Friday, June 14, 2024
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21. मुमताज महल और उसकी औलादें

शाहजहाँ की बिनब्याहता बेगमों की गिनती नहीं की जा सकती किंतु घोषित तौर पर शाहजहाँ की नौ ब्याहता बेगमें थीं- कंधारी महल, अकबराबादी बेगम, मुमताज महल, हसीना बेगम, मोती बेगम, कुदासिया बेगम, फतेहपुरी महल, सरहिंदी बेगम तथा रानी मनभाविती। इन सभी बेगमों से शाहजहाँ को ढेरों औलादें हुई थीं। खुद बेगमें भी बच्चे जनते-जनते मर गई थीं। 

शाहजहाँ की नौ बेगमों में से मुमताज महल तीसरे नम्बर की थी। उसके पेट से चौदह आलौदें जन्मीं जिनमें से मुमताज महल के देखते-देखते छः औलादें काल-कवलित हो गईं तथा केवल आठ जीवित बची थीं। मुमताज महल की ये आठों औलादें, बादशाह की दुबारा बीमारी की खबर सुनकर मुगलिया तख्त को पाने के लिए एक दूसरे को जान से मारने को तत्पर हो गईं।

यह एक हैरानी की ही बात थी कि शाहजहाँ की अन्य आठ बेगमों की औलादों को न तो लाल किले से कोई मतलब था और न लाल किले के लिए होने वाली खूनी जंग से जबकि इस खूनी जंग ने देखते-ही देखते राष्ट्रव्यापी स्वरूप धारण कर लिया जिसमें कई लाख लोगों ने अपने प्राण गंवाए। राजपूत सेनाओं को इस खून खराबे में बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। निःसंदेह महाराजा रूपसिंह को इस खूनी जंग में सबसे ज्यादा कीमत चुकानी थी।

मुमताज के बेटे-बेटियों की खूनी जंग में प्रवेश करने से पहले हमें लाल किले की असली स्वामिनी मुमताज महल का थोड़ा सा इतिहास जानना चाहिए। मुमताज़ महल का बचपन का नाम अर्जुमंद बानो बेगम था। शाहजहाँ उसे मुमताज महल कहा करता था जिसका अर्थ होता है महल का सबसे प्यारा आभूषण। मुमताज का जन्म अप्रैल 1593 में आगरा में हुआ था। उसका पिता अब्दुल हसन असफ़ ख़ान, मरहूम बादशाह जहाँगीर की बेगम नूरजहाँ का भाई था तथा वह अपने बाप के साथ फारस से भारत आया था। इस प्रकार मुमताज महल की रगों में फारस का खून बहता था और वह शाहजहाँ की ममेरी बहिन थी।

मुमताज महल संगमरमर के पत्थर से तराशी हुई सफेद गुड़िया की तरह बेपनाह खूबसूरत दिखती थी तथा आगरा के मीना बाजार में अपनी दुकान पर रेशम और कांच के मोती बेचा करती थी। मीना बाजार की शुरुआत, शाहजहाँ के दादा जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर ने की थी। यह बाजार केवल मुगलिया शहजादों और खादनदानी अमीर-उमरावों के लिए सजता था। मीना बाजार में दुनिया भर के मुल्कों से आई शाहजादियों और हिन्दू राजकुमारियों को अपनी दुकानें लगाने की अनुमति थी जिन पर उन्हें खुद अपना सामान बेचना होता था। अक्सर इन दुकानें की मालकिनें भी किसी शेख, शहजादे या अमीर-उमराव के हाथ बिक जाती थीं।

1607 ईस्वी में एक बार शहजादा खुर्रम, मीना बाजार की सैर करने के लिए आया और उसकी मुलाकात अपनी ममेरी बहिन अर्जुमंद बेगम से हुई। पहली ही मुलाकात में खुर्रम ने अर्जुमंद बेगम से विवाह करने का निर्णय कर लिया। पहले से ही दो बेगमों के होते हुए भी शहजादे खुर्रम ने अपने पिता जहाँगीर के समक्ष अपने तीसरे विवाह की इच्छा व्यक्त की। इस पर 1612 ईस्वी में जहाँगीर ने खुर्रम का विवाह अर्जुमंद बेगम से कर दिया क्योंकि जहाँगीर कतई नहीं चाहता था कि जैसा हत्याकाण्ड नूरजहाँ बेगम के मामले में जहाँगीर ने किया था, वैसा ही हत्याकाण्ड खुर्रम अर्जुमंद के लिए दोहराए।

इस प्रकार 19 साल की अर्जुमंद, 20 साल के खुर्रम की तीसरी बेगम बन गई जो बाद में मुमताज महल कहलाई तथा खुर्रम शाहजहाँ के नाम से जहाँगीर का उत्तराधिकारी हुआ। मुमताज महल कहने भर को शाहजहाँ की तीसरी बेगम थी परन्तु शीघ्र ही वह शाहजहाँ की सबसे पसंदीदा बेगम बन गई। शाहजहाँ के शाही फरमानों के खाली कागज तथा शाहजहाँ की असली शाही मुहर, मुमताज महल के पास रहती थी जिसका अर्थ यह था कि जहाँगीर के नाम से जारी किए गए आदेश वास्तव में मुमताज महल द्वारा जारी किए जाते थे।

मुमताज महल शतरंज खेलने में माहिर थी। शाहजहाँ घण्टों तक मुमताज महल के सामने बैठकर उसके साथ शतरंज खेला करता था। मुमताज अक्सर बादशाह को इस खेल में हरा देती थी। जब भी मुमताज, शाहजहाँ को हराती थी, शाहजहाँ निहाल होकर उस पर अशर्फियों और हीरे-मोतियों की बरसात करता था।

मुमताज को अपनी मातृभाषा फारसी का बहुत अच्छा ज्ञान था और वह फारसी भाषा में बहुत उम्दा कविताएं लिखा करती थी। उसने फारसी भाषा के बहुत से कवियों को मुगल दरबार में आश्रय दिया था। इस कारण मुमताज की प्रसिद्धि भारत की सीमाएं पार करके फारस तक जा पहुँची थी। मुमताज महल ने लाल किले के शाही बागीचों को सुंदर फूलों से सजाकर उन्हें स्वर्ग जैसा बना दिया था। इस प्रकार मुमताज महल ने अपने चारों ओर सौंदर्य का सृजन किया था और शाहजहाँ सौंदर्य के इस अप्रतिम सागर में अनवरत डुबकियां लगाया करता था।

जिस प्रकार जहाँगीर की बेगम नूरजहाँ ने मुगलिया सल्तनत को अपनी अंगुलियों पर नचाया था, उसी प्रकार मुमताज महल भी बादशाह की चहेती बनकर मुगलिया तख्त, मुगलिया खानदान और मुगलिया सल्तनत को अपनी अंगुलियों पर नचाने लगी। इसी का परिणाम था कि शाहजहाँ की अन्य आठों बेगमें तथा उनकी ढेर सारी औलादें बुरी तरह उपेक्षित हुईं तथा इतिहास के पन्नों पर उनके नाम तक दर्ज नहीं हो सके।

मुगलिया सल्तनत पर मजबूती से अधिकार जमाए रखने के लिए मुमताज ने दो उपाय किए। पहला तो यह कि वह अक्सर शाही बाग में गरीब औरतों को आमंत्रित करती तथा उनके साथ पर्याप्त समय बिताती। इन औरतों से उसे सल्तनत में होने वाली छोटी-बड़ी बातों की जानकारी मिलती थी। मुमताज महल, गरीब और जरूरतमंद औरतों की भरपूर मदद भी करती। वह अक्सर बादशाह को भी इस काम में शामिल करती तथा बादशाह से ही जरूरतमंद रियाया की मदद करवाती थी किंतु उन लड़कियों का वह स्वयं ध्यान रखती थी जिनका विवाह गरीबी के कारण नहीं हो पाता था। इन कारणों से मुमताज महल, गरीब रियाया में बेहद पसंद की जाती थी।

दूसरा उपाय भी बहुत सोच समझ कर अपनाया गया था। जब भी शाहजहाँ किसी भी काम से राजधानी से बाहर जाता था तो मुमताज अनिवार्य रूप से उसके साथ जाती थी। इसका लाभ यह हुआ कि सल्तनत के प्रत्येक अमीर, उमराव, शहजादे, हिन्दू सरदार तथा मुल्ला-मौलवियों से मुमताज का सीधा सम्पर्क हो गया। यही कारण था कि जब तक मुमताज जीवित रही, किसी ने उसके विरुद्ध जबान तक नहीं खोली। न कोई व्यक्ति मुमताज के खिलाफ बादशाह के कान भर सका।

उन्नीस वर्ष की आयु में मुमताज का विवाह शाहजहाँ से हुआ था। इस विवाह के बाद वह केवल उन्नीस साल जीवित रही तथा इस अवधि में उसने चौदह बार गर्भ धारण किया। एक तरह से शाहजहाँ ने उसे बच्चे पैदा करने की मशीन बनाकर रख दिया था। 17 जून 1631 को बुरहानपुर में शाहजहाँ की चौदहवीं संतान गौहरा बेगम को जन्म देते वक्त मुमताज महल की मृत्यु हो गई। शाहजहाँ ने गौहरा बेगम को अपने लिए अभिशप्त माना तथा उसका मुँह तक देखने से मना कर दिया।

शाहजहाँ के चाचा दानियाल ने मुमताज का शव बुरहानपुर के जैनाबाद बाग में दफ्न किया। उसके शव को सुरक्षित रखने के लिए मिस्र देश में ममी बनाने की तीन प्रसिद्ध विधियों में से एक विधि का सहारा लिया गया ताकि उसके शव में से कभी बदबू नहीं आ सके तथा उसका शव हजारों साल तक सुरक्षित रह सके।

मुमताज के शोक में डूबा हुआ शाहजहाँ, लगभग एक साल तक बुरहानपुर में ही रहा तथा इस दौरान वह अपने डेरे से एक बार भी बाहर नहीं निकला। बाद में जब आगरा में ताजमहल का निर्माण शुरू हुआ तथा चाहर-दीवारियां बन गईं, तब दिसम्बर 1631 में मुमताज के शव को कब्र से बाहर निकाला गया। इस शव को पूरे लाव-लश्कर के साथ शानदार शाही जुलूस के रूप में बुरहानपुर से आगरा तक लाया गया। इस जुलूस पर उस समय आठ करोड़ रुपए व्यय हुए थे।

12 जनवरी 1632 को मुमताज का शव निर्माणाधीन ताजमहल के परिसर में दफना दिया गया। जब 9 साल बाद ई.1640 में ताजमहल बनकर पूरा हो गया, तब मुमताज महल के शव को एक बार फिर कब्र से बाहर निकाला गया तथा इस बार उसे ताजमहल के एक तहखाने में दफनाया गया तथा उसके ऊपर की मंजिल में उसकी नकली कब्र बनाई गई ताकि यदि दुश्मन कभी ताजमहल को नष्ट करें तो मुमताज महल, अपने तहखाने और अपने ताबूत में सुरक्षित रहकर आराम से कयामत के दिन का इंतजार कर सके। 

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