Tuesday, March 5, 2024
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2. मदमत्त मरहठे

1526 इस्वी के बाद दिल्ली की जिन गलियों में मुगलों के रौब-दाब और शानोशौकत के डंके बजते थे और जिनकी धूम दक्खिन में भी पूरी बुलंदी के साथ सुनी जाती थी, उन डंकों की आवाजें 1680 ईस्वी के पश्चात् धीमी पड़नी लगी थीं। छत्रपति शिवाजी तथा मेवाड़ के महाराणा राजसिंह के हाथों बुरी तरह से पिटे हुए, बददिमाग, बूढ़े और अशक्त औरंगजेब ने मराठों को दिल्ली की तरफ बढ़ने से रोकने के लिये मारवाड़ के राजा जसवंतसिंह, ढूंढाड़ के राजा सवाई जयसिंह और बीकाणा के राजा कर्णसिंह को मराठों के विरुद्ध झौंका। इस प्रकार मराठा शक्ति के साथ राजपूत शासकों का पहला परिचय मुगल सेनापतियों की हैसियत से युद्ध के मैदानों में हुआ।

इन राजपूत राजाओं ने अपने लाखों सिपाही युद्ध के मैदानों में कटवा डाले फिर भी वे, मराठों की टिड्डी सेनाओं को दिल्ली की ओर बढ़ने से नहीं रोक सके। 1706 ईस्वी में मराठों ने दक्षिणी गुजरात में पहली बार मुगल सेना को परास्त किया। इस प्रकार औरंगजेब ने अपने जीवन के आखिरी सालों में अपनी आँखों से मराठों को दिल्ली की ओर लपकते हुए देखा।

अठारहवीं सदी के आरंभ में छत्रपति के स्थान पर पेशवा का प्रभुत्व बढ़ना आरंभ हुआ और उसके द्वारा नियुक्त सिन्धिया, होलकर, गायकवाड़ तथा भौंसले सरदार, मुगलों के पराभव से उत्पन्न हुई रिक्तता को भरने के लिये आगे आये किंतु उनकी इन आकांक्षाओं को पूरा करने में राजपूताना की मारवाड़, बीकाणा, ढूंढाड़ और कोटा रियासतें अब भी आड़े आ रही थीं।

1711 ईस्वी में मराठे प्रथम बार मेवाड़ में प्रविष्ठ हुए। मराठों के वेग को रोकने के लिये 1713 ईस्वी में मुगल बादशाह फर्रुखसीयर ने जयपुर के शासक सवाई जयसिंह को गुजरात का सूबेदार बनाया किंतु जब महाराजा जयसिंह मराठों के समक्ष असफल हो गया तब फर्रुखसीयर ने जोधपुर के शासक अजीतसिंह को गुजरात की सूबेदारी सौंपी। महाराजा अजीतसिंह के लिये भी यह संभव नहीं था कि वे मराठों को आगे बढ़ने से रोक सकें। मराठे और भी तेज गति से आगे बढ़ने लगे। मुगल बादशाह मुहम्मदशाह ने जोधपुर के अगले शासक महाराजा अभयसिंह को गुजरात की सूबेदारी सौंपी ताकि वे मराठों को गुजरात में ही रोक सकें किंतु अपने पिता अजीतसिंह की ही तरह महाराजा अभयसिंह को भी इस कार्य में कोई सफलता नहीं मिली और मराठे आगे बढ़ते ही चले गये।

1735 इस्वी में राजपूताने की समस्त बड़ी रियासतों ने पेशवा को चौथ देना स्वीकार कर लिया। इनमें जोधपुर रियासत भी सम्मिलित थी। यही वह समय था जब राजपूताना की रियासतों में पेशवा के प्रतिनिधि स्थाई रूप से रहने लगे थे और रियासत की गतिविधियों की राई-रत्ती और तिल-तिल की सूचना मराठों तक पहुँचाने लगे थे। इसके बाद के पच्चीस सालों में मराठे लगातार दिल्ली की ओर बढ़ते रहे और मुगल सत्ता शनैः-शनैः अस्ताचल की ओर लुढ़कती रही।

1739 ईस्वी में जब नादिरशाह ने भारत पर आक्रमण किया तो मुगलों की दुर्दशा की कलई पूरे देश के समक्ष खुल गई। मराठों ने इसे उचित समय समझकर दिल्ली को और तेज झटके दिये जिससे विवश होकर बादशाह ने दक्खिन के छः प्रांतों की चौथ वसूली के अधिकार मराठों को दे दिये।

1761 ईस्वी में अहमदशाह अब्दाली ने हिन्दुस्थान की भूमि पर खून की होली खेली। इस समय तक मुगल साम्राज्य की इतनी दुर्दशा हो चुकी थी कि बादशाह आलमगीर, अहमदशाह अब्दाली के विरुद्ध छोटी-मोटी सेना भी नहीं भेज सका। इसलिये मराठों ने उसकी ओर से पानीपत के मैदान में मोर्चा संभाला। मराठे अब्दाली की सेनाओं को गाजर मूली समझते थे, इसलिये वे युद्ध के मैदान में अपनी पत्नियों, रखैलों और दासियों को लेकर पहुँचे। युद्ध क्षेत्र में उतरने से पहले उन्होंने पुष्कर और प्रयाग में डुबकियां लगाईं और काशी में विश्वनाथ के दर्शन किये। वे बड़ी ही लापरवाही से पानीपत के मैदान में उतरे। अहमदशाह अब्दाली ने एक लाख मदमत्त मरहठों को बड़ी बेरहमी से मौत के घाट उतारा। पूरा भारत विधवा मराठनों के करुण क्रंदन से गूंज उठा। इसके बाद विजय मद में चूर अब्दाली ने हाथी पर बैठकर दिल्ली में प्रवेश किया।

अब्दाली ने आलमगीर की बादशाहत को लालकिले की एक साधारण कोठरी तक सीमित कर दिया। उससे तख्ते ताउस छीनकर, लकड़ी का एक साधारण पाट पकड़ा दिया। अब्दाली तथा उसके सैनिकों ने बादशाह आलमगीर की औरतों और बेटियों को लाल किले के महलों में नंगी करके दौड़ाया और उनके साथ दिन दहाड़े बलात्कार किये। निकम्मा आलमगीर, अब्दाली के विरुद्ध कुछ नहीं कर सका। जब अब्दाली लाल किले का पूरा गर्व धूल में मिलाकर अपने वतन को लौट गया तब मुगल शाहजादियां पेट की भूख मिटाने के लिये दिल्ली की गलियों में मारी-मारी फिरने लगीं। वेतन नहीं मिलने के कारण मुगल सिपाहियों और लाल किले के नौकरों ने दिल्ली की गलियों में फिरने वाली कुतियाओं के नाम मुगल शहजादियों के नाम पर रख दिये जिन्हें वे सरे आम लातें मारकर गंदी गालियाँ दिया करते थे।

पानीपत के मैदान में एक लाख मराठों को काट डालने के पश्चात् उत्तर भारत में यह आशा जगी थी कि अब मराठों के आतंक से मुक्ति मिल जायेगी किंतु यह आशा शीघ्र ही निराशा में बदल गई जब राजपूत राजा आपस में ही एक दूसरे को नीचा दिखाने और उनके इलाके छीनने में व्यस्त रहे और मराठे, शीघ्र ही टिड्डी दलों की भाँति उत्तर भारत के मैदानों में लौट आये। वे पहले की ही तरह राजपूत राज्यों से बलपूर्वक चौथ वसूलने लगे।

आरंभ में तो सिन्धिया, होलकर और पेशवा, राजपूताने की रियासतों में चौथ वसूली करने तक सीमित रहे किंतु वे इतने बड़े लुटेरे और धन के इतने बड़े लालची थे कि शीघ्र ही चौथ की राशि प्राप्त करने की सीमित इच्छा के दायरे से बाहर निकलकर, राजपूत रियासतों के साथ विवेकहीन अनुबंध करके उनके माध्यम से अपरिमित धन ऐंठने लगे। उन्होंने राजपूताना रियासतों में चल रही अन्तर्कलहों से लाभ उठाने का कोई भी अवसर हाथ से नहीं जाने दिया।

मराठों के उत्तर भारत में सक्रिय होने से पहले राजपूताना की रियासतों में परम्परागत सामंतों का ही शासन में वर्चस्व था किंतु मराठों ने उत्तर भारत में नौकरशाही की व्यवस्था को नया स्वरूप दिया। उनके वकील प्रत्येक रियासत में नियुक्त रहते थे जो सामान्यतः कुलीन ब्राह्मण वर्ग से होते थे। इन वकीलों की नियुक्ति के बदले राजपूताना की रियासतों को भी मराठा सरदारों के पास अपने वकील रखने पड़ते थे जो मराठा सरदारों के सम्पर्क में रहकर अपनी रियासत के हितों का संरक्षण करते थे।

मराठा सरदार सिन्धिया और होलकर कभी एक स्थान पर नहीं टिकते थे, वे आजीवन युद्ध के मैदानों में अपनी सेनाएं लेकर भटकते रहते थे। इस कारण देसी रियासतों के वकीलों को भी उनकी सेनाओं के साथ फिरते रहना होता था। मराठों की इस रीति-नीति के कारण सामंतों की सहायता के लिये बड़ी संख्या में विश्वस्त राजकीय कर्मचारियों की आवश्कता होती थी जिससे नौकरशाही का बड़े स्तर पर प्रसार हुआ।

मारवाड़ रियासत में भी सामंतशाही के साथ-साथ नौकरशाही, काफी मजबूत हो गई। ये लोग मुत्सद्दी तथा मुसाहिब कहलाते थे। ये भी सामंतों के समान, राजा के साथ बैठकर भोजन करते थे। अंतर केवल इतना था कि राजा के सामंत, राजा के समान असली हड्डियाँ चबाते थे जबकि मुत्सद्दी, शाकाहारी ओसवाल महाजन होने से चांदी की हड्डियाँ दाल में डलवाते थे और जब राजा असली हड्डी चूसता था तब ये मुत्सद्दी, चांदी की नकली हड्डियाँ मुँह में लेकर राजा के प्रति स्वामीभक्ति और आदर प्रकट करते थे।

राज्य के सामंत प्रायः अपनी जागीर में रहते थे तथा युद्ध के समय राजा के द्वारा बुलाये जाने पर अथवा अवसर विशेष पर परम्पराओं के निर्वहन के लिये राजदरबार में उपस्थित होते थे, जबकि मुत्सद्दी और मुसाहिब हर समय राजा के निकट बने रहते थे। इस कारण सामंतों के स्थान पर वे राजा के अधिक निकट हो गये थे। यही कारण था कि राज्य का मुत्सद्दी वर्ग, परम्परागत सामंतों के विरुद्ध खुलकर मोर्चा लेने लगा था। यहाँ तक कि राज्य के उत्तराधिकार के प्रश्न को भी प्रायः यही मुत्सद्दी वर्ग हल करता था।

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