जोधपुर राजपरिवार में सतीप्रथा
हिन्दू राजवंशों में पति के मरने पर पत्नी के सती होने की परम्परा पौराणिक काल से ही चली आ रही थी। अनेक पौराणिक कथाओं में सती होने के उल्लेख मिलते हैं। जोधपुर के राठौड़ राजवंश में भी राजा की मृत्यु के बाद रानियों के सती होने की परम्परा थी। जोधपुरराजपरिवार में सतीप्रथा का लम्बा इतिहास है।
राजा के शव के साथ उसकी ब्याहता रानियां, चहेती दासियां, प्रिय सेवक, बंदर आदि पशु एवं मोर आदि पक्षी भी चिता में जलकर भस्म होते थे। हालांकि पुराणों में वर्णित सती प्रसंगों में दास-दासियों एवं पशु-पक्षियों के राजा की चिता पर जलकर भस्म होने के उल्लेख नहीं मिलते हैं।
राव सीहा (तेरहवीं शताब्दी ईस्वी) के वंशज राव जोधा (ई.1438-88) ने ई.1456 में मण्डोर दुर्ग पर अधिकार करके राठौड़ों के मारवाड़ राज्य की नींव डाली तथा ई.1459 में मेहरानगढ़ दुर्ग की स्थापना करके मारवाड़ राज्य की राजधानी मण्डोर से जोधपुर स्थानांतरित की।
राव जोधा के पुत्र राव सूजा (ई.1491-1515) ने मेहरानगढ़ दुर्ग में रानियों के लिए अलग से महल बनवाए जिन्हें हिन्दू राजवंशों की परम्परा के अनुसार रनिवास कहा जाता था। राजा सूरसिंह (ई.1595-1619) ने मेहरानगढ़ दुर्ग में ‘चित्र सेवा री हमार’ के पूजनीय स्थान पर जनाना ड्यौढ़ी बनवाई।[1]
मुगल शाही परम्परा में रनिवास को हरम कहा जाता था किंतु जब भारत के हिन्दू राजाओं ने अपने राज्यों में मुगलों के अनुकरण पर राजव्यवस्थाएं लागू कीं तो उन्होंने रनिवास को जनाना ड्यौढ़ी नाम दिया। जनाना ड्यौढ़ी भिन्न प्रवेश द्वार वाली एक अलग-थलग व्यवस्था थी जिसमें सामान्यतः पुरुषों का प्रवेश वर्जित था। जनाना ड्यौढ़ी में नपुंसक पहरेदार होते थे जिन्हें नाजर कहा जाता था। रनिवास में नियुक्त महिला सैनिकों को उड़दा बेगणियां कहा जाता था।
जनाना ड्यौढ़ी में रानियों के लिए रंगमहल, शयनकक्ष, रसोड़ा और निज-कक्ष होते थे। राजा सूरसिंह ने रानियों के लिए ई. 1615 में मेहरानगढ़ दुर्ग में हमाम (स्नान घर) तथा पूजा-पाठ के लिए ठाकुर जी, कुलदेवी नागणेचिया और हरकाबाई सती के मंदिर का मंदिर बनवाए।।[2]
थार रेगिस्तान में आए प्रथम राठौड़ शासक राव सीहा के स्मारक लेख में (ई.1273) में राव सीहा के पीछे सती होने वाली पार्वती सोलंकी रानी की देवली का उल्लेख मिलता है। यह जोधपुरराजपरिवार में सती प्रथा का पहला उदाहरण है।राव सातल के पीछे उसकी सात रानियों के सती होने का उल्लेख मिलता है। [3]
मुरारीदान री ख्यात अनुसार राव सातल के पीछे सती होने वाली रानी हरखाबाई का पूजन नागणेचिया माता (राठौड़ कुलदेवी) के साथ किया जाता है। क्योंकि रानी हरखाबाई ने संतानहीन होकर भी अपने 10 शक्तिशाली देवरों में से अपने प्रभाव में रहने वाले देवर सूजा को राज्य दिलवाया था।[4]
रानी हरखाबाई राव सूजा के लिए राज्य दिलवाने वाली देवी के रूप में मान्य हुई। कुछ इतिहासकारों के अनुसार राव सूजा ने भाभी हरखाबाई की राजनैतिक शक्ति को समाप्त करने के लिए उसे सती करवाया तथा उसे सती माता के रूप में प्रसिद्धि दिलवाई। वह साधारण में, पति के पीछे जीवन बलिदान करने वाली, महानता की प्रतीक बना दी गई। इसी महानता और प्रसिद्धि ने संभवतः राठौड़ राजवंश की महिलाओं में में त्याग की प्रतिमूर्ति बनने और देवी माता का दर्जा पाने की लालसा पैदा हुई हो! [5]
इस प्रकार इन आधुनिक इतिहासकारों की दृष्टि में राठौड़ राजवंश ने सती होने की राजनीति करके अपना राज्य और जनसमाज में ख्याति प्राप्त करके हित साधा था किंतु यह आरोप सही नहीं है क्योंकि हिन्दू राजवंशों में रानियों के सती होने की परम्परा पौराणिक का से ही विद्यमान थी। मध्यकाल में यह परम्परा श्रेष्ठियों अर्थात् महाजन-वैश्य जातियों की स्त्रियों ने भी अपना ली थी।
राजा के जीवन काल में उसकी समस्त रानियों को अर्द्धांगिनी के अधिकार नहीं मिलते थे। सौत-पुत्र के शासन काल में उनकी राजनैतिक ताकत कम हो जाती थी। विधवा रानियों को समय और परिस्थितियों के अनुसार अपनी संतान के हित में चुप्पी साधे रखनी पड़ती थी, ताकि अवयस्क संतान के जीवन पर किसी प्रकार का राजनैतिक संकट उत्पन्न न हो। रानीमंगा भाटों की बही से हमें विधवा रानियों के वृंदावन और मथुरा में जाकर भगवान-भक्ति में जीवन खपा देने के प्रमाण प्राप्त होते हैं।[6]
सती रूप में की जाने वाली राजनीति को हम ‘सती वचन’ और ‘सती श्राप’ के उदाहरण सहित (कहानियों, मिथकों और साहित्यिक) प्राप्त करते हैं। [7]
बाँकीदास री ख्यात के अनुसार हम राठौड़ राव-राजाओं के पीछे सती होने वाली रानियों द्वारा पुत्रों को दिए जाने वाले श्राप को सत्य होने और राठौड़ सरदारों द्वारा सती रानी को दिए वचन का पालन करने की कहानियाँ प्राप्त करते हैं, जोकि समकालीन इतिहासकारों द्वारा हमारा ध्यान भटकाने की प्रभावी सामग्री के रूप में परोसी गई है। अर्थात राठौड़ राजाओं ने अपनी माताओं को शक्ति ग्रहण करने में सहायता देने वाली प्रभावशाली राजनैतिक व्यक्ति या संस्था रूप में उपयोग किया था, परन्तु पितृसत्तात्मक इतिहास में राजपरिवार की महिलाओं के राजनैतिक प्रभाव को न दिखलाने के लिए उनकी सती माता के रूप में प्रस्तुती, सती वचन और श्राप के औचित्य को अहम् घटक के रूप में ख्यातों-बहियों में प्रस्तुत कर दिया है।[8]
राव चन्द्रसेन ने, पाटवी कुंवर होने के बावजूद भाइयों और उमरावों के विद्रोह से बचने के लिए माँ स्वरूपदेवी झाली को पिता के साथ सती नहीं होने दिया था। सती माँ समर्थन (झाली रानी ने सती श्राप का भय दिखलाकर राठौड़ सरदारों और भाइयों से राव चन्द्रसेन के राज्याधिकार को स्वीकृति दिलवाई थी) अपने हक में करवाने के बाद अगली सुबह सती होने दिया था। नाराज सती स्वरूपदेवी ने राव चन्द्रसेन को श्राप दिया था कि, तेरे पास राज्यहक सुरक्षित नहीं रहेगा (तै मोनू राज रा बंदोवस्त वास्तै रावजी संग बलण न दीवी सो थारो राज मत रहे)।[9]
इस प्रकार लेखक ने झाली रानी के राठौड़ सरदारों पर राजनैतिक प्रभाव को उनके श्राप दिए जाने की घटना से जोड़ दिया ताकि हम संवेदनशील मानवीय आधार पर उनकी राजनैतिक ताकत को अंधेरे में डालकर सती माता के रूप में बखान करें।[10]
राणीमंगा भाटों की बही अनुसार राव मालदेव की उमादेवी भटियानी रानी ने भी गोद के पुत्र राम को राज्यहक न मिलने का श्राप दिया था (थारे जोधपुर रो राज आवै नहीं, हूँ धणी सू रूसणो कर आई छुपण बीजी कोई मत करजो, इण तरै नाठै तो राज आवै नहीं) ।[11]
यह उदाहरण भी हमें राव रामसिंह के कमजोर राजनैतिक व्यक्तित्व और कार्य कुशल रणनीतिक न होने के रूप में पहचानने नहीं देता है। वस्तुतः राव चन्द्रसेन और राव राम का मारवाड़ राज्यहक सुरक्षित न रहने का कारण उस समय की राजनैतिक परिस्थितियाँ हैं, क्योंकि एक तरफ मुगल बादशाह अकबर अपनी शक्ति का झंडा भारत में लहरा रहा था, तो दूसरी तरफ राजपूत ठाकुर आपसी गृहयुद्ध में शक्ति गंवा रहे थे। इसी कारण राव उदयसिंह बादशाह अकबर के संरक्षण में जोधपुर का राजा बन गया था।[12]
इस प्रकार सती रानियाँ देवी माता की तरह सत्य की प्रतिमूर्ति नहीं थी, बल्कि सती होना राजपरिवार महिलाओं की मजबूरी होता था, जोकि उनके संतानहीन होने, संतान से उपेक्षा प्राप्ति (राव मालदेव की झाली और उमादेवी भटियानी रानी, महाराजा अजीतसिंह की चौहान रानी) और संतान हत्या देखने के दुख से निजात प्राप्ति (महाराजा अजीतसिंह की बड़ी भटियानी, सिसोदया और छोटी चौहान रानी) रूप था।[13]
मुरारीदान री ख्यात के अनुसार सती होने वाली रानियों की आज्ञा का पालन करना राठौड़ सरदार अपना कर्तव्य मानते थे। महाराजा गजसिंह के स्वर्गवासी होने पर केसरदेवी नरूकी रानी ने सत् धारण करने से पहले सीकदार राघोदास को सभी कैदियों को रिहा करने का आदेश दिया था।[14]
वास्तव में यह स्वर्गवासी राजा और उसकी रानियों के प्रति राठौड़ सरदारों की निष्ठा एवं स्वामीभक्ति होती थी, जिसको समकालिक लेखक रानी की सती रूप में महिमा मंडित करके गौण बना देता था। महाराजा बख्तसिंह की सती रानियों ने भी व्यास उदयचन्द नाथावत और उनके पुत्र को कैद से रिहा करवाया था।[15]
इसके अलावा सती होने वाली रानियाँ राजकोष से रुपया मंगाकर खैरात में बांटती थी।[16] मारवाड़ री ख्यातानुसार महाराजा अभयसिंह के पीछे सती होने वाली तंवर रानी ने दान पुण्य और झालरा बनवाने के लिए 42000 रुपया कामदार बोड़ा सामीदास को प्रदान किया था।[17]
इस प्रकार राजपरिवार महिला पति मृत्यु बाद यकायक राजकोष से दानपुण्य और कैदियों को रिहा करवाने का राजनैतिक अधिकार प्राप्त कर लेती थी, जिसको वे जिंदा रहते हुए न पाकर अपनी मृत्यु समय प्राप्त करके अपने राजनैतिक अस्तित्व और औचित्य को सिद्ध कर देती थी।[18]
महाराजा श्री विजयसिंहजी री ख्यातानुसार कुंवर भोमसिंह की पत्नी भटियानी रानी ने सती-सवारी के समय मंडी में भगवान गणेश जी मंदिर के दर्शन करके सेवा स्वरूप अपने गहने चढ़ाए थे तथा घाटी के ऊपर रहने वाले भंगी को 300 रुपये के गहने साल (कमरा) बनवाने के लिए दिए थे।[19] महाराजा भीमसिंह की देवड़ी रानी ने अपने बर्तन और चाँदी का पलंग बालकिसन मंदिर को भेंट किया था।[20]
इस प्रकार सती रानियाँ अंतिम समय में धर्म-कर्म करके (निजी सामान को खालसा होने अर्थात राज्य के अधिकार में चले जाने से बचाकर धार्मिक छवि ईजाद करके राजनीति करती थी) अपनी छवि लोक-समाज समक्ष कल्याणकारी और दानमयी रूप में प्रस्तुत करती थी, ताकि लोक-समाज किंवदंतियों और प्रशंसा गीत गाकर उन्हें अमर बना दे, जोकि जीते-जी संभव न था।[21]
जोधपुर हुकूमत बही के प्रलेखानुसार महाराजा जसवंतसिंह की जलती चिता में पूरबिया कल्याण ने कूद कर आत्मदाह कर लिया था।[22] महाराजा अजीतसिंह के साथ दो नाजर नथू, किरणो और सिसोदया उमेदसिंह ने सत् (आत्मदाह) मार्ग का अनुसरण किया था।[23]
महाराजा विजयसिंह के साथ जाट आसीयो और महाराजा भीमसिंह के दुख में सौड़ बखतौ ने आत्मदाह कर लिया था। इसके अलावा राठौड़ राजाओं के साथ वडारन और दासी भी काफी संख्या में सती होती थी।[24]
इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि, सती यानी सत् मार्ग पर चलने की बाध्यता पत्नी तक सीमित नहीं थी। इस राह में निष्ठा अहम् स्थान रखती थी, जिसमें पुरुष-नारी का कोई लैंगिंग भेदभाव नहीं था। दूसरा हम वडारनों और राजवंश दासियों के अपनी स्वामिनी के साथ जीवन स्वाहा करने के पीछे अपने निजी धन के खालसा होने या राज्य- पूँजी बन जाने के दुख से निजात और संरक्षण समाप्ति (सुख-सुविधाओं की समाप्ति) का कारण प्राप्त करते हैं।[25]
जोधपुर हुकूमत री बही के अनुसार महाराजा जसवंतसिंह के निधन के बाद मुगल बादशाह औरंगजेब द्वारा जोधपुर राज्य की खालसा घोषित कर मुगल राज्य में दिया गया था। मारवाड़ राज्य पर मुगल अधिकार बहाली के लिए आए मुगल अधिकारी नवाब के जोधपुर के नजदीक आने की सूचना पाकर पटरानी जसवंतदेवी हाड़ी, चौहान रानी जस रूप और अतिसुखदेवी देवड़ी ने दासी रूप धारण कर लिया था। दासी भेष में ये महल से उतर कर रामपोल तक आ गई थी। राठौड़ राजवंश के गढ़ से नीचे आने के समाचार पाकर सरदार सोनगजी ने तुरन्त सभी रानियों को राठौड़ इज्जत और शान के नाम पर रामपोल के पास आकर रोक लिया था। रात्रि हो जाने के कारण राजवंश को वडारन गंगा के घर पर रखा था। अगली सुबह सुरक्षा का वचन देकर गढ़ में लौटा दिया था। सुरक्षा कारणों से देवड़ी और चौहान रानी, जादम रानी पुत्र के जन्म लेने तक भाटी गोयंददास के घर में रही थी।[26]
इस घटना को देने का कारण पटरानी जसवंतदेवी हाड़ी है। यह वही रानी है, जिसने महाराजा जसवंतसिंह के धरमत युद्ध से पराजित होकर जोधपुर वापस आने पर किले के द्वार बंद करवा दिए थे। हाड़ी रानी ने अपने मान-सम्मान के मुद्दे के नाम पर महाराज को बनावटी व्यक्ति की संज्ञा देकर सती होने का दृश्य उत्पन्न कर दिया था। महाराज द्वारा काफी मिन्नतों के बाद रानी ने द्वार खोलने का हुक्म दिया था।[27]
इस घटना को बर्नियर तक ने अपने यात्रा-संस्मरण में विवरण सहित लिखा है।[28] स्पष्टतया इस जुनूनी परम्परा की आड़ में रानियाँ सती परम्परा का अपनी हितपूर्ति और स्वेच्छी व्यवहार के तहत कार्यान्वित करती थी।[29]
जोधपुर हुकूमत बही अनुसार महाराजा जसवंतसिंह के पीछे गर्भवती कछवाही रानी ने सती होने की जिदद् की थी। राठौड़ सरदार उदयसिंह ने गर्भवती रानी के हठ पर कहा, आपके सती होने से पहले हम 10 राजपूत जलेंगे तभी आप सती होंगी।[30]
इस प्रकार हम देखते हैं कि, कछवाही रानी अच्छी तरह से जानती थी कि, गर्भवती होने के कारण और उत्तराधिकारी पुत्र लालसा में राठौड़ सरदार सती नहीं होने देंगे, तब भी रानी ने सती होने की बात कहकर राठौड़ सरदारों की इज्जत और मारवाड़ी प्रजा में सहानुभूति व यश प्राप्त किया था। [31]
साहित्यिक ग्रन्थ रूपक के अनुसार सत्ता लालसा में कुंवर अभयसिंह ने पिता महाराज की हत्या करवा दी थी। महाराज की अर्थी के साथ सतियों की सवारी में महाराजा अभयसिंह की माता चौहान रानी के शामिल होने पर सरदारों ने रोका, तो चौहान रानी ने पति बिना थोड़े दिन भी जीना धिक्कार (संतान की उपेक्षा और उनके स्वेच्छाचारी व्यवहार को छुपाया) कहा था।[32]
इसी प्रकार महाराजा भीमसिंह के स्वर्गवास बाद सती होने वाली रानियों में से देवड़ी रानी ने सरदारों को कहा था कि, आप लोगों ने महाराज की मृत्यु छुपाकर क्यों रखी। मैं महाराज को सती होने की इच्छा जतालाकर क्षत्राणी राजपूत कन्या होने का परिचय देती। मारवाड़ री ख्यातानुसार महाराजा विजयसिंह के कुंवर भोमसिंह की शीतला बीमारी से मृत्यु बाद चाँदकंवर भटियानी और चौहान रानी सती हुई थी।[33] चौहान रानी ने नाजर गंगादास को कहकर अपनी सती सवारी उसी मार्ग से निकलवाई थी, जिस राह से वह विवाह करके मेहरानगढ़ में आई थी। राणीमंगा भाट बहीनुसार महासती चाँदकंवर भटियानी और कुंवर सरदारसिंह के साथ सती होने वाली रानी पन्नेकंवर तंवर के चाँदी के पतरों पर (हथ-फूल पहने उकेरित) हाथ नागणेचियाँ माता के मंदिर में सुरक्षित रखे हैं। [34]
इस प्रकार हम देखते हैं कि, राठौड़ राजवंश ने स्वयं को सम्मानीय बनाने के लिए सती होते समय अलग-अलग रणनीतियों (वचन, कैद रिहाई और सती माता रूप) का उपयोग किया था।[35]
मारवाड़ री ख्यात के अनुसार ई.1803 में जयपुर के कछवाहा राजा प्रतापसिंह के निधन का समाचार जोधपुर आया था। करवा चौथ व्रत की पूजा करती बाई अभय कंवर को पति महाराज प्रतापसिंह के स्वर्गवासी होने की सूचना नाजर रामदास ने दी थी। बाई ने नाजर को सती होने की तैयारी करने को कहा था। बाई की माँ भटियानी रानी, पुत्री के सती होने के खिलाफ अड़ (राजनैतिक फायदे के तहत माँ-बेटी को कैद से रिहा करके महाराज भीमसिंह जोधपुर ने बाई का विवाह किया था) गई थी। रानी भटियानी ने महाराजा भीमसिंह को खूब गालियाँ दी थी, वृद्ध और बीमार राजा प्रतापसिंह से विवाह के कुछ समय बाद ही बाई के विधवा हो जाने के कारण), पर वे कुछ नहीं बोले थे। महाराजा भीमसिंह का बाई के साथ संवाद हुआ था जिसमें महाराज ने लड़की पर लांछन लगने की बात कही – तू वीजैसिंहजी री पोती, म्हारी बैन जयपुर परणाई काईं-कचाई लागै, तो इण में औरत रै लागै- तब बाई ने कहा भोली हूं म्हेराज के शरीर की दशा देखकर पाघ लेती आई थी। अभयकंवर बाई ने महासती का दर्जा प्राप्त करने के लिए अपनी चिता का घर यानि घर-सड़ा उखड़वाकर महाराज माता चाँदकंवर भटियानी के सती-स्थान पर रखवाया था।[36]
इन लेखों में हमें सती होने वाली महिलाओं के सम्मान या प्रशंसा में कोई भी शब्द लिखा नहीं मिलता है, सिर्फ पति के परलोकगमन मार्ग का पत्नी द्वारा अनुसरण करने की सूचना मिलती है। राठौड़ ख्यात-बहियों में पति का अनुसरण करना राठौड़ रानी का कर्तव्य समझाया गया है, यही सती यानी सत् मार्ग या सत् परम्परा है। मारवाड़ री ख्यात में ई.1777 में महाराजा विजयसिंह के कुंवर फतेहसिंह की मृत्यु के बाद सात पुत्रवधुओं में से किसी एक भी रानी के सती न होने पर निराशा प्रकट की गई है। [37]
हकीकत खाता बहीनुसार विवाह के एक साल बाद 1803 ई. में विधवा होने पर अभयकंवर बाई ने बाड़ी के महल में जाकर स्नान करके कीमखाप का घाघरा पहना था। अबदार खाना से गंगाजल की सीसी और इत्र लेकर बाई महाडोल में बैठकर मंडोर गई थी। बाई की सवारी में धायभाई सिम्भुदान, व्यास, प्रोहित, ड्योढ़ीदार गोपालदास, धांधल केसोराव, जोशी, वेदिया, खवास, पासवान,, नगाड़ा, असरफी, घोड़ाधुरी, निशान का हाथी, पातर-भगगण वगैरह थी। वडारन रुपया उछाल रही थी। राह में चांवडा माता के मंदिर में बाई ने अपने गहने अर्पित किए थे। [38]
सती होने वाली राठौड़ रानियां, सती सवारी से पहले गहने और अन्य सामान खजाना में जमा करवाती थी, फिर अपने दर्ज मुताबिक महाडोल में बैठकर मंडोर (जोधपुर के निकट मारवाड़ राज्य की पूर्व राजधानी जहाँ राजपरिवार के श्मशान हैं) पधारती थी। खवास, पासवान खुले केश घोड़ों पर सवार होती थी। सवारी समय पातर-भगगणों (नर्तकियों) के सोलमों गायन के साथ राज्य का बजता नगाड़ा, असरफी, घोड़ा घुरी, निसांण का हाथी चलते थे। रानियाँ मंडोर में पंथेवाड़ी माता की पूजा करके सोलमों (ढोल वजैता हे सखी पीये आयै मुज लैण, ढोल बजंता मैं चली पीये को बदलो दैण) गवाती थी। फिर रानियाँ धीरे-धीरे चिता की परिक्रमा करके घरवाड़ा सड़ों (घर के आकार में बने चिता) में जाकर बैठ जाती थी।[39]
चिता के ऊपर महाराज के पार्थिव शरीर को मखमल के गद्दे और तकिया लगाकर लिटाया जाता था। महाराज के सिर को रानी गोद (कई रानी होने पर उच्च वंश वाली रानी) में रखती थी, खवास, पासवान महिलाएँ सामने बैठती थी तथा दासी मोरछल से हवा करती थी। बाहर ढोल-नगाड़ों की तेज आवाज और गायणों के सोलमों गायन के बीच ब्राह्मण चिता को अग्नि देता था जिसके बीच रानी की चिल्लाहट दब कर रह जाती थी। दूसरा लकड़ियों और घास-फूस से घर की आकृति में बनी चिता के जलकर ऊपर गिरने से भी रानियों की मौत हो जाती होगी। वे इस शोर-शराबे के बीच महानता की मूरत मानी जाती थी।[40]
इस आलेख में डॉ. निशा भारद्वाज द्वारा जोधपुर राजपरिवार में सतीप्रथा के सम्बन्ध में जोधपुर राजवंश की राजनीति पर अनेक आरोप लगाए गए हैं, उनसे पूर्णतः सहमत नहीं हुआ जा सकता किंतु इस संभावना से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि मध्यकालीन हिन्दू राजवंशों एवं सामंती परिवारों में सती प्रथा का महिमा मण्डन करके जन-साधारण में राजपरिवार के प्रति आकर्षण को बनाए रखने की चेष्टा की जाती थी। जोधपुर राजपरिवार भी इस मोह से अछूता नहीं था अन्यथा महाराजा मानसिंह की चिता में रानियों के साथ-साथ डावड़ियों (दासियों), बंदर और मोर जैसे निरीह प्राणियों को नहीं जलाया जाता। हालांकि जोधपुर राजवंश के इतिहासकारों ने इन प्राणियों को स्वेच्छा से चिता में कूदने की बात कही गई है जिसे स्वीकार करना कठिन है।
ई. 1848में ईस्ट इण्डिया कम्पनी सरकार के संरक्षण में, ब्रिटिश पोलिटिकल अधिकारियों के दबाव के कारण जोधपुर राज्य (मारवाड़) में सती प्रथा पर रोक लगाई गई। यह प्रतिबंध जोधपुर के तत्कालीन महाराजा तख्त सिंह ने लागू किया था।
[1] डॉ. निशा भारद्वाज, राजस्थान के पूर्व जोधपुर राजघराने में सती प्रथा: एक विश्लेषण, वैचारिकी, मार्च-अप्रेल 2026, पृ. 79 से 85.
[2] मुहणौत नैन्सी, मारवाड़ परगना री विगत, भाग 1, संपा, नारायणसिंह भाटी, (जोधपुर: राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, 1968), पृष्ठ संख्या, 559-63।
[3] राठौड़ राव सीहा का सती स्मारक लेख, संपा. गोविन्दलाल श्रीमानी राजस्थान के अभिलेख, भाग1, पृष्ठ संख्या, 235-28।
[4] मुरारीदान री ख्यात, संपा, विक्रमसिंह भाटी, पृष्ठ, 54 और राठौड़ां री ख्यात, भाग1 संपा, हुकमसिंह भाटी, पृष्ठ, 52।
[5] डॉ. निशा भारद्वाज, राजस्थान के पूर्व जोधपुर राजघराने में सती प्रथा: एक विश्लेषण, वैचारिकी, मार्च-अप्रेल 2026, पृ. 79 से 85.
[6] राणीमंगा भाटों की बही, संपा, महेन्द्रसिंह नगर, पृष्ठ संख्या, 27-32, मुरारीदान री ख्यात, संपा, विक्रमसिंह भाटी, पृष्ठ संख्या, 73-95 और राठौड़ां री ख्यात, भाग 1. संपा, हुकमसिंह भाटी, पृष्ठ संख्या, 97-113। राव मालदेव से लेकर मोटा राजा उदयसिंह की रानियों ने भगवान श्री कृष्ण की चरण वंदना में जीवन समर्पित कर दिया था। इससे हम अंदाजा लगा सकते हैं कि, इन रानियों का जीवन कितना कठिन होगा। शाही महल और सुख-सुविधा त्यागना विवशता होती थी, न कि मनमर्जी।
[7] डॉ. निशा भारद्वाज, राजस्थान के पूर्व जोधपुर राजघराने में सती प्रथा: एक विश्लेषण, वैचारिकी, मार्च-अप्रेल 2026, पृ. 79 से 85.
[8] डॉ. निशा भारद्वाज, राजस्थान के पूर्व जोधपुर राजघराने में सती प्रथा: एक विश्लेषण, वैचारिकी, मार्च-अप्रेल 2026, पृ. 79 से 85.
[9] बाँकीदास री ख्यात, संपा, जिनविजय मुनि, पृष्ठ, 18, राठौड़ां री ख्यात भाग 1. संपा. हुकमसिंह भाटी, पृष्ठ संख्या 101-02 और मूंदियाड़ री ख्यात संपा, विक्रमसिंह भाटी, पृष्ठ, 46। राव चन्द्रसेन द्वारा राठौड़ जैतमाल जैसावत या चांपावत की विनती अस्वीकार कर चाकर की हत्या कर दी गई थी। जिसके कारण जैतमाल ने कंवर राम और उदयसिंह को पत्र लिखकर राव चन्द्रसेन से राज्य हस्तगत करने को कहा था। इस प्रकार जोधपुर में भाइयों के बीच राज्याधिकार को लेकर गृहयुद्ध आरम्भ हुआ था।
[10] डॉ. निशा भारद्वाज, राजस्थान के पूर्व जोधपुर राजघराने में सती प्रथा: एक विश्लेषण, वैचारिकी, मार्च-अप्रेल 2026, पृ. 79 से 85.
[11] राणीमंगा भाटों की बही, संपा, महेन्द्रसिंह नगर, पृष्ठ 24 और मूंदियाड़ री ख्यात संपा, विक्रमसिंह भाटी, पृष्ठ 47. कंवर राम माता की आधी जलती चिता छोड़कर राज्य पर अधिकार जमाने के लिए चल दिया था। इसलिए रानी ने सौत-पुत्र के पक्ष में पति का घर न त्यागने की बात कही थी। कंवर माता के क्षमा मांगने पर ठिकाना मिल जाने की बात कही थी।
[12] डॉ. निशा भारद्वाज, राजस्थान के पूर्व जोधपुर राजघराने में सती प्रथा: एक विश्लेषण, वैचारिकी, मार्च-अप्रेल 2026, पृ. 79 से 85.
[13] डॉ. निशा भारद्वाज, राजस्थान के पूर्व जोधपुर राजघराने में सती प्रथा: एक विश्लेषण, वैचारिकी, मार्च-अप्रेल 2026, पृ. 79 से 85.
[14] मुरारीदान री ख्यात संपा विक्रमसिंह भाटी, पृष्ठ 109, राणीमंगा भाटों की बही संपा, महेन्द्रसिंह नगर, पृष्ठ 43. मूंदियाड़ री ख्यात संपा, विक्रमसिंह भाटी, पृष्ठ संख्या, 86-87 और राठौड़ां री ख्यात भाग 1 संपा, हुकमसिंह भाटी, पृष्ठ संख्या, 197-98. पंचोली ब्लू ने महाराज के मृत्यु-दुख में रिहा होने से मना कर दिया था। महाराजा जसवंतसिंह ने दिल्ली में ताजपोशी के समय पंचोली बलु को बुलाकर मुल्क बंदोबस्त का काम सौंपा था।
[15] मूंदियाड़ री ख्यात संपा, विक्रमसिंह भाटी, पृष्ठ, 253 और राठौड़ां री ख्यात, भाग II संपा, हुकमसिंह भाटी, पृष्ठ, 522. सती होते समय राठौड़ राजवंश कैद में पड़े उमरावों और सरदारों को रिहा करवाकर अपनी छवि को चमकाती थी।
[16] राजरूपक संपा, रामकर्ण, (काशी: नागरी प्रचारिणी सभा, 1941), पृष्ठ, 49 और राठौड़ां री ख्यात भाग II संपा, हुकमसिंह भाटी, पृष्ठ, 485. महाराजा अजीतसिंह की रानियों ने सती होते समय खूब दान-पुण्य किया था। महाराजा अभयसिंह की सती रानियों ने 3000 रुपया खैरात में बांटा था।
[17] महाराजा अभयसिंह री ख्यात, ग्रन्थांक 15659, पत्र संख्या, 310-11 और मारवाड़ री ख्यात, संपा, हुकमसिंह भाटी, पृष्ठ, 2।
[18] डॉ. निशा भारद्वाज, राजस्थान के पूर्व जोधपुर राजघराने में सती प्रथा: एक विश्लेषण, वैचारिकी, मार्च-अप्रेल 2026, पृ. 79 से 85.
[19] महाराजा श्री विजयसिंह री ख्यात, संपा, ब्रजेश कुमार सिंह, पृष्ठ, 94 और राठौड़ां री ख्यात, भाग III, संपा, हुकमसिंह भाटी, पृष्ठ, 599-600, भंगी और मंदिर ने कंवर की रखेलों के गहने दान-पुण्य और धर्म-कर्म के नाम पर स्वीकार करने से मना कर दिया था।
[20] मारवाड़ री ख्यात, संपा, हुकमसिंह भाटी, पृष्ठ, 165।
[21] डॉ. निशा भारद्वाज, राजस्थान के पूर्व जोधपुर राजघराने में सती प्रथा: एक विश्लेषण, वैचारिकी, मार्च-अप्रेल 2026, पृ. 79 से 85.
[22] जोधपुर हुकूमत री बही, संपा, सतीशचंद्र, रघुबीरसिंह और जी.डी. शर्मा, पृष्ठ संख्या, 76 और राणीमंगा भाटों की बही, संपा, महेन्द्रसिंह नगर, पृष्ठ, 48. जलती चिता में कूदने पर मृत्यु प्राप्त पूरबिया कल्याण की महाराज संग अलग चिता सजाई गई थी।
[23] राठौड़ां री ख्यात, भाग II, संपा, हुकमसिंह भाटी, पृष्ठ संख्या, 424-25।
[24] मारवाड़ री ख्यात, संपा, हुकमसिंह भाटी, पृष्ठ संख्या, 5-165 और राठौड़ां री ख्यात, भाग I, II, III संपा, हुकमसिंह भाटी, पृष्ठ संख्या, 128-688. रानियों की वडारन और दासियाँ खालसा होने और निर्वासित जीवन दंश से बचने के लिए रानी संग सती हो जाती थी, क्योंकि ये रानी संग उनके पीहर से आती थी। रानी का संरक्षण समाप्त और वास्तविक जीवन परिस्थिति प्रकट हो जाती थी।
[25] डॉ. निशा भारद्वाज, राजस्थान के पूर्व जोधपुर राजघराने में सती प्रथा: एक विश्लेषण, वैचारिकी, मार्च-अप्रेल 2026, पृ. 79 से 85.
[26] जोधपुर हुकूमत री बही संपा, सतीशचंद्र, रघुबीरसिंह और जी.डी. शर्मा, पृष्ठ संख्या, 94-98।
[27] कविराज श्यामलदास, वीर-विनोद, भाग II, पृष्ठ संख्या, 824-25 और मारवाड़ री ख्यात, संपा. हुकमसिंह भाटी, पृष्ठ, 7. महाराजा जसवंतसिंह ने हाड़ी रानी के व्यवहार से दुखी होकर हाड़ाओं से विवाह संबंध समाप्त किए थे। हाड़ी रानी ने विधवा रूप में पीहर में रहकर प्राण त्यागे थे।
[28] फ्रांसिको बर्नियर, ट्रेवल इन द मुगल एम्पायर ए. डी. 1656-68. अनु, विन्सेंठ स्मिथ, पृष्ठ संख्या, 40-1 और महाकवि श्यामलदास, वीर-विनोद भाग III पृष्ठ 824।
[29] डॉ. निशा भारद्वाज, राजस्थान के पूर्व जोधपुर राजघराने में सती प्रथा: एक विश्लेषण, वैचारिकी, मार्च-अप्रेल 2026, पृ. 79 से 85.
[30] जोधपुर हुकूमत री बही, संपा, सतीशचंद्र, रघुबीरसिंह और जी.डी. शर्मा, पृष्ठ, 76. राठौड़ सरदार रणछोड़दास गोयन्दास, संग्रामसिंह, चांपावत सूरजमल, कुंपावत नाहरखान, ऊदावत राजसिंह, जैतावत प्रतापसिंह, चांपावत उदयसिंह, करणोत दुरगदास आदि ने दोनों रानियों को पुत्र होने तक रुकने को कहा था। रानी के हठ को देखकर सरदारों ने कहा, जीव हत्या के दोष में पहले हम 10 राजपूत जलेंगे।
[31] डॉ. निशा भारद्वाज, राजस्थान के पूर्व जोधपुर राजघराने में सती प्रथा: एक विश्लेषण, वैचारिकी, मार्च-अप्रेल 2026, पृ. 79 से 85.
[32] राजरूपक, संपा, रामकर्ण, पृष्ठ संख्या, 48-49. सवाई जयसिंह ने कंवर अभयसिंह को भड़काकर सत्ता लोभ देकर महाराज की बख्तसिंह के हाथों हत्या करवा दी थी। चौहान रानी को सरदारों ने महाराज अभयसिंह की राजमाता कहकर सती होने से रोका था।
[33] मारवाड़ री ख्यात संपा, हुकमसिंह भाटी, पृष्ठ, 165। राणीमंगा भाटों की बही, संपा, महेन्द्रसिंह नगर, पृष्ठ संख्या, 66 और मारवाड़ री ख्यात, संपा, हुकमसिंह भाटी, पृष्ठ, 65।
[34] मारवाड़ री ख्यात, संपा, हुकमसिंह भाटी, पृष्ठ, 14।
[35] डॉ. निशा भारद्वाज, राजस्थान के पूर्व जोधपुर राजघराने में सती प्रथा: एक विश्लेषण, वैचारिकी, मार्च-अप्रेल 2026, पृ. 79 से 85.
[36] हकीकत खाता बही, वि.स. 1821-1930, बही नं: 2, पत्र संख्या, 105. बाई के सती होने पर 933 रुपये रोकड़, 218 टका, 125 गायें, 1000 मण धान, 500 मण बाजरा नागौर का, 500 मण गेहूं जैतारण के दान किए गए थे।
[37] मारवाड़ री ख्यात, संपा, हुकमसिंह भाटी, पृष्ठ संख्या, 8-9 और मुहणौत नैन्सी, मारवाड़ परगना री विगत, भाग1, पृष्ठ, 563। जोधपुर गढ़ में हरकाबाई सती नाम का मंदिर भी है। मारवाड़ी जनसमाज और राठौड़ राजवंश विवाह, मृत्यु और त्योहार समय इनकी पूजा अर्चना करके चढ़ावा अर्पित करते हैं।
[38] राजरूपक, संपा, रामकर्ण, पृष्ठ. 49, राणीमंगा भाटों की बही, संपा, महेन्द्रसिंह नगर, पृष्ठ, 72, हकीकत खाता बही, वि.स. 1821-1930, बही नं: 2. पत्र संख्या, 105 और मारवाड़ री ख्यात, संपा, हुकमसिंह भाटी, पृष्ठ, 165. महाराजा मानसिंह के पीछे एकमात्र देवड़ी रानी अजनकंवर सती हुई थी। देवड़ी रानी की प्रशंसा में चारणों ने गीत गाया था। दुले पतीव्रत देवड़ी रंग सती रिझवार। मुजरो कियो मानू सू लीदा दासीला।।
[39] महाराजा तख्तसिंह री ख्यात पृष्ठ 2. सती रानियों में से पदानुक्रम अनुसार रानी को महाराज का सिर गोद में रखने का अधिकार होता था। पटरानी और मर्जीदान रानी के सती होने पर यह हक इनका होता था अर्थात पटरानी सती नहीं होती तो मर्जीदान रानी को, मर्जीदान रानी के भी सती न होने पर पीहर राजवंश के दर्जे के अनुसार रानी को स्वर्गवासी पति के सिर को गोद में रखने का अधिकार मिलता था।
[40] डॉ. निशा भारद्वाज, राजस्थान के पूर्व जोधपुर राजघराने में सती प्रथा: एक विश्लेषण, वैचारिकी, मार्च-अप्रेल 2026, पृ. 79 से 85.



