Wednesday, February 28, 2024
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दुर्लभ गोलाकार बौद्ध चैत्य

 अशोक का शासन काल 273 ई.पू. से 232 ई.पू रहा। यद्यपि वह सभी भारतीय धर्मों में विश्वास रखने वाला शासक था किंतु वह पहला मौर्य सम्राट था जिसने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिये शासन की तरफ से कार्य किया।

 ई.1909 में बैराठ में बीजक की पहाड़ी में 27 फुट व्यास के एक गोलाकार बौद्ध चैत्य (बौद्ध मंदिर) के अवशेष प्राप्त हुए। इस चैत्य को सम्राट अशोक के शासन काल के प्रारंभिक दिनों में निर्मित माना जाता है। इसमें पत्थरों के स्थान पर लकड़ी के अष्टपहलू स्तंभों तथा ईंटों का प्रयोग हुआ। इस स्थान पर संभवतः लकड़ी के 26 स्तम्भ थे जो जली हुई अवस्था में पाये गये। इन स्तम्भों द्वारा सभा मण्डप का निर्माण हुआ था।

प्रत्येक स्तम्भ के बीच में ईंटों की दीवारें थीं। मंदिर की छत भी लकड़ी तथा केलू से पाटी गई थी। मंदिर का प्रवेशद्वार पूर्व की ओर था। चैत्य का प्रारूप इस प्रकार का था जिस प्रकार गुफाओं को काटकर चैत्य बनाये जाते थे। यह दो वृत्तों से घिरा हुआ था तथा दोनों वृत्त प्रदक्षिणा पथ से अलग होते थे। इसकी समानता प्रथम शती ईस्वी पूर्व के जुन्नार के तुलजा लीना समूह की चैत्य गुफा से की जाती है। अंतर केवल इतना था कि बैराठ के चैत्य में लकड़ी और ईंटों का प्रयोग हुआ था जबकि तुलजा लीना के चैत्यों का निर्माण पत्थरों से गुफा काटकर 12 स्तंभों की गोलाकार पंक्तियों के योग से हुआ था।

संभवतः बैराठ के चैत्य के अनुकरण पर ही आगे चलकर पश्चिम एवं पूर्व भारत के अन्य चैत्य बने। यहां से प्राप्त राख के ढेर से अनुमान होता है कि यह चैत्य अग्निकाण्ड में नष्ट हुआ। दयाराम साहनी ने माना है कि इसे हूण आक्रांताओं ने जलाकर नष्ट किया।

भगवान बुद्ध के अस्थि अवशेष

जयपुर नरेश सवाई रामसिंह के शासन काल में यहाँ से एक स्वर्णमंजूषा भी प्राप्त हुई थी जिसमें भगवान बुद्ध के अस्थि अवशेष थे। हीनयान सम्प्रदाय के भिक्षु, भगवान बुद्ध के अस्थि अवशेष जहां रखते थे उसके चारों ओर दोहरी दीवार के बीच में परिक्रमा पथ बनाया जाता था। जैसा कि इस स्थान से भी मिला है।

अंकित ईंटें

गोलाकार चैत्य से मिली ईंटों पर एक या दो अक्षर अंकित थे। कुछ पर पाशम्; विस्; वि; काम; आदि शब्द भी पढ़े गये हैं। सम्भवतः चैत्य के बाहर की दीवारों पर बौद्ध ग्रंथों से कुछ उद्धरण अंकित किये गये थे जिनके अंश अक्षरों एवं शब्दों के रूप में ईंटों पर पाये गये।

विशाल बौद्ध विहार

बीजक की पहाड़ी का ऊपरी चबूतरा चौड़ी सीढ़ियों की एक पंक्ति से जुड़ा हुआ था। खुदाई करने पर एक विशाल बौद्ध विहार के चिह्न दिखाई दिये। एक चौकोर घेरे के आसपास छः-सात कोठरियों के चिह्न भी मिले थे। सम्भवतः बीच का मठ बड़ा था तथा उसके आसपास मठाधीश के साथ रहने वाले व्यक्तियों के निवास थे।

अथवा मठाधीश के दैनिक जीवन के अन्य कार्य सम्पादित करने के लिये कक्ष रहे होंगे। इन बौद्ध विहारों के ध्वंसावशेषों को देखने से अनुमान होता है कि उन विहारों का दो-तीन या अधिक बार जीर्णोद्धार हुआ होगा। इस विहार की ईंटें ठीक वैसी ही थीं जैसी कि गोलकार चैत्य से मिली हैं। इन कोठरियों की ईंटों को मिट्टी के गारे में जोड़ा गया है। इनके बाहर और भीतर दोनों ओर सफेदी की पर्त है।

बैराठ से प्राप्त बौद्ध कालीन सामग्री

इस स्थान से आलंकारिक मृद्पात्र, पहिये पर त्रिरत्न तथा स्वस्तिक के चिह्न प्राप्त हुए हैं। यहां से मिट्टी के खिलौने भी बड़ी संख्या में मिले हैं जिनमें सब प्रकार के पक्षियों की आकृतियां हैं। ये आकृतियां ठीक वैसी ही हैं जैसी कि भरहुत से मिली कलाकृतियों की हैं। जुड़े ढकने तथा ना-ना प्रकार के मिट्टी के बर्तन भी मिले हैं। बौद्ध स्थलों से उत्तरी काली पॉलिशयुक्त तथा भूरे या स्लेटी रंग के मिट्टी के बर्तन मिलते हैं। इस स्थान से भी ऐसे ही बर्तन मिलते हैं। इन बर्तनों की उपस्थिति से भी पुष्टि होती है कि यह बौद्ध कालीन स्थान है।

बुद्ध की प्रतिमा का अभाव

यहां से भगवान बुद्ध की कोई आकृति या प्रतिमा नहीं मिली है जिससे अनुमान होता है कि यह हीनयान सम्प्रदाय का चैत्य था जो बुद्ध की भगवान के रूप में पूजा नहीं करते थे और न ही बुद्ध की मूर्तियां बनाते थे। ईसा के बाद की शताब्दियों में हीनयान सम्प्रदाय वालों ने भी भगवान बुद्ध की मूर्तियां बनाना आरम्भ कर दिया था। राजस्थान के झालावाड़ जिले से ऐसी कई बौद्ध गुफाएं मिली हैं जो हीनयान से सम्बद्ध होते हुए भी अनेक बुद्ध प्रतिमाओं से युक्त हैं।

सिंह आकृति युक्त स्तम्भ

 इस स्थान से अशोक के चिकने पॉलिश युक्त एवं पॉलिश रहित दो स्तम्भों के लगभग एक सौ टुकड़े प्राप्त हुए। ये स्तम्भ चुनार पत्थर के थे और अशोक स्तम्भ खण्ड जैसे ही थे। इन्हें देखने से अनुमान होता है कि इनका ऊपरी भाग एक लम्बे और दृढ़ ताम्बे के तार से बंधा हुआ था। ऊपर के भाग में सिंह की आकृति होने का अनुमान है। इस सिंह के भी कई खण्ड यहां से मिले हैं। रायबहादुर दयाराम साहनी ने इस प्रकार के सिंह युक्त दो स्तम्भ चम्पारन जिले के रामपुरवा स्थान पर देखे थे जिन्हें राजपथ का हिस्सा बना दिया गया था।

बैराठ में अशोक कालीन दो स्तम्भों की प्राप्ति से ऐसे स्तम्भों की कुल संख्या 16 हो गई। इससे पहले यह धारणा थी कि ऐसे स्तम्भों की संख्या केवल 14 है। हेनरी कजेन्स ने ऐसा ही एक अशोक कालीन सिंह मस्तक नगरी (जिला चित्तौड़गढ़) की कंकाली माता की मूर्ति के पास पड़ा देखा था। 

अशोक कालीन सिक्कों की प्राप्ति

बौद्ध विहार की पूर्वी दीवार की मोटाई में एक छोटी सी मिट्टी की हांडी मिली थी जिसमें चांदी के 36 सिक्के थे। इन सिक्कों में 8 सिक्के पंचमार्क थे और 28 सिक्के यूनानी ढंग के थे। ये समस्त सिक्के अशोक कालीन अनुमानित होते हैं।

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