राजस्थान में श्रीकृष्णभक्ति परम्परा अत्यंत प्राचीन, समृद्ध और बहुआयामी है। यद्यपि ऐतिहासिक दृष्टि से यह कहना कठिन है कि राजस्थान में श्रीकृष्णभक्ति परम्परा की यह धारा भगवान श्रीकृष्ण के समकालीन कालखंड से ही निरंतर प्रवाहित हो रही थी, किंतु उपलब्ध पुरातात्विक, साहित्यिक और सांस्कृतिक साक्ष्य यह निर्विवाद रूप से सिद्ध करते हैं कि राजस्थान में श्रीकृष्णभक्ति परम्परा की जड़ें ईसा पूर्व की प्रारंभिक शताब्दियों तक गहरी जमी हुई थी।
प्राचीनतम पुरातात्विक साक्ष्य: नारायण वाटक एवं हाथी बाड़ा
राजस्थान का भागवत धर्म से सम्पर्क ईसा पूर्व तीसरी-चौथी शताब्दी में ही स्थापित हो चुका था। राजस्थान में श्रीकृष्णभक्ति परम्परा का सबसे सुदृढ़ पुरातात्विक प्रमाण चित्तौड़गढ़ से लगभग 16 किलोमीटर दूर स्थित ‘नारायण वाटक’ (वर्तमान नगरी के निकट) से प्राप्त ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी का शिलालेख है। यह समूचे भारतवर्ष में भागवत धर्म और वासुदेव-संकर्षण उपासना से सम्बद्ध सबसे प्राचीन पुरातात्विक अभिलेख माना जाता है।
यह ऐतिहासिक स्थल लगभग 300 फीट लंबा और 150 फीट चौड़ा एक विशाल प्राकार (बाड़ा) है, जिसे स्थानीय स्तर पर ‘हाथी बाड़ा’ कहा जाने लगा। जनमानस द्वारा ‘हाथी बाड़ा’ नाम दिए जाने का ऐतिहासिक कारण यह था कि जब मुगल बादशाह अकबर ने चित्तौड़गढ़ दुर्ग पर आक्रमण किया था, तब शाही सेना के हाथियों का पड़ाव और उन्हें बांधने का स्थान इसी प्राकार में बनाया गया था। कालांतर में लोग इसके मूल नाम ‘नारायण वाटक’ को विस्मृत कर बैठे।
गौरीशंकर ओझा ने यहाँ प्राप्त दोनों प्राचीन शिलालेखों का विधिवत अध्ययन और वाचन करके यह उद्घाटित किया कि यह स्थल मूलतः भागवत परंपरा का ‘नारायण वाटक’ (पूजा-स्थल/स्थाण्डिल) था, जहाँ संकर्षण और वासुदेव की प्रतिष्ठा की गई थी।
भागवत धर्म का अखिल भारतीय प्रसार और विदिशा का गरुड़ स्तम्भ
उसी कालखंड में भागवत धर्म केवल राजस्थान तक सीमित न रहकर उत्तर और मध्य भारत से होते हुए सुदूर दक्षिण तक फैल रहा था। प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता सर अलेक्जेंडर कनिंघम ने मध्य प्रदेश के विदिशा (बेसनगर) में एक प्राचीन स्तम्भ की खोज की थी। स्थानीय ग्रामीण उस स्तम्भ पर तेल और सिंदूर चढ़ाकर उसे ‘खंभा बाबा’ के रूप में पूजते थे।
कनिंघम ने अपने यात्रा विवरण में उल्लेख किया है कि जब वे दूसरी बार वहाँ पहुँचे, तो उन्होंने ग्रामीणों के हाथ जोड़कर बड़ी कठिनाई से उन्हें समझाया कि इस पाषाण स्तम्भ पर कुछ ऐतिहासिक पंक्तियाँ उत्कीर्ण हैं, जिन्हें पढ़ना आवश्यक है। अभिलेख के अध्ययन से ज्ञात हुआ कि यह स्तम्भ तक्षशिला के यवन (यूनानी) राजा अंतिआलकीदास के राजदूत हेलिओडोरस द्वारा स्थापित करवाया गया गरुड़ स्तम्भ है।
हेलिओडोरस ने स्वयं को अभिलेख में स्पष्ट रूप से ‘परम भागवत’ घोषित किया था। ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी का यह स्तम्भ प्रमाणित करता है कि विदेशी यवन भी भागवत धर्म से गहराई से प्रभावित होकर इसे अंगीकार कर रहे थे। इस प्रकार राजस्थान में श्रीकृष्णभक्ति परम्परा विस्तृत होती रही। वह मध्य प्रदेश के केंद्रों से प्रस्फुटित भागवत धर्म महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और सुदूर तमिलनाडु तक फैल गई।
गुप्तकालीन साक्ष्य: डॉ. एल. पी. टेसिटोरी की खोजें
राजस्थान में चित्तौड़ के बाद कृष्ण उपासना का अगला सुदृढ़ पुरातात्विक साक्ष्य पश्चिमी राजस्थान के बीकानेर संभाग में प्राप्त होता है। प्रसिद्ध इतालवी भाषाविद् और प्राच्यविद्या शोधवेत्ता डॉ. लुइगी पियो टेसिटोरी ने बीकानेर, श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ जनपदों में गहन पुरातात्विक सर्वेक्षण किया। ‘भारतीय विद्या मंदिर’ शोध संस्थान टेसिटोरी साहब के शोध कार्यों से निरंतर जुड़ा रहा, उनकी संपादित कृतियों का प्रकाशन किया तथा बीकानेर संग्रहालय परिसर में उनकी प्रतिमा भी स्थापित करवाई।
टेसिटोरी ने पीर की थेड़ी, कालीबंगा, पीलीबंगा आदि हड़प्पा कालीन तथा ऐतिहासिक स्थलों के टीलों की खुदाई में अनेक दुर्लभ टेराकोटा (मृण्मूर्तियाँ) खोज निकालीं। इन पुरावशेषों में गोवर्धनधारी कृष्ण की मूर्ति, गोपियों से दान (दधि-कर) मांगते हुए कृष्ण और ‘यशोदा कृति’ उत्कीर्ण मृण्मूर्तियाँ प्रमुख हैं।
ये सभी कलाकृतियाँ तीसरी-चौथी शताब्दी ईस्वी अर्थात् गुप्त काल की हैं, जो वर्तमान में बीकानेर के राजकीय संग्रहालय में सुरक्षित हैं। गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त, समुद्रगुप्त और कुमारगुप्त स्वयं को गर्व से ‘परमभागवत’ घोषित करते थे, और राजस्थान में टेसिटोरी द्वारा खोजी गई ये सामग्रियां इसी गुप्तकालीन भागवत परम्परा की सशक्त गवाही देती हैं। ये साक्ष्य प्रमाणित करते हैं कि गुप्त काल में राजस्थान की श्रीकृष्णभक्ति परम्परा अत्यंत समृद्ध थी।
मंडोर के द्वार-स्तम्भ: गुप्तकालीन कृष्ण-लीला का मूर्तन
तीसरी-चौथी शताब्दी का एक अन्य अप्रतिम साक्ष्य जोधपुर के प्राचीन ऐतिहासिक नगर मंडोर में प्राप्त होता है। पुरातत्व विभाग के पश्चिमी मण्डल के सर्वेक्षण के दौरान डॉ. देवदत्त रामकृष्ण भंडारकर और उनके सहयोगी पी. के. शाह ने मंडोर के एक ध्वस्त मंदिर के भग्नावशेषों से द्वार-स्तम्भ (तोरण-द्वार के पाषाण स्तम्भ) खोजे थे।
गुप्तकालीन शिल्प-कला से युक्त इन विशाल आयताकार द्वार-स्तम्भों पर सम्पूर्ण कृष्ण-लीला का अत्यंत सजीव अंकन उत्कीर्ण है। इसमें देवकी के गर्भ से श्रीकृष्ण का कारागार में जन्म, वसुदेव द्वारा यमुना पार कर उन्हें गोकुल ले जाना, गोकुल और नन्दगाँव की बाल-लीलाएं, यशोदा द्वारा मथानी से दही बिलोना, माखन चोरी, पूतना-वध, शकटासुर-वध, तृणावर्त-वध और अरिष्टासुर-वध जैसे अनेक प्रसंगों को पाषाण पर बारीकी से उकेरा गया है। ये दुर्लभ और अद्वितीय स्तम्भ वर्तमान में जोधपुर के महाराजा सरदार सिंह संग्रहालय (उम्मेद उद्यान) में सुरक्षित और प्रदर्शित हैं।
10वीं से 12वीं शताब्दी के देवालयों में कृष्ण-लीला का सार्वभौम अंकन
10वीं-11वीं शताब्दी और उसके पश्चात् निर्मित राजस्थान के प्राचीन मंदिरों में कृष्ण-लीला का चित्रण अत्यंत व्यापक स्तर पर दिखाई देता है। सबसे विस्मयकारी तथ्य यह है कि कृष्ण-लीला का यह अंकन केवल वैष्णव देवालयों तक सीमित नहीं रहा, अपितु शैव, शाक्त और जैन मंदिरों में भी प्रमुखता से हुआ।
माउंट आबू के प्रसिद्ध विमल वसही (विमल शाही) जैन मंदिर के रंगमंडप और छतों पर कृष्ण-लीला के अनेक दृश्य खूबसूरती से उत्कीर्ण हैं। जैन परंपरा में कृष्ण की उपस्थिति का एक प्रमुख कारण यह है कि 22वें जैन तीर्थंकर भगवान नेमीनाथ (अरिष्टनेमि) को महाभारत कालीन श्रीकृष्ण का चचेरा/मौसेरा भाई माना जाता है।
जोधपुर के समीप स्थित ओसियाँ, जो ओसवाल जैन समुदाय की उद्गम स्थली है (जहाँ तत्कालीन राजपूतों ने जैन धर्म स्वीकार किया और ओसवाल कहलाए), वहाँ के 10वीं से 12वीं शताब्दी के सूर्य मंदिर, देवी मंदिर और विष्णु मंदिरों की दीवारों, स्तम्भों तथा रथिकाओं में सम्पूर्ण कृष्ण-लीला का अद्भुत शिल्पांकन मिलता है।
इसी प्रकार बाड़मेर जिले के किराडू (प्राचीन किरातकूप) में स्थित 10वीं-11वीं शताब्दी के पाँच प्रसिद्ध सोलंकी शैली के शिव और विष्णु मंदिरों में कृष्ण-लीला के साथ-साथ रामायण के प्रसंग भी पाषाण पर अत्यंत जीवंतता के साथ उकेरे गए हैं।
अवतारवाद, वैष्णव धर्म और चतुर्भुज विग्रह का ऐतिहासिक विवेचन
राजस्थान के धार्मिक इतिहास में एक अत्यंत विचारणीय प्रश्न यह उठता है कि ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी के नारायण वाटक के बाद 7वीं-8वीं से 14वीं-15वीं शताब्दी तक शिव, देवी और विष्णु के मंदिर तो बहुतायत में मिलते हैं और उन पर कृष्ण-लीलाएं भी उत्कीर्ण हैं, किंतु स्वतंत्र रूप से केवल श्रीकृष्ण के नाम से मंदिर क्यों नहीं मिलते?
इस ऐतिहासिक गुत्थी को समझने के लिए अवतारवाद और भागवत धर्म के विकासक्रम को जानना आवश्यक है:
- वैदिक पृष्ठभूमि एवं अवतारवाद का उद्भव: प्राचीन वैदिक व्यवस्था में विष्णु ऋग्वेद के एक गौण (तृतीय श्रेणी) देवता थे, जो सूर्य के प्रकाश-रूप का प्रतिनिधित्व करते थे और जिनके लिए ऋग्वेद में मात्र साढ़े तीन सूक्त समर्पित हैं, जिनमें उनके तीन डगों में त्रिलोक नापने के पराक्रम का वर्णन है। ब्राह्मण ग्रंथों में प्रजापति/ब्रह्मा के तीन अवतारों—मत्स्य, कच्छप और वराह का उल्लेख आया।
- भागवत धर्म का वैष्णवीकरण: जब लोक-मानस में वीरपूजा और भागवत धर्म (वासुदेव-कृष्ण उपासना) अत्यधिक लोकप्रिय हुआ, तब वैदिक परंपरा ने लोक-ग्राह्यता बनाए रखने के लिए भागवत धर्म के आराध्य वासुदेव और नारायण को विष्णु में अंतर्भुक्त कर दिया और श्रीकृष्ण को विष्णु का पूर्णावतार घोषित किया। इस प्रक्रिया में मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण और बाद में बौद्ध धर्म के प्रभाव को देखते हुए बुद्ध तथा भविष्य के लिए कल्कि को जोड़कर ‘दशावतार’ की व्यवस्था गढ़ी गई।
- विष्णु मूर्तियों का वास्तविक स्वरूप: मूलतः भागवत परंपरा के उपास्य देव वासुदेव-नारायण चतुर्भुज स्वरूप वाले थे। जब भागवत धर्म का वैष्णव धर्म में रूपांतरण हुआ, तब विष्णु का स्वरूप भी चतुर्भुज ही अभिकल्पित किया गया। अतः मध्यकाल (14वीं-15वीं शताब्दी) से पूर्व के जो मंदिर केवल ‘विष्णु मंदिर’ कहलाते हैं, वे वास्तव में चतुर्भुज वासुदेव श्रीकृष्ण के ही देवालय हैं। गुजरात के द्वारका और डाकोर के द्वारकाधीश विग्रह इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।
- राजस्थान के चतुर्भुज मंदिर: राजस्थान में गढ़बोर (राजसमंद) और मेड़ता के ‘चारभुजानाथ’, डूंगरपुर और जोधपुर के ‘रणछोड़राय’, कांकरोली के ‘द्वारकाधीश’ तथा उदयपुर का प्रसिद्ध ‘जगदीश मंदिर’—ये सभी देवालय वस्तुतः श्रीकृष्ण के चतुर्भुज स्वरूप की ही निरंतरता हैं। 16वीं-17वीं शताब्दी के उपरांत ही श्रीकृष्ण के वंशीधर, द्विभुज और लीला-स्वरूप वाले स्वतंत्र विग्रहों की स्थापना और मंदिरों के निर्माण में तीव्रता आई।
मध्यकालीन भक्ति-आंदोलन और मीरां-युग का स्वर्णकाल
16वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से राजस्थान में कृष्णोपासना का एक अभूतपूर्व स्वर्णकाल प्रारंभ हुआ, जिसे निसंकोच ‘मीरां-युग’ कहा जा सकता है।
1498 ईस्वी में मेड़ता के राठौड़ राजकुल में जन्मीं और 1511 ईस्वी में मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश (राणा सांगा के ज्येष्ठ पुत्र भोजराज) से विवाहित मीरांबाई ने अल्पायु में वैधव्य का आघात सहा। किंतु उन्होंने स्वयं को कभी विधवा नहीं माना; वे स्वयं को उस परमात्मा की नित्य अखण्ड सुहागिन मानती रहीं—
जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई
X X X
म्हारा गिरधर गोपाल दूसरा न कोई
मीरांबाई द्वारा अपने आराध्य गिरधर गोपाल के विरह और मिलन के भाव में गाए गए आत्मनिवेदनपरक पदों ने न केवल राजस्थान, अपितु सम्पूर्ण भारत में कृष्ण-भक्ति की एक पावन लहर प्रवाहित कर दी। मीरां की यह अनन्य प्रेमाभक्ति राजस्थान की आध्यात्मिक चेतना का सर्वोच्च शिखर बन गई।
16वीं-17वीं शताब्दी से श्रीकृष्ण की वंशीधर द्विभुज लीला-मूर्तियाँ और स्वतंत्र मंदिर बनने लगे, जिसके बाद राजस्थान में श्रीकृष्णभक्ति परम्परा के अंतर्गत कृष्ण-मंदिर सर्वाधिक पूज्य और प्रतिष्ठित हुए।
राजघरानों में कृष्ण-भक्ति और चित्रकला शैलियों का उत्कर्ष
मीरां-युग के साथ ही राजस्थान के प्रायः सभी प्रमुख राजपूत राजघरानों में कृष्ण-भक्ति राज-धर्म और व्यक्तिगत आस्था का केंद्र बन गई। उदयपुर (मेवाड़), जोधपुर (मारवाड़), मेड़ता, बीकानेर, जैसलमेर, किशनगढ़, आमेर-जयपुर, अलवर, भरतपुर, कोटा, बूंदी और झालावाड़ के राजाओं ने कृष्णोपासना को अंगीकार किया।
इस काल में राजस्थान में श्रीकृष्णभक्ति परम्परा प्रमुख धार्मिक प्रवृत्ति बन गई। उदयपुर, जोधपुर, मेड़ता, बीकानेर, जैसलमेर, किशनगढ़, जयपुर, अलवर, भरतपुर, बूंदी-कोटा और झालावाड़ के राजमहलों में श्रीमद्भागवत, गीत गोविंद और रसिकप्रिया की सचित्र प्रतियाँ तैयार हुईं तथा लघुचित्रों व भित्तिचित्रों का विपुल निर्माण हुआ।
- चित्रकला का स्वर्णिम विस्तार: 17वीं शताब्दी में जब मुगल बादशाह औरंगजेब ने अपनी धर्मांध और कट्टर नीतियों के चलते मुगल दरबार के कलाकारों और चित्रकारों को निष्कासित कर दिया, तब उन कलाकारों को राजस्थान की विभिन्न रियासतों ने सहर्ष संरक्षण प्रदान किया। परिणामस्वरूप राजस्थान में लघुचित्र शैलियों (Miniature Paintings) का अद्भुत विकास हुआ।
- चित्रित विषय और ग्रंथ: मेवाड़ शैली, जोधपुर शैली, बीकानेर शैली, किशनगढ़ शैली, कोटा-बूंदी शैली और जयपुर शैली में कृष्ण-लीला, रासलीला, गोवर्धन-धारण, चीर-हरण, माखन-चोरी और राधा-कृष्ण के प्रेम प्रसंगों पर आधारित हजारों लघुचित्र बने। साथ ही ‘श्रीमद्भागवत पुराण’, जयदेव कृत ‘गीत गोविन्द’ और कवि केशवदास कृत ‘रसिकप्रिया’ की भव्य सचित्र प्रतियाँ राजमहलों में तैयार करवाई गईं।
- राजकीय कवि और साधक: किशनगढ़ के महाराजा सावंत सिंह ने राजपाट त्यागकर ‘नागरीदास’ नाम से विपुल कृष्ण-पदों की रचना की, और उनकी प्रेयसी ने ‘रसिकप्रिया’ नाम से पद रचे। आमेर-जयपुर के महाराजा सवाई प्रतापसिंह ने ‘ब्रजनिधि’ नाम से हजारों भक्ति पदों का प्रणयन किया।
राजस्थानी काव्य और साहित्य में श्रीकृष्ण की गूंज
राजस्थान में मध्ययुगीन काव्य-सृजन की प्रमुख धारा कृष्ण-काव्य ही रही। 11वीं-12वीं शताब्दी से अंकुरित यह परम्परा 15वीं-16वीं शताब्दी से 20वीं शताब्दी तक डिंगल, पिंगल (ब्रज मिश्रित डिंगल) और आधुनिक राजस्थानी भाषा में अनवरत प्रवाहित रही।
- वेलि क्रिसन रुकमणी री: बीकानेर नरेश महाराजा रायसिंह के अनुज कुंवर पृथ्वीराज राठौड़ द्वारा डिंगल भाषा में रचित अमर प्रबंध काव्य ‘वेलि क्रिसन रुकमणी री‘ राजस्थानी साहित्य का सिरमौर ग्रंथ है। श्रीमद्भागवत के कृष्ण-रुक्मिणी विवाह प्रसंग पर आधारित इस अनुपम कृति को समकालीन विद्वान कवि दुरसा आढ़ा ने ‘पाँचवाँ वेद’ और ‘उन्नीसवाँ पुराण’ कहकर सम्मानित किया।
- साहित्य में रुक्मिणी और राधा का स्थान: प्राचीन राजस्थानी कृष्ण-काव्य में श्रीकृष्ण के साथ प्रधान रूप से पटरानी रुक्मिणी का ही चित्रण मिलता है। कालांतर में जयदेव के ‘गीत गोविन्द’ के प्रभाव से राधा का स्वरूप प्रविष्ट हुआ।
- प्रमुख रचनाकार: भक्तकवि ईसरदास (हरिरस), नरहरिदास बारहठ (अवतार चरित्र), सांया जी झूला, तथा आधुनिक काल में महावीर प्रसाद जोशी (जिन्होंने ‘ब्रजेश’, ‘मथुरेश’ और ‘द्वारकेश’ त्रयी महाकाव्य रचे), गिरधारी सिंह परिहार, सत्यप्रकाश जोशी आदि कवियों ने कृष्ण-चरित्र पर विपुल साहित्य रचा।
- ईसरदास, नरहरिदास बारहठ, सांया झूला से लेकर आधुनिक काल में महावीर प्रसाद जोशी, गिरधारीसिंह परिहार और सत्यप्रकाश जोशी तक कवियों की एक विशाल श्रृंखला रही है। राजस्थान में श्रीकृष्णभक्ति परम्परा का प्रभाव विश्नोई और जसनाथी जैसे निराकार उपासक संप्रदायों तथा सहजोबाई जैसे राम-भक्तों के साहित्य पर भी स्पष्ट दिखाई देता है।
- सम्प्रदाय-निरपेक्ष प्रभाव: कृष्णभक्ति का प्रभाव इतना गहरा था कि विश्नोई सम्प्रदाय (जाम्भोजी) और जसनाथी सम्प्रदाय जैसे निर्गुण-निराकार उपासक पंथों के साहित्य में भी कृष्ण-स्तुति के पद मिलते हैं। यहाँ तक कि श्रीराम की अनन्य भक्त सहजोबाई के काव्य में भी श्रीराम सरयू तट पर श्रीकृष्ण की भांति रास रचाते दिखाई देते हैं, जिसके फलस्वरूप रामावत संप्रदाय में ‘रसिक शाखा’ का प्रादुर्भाव हुआ।
लोक-साहित्य, हरजस और लोक-मानस में पारिवारिक कृष्ण
राजस्थान के लोक-साहित्य और ग्रामीण महिलाओं के कंठ में बसे गीतों में श्रीकृष्ण का जो स्वरूप मिलता है, वह अत्यंत आत्मीय, मानवीय और सरस है। वैवाहिक मांगलिक गीतों और लोक-गीतों में कृष्ण वर और आदर्श पुरुष के रूप में आते हैं, किंतु लोक-विधा ‘हरजस’ (हरियश) में उनका सम्पूर्ण घरेलू रूप प्रकट होता है।
हरजसों में श्रीकृष्ण एक ओर ब्रह्मांड के स्वामी ठाकुरजी हैं, तो दूसरी ओर एक साधारण राजस्थानी गृहस्थ हैं:
- उनके पास रहने को भव्य महल हैं, किंतु बीच-बीच में वे अपनी गूजरी रानी की टपकती झोपड़ी में जाते हैं। वर्षा ऋतु में जब झोपड़ी चूने लगती है, तो कान्हा और गूजरी अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर राधारानी के महलों में शरण लेते हैं।
- महलों में राधा, रुक्मिणी और सत्यभामा के मध्य होने वाले मान-मनुहार, गृहस्थी के काम—कुएं से पानी भरकर लाना, रसोई बनाना, चूल्हा-चौका करना, गोबर से ‘थेपड़ियां’ (कंडे) थापना आदि का सजीव वर्णन मिलता है।
- जब कृष्ण रुक्मिणी को कोई सुंदर साड़ी लाकर देते हैं और राधा को इसका भान होता है, तो घर में कलह मच जाती है और बेचारे कृष्ण रानियों के झगड़ों को शांत करने में लगे रहते हैं। साथ ही सास यशोदा और बहू राधा के स्वाभाविक लोक-द्वंद्व भी इन पदों में जीवंत हो उठते हैं।
- प्रत्येक हरजस के श्रवण और गायन के अंत में सौभाग्य, धन-धान्य, सुयोग्य वर और अंत में वैकुंठ-वास की फलश्रुति जुड़ी होती है।
राजस्थान की लोकवार्ताएँ और कृष्ण-कथाएँ
राजस्थान के जन-जन में श्रीकृष्ण की भक्तवत्सलता और लीलाओं से जुड़ी अनेक चमत्कारी लोकवार्ताएँ प्रचलित हैं:
- नरसी मेहता की हुंडी और मायरा: जूनागढ़ के भक्त नरसी मेहता द्वारा लिखी गई हुंडी को द्वारका में ‘सांवल शाह’ (सांवलिया सेठ) बनकर श्रीकृष्ण ने स्वयं स्वीकारा और नरसी की पुत्री नानी बाई के मायरे में छप्पन करोड़ का अलौकिक मायरा भरा।
- मीरांबाई की रक्षा: राणा विक्रमसिंह द्वारा भेजे गए विष के प्याले को मीरां के लिए चरणामृत बनाना, पिटारे के विषधर नाग को नौलखा नवरंग हार में बदलना, और अंत समय में द्वारका के रणछोड़राय विग्रह में मीरां का सशरीर समा जाना।
- करमा बाई का खीचड़ा: पुजारी के बाहर जाने पर बालिका करमा बाई का प्रेमपूर्वक बाजरे का खीचड़ा बनाना और हठपूर्वक भगवान को भोग लगाना, जिस पर कान्हा द्वारा साक्षात आकर खीचड़ा आरोगना।
- रुक्मिणी का वरण: एक वार्ता के अनुसार बाजरे का सिट्टा बेचते समय फूस का कण आंख में लगने से काणी हुई ग्रामीण कन्या रुक्मिणी को श्रीकृष्ण द्वारा निज रूप में प्रकट होकर अपनाना और विवाह करना।
- अजमल जी को वरदान एवं रामदेवरा: पोकरण के निःसंतान ठाकुर अजमल जी द्वारा द्वारकाधीश की शरण में जाने पर भगवान कृष्ण का उनके घर पुत्र रूप में अवतरित होने का वरदान देना, जिसके फलस्वरूप जन-जन के आराध्य लोकदेवता बाबा रामदेव जी (पीरों के पीर रामापीर) का प्राकट्य हुआ।
- हलवाई और सोने का कंगन: रात्रि में भोग भूल जाने पर बालकृष्ण का स्वयं आधी रात को हलवाई की दुकान पर जाकर सोने का कंगन देकर चार लड्डू खरीदकर जीमना।
- खाटूश्यामजी की महिमा: महाभारत के महाबली बर्बरीक (घटोत्कच के पुत्र एवं भीम के पौत्र) द्वारा शीश का दान दिए जाने पर श्रीकृष्ण द्वारा उन्हें अपने नाम ‘श्याम’ से कलयुग में पूजित होने का वरदान देना, जो आज सीकर के खाटू धाम में ‘हारे का सहारा, बाबा श्याम हमारा’ के रूप में विश्वविख्यात हैं।
प्रमुख कृष्ण-भक्त सम्प्रदाय और राजस्थान में उनकी पीठें
राजस्थान देश का वह सौभाग्यशाली प्रदेश है जहाँ प्रायः सभी प्रमुख वैष्णव कृष्ण-सम्प्रदायों की मुख्य अथवा प्रभावशाली पीठें स्थापित हुईं:
| सम्प्रदाय | संस्थापक / प्रमुख आचार्य | राजस्थान में प्रमुख केंद्र | उपासना पद्धति एवं वैशिष्ट्य |
| निम्बार्क सम्प्रदाय | आचार्य निम्बार्क (12वीं सदी) | सलेमाबाद (किशनगढ़-अजमेर), स्थापना सन् 1500 ई. | शालिग्राम रूपी ‘सर्वेश्वर प्रभु’ एवं राधा-कृष्ण की निकुंज युगल सेवा। |
| पुष्टिमार्ग (वल्लभ सम्प्रदाय) | महाप्रभु वल्लभाचार्य एवं विट्ठलनाथ जी | नाथद्वारा (श्रीनाथजी), कांकरोली (द्वारकाधीश), कोटा (मथुरेशजी), कामां (भरतपुर) | राग, भोग और श्रृंगार से युक्त हवेली-संगीत व वात्सल्य/सख्य भाव की अष्टछाप सेवा। |
| गौड़ीय (चैतन्य) सम्प्रदाय | चैतन्य महाप्रभु एवं रूप-सनातन गोस्वामी | जयपुर (गोविन्ददेवजी, गोपीनाथजी, राधा-दामोदरजी), करौली (मदनमोहनजी) | राधा-कृष्ण का युगल विग्रह, संकीर्तन और माधुर्य भाव की उपासना। |
| श्रीकृष्ण-प्रणामी सम्प्रदाय | महामति प्राणनाथ जी | जयपुर (आदर्श नगर), मेड़ता | विग्रह के स्थान पर मोरपंख, बाँसुरी एवं पवित्र ‘कुलजम स्वरूप’ ग्रंथ की पूजा। |
| ललित सम्प्रदाय | बंशीमल जी (जयपुर) | जयपुर | राधा की प्रधान सखी ललिता जी के माध्यम से युगल सरकार की सेवा। |
| चरणदासी (शुक) सम्प्रदाय | स्वामी चरणदास जी (18वीं सदी) | मेवात, जयपुर, अलवर | शुकदेव जी एवं श्रीमद्भागवत को गुरु मानकर ज्ञान-भक्ति का समन्वय। |
औरंगजेब का कालखंड और मूर्तियों का राजस्थान में संरक्षण
सन् 1669 में मुगल बादशाह औरंगजेब ने मथुरा के केशवराय (कृष्ण जन्मभूमि) मंदिर सहित समूचे उत्तर भारत के हिंदू देवालयों और मूर्तियों को ध्वस्त करने का क्रूर फरमान जारी किया। उस संकटकाल में ब्रजमंडल के पुष्टिमार्गीय और गौड़ीय गोस्वामी अपने आराध्य विग्रहों को सुरक्षित रखने हेतु राजस्थान के वीर राजपूत शासकों की शरण में आए।
- मेवाड़ का शरणागत-वत्सल धर्म: मेवाड़ के वीर महाराणा राजसिंह ने औरंगजेब की खुली चुनौती स्वीकार करते हुए गोवर्धन से पधारे पुष्टिमार्ग के प्रधान आराध्य श्रीनाथजी (गोवर्धननाथ जी) को उदयपुर राज्य के सिहाड़ ग्राम में प्रतिष्ठित करवाया, जो आज विश्वविख्यात तीर्थ नाथद्वारा के नाम से जाना जाता है। इसी प्रकार द्वारकाधीश प्रभु को कांकरोली में नवनिर्मित राजसमंद झील के तट पर स्थापित किया गया।
- कोटा एवं हाड़ौती: पुष्टिमार्ग के सात स्वरूपों में से प्रथम निधि मथुरेशजी को कोटा नरेश ने अपने राज्य में ससम्मान प्रतिष्ठित किया। जिससे राजस्थान में श्रीकृष्णभक्ति परम्परा को नवीन ऊर्जा प्राप्त हुई।
- कामां और बीकानेर: अन्य पुष्टिमार्गीय निधियाँ जयपुर और बीकानेर के रतन बिहारी मंदिर में कुछ समय विराजने के उपरांत भरतपुर के कामां (कामवन) में स्थापित हुईं।
- जयपुर—’गुप्त वृन्दावन’: आमेर-जयपुर के कछवाहा शासकों का वृन्दावन के गौड़ीय आचार्यों से घनिष्ठ सम्बंध था। सवाई जयसिंह ने वृन्दावन से पधारे श्री गोविन्ददेवजी के विग्रह को अपने राजमहल (सिटी पैलेस) के सम्मुख इस प्रकार स्थापित करवाया कि महल से प्रतिदिन प्रभु के सीधे दर्शन हो सकें। इसके अतिरिक्त गोपीनाथजी (पुरानी बस्ती) और राधा-दामोदरजी (चौड़ा रास्ता) में विराजे। मदनमोहनजी का विग्रह जयपुर से करौली नरेश को भेंट किया गया, जहाँ वे करौली के आराध्य बने। इन समस्त पावन विग्रहों की उपस्थिति के कारण ही जयपुर को ‘दूसरा वृन्दावन’ या ‘गुप्त वृन्दावन’ कहा जाता है।
जन्माष्टमी पर्व, उत्सव परम्परा और नंदोत्सव
राजस्थान के सांस्कृतिक जीवन में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी (भाद्रपद कृष्ण अष्टमी) केवल एक व्रत नहीं, बल्कि सबसे बड़ा लोकोत्सव है। गाँव-गाँव और नगर-नगर के घरों में लड्डू गोपाल का श्रृंगार होता है, पालना सजाया जाता है, और दिनभर उपवास रखकर मध्यरात्रि 12 बजे पंजरी व पंचामृत के भोग के साथ व्रत का पारण किया जाता है।
- जयपुर के उत्सव: जयपुर के चौड़ा रास्ता स्थित राधा-दामोदर मंदिर और नाहरगढ़ पहाड़ी पर स्थित चरण मंदिर में दोपहर 12 बजे ही जन्मोत्सव मनाया जाता है। मुख्य गोविन्ददेवजी मंदिर में भाद्रपद कृष्ण प्रतिपदा से ही संकीर्तन और सांस्कृतिक झांकियों की झड़ी लग जाती है।
- नाथद्वारा की भव्यता: नाथद्वारा की श्रीनाथजी हवेली में जन्माष्टमी पर लाखों श्रद्धालु उमड़ते हैं। रात्रि ठीक 12 बजे 21 तोपों की गर्जना के साथ कान्हा का जन्म घोषित होता है। नवप्रसूता यशोदा मैया के लिए केसर, कस्तूरी और मेवों से निर्मित विशेष औषधीय लड्डू का भोग लगाया जाता है।
- सांवलिया सेठ (मंडफिया, चित्तौड़): यहाँ जन्माष्टमी पर भव्य मेला भरता है और यह धाम वर्तमान में राजस्थान के सर्वाधिक आस्था व चढ़ावे वाले तीर्थों में गिना जाता है।
- सर्वधर्म समभाव (नरहड़ दरगाह): झुंझुनू जिले के नरहड़ कस्बे में स्थित हज़रत हाजिब शकरबार शाह की दरगाह में जन्माष्टमी पर विशाल मेला भरता है और हिंदू-मुस्लिम सभी मिलकर कृष्ण जन्मोत्सव मनाते हैं।
- नंदोत्सव और जलझूलनी एकादशी: जन्माष्टमी के अगले दिन ‘नंदोत्सव’ पर “नंद घर आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की” के जयकारों के साथ हल्दी-दही की उछाल होती है। तत्पश्चात भाद्रपद शुक्ल एकादशी (जलझूलनी ग्यारस) को ठाकुरजी की भव्य डोल-यात्राएँ निकलती हैं और वे जलाशयों में नौका-विहार करते हैं।
भौगोलिक एवं ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: राजस्थान से गुजरते कृष्ण-मार्ग
पौराणिक और ऐतिहासिक अनुसंधानों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण और बलराम के कई प्रमुख गमन-मार्ग राजस्थान के भूभाग से होकर गुजरे थे:
- मथुरा से संदीपनि आश्रम (उज्जैन): कृष्ण और बलराम के मथुरा से उज्जैन जाने का मार्ग पूर्वी और दक्षिणी राजस्थान के धौलपुर, कोटा और झालावाड़ से होकर गुजरता था। धौलपुर का मुचुकुन्द तीर्थ वही पावन गुफा-स्थल है जहाँ महाराज मुचकुंद सोए थे और रणछोड़ श्रीकृष्ण का पीछा करते हुए आए कालयवन का उनके दृष्टिपात से अंत हुआ था।
- सरस्वती नदी मार्ग (द्वारका से इंद्रप्रस्थ व कुरुक्षेत्र): महाभारत में बलराम जी की सरस्वती तीर्थयात्रा का विस्तार से उल्लेख है। यह लुप्त सरस्वती नदी वर्तमान राजस्थान के हनुमानगढ़, सूरतगढ़ और जैसलमेर से होकर बहती थी। द्वारका से हस्तिनापुर और इंद्रप्रस्थ के मध्य यह एक मुख्य मार्ग था।
- मरुभूमि और ऋषि उतंक प्रसंग: महाभारत के अनुसार जब श्रीकृष्ण सुभद्रा को लेकर द्वारका लौट रहे थे, तब वे राजस्थान की मरुभूमि से गुजरे जहाँ मीठे मतीरे (फल) बहुतायत में होते थे। यहीं मरुस्थल में उनकी भेंट तपस्वी महर्षि उतंक से हुई थी, जिन्हें भगवान ने इच्छानुसार मरुधरा में मेघ-वर्षा का वरदान दिया था।
- आबू-सिरोही मार्ग: डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा के अनुसार श्रीकृष्ण के द्वारका से पांचाल एवं हस्तिनापुर जाने का एक प्रमुख मार्ग आबू-सिरोही की तलहटी से होकर जाता था। आबू पर्वत पर भगवान श्रीकृष्ण के प्रवास की जनश्रुतियाँ आज भी जीवित हैं।
यह जीवंत उत्सव-संस्कृति सिद्ध करती है कि जन-जन के उल्लास में राजस्थान में श्रीकृष्णभक्ति परम्परा पूरी तरह समाहित है।
कृष्ण-वंशज यादव राजवंश: ब्रज से गजनी और जैसलमेर तक
राजस्थान के राजनीतिक इतिहास में कृष्ण-वंशज यदुवंशी (यादव) क्षत्रियों के शासन का अत्यंत गौरवशाली अध्याय रहा है:
- भरतपुर का बहज (वज्रनाभपुर): भरतपुर के निकट ‘बहज’ मूलतः श्रीकृष्ण के प्रपौत्र (अनिरुद्ध के पुत्र) वज्रनाभ की राजधानी ‘वज्रनाभपुर’ था। माना जाता है कि ‘वज्र’ शब्द के वर्ण-विपर्यय से ही कालांतर में ‘ब्रज’ नामकरण हुआ। हाल ही में पुरातत्व विभाग द्वारा बहज में 5 मीटर की गहराई पर किए गए उत्खनन में लगभग 4500 वर्ष प्राचीन मकान, कूप और मृद्भाण्ड प्राप्त हुए हैं, जो महाभारत-कृष्ण काल से मेल खाते हैं।
- तिमनगढ़ एवं करौली राज्य: बहज के यदुवंशियों की एक शाखा ने 11वीं-12वीं शताब्दी में दौसा-करौली क्षेत्र के तिमनगढ़ पर शासन किया। आगे चलकर इसी वंश ने करौली राज्य की स्थापना की, जिनके आराध्य देव श्री मदनमोहन जी हैं। भरतपुर का जाट राजवंश भी स्वयं को भगवान श्रीकृष्ण का वंशज मानता है और उनके आराध्य ‘ब्रजराज’ हैं।
- गजनी, भटनेर और जैसलमेर का भाटी राजवंश: कृष्ण-वंशज यादवों की एक शाखा गंधार और मध्य एशिया तक विस्तृत हुई। 5वीं शताब्दी ईस्वी में यदुवंशी राजा गज ने वर्तमान अफगानिस्तान में ‘गजनी’ नगर की नींव रखी। 7वीं शताब्दी में गजनी के सिंहासन पर रावल भट्टी बैठे, जिन्होंने ‘भट्टी संवत’ चलाया और उनके वंशज ‘भाटी’ कहलाए।
- स्वदेश वापसी और दुर्ग निर्माण: विदेशी आक्रमणों के दबाव में भाटी शासक पुनः भारत लौटे और पश्चिमी राजस्थान के ददरेवा व लोद्रवा होते हुए 12वीं शताब्दी में रावल जैसल ने अमर दुर्ग जैसलमेर की स्थापना की। भाटियों ने उत्तर दिशा के प्रहरी के रूप में हनुमानगढ़ में ‘भटनेर दुर्ग’ और बीकानेर के निकट ‘पूकल (पूगल) राज्य’ की स्थापना की। साथ ही पंजाब के पटियाला और सियालकोट तक अपना राज्य विस्तार किया।
निष्कर्ष
उपर्युक्त समग्र विवेचन से यह पूर्णतः स्पष्ट होता है कि राजस्थान में श्रीकृष्णभक्ति परम्परा केवल एक धार्मिक उपासना पद्धति मात्र नहीं है, अपितु यह यहाँ के इतिहास, पुरातत्व, अभिलेखों, स्थापत्य, मूर्तिकला, चित्रकला, उच्च साहित्य, लोक-साहित्य और जन-जीवन की धड़कनों में रचा-बसा एक चिरंतन सांस्कृतिक प्रवाह है।
ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी के नारायण वाटक से लेकर गुप्तकालीन टेराकोटा और द्वार-स्तम्भों तक, मध्यकालीन मीरां के विरह-पदों से लेकर पुष्टिमार्गीय व गौड़ीय सम्प्रदायों के विग्रहों तक, और महलों के लघुचित्रों से लेकर ग्रामीण झोपड़ियों में गाए जाने वाले हरजस गीतों तक—राजस्थान का कण-कण और जन-जन श्रीकृष्ण के अनुराग में युगों-युगों से सराबोर रहा है और आज भी पूरी श्रद्धा के साथ जाग्रत है।



