जोधपुरा उत्खनन: स्तर विन्यास और मृदभांड अनुक्रम

यह आलेख राजस्थान सरकार के पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग द्वारा जयपुर जिले के जोधपुरा नामक पुरास्थल पर किए गए उत्खनन के निष्कर्षों और उनके ऐतिहासिक महत्व का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत करता है।

जोधपुरा के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संदर्भ

  • जोधपुरा पुरास्थल ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके समीपवर्ती क्षेत्रों, विशेषकर भब्रू और विराटनगर में अशोक के शिलालेख प्राप्त हुए हैं।
  • टीले के नामकरण ‘घड़तुल घाट’ के पीछे एक स्थानीय जनश्रुति जुड़ी है:
  • लगभग दो सौ वर्ष पूर्व, घड़तुल दास नामक एक स्थानीय संत ने इस टीले पर कठिन तपस्या की थी।
  • उन्हीं के नाम पर इस स्थल को स्थानीय स्तर पर ‘घड़तुल घाट’ के रूप में पहचान मिली।
  • जोधपुरा की पुरातात्विक विशिष्टता इस तथ्य में निहित है कि भारत में यह संभवतः एकमात्र ऐसा स्थल है जहाँ गेरुवर्णी मृदभांड (O.C.P.) के स्तर किसी भी प्रकार के जलप्रलय (deluge) या प्राकृतिक आपदा से पूर्णतः अप्रभावित पाए गए हैं।

1. परिचय और भौगोलिक स्थिति

जोधपुरा (27° 31′ उत्तरी अक्षांश और 76° 5′ पूर्वी देशांतर) राजस्थान के जयपुर जिले की कोटपूतली तहसील में स्थित एक अत्यंत महत्वपूर्ण पुरातात्विक टीला है। यह स्थल जयपुर-दिल्ली राजमार्ग पर जयपुर से लगभग 98 किमी की दूरी पर साबी नदी के दाहिने तट पर स्थित है। भौगोलिक और ऐतिहासिक दृष्टि से यह क्षेत्र प्राचीन ‘मत्स्य देश’ का अभिन्न अंग रहा है।

2. उत्खनन के उद्देश्य और कार्यप्रणाली

उत्खनन का प्राथमिक उद्देश्य चित्रित धूसर मृदभांड (P.G.W.) और कृष्ण-लोहित मृदभांड (Black and Red Ware) की सटीक स्तरिक स्थिति (Stratigraphical position) का निर्धारण करना तथा उनसे पूर्ववर्ती मृदभांड संस्कृतियों के साथ उनके अंतर्संबंधों का अन्वेषण करना था।

शोध की प्रविधि के अंतर्गत, टीले के पश्चिमी भाग में तीन विशिष्ट खाइयों का उत्खनन किया गया। इनमें खाई ‘A’ (10 मीटर x 5 मीटर), खाई ‘B’ (5 मीटर x 5 मीटर) और खाई ‘C’ (5 मीटर x 5 मीटर) सम्मिलित थीं।

इन उत्खननों के माध्यम से आद्य-ऐतिहासिक काल (Protohistorical period) से लेकर शुंग-कुषाण काल के अवसान तक के पाँच स्पष्ट सांस्कृतिक कालखंडों का विन्यास उद्घाटित हुआ है।

3. सांस्कृतिक कालक्रम का विस्तृत विवरण

3.1 प्रथम काल (Period I): गेरुवर्णी मृदभांड (O.C.P.) संस्कृति

जोधपुरा का प्रथम सांस्कृतिक काल ‘जोधपुरा गेरुवर्णी मृदभांड’ संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है। राजस्थान के अर्ध-रेगिस्तानी क्षेत्र में इस संस्कृति की खोज भारतीय पुरातत्व के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी साक्ष्य है।

द्वितीय सहस्राब्दी ईसा पूर्व की यह संस्कृति यहाँ 1.05 मीटर से 1.30 मीटर की मोटाई वाले जमाव में प्राप्त हुई है। इस स्तर का मृदा विन्यास कंकड़ मिश्रित पीली-भूरी मिट्टी से निर्मित है, जो पूर्णतः जल-प्रभाव से मुक्त है।

वर्ष 1973 में लगभग 60 वर्ग मीटर के क्षेत्र में इस उद्योग का अनावरण किया गया।

  • मृदभांड प्रारूप एवं वर्गीकरण:  यहाँ के मृदभांड चाक-निर्मित हैं और इनका वर्ण नारंगी से लेकर गहरा लाल है। गंगा घाटी के अन्य स्थलों के विपरीत, यहाँ के बर्तनों में घिसे हुए किनारे या चूर्णिल सतह (powdery surface) जैसे लक्षण दुर्लभ हैं, क्योंकि यहाँ के मृदभांड अबाधित स्तरों (undisturbed layers) से प्राप्त हुए हैं। मुख्य आकारों में कटोरे, फूलदान (vases), घुंडीदार ढक्कन, हत्थे वाले बर्तन और विशेष रूप से ‘डिश-ऑन-स्टैंड’ (dish-on-stand) सम्मिलित हैं।
  • अंकन एवं अलंकरण:  बर्तनों पर त्रिकोणीय खांचे, समानांतर रेखाओं के मध्य उत्कीर्णन, लहरदार रेखाएं और ‘चेक डिजाइन’ उत्कीर्ण हैं। कतिपय मृदभांड खंडों पर नीले रंग के समानांतर बैंडों का धुंधला अंकन भी देखा गया है।
  • वैज्ञानिक विश्लेषण:  इन स्तरों से रासायनिक परीक्षण और तिथि निर्धारण हेतु चारकोल के नमूने एकत्रित किए गए हैं।
  • प्रथम काल (O.C.P.) से प्राप्त पुरावशेष : धात्विक अवशेष, आकारहीन तांबे के टुकड़े, मृण्मय कलाकृतियाँ, टेराकोटा केक (O.C.P. शैली), प्रसाधन/आभूषण, टेराकोटा मनके और पत्थर के मनके, अस्थि उपकरण | अस्थि शूक (Bone spikes) |

3.2 द्वितीय काल (Period II): अचित्रित कृष्ण-लोहित मृदभांड (Black and Red Ware)

यह काल ओ.सी.पी. और पी.जी.डब्ल्यू. स्तरों के मध्य एक सुस्पष्ट संक्रमणकालीन चरण को परिलक्षित करता है। यहाँ प्राप्त कृष्ण-लोहित मृदभांड मुख्यतः थालियों और कटोरों के रूप में हैं।

  • तुलनात्मक विश्लेषण:  यहाँ के मृदभांड भरतपुर के समीप ‘नोह’ से साम्यता रखते हैं, किंतु उदयपुर की ताम्रपाषाणिक ‘आहड़’ संस्कृति से पूर्णतः भिन्न हैं। एक महत्वपूर्ण विभेदक तथ्य यह है कि नोह में कृष्ण-लोहित मृदभांडों पर जो उत्कीर्ण अलंकरण (incised decorations) प्रचुर मात्रा में मिलते हैं, वे जोधपुरा में अनुपस्थित हैं।
  • सह-मृदभांड:  इस काल में अपरिष्कृत लाल मृदभांड (Coarse Red Ware) और कृष्ण-लेपित मृदभांड (Black slipped Ware) भी सह-अस्तित्व में थे। यहाँ से प्राप्त मिट्टी के गारे के फर्श (mud lumps floor) तत्कालीन आवास विन्यास पर महत्वपूर्ण प्रकाश डालते हैं।

3.3 तृतीय काल (Period III): चित्रित धूसर मृदभांड (Painted Grey Ware – P.G.W.)

यह काल धूसर मृदभांडों की उपस्थिति द्वारा विशिष्ट है, जिन पर आंतरिक और बाह्य दोनों सतहों पर विविध चित्रांकन मिलते हैं। यह स्तर अपने प्रारूप और विन्यास में हस्तिनापुर (II) और नोह (III) के समतुल्य है।

  • विशिष्टता:  जोधपुरा की एक उल्लेखनीय विशेषता यह है कि इस काल में भी कृष्ण-लोहित मृदभांड एक प्रमुख उद्योग के रूप में निरंतर सक्रिय रहा।
  • पुरावशेष:  इस स्तर से लौह उपकरण, टेराकोटा के ‘घट’ के आकार के मनके, अस्थि शूक (bone spikes), अस्थि सॉकेट और पाषाण मनके प्राप्त हुए हैं।

3.4 चतुर्थ काल (Period IV): उत्तरी कृष्ण मार्जित मृदभांड (N.B.P.W.)

यह काल एन.बी.पी. मृदभांडों और बिना लेप वाले लाल मृदभांडों (कटोरे और जार) द्वारा पहचाना जाता है। यहाँ से प्राप्त महत्वपूर्ण पुरावशेषों में लौह बाणाग्र (arrowheads), लौह कीलें, शंख की चूड़ियों के खंड, हाथ से निर्मित कूबड़ वाले बैल की टेराकोटा मूर्ति और पत्थर के मनके शामिल हैं।

3.5 पंचम काल (Period V): शुंग-कुषाण काल

यह काल शुंग और कुषाण कालीन मृदभांड परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है। यहाँ के मृदभांड चाक-निर्मित, लाल वर्ण के और मध्यम से महीन गठन (fabric) वाले हैं, जिन पर लेप (slip) या वॉश का प्रयोग किया गया है।

  • आकार एवं प्रतीक:  मुख्य आकारों में कटोरे, ढक्कन-सह-कटोरे और ‘लघु प्रणाल युक्त अधरोष्ठी कटोरे’ (lipped bowls with small spouted channels) विशिष्ट हैं। कतिपय पात्रों पर ‘त्रिरत्न’ और ‘स्वास्तिक’ जैसे धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतीकों का अंकन मिलता है।
  • प्राप्त सामग्री:  इस काल से तांबे का सिक्का, लौह उपकरण, और टेराकोटा के घट-आकार के मनके प्राप्त हुए हैं।

4. जोधपुरा उत्खनन का महत्व और निष्कर्ष

जोधपुरा का उत्खनन भारतीय पुरातत्व के स्तरविन्यास संबंधी कतिपय जटिल प्रश्नों के समाधान हेतु अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस स्थल की सबसे बड़ी उपलब्धि ओ.सी.पी. संस्कृति का एक ऐसा निक्षेप प्राप्त करना है जो गंगा घाटी के विपरीत जलोढ़ क्रियाओं से मुक्त और यथावत स्थिति में है।

यद्यपि टीले की ऊपरी सतह मानवीय या प्राकृतिक कारणों से विक्षुब्ध (disturbed) है, जहाँ 1.60 मीटर से 2.55 मीटर की गहराई तक ह्यूमस गर्त (humus pits) विद्यमान हैं, तथापि यहाँ से प्राप्त सामग्री सांस्कृतिक अनुक्रम के पुनर्निर्माण के लिए अमूल्य निधि है। यह स्थल राजस्थान के अर्ध-शुष्क अंचल में प्राचीन सभ्यताओं के क्रमिक विकास का एक सुसंगत और प्रामाणिक आलेख प्रस्तुत करता है।

डॉ. मोहनलाल गुप्ता

Dr. Mohanlal Gupta
Dr. Mohanlal Guptahttps://rajasthanhistory.com
डॉ. मोहनलाल गुप्ता राजस्थान के जाने-माने इतिहासकार एवं लेखक हैं। उनकी सौ से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं तथा पत्र-पत्रिकाओं में हजारों आलेख प्रकाशित हुए हैं।

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