हिन्दी साहित्य में हम्मीर रासो नाम से तीन अलग-अलग रचनाएँ मिलती हैं, जिनके रचयिता, भाषा और काल भिन्न-भिन्न हैं।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
13वीं शताब्दी के अंत में दिल्ली सल्तनत का विस्तार हो रहा था। अलाउद्दीन खिलजी ने 1299 ई. में रणथंभौर पर आक्रमण किया, जो चौहानों का अभेद्य किला था। हम्मीर, पृथ्वीराज चौहान के वंशज, ने स्वतंत्रता की रक्षा हेतु प्राणपण संघर्ष किया। हम्मीर रासो के अनुसार, हम्मीर ने 36 वर्ष की आयु में खिलजी की विशाल सेना का सामना किया। कथा में हम्मीर की रानी वीरमती, पुत्र बिमदेव और अन्य योद्धाओं के बलिदान का वर्णन है। ऐतिहासिक रूप से यह युद्ध 1301 ई. में समाप्त हुआ, जब हम्मीर ने जौहर कराया और स्वयं वीरगति प्राप्त की। रासो ऐतिहासिक तथ्यों को काव्यात्मक रूप देती है, जिसमें अतिशयोक्ति है, किंतु मूल घटनाएं प्रमाणिक हैं।
साहित्यिक परिप्रेक्ष्य
- रासो काव्य परम्परा : रासो काव्य लेखन परम्परा हिन्दी साहित्य के आदिकाल अर्थात् वीरगाथा काल में उत्पन्न हुई और पृथ्वीराज रासो से प्रारम्भ मानी जाती है।
- हम्मीर रासो का नायक : रणथम्भौर के राणा हम्मीरदेव हम्मीरदेव (1283-1301 ई.), जो पृथ्वीराज चौहान के वंशज थे। उन्होंने दिल्ली के सुलतान अलाउद्दीन खिलजी से कई बार युद्ध किया और अन्ततः वीरगति प्राप्त की।
- कथानक: यह ग्रंथ मुख्य रूप से हम्मीर देव और दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के बीच हुए युद्ध (1301 ईस्वी) पर आधारित है।
- विशेषता : इन रचनाओं में रणथंभौर के शासक राव हम्मीर देव के पराक्रम का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन मिलता है, जो उस समय के वीरगाथा साहित्य की शैली थी- “सिंह सवन सत्पुरुष वचन, कदली फलै इक बार। तिरिया तेल हम्मीर हठ, चढ़ै न दूजी बार॥”
हम्मीर रासो नाम से मिलने वाले ग्रंथ
रामचन्द्र शुक्ल ने ‘हिन्दी साहित्य का अतीत’ में लिखा है कि ‘हम्मीर रासो’ नाम के कम से कम तीन काव्य मिलते हैं। इनके रचयिता, भाषा और काल अलग-अलग हैं। ये रणथंभौर के प्रसिद्ध चौहान शासक राणा हम्मीरदेव (हम्मीर) के चरित्र पर आधारित वीरगाथा काव्य हैं। ये तीनों रचनाएँ वीरगाथा परम्परा की अमूल्य धरोहर हैं और राणा हम्मीरदेव के शौर्य को साहित्यिक रूप में अमर करती हैं।
1. शारंगधर (या सारंगधर) कृत हम्मीर रासो (14वीं शताब्दी)
यह सबसे प्राचीन और मूल रचना मानी जाती है (लगभग 14वीं शताब्दी के आसपास), अपभ्रंश या प्रारंभिक राजस्थानी/हिन्दी में। इसकी मूल प्रति उपलब्ध नहीं है, पर ‘प्राकृत पैंगलम’ (एक व्याकरण ग्रंथ) में इसके कुछ छन्द उद्धृत हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसी आधार पर शार्ङ्गधर को ‘हम्मीर रासो’ का रचयिता माना है।
2. महेश कवि कृत हम्मीर रासो
यह शारंगधर के बाद की रचना है। इसमें लगभग 300 छन्द हैं, और रणथंभौर के राणा हम्मीर का चरित्र वर्णन है। यह जोधराज की रचना से पहले की है।
3. जोधराज कृत हम्मीर रासो (18वीं शताब्दी)
यह सबसे बाद की और सबसे प्रसिद्ध उपलब्ध रचना है । जोधराज ने इसकी रचना संवत् 1785 (1728 ईस्वी) के आसपास नीमराना के राजा चंद्रभान के संरक्षण में की थी। यह बड़ा प्रबन्ध काव्य है, इसमें लगभग 700 छन्द हैं। छप्पय छन्द में रचित, और श्यामसुन्दर दास द्वारा सम्पादित होकर प्रकाशित हुआ है। इसमें हम्मीरदेव की वीरता का विस्तृत वर्णन है, कुछ कल्पित प्रसंग भी हैं।
हम्मीर पर अन्य रचनाएँ
हम्मीर पर नयनचंद सूरी द्वारा लिखित ‘हम्मीर महाकाव्य’ भी उपलब्ध है। एक अन्य रचना ‘हम्मीर काव्य’ शीर्षक से भी मिलती है।
कथानक
हम्मीर पर आधारित इन तीनों रासो ग्रंथों का कथानक हम्मीर के जन्म से प्रारंभ होकर उनके राज्याभिषेक, अलाउद्दीन के दूतों से संवाद, 13 मास के घेराबंदी और अंतिम युद्ध तक फैला हुआ है। खिलजी की चालाकी (बिमदेव को धोखे से हराना) और हम्मीर की धर्मपरायणता (मीर मोहम्मद को आश्रय देना) प्रमुख हैं। चढ़ाई के दृश्य रोमांचक हैं- “लूनी लहरि ललकारि रण रंग रंग रच्यौ रंगी।” अंत में रानी रंगादेवी का जौहर और हम्मीर का साका हृदयस्पर्शी है। यह कथा बलिदान की महिमा गाती है।
हम्मीर रासो की साहित्यिक विशेषताएं
रासो काव्य परंपरा में हम्मीर रासो एक उत्कृष्ट ग्रंथ है।भाषा अपभ्रंश-राजस्थानी मिश्रित है, जिसमें दोहे, सोरठे और चौपाई छंद प्रमुख हैं। वीर रस प्रधान होने पर शृंगार, करुण और भक्ति रस भी हैं। शरंगधर की भाषा ओजपूर्ण है: “हम्मीर महिपाल रण सिमरि रिसि गावै रास”। वर्णन जीवंत हैं—किले की प्राचीरें, घोड़ों की टापें, तलवारों की झनकार। अलंकार जैसे उपमा (हम्मीर सिंह के समान), अनुप्रास और यमक प्रचुर हैं। यह मौखिक परंपरा से विकसित हुई, अतः लोकगीतों का प्रभाव दिखता है। रासो ने राजपूत गाथाओं को साहित्यिक रूप दिया।
हम्मीर रासो का मुख्य संदेश
यह काव्य हम्मीर देव के ‘शरणागत वत्सलता’ और उनके हठ (हम्मीर हठ) के लिए प्रसिद्ध है।



