदशाह अब्दाली के जाते ही मराठे दिल्ली में आ धमके। जिस नजीब खां को अब्दाली अपने प्रतिनिधि के रूप में छोड़ गया था, उसने मल्हारराव को अपना धर्मपिता कहकर उसके पांव पकड़ लिये। रघुनाथराव ने पंजाब पर चढ़ाई की तथा अप्रेल 1758 में अब्दाली के पुत्र तैमूरशाह को वहाँ से मार भगाया।

सदाशिव भाऊ से अनबन

 बल्लभगढ़, मथुरा और वृंदावन पर अभियान करके लौट जाने के बाद लगभग हर साल अब्दाली भारत आया किंतु ई.1760 में उसने फिर से दिल्ली का रुख किया। जब मराठों को यह ज्ञात हुआ कि अब्दाली फिर से दिल्ली की ओर आ रहा है तो वे उसका मार्ग रोकने के लिये सदाशिव भाऊ के नेतृत्व में दिल्ली की ओर चल पड़े। वे अपने साथ भारी-भरकम लवाजमा लेकर आये। उनके साथ बड़ी संख्या में उनके परिवारों की स्त्रियां, नृत्यांगनायें एवं भोग-विलास की सामग्री थी। उन्हें विश्वास था कि मराठों के लिये अब्दाली से निबटना बायें हाथ का खेल है। सदाशिव भाऊ तीस साल का अनुभवहीन युवक था। वह पेशवा बाजीराव प्रथम का भतीजा तथा चिम्माजी अप्पा का सिरफिरा और घमण्डी पुत्र था। उसे शत्रु और मित्र की पहचान नहीं थी। फिर भी उसने राजा सूरजमल को मराठों के विरुद्ध अपने साथ लेने की इच्छा व्यक्त की तथा उसे मराठों की तरफ से लड़ने का निमंत्रण भिजवाया। सूरजमल इस शर्त पर मराठों को अपने 10 हजार सैनिकों सहित सहायता देने के लिये तैयार हो गया कि मराठे  उसके देश में उपद्रव नहीं करेंगे तथा चौथ वसूली के लिये तकाजे करके उसे तंग नहीं करेंगे। मराठों ने सूरजमल की शर्तें स्वीकार कर लीं। 8 जून 1760 को भाऊ ने मराठा सैनिकों पर, जाटों को सताने या उनके क्षेत्र में लूटपाट करने पर रोक लगा दी। इसके बदले में सूरजमल ने मराठों को एक माह के उपयोग जितनी खाद्य सामग्री प्रदान की।

आगरा से 20 मील दूर बाणगंगा नदी के तट पर भाऊ का डेरा था। वहीं से उसने सूरजमल को लिखा कि सूरजमल अपनी सेना को लेकर आ जाये। सूरजमल को भाऊ पर विश्वास नहीं हुआ। इस पर मल्हारराव होल्कर तथा सिन्धिया ने सूरजमल की सुरक्षा के लिये शपथपूर्वक वचन दिया। 30 जून 1760 को सूरजमल अपने 10 हजार सैनिक लेकर भाऊ के शिविर में पहुंचा। भाऊ ने स्वयं दो मील आगे आकर सूरजमल का स्वागत किया। भाऊ ने यमुनाजी का जल हाथ में लेकर सूरजमल के प्रति अपनी मित्रता की प्रतिज्ञा दोहराई।

 भाऊ ने सूरजमल की सलाह पर मथुरा में एक युद्ध परिषद आहूत की जिसमें वजीर इमादुलमुल्क को भी बुलाया गया। इस युद्ध परिषद में सबसे सुझाव मांगे गये कि अहमदशाह अब्दाली का सामना किस प्रकार किया जाये।

राजा सूरजमल ने सदाशिव भाऊ को सलाह दी कि मराठा महिलाएं, अनावश्यक सामान और बड़ी तोपें जो इस लड़ाई में कुछ काम न देंगी, चम्बल के पार ग्वालियर तथा झांसी के किलों में भेज दी जायें और आप स्वयं हल्के शस्त्रों से सुसज्जित रहकर अब्दाली का सामना करें। यदि आप अपनी महिलाओं को इतनी दूर न भेजना चाहें तो भरतपुर राज्य के किसी किले में भिजवा दें। सूरजमल ने यह भी सलाह दी कि अब्दाली से आमने-सामने की लड़ाई करने के स्थान पर छापामार युद्ध किया जाये तथा बरसात तक उसे अटकाये रखा जाये। जब बरसात आयेगी तो अब्दाली हिल भी नहीं पायेगा और संभवतः तंग आकर वह अफगानिस्तान लौट जाये। सूरजमल को विश्वास था कि मराठों को सिक्खों तथा बनारस के हिन्दू राजा से भी सहायता प्राप्त होगा। क्योंकि अब्दाली ने सिक्खों का बहुत नुक्सान किया था। इसी प्रकार बनारस का राजा बलवंतसिंह अवध के नवाब शुजाउद्दौला का शत्रु था। होलकर ने सूरजमल के सुझावों का समर्थन किया किंतु सदाशिव भाऊ अविवेकी व्यक्ति था, उसने सूरजमल के व्यवाहरिक सुझावों को भी मानने से मना कर दिया।

मराठों और जाटों ने मथुरा से आगे बढ़कर दिल्ली पर अधिकार कर लिया। दिल्ली हाथ में आते ही भाऊ तोते की तरह आंख बदलने लगा। सूरजमल के लाख मना करने पर भी उसने लाल किले के दीवाने खास की छतों से चांदी के पतरे उतार लिये और नौ लाख रुपयों के सिक्के ढलवा लिये। सूरजमल स्वयं दिल्ली का शासक बनना चाहता था। उसे यह बात बुरी लगी और उसने भाऊ को रोकने का प्रयत्न किया किंतु भाऊ नहीं माना। सूरजमल चाहता था कि इमादुलमुल्क को फिर से दिल्ली का वजीर बनाया जाये किंतु भाऊ ने घोषणा की कि वह नारोशंकर को दिल्ली का वजीर बनायेगा। इससे सूरजमल और इमादुलमुल्क का भाऊ से मोह भंग हो गया।

महाराजा सूरजमल चाहता था कि दिल्ली के बादशाह आलमगीर (द्वितीय) को मार डाला जाये किंतु आलमगीर, भाऊ को अपना धर्मपिता कहकर उसके पांव पकड़ लेता था। महाराजा सूरजमल आलमगीर से इसलिये नाराज था क्योंकि इस बार अब्दाली को भारत आने का निमंत्रण आलमगीर ने ही भेजा था ताकि सूरजमल को कुचला जा सके। भाऊ का आलमगीर के प्रति अनुराग देखकर सूरजमल नाराज हो गया। सूरजमल चाहता था कि दिल्ली की सुरक्षा का भार सूरजमल पर छोड़ा जाये किंतु भाऊ ने दिल्ली के महलों पर अपनी सेना का पहरा बैठा दिया। इन सब बातों से सूरजमल खिन्न हो गया। उसने भाऊ से कहा कि वह दीवाने आम की चांदी की छत फिर से बनवाये तथा इमादुलमुल्क को दिल्ली का वजीर बनाने की घोषणा करे, अन्यथा भाऊ को सूरजमल की सहायता नहीं मिल सकती।

 इस पर भाऊ ने तैश में आकर जवाब दिया- ‘क्या मैं दक्खन से तुम्हारे भरोसे यहाँ आया हूँ। जो मेरी मर्जी होगी, करूंगा। तुम चाहो तो यहाँ रहो, या चाहो तो अपने घर लौट जाओ। अब्दाली से निबटने के बाद मैं तुमसे निपट लूंगा।’

होलकर तथा सिन्धिया ने सूरजमल की सुरक्षा की जिम्मेदारी ली थी किंतु वे समझ गये थे कि अब सूरजमल दिल्ली में सुरक्षित नहीं है। इसलिये उन्होंने सूरजमल के सलाहकार रूपराम कटारिया से कहा कि जैसे भी हो, सूरजमल को दिल्ली से निकल जाना चाहिये। रूपराम कटारिया ने यह बात सूरजमल को बताई। सूरजमल उसी दिन मराठों को त्यागकर बल्लभगढ़ के लिये रवाना हो गया। होलकर और सिंधिया ने सूरजमल के निकल भागने की सूचना बहुत देर बाद भाऊ को दी। इस पर भाऊ, सूरजमल से बहुत नाराज हो गया। इमाद-उस-सादात के लेखक का कथन है- ‘भाऊ ने सूरजमल से दो करोड़ रुपये मांगे और उसे संदेहजनक पहरे में रख दिया।’ संभवतः सूरजमल को इस पहरे में से निकलने के लिये विशेष प्रबंध करने पड़े।

सूरजमल द्वारा मराठों का त्याग करते ही मराठों पर विपत्तियां आनी आरम्भ हो गईं। अहमदशाह अब्दाली की सेनाओं को रूहेलों के राज्य से अनाज की आपूर्ति हो रही थी तथा मराठों को सूरजमल के राज्य से अनाज मिल रहा था किंतु सूरजमल के चले जाने से दिल्ली में अनाज की कमी होने लगी और अनाज के भाव अचानक बढ़ गये। दिल्ली के आसपास के क्षेत्रों को विगत कुछ वर्षों में इतना अधिक रौंदा गया था कि वहाँ से अनाज प्राप्त करना सम्भव नहीं रह गया था। भाऊ के बुरे व्यवहार के उपरांत भी सूरजमल की सहानुभूति मराठों से बनी रही।

अहमदशाह अब्दाली ने सूरजमल से समझौता करने का प्रयास किया। वह चाहता था कि सूरजमल, भावी युद्ध से तटस्थ रहने की घोषणा कर दे ताकि मराठों को पूरी तरह से अकेला बनाया जा सके किंतु सूरजमल ने अब्दाली से किसी तरह का समझौता करने का प्रस्ताव ठुकरा दिया।

जैसे-जैसे अब्दाली की सेनाएं दिल्ली के निकट आती गईं, वैसे-वैसे दिल्ली, आगरा और अन्य क्षेत्रों में रहने वाले लोग अपने परिवारों को लेकर भरतपुर राज्य में शरण लेने के लिये आने लगे। सूरजमल ने इन शरणार्थियों के लिये अपने राज्य के दरवाजे खोल दिये। यहाँ तक कि घायल मराठा सरदार जनकोजी सिंधिया और उसका परिवार भी कुम्हेर आ गया। मुगल बादशाह के वजीर इमादुलमुल्क ने भी अपना परिवार सूरजमल के संरक्षण में भेज दिया। उदारमना सूरजमल ने अपने प्रबल शत्रुओं और उनके परिवारों को दिल खोलकर शरण दी। दूसरी तरफ रूहेले, पहले की ही तरह अहमदशाह अब्दाली के साथ हो गये। अवध का नवाब शुजाउद्दौला भी अब्दाली की तरफ हो गया।

मराठों को शरण

ई.1761 में अब्दाली पानीपत पहुंच गया। मराठों ने दिल्ली के निकटवर्ती राजपूत राज्यों से सहायता मांगी किंतु राजपूत राज्य तो पहले से ही मराठों द्वारा जर्जर कर दिये गये थे। इसलिये राजपूत राज्य अपने प्रबल मराठा शत्रुओं का साथ देने के लिये तैयार नहीं हुए। सूरजमल पहले ही अपने राज्य को लौट चुका था। इस कारण मराठों ने अकेले ही अब्दाली का मार्ग रोका और इतिहास प्रसिद्ध पानीपत की तीसरी लड़ाई हुई। पानीपत के मैदान ने इससे पहले भी हिन्दुओं का साथ नहीं दिया था। अतः पानीपत की तीसरी लड़ाई में भी हिन्दुओं का दुर्भाग्य उनके आड़े आ गया।

अब्दाली ने पानीपत के मैदान में 1 लाख मदमत्त मराठों को काट डाला। भाऊ मारा गया। बचे हुए मराठा सैनिक प्राण लेकर भरतपुर की तरफ भागे। जो मराठे अपने समक्ष किसी को कुछ गिनते नहीं थे, उन भागते हुए मराठा सैनिकों के हथियार, सम्पत्ति और वस्त्र उत्तर भारत के किसानों ने छीन लिये। जो दुर्दशा मराठों ने उत्तर भारत के किसानों की, की थी, ठीक उसी दुर्दशा में स्वयं मराठे भी जा पहुंचे। भूखे और नंगे मराठा सैनिक किसी तरह प्राण बचाकर, महाराजा सूरजमल के राज्य में प्रविष्ठ हुए। सूरजमल ने उनकी रक्षा के लिये अपनी सेना भेजी। उन्हें भोजन, वस्त्र और शरण प्रदान की।

महारानी किशोरी देवी ने देश की जनता का आह्वान किया कि वे भागते हुए मराठा सैनिकों को न लूटें। मराठा सैनिकों को मेरे बच्चे जानकर उनकी रक्षा करें। महारानी किशोरी देवी ने मराठा शरणार्थियों के लिये भरतपुर में अपना भण्डार खोल दिया। उसने सात दिन तक चालीस हजार मराठों को भोजन करवाया। ब्राह्मणों को दूध, पेड़े और मिठाइयां दीं। महाराजा सूरजमल ने प्रत्येक मराठा सैनिक को एक रुपया, एक वस्त्र और एक सेर अन्न देकर अपनी सेना के संरक्षण में मराठों की सीमा में ग्वालियर भेज दिया।

जदुनाथ सरकार ने भरतपुर राज्य में पहुंचे शरणार्थियों की संख्या 50,000 तथा अंग्रेज पादरी फादर वैंदेल ने एक लाख बताई है। ग्राण्ट डफ ने मराठा शरणार्थियों के साथ सूरजमल के व्यवहार की चर्चा करते हुए लिखा है- ‘जो भी भगोड़े उसके राज्य में आए, उनके साथ सूरजमल ने अत्यन्त दयालुता का बर्ताव किया और मराठे उस अवसर पर किये गये जाटों के व्यवहार को आज भी कृतज्ञता तथा आदर के साथ याद करते हैं। नाना फड़नवीस के एक पत्र में लिखा है- ‘सूरजमल के व्यवहार से पेशवा के चित्त को बड़ी सान्त्वना मिली।’

वैंदेल लिखता है- ‘जाटों के मन में मराठों के प्रति इतनी दया था कि उन्होंने उनकी सहायता की जबकि जाटों की शक्ति इतनी अधिक थी कि यदि सूरजमल चाहता तो एक भी मराठा लौटकर दक्षिण नहीं जा सकता था।’

मुगलों का पराभव

मुगलों की सत्ता औरंजगजेब के जीवन काल में ही अपने पतन की ओर बढ़ गई थी। ई.1739 में नादिरशाह के आक्रमण के बाद तो वह पतन के चरम पर जा पहुंची थी किंतु ई.1761 में पानीपत का युद्ध समाप्त हो जाने के बाद मुगल सत्ता का नैतिक पतन भी हो गया। विजय मद में चूर अब्दाली ने हाथी पर बैठकर दिल्ली में प्रवेश किया। उसने आलमगीर को एक साधारण कोठरी में बंद कर दिया। अब्दाली तथा उसके सैनिकों ने बादशाह आलमगीर तथा उसके अमीरों की औरतों और बेटियों को लाल किले में निर्वस्त्र करके दौड़ाया और उन पर दिन-दहाड़े बलात्कार किये। निकम्मा आलमगीर, अब्दाली के विरुद्ध कुछ नहीं कर सका। जब अहमदशाह अब्दाली, लाल किले का पूरा गर्व धूल में मिलाकर अफगानिस्तान लौट गया तब मुगल शाहजादियाँ पेट की भूख मिटाने के लिये दिल्ली की गलियों में फिरने लगीं। इस प्रकार पानीपत के तृतीय युद्ध के बाद मुगल सल्तनत का लगभग अन्त हो गया। मुगलों, मराठों तथा अफगानों के पराभव ने अँग्रेजों के लिये उत्तर भारत में मैदान साफ कर दिया।

अब्दाली को अंगूठा

अहमदशाह अब्दाली ने ई.1757 से ई.1761 के बीच महाराजा सूरजमल से कई बार रुपयों की मांग की। अपने राज्य की रक्षा के लिये महाराजा ने अब्दाली को कभी दो करोड़़, कभी 65 लाख, कभी 10 लाख तो कभी 6 लाख तथा अन्य बड़ी-बड़ी राशि देने के वचन दिये किंतु उसे कभी फूटी कौड़ी नहीं दी। पानीपत की लड़ाई जीतने के बाद अब्दाली ने सूरजमल से एक करोड़ रुपया मांगा। सूरजमल ने अब्दाली के आदमियों का स्वागत किया तथा उन्हें बड़े इनाम-इकरार देकर कहा कि उसे कुछ मुहलत दी जाये, रुपये पहुंच जायेंगे। अब्दाली के आदमियों को भरोसा हो गया कि इस बार सूरजमल अवश्य ही रुपये दे देगा। इसलिये उन्होंने अब्दाली को भी आश्वस्त करने का प्रयास किया किंतु अब्दाली का धैर्य जवाब दे गया। उसने सूरजमल पर आक्रमण करने की योजना बनाई किंतु वह कार्यान्वित नहीं हो सकी। इस पर अब्दाली अड़ गया कि इस बार तो वह कुछ लेकर ही मानेगा। महाराजा ने कहा कि उसे 6 लाख रुपये दिये जायेंगे किंतु अभी हमारे पास केवल 1 लाख रुपये ही हैं। अब्दाली केवल एक लाख रुपये ही लेकर चलता बना। उसके बाद महाराजा ने उसे कभी कुछ नहीं दिया।

इमादुलमुल्क को शरण

अब्दाली के जाते ही उसके वजीर इमादुलमुल्क ने बादशाह की हत्या करवाकर शव नदी तट पर फिंकवा दिया तथा यह प्रचारित कर दिया कि बादशाह पैर फिसलने से मर गया। बादशाह की हत्या कर देने के बाद इमादुल्मुल्क दिल्ली से भागकर महाराजा सूरजमल की शरण में आ गया जहाँ उसका परिवार पहले से ही रह रहा था। फादर वैंदेल ने लिखा है- ‘इस प्रकार उसने महान मुगलों का वजीर होने का अपना गौरव जाटों को अर्पित कर दिया। उसे एक जमींदार जाट से, एक भिखारी की तरह हाथ जोड़कर दया की भीख मांगते और उसके प्रजाजनों में शरण लेते तनिक भी लाज न आई। जबकि इससे पहले वह उससे पिण्ड छुड़ाने के लिये सारे हिन्दुस्तान को शस्त्र-सज्जित कर चुका था। इससे पहले मुगलों के गौरव को इतना बड़ा और इतना उचित आघात नहीं लगा था। इस अप्रत्याशित घटना ने उनके गौरव को घटा दिया और नष्ट कर दिया।’

आगरा पर अधिकार

पानीपत की तीसरी लड़ाई के बाद उत्तर भारत की राजनीति में शून्यता आ गई थी। इस स्थिति का लाभ उठाते हुए सूरजमल ने आगरा दुर्ग पर अधिकार करने का निर्णय लिया। ऐसा करके ही वह दो-आब क्षेत्र में एक ऐसी सशक्त शासन व्यवस्था स्थापित कर सकता था जो विदेशी आक्रांताओं का सामना कर सके तथा मराठों को भी दूर रख सके। 3 मई 1761 को सूरजमल के 4000 जाट सैनिक आगरा पहुंचे। उनका नेतृत्व बलराम कर रहा था। (कुछ स्रोतों के अनुसार जाट सैनिकों की संख्या 2 हजार थी तथा उनका नेतृत्व वैर का राजा बहादुरसिंह कर रहा था।) उसने आगरा नगर में अपनी चौकियां स्थापित करके प्रमुख स्थानों पर अधिकार जमा लिया। जब इन सैनिकों ने आगरा दुर्ग में प्रवेश करने की चेष्टा की तो दुर्गपति ने विरोध किया। इस झगड़े में 200 सैनिक मारे गये। इस दौरान महाराजा सूरजमल स्वयं मथुरा में बैठकर आगरा में हो रही गतिविधियों पर दृष्टि रखता रहा। 24 मई 1761 को सूरजमल यमुना पार करके कोइल (अलीगढ़) पहुंच गया। जाट सेना ने कोइल तथा जलेसर पर अधिकार कर लिया। सूरजमल की सेना ने आगरा दुर्ग रक्षकों के परिवारों को पकड़ लिया तथा उन पर दबाव बनाया कि वे दुर्ग सूरजमल को समर्पित कर दें। इस पर दुर्गपति ने एक लाख रुपये तथा पांच गांवों की जागीर मांगी। उसकी मांगें स्वीकार कर ली गईं। 12 जून 1761 को सूरजमल ने आगरा में प्रवेश किया तथा दुर्ग पर अधिकार कर लिया। आगारा दुर्ग से सूरजमल को बड़ी संख्या में विशाल तोपें, बारूद तथा हथियार प्राप्त हुए। सूरजमल ने ताजमहल पर लगे चांदी के दो दरवाजे उखड़वा लिये तथा उन्हें पिघलवाकर चांदी निकलवा ली। ई.1774 तक आगरा, जाटों के अधिकार में रहा।

रूहेलों का दमन

पानीपत की लड़ाई के बाद रूहेलों ने मराठा सरदारांे को भगाकर उनसे भौगांव, मैनपुरी, इटावा आदि क्षेत्र छीन लिये थे। सूरजमल ने रूहेलों पर आक्रमण करके उन्हें काली नदी के दूसरी ओर धकेल दिया तथा वहाँ की प्रजा को रूहेलों से मुक्ति दिलवाई। अब्दाली ने रूहेलों को बुलंदशहर, अलीगढ़, जलेसर, सिकन्दरा राऊ, कासंगज तथा सौरों के क्षेत्र प्रदान किये थे। इससे पहले ये क्षेत्र सूरजमल के अधिकार में हुआ करते थे। सूरजमल ने रूहेलों को खदेड़ कर अपने पुराने क्षेत्रों पर फिर से अधिकार कर लिया। इसी प्रकार अनूपशहर, सियाना, गढ़ मुक्तेश्वर एवं हापुड़ आदि क्षेत्रों से भी रूहेलों एवं अफगानियों को भगा दिया गया।

ब्रजक्षेत्र के अन्य परगनों पर अधिकार

आगरा पर अधिकार करने के बाद महाराजा ने फरह, किरावली, फतहपुर सीकरी, खेरागढ़, कोलारी, तांतपुर, बसेड़ी तथा धौलपुर परगनों पर भी अधिकार कर लिया।

हरियाणा पर अभियान

महाराजा सूरजमल ने अपने दो पुत्रों जवाहरसिंह तथा नाहरसिंह को सेनाएं देकर हरियाणा के क्षेत्रों पर अधिकार करने के लिये भेजा। इस भू-भाग में इन दिनों मेव मुसलमानों एवं बलूच मुसलमानों ने अपनी गढ़ियां स्थापित कर रखी थी। रूहेलों एवं अफगानियों के बाद मेवों और बलूचों की बारी आनी ही थी। इन्हें मिटाये बिना दिल्ली पर सशक्त राजनीतिक सत्ता की स्थापना नहीं की जा सकती थी। इसलिये जाटों की एक टुकड़ी ने फरीदाबाद, बटेश्वर, राजाखेड़ा पर अधिकार कर लिया। सिकरवार राजपूतों से सिकरवाड़ ठिकाना एवं भदौरिया राजपूतों से भदावर ठिकाना भी जीत लिया गया। इस प्रकार ई.1762 से 1763 तक हरियाणा प्रदेश के विस्तृत क्षेत्र पर अधिकार किया गया। जवाहरसिंह की सेना ने रूहेलों से रेवाड़ी, झज्झर, पटौदी, चरखी दादरी, सोहना तथा गुड़गांव छीन लिये।

ई.1763 में फर्रूखनगर पर अधिकार करने को लेकर जाटों एवं बलोचों में युद्ध हुआ। जाटों का नेतृत्व राजकुमार जवाहरसिंह ने किया तथा बलोचों का नेतृत्व मुसावी खां ने किया। जब बलोचों  का पलड़ा भारी पड़ने लगा तो स्वयं सूरजमल को युद्ध क्षेत्र में आना पड़ा। दो माह तक और घेरा डाला गया तथा जबर्दस्त दबाव बनाया गया। मुसावी खां ने इस शर्त पर दुर्ग खाली करना स्वीकार किया कि राजा सूरजमल स्वयं गंगाजल हाथ में रखकर शपथ ले कि वह मुसावी तथा उसके आदमियों को दुर्ग से निरापद रूप से हट जाने देगा। मुसावी खां ने दुर्ग खाली कर दिया। सूरजमल ने उसे बंदी बनाकर भरतपुर भेज दिया गया। 12 दिसम्बर 1763 को दुर्ग पर सूरजमल का अधिकार हो गया।

गढ़ी हरसारू एक पक्की गढ़ी थी जो बड़ी संख्या में मेव डाकुओं को शरण देती थी। इसके नुकीले दरवाजों को तोड़ने में हाथियों का प्रयोग किया गया किंतु वे सफल नहीं हो सके। इस पर जवाहरसिंह ने अपने कुल्हाड़ी दल को गढ़ी का दरवाजा तोड़ने के लिये भेजा। इन सैनिकों ने अपने सरदार सीताराम कोटवान के नेतृत्व में गढ़ी के दरवाजों पर हमला किया और दरवाजे को तोड़ दिया। जाट सेना तीव्र गति से गढ़ी में घुस गई और उसमें छिपे बैठे समस्त डाकुओं को मार डाला।

जाटों द्वारा रोहतक पर भी अधिकार कर लिया गया। इसके बाद सूरजमल ने दिल्ली से 12 कोस दूर स्थित बहादुरगढ़ का रुख किया। यहाँ पर बलोच सरदार बहादुरखां का अधिकार था। उसने नजीबुद्दौला से सम्पर्क किया किंतु सूरजमल ने किसी की नहीं सुनी और बहादुरगढ़ पर अधिकार कर लिया।

सूरज का अवसान

अब तक सूरजमल ने दिल्ली के चारों तरफ के इलाके छीन लिये थे। वह मुगलों की दो पुरानी राजधानियों- आगरा तथा फतहपुर सीकरी पर अधिकार कर चुका था तथा बहादुरगढ़ पर अधिकार करके दिल्ली के अत्यंत निकट पहुंच गया था। इसलिये दिल्ली की मुस्लिम सत्ता को अपने अस्तित्व की अंतिम लड़ाई लड़ने के अतिरिक्त ओर कोई चारा नहीं रहा। उस काल में रूहेले ही नजीबुद्दौला के नेतृत्व में दिल्ली की रक्षा कर रहे थे। रूहेला सरदार नजीबुद्दौला शाहआमल द्वितीय के मुख्तार खास के पद पर नियुक्त था। उसने सूरजमल पर नकेल कसने का विचार किया। सूरजमल ने नजीबुद्दौला से समझौता करने का प्रयास किया किंतु नजीबुद्दौला सहमत नहीं हुआ। इस पर सूरजमल ने जवाहरसिंह को फर्रूखाबाद के दुर्ग में रुकने को कहा और स्वयं ने 23 दिसम्बर 1763 को यमुना पार करके गाजियाबाद के आसपास के गांवों को जला दिया तथा यमुना के पश्चिमी किनारे पर डेरा लगाया। कुछ दिन बाद जाट सेना दिल्ली के दक्षिण में आकर बैठ गई। इस पर रूहेला सरदार दिल्ली से बाहर निकला और जाटों से चार मील पहले खिज्राबाद में आकर बैठ गया। इस पर सूरजमल फिर से यमुना पार करके अपनी पुरानी जगह पर जाकर बैठ गया। 24 दिसम्बर को नजीबुद्दौला ने सूरजमल से कहलवाया कि वह अपने राज्य को लौट जाये। सूरजमल ने नजीबुद्दौला को दिल्ली से बाहर आने की चेतावनी दी। इस पर नजीबुद्दौला रात्रि के अंधेरे में दिल्ली से बाहर निकला और 25 दिसम्बर का सूरज निकलने से पहले ही दिल्ली से 16 किलोमीटर दूर हिण्डन नदी के पश्चिमी तट पर आकर डेरा गाढ़ लिया। उसके साथ लगभग 10 हजार सिपाही थे। सूरजमल के पास 25 हजार सिपाही थे। सूरजमल ने नजीबुद्दौला को तीन तरफ से घेरने की योजना बनाई और अपने 5 हजार सिपाहियों को नजीबुद्दौला के पीछे की तरफ भेज दिया। 25 दिसम्बर की शाम के समय राजा सूरजमल अपनी सेना की स्थिति का अवलोकन करने के लिये अपनी एक छोटी सी टुकड़ी के साथ चक्कर लगाने के लिये निकला।

रूहेला सैनिकों को महाराजा सूरजमल के आगमन की सूचना मिल गई। वे हिण्डन नदी के कटाव में छिप कर बैठ गये। जब महाराजा वहाँ से होकर निकला तो रूहेलों ने अचानक उस पर हमला बोल दिया। सैयद मोहम्मद खाँ बलूच ने महाराजा के पेट में अपना खंजर दो-तीन बार मारा, एक सैनिक ने महाराजा की दांयी भुजा काट दी। भुजा के गिरते ही महाराजा धराशायी हो गया। उसी समय उसके शरीर के टुकड़े कर दिये गये। एक रूहेला सैनिक महाराजा की कटी हुई भुजा को अपने भाले की नोक में पताका की भांति उठाकर नजीबुद्दौला के पास ले गया। इस प्रकार 25 दिसम्बर 1763 की संध्या में ठीक उस समय हिन्दूकुल गौरव महाराजा सूरजमल का अवसान हो गया जब भगवान भुवन भास्कर दिन भर का कार्य निबटा कर प्रस्थान करने की तैयारी में थे।

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