Tuesday, June 25, 2024
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16. मुगलिया हरम की शहजादियाँ

बादशाह के हरम में नियुक्त नौकरों, लौण्डियों और हिंजड़ों को समझ में नहीं आ रहा था कि बादशाह को हुआ क्या है और शहजादे दारा तथा शहजादी जहांआरा के अतिरिक्त प्रत्येक व्यक्ति को बादशाह के शयन कक्ष में जाने से रोक क्यों दिया गया है! शाही हकीम की आवाजाही बादशाह के ख्वाबगाह में अलबत्ता बनी हुई है। हरम के नौकरों, लौण्डियों और हिंजड़ों ने आनन-फानन में लाल किले तथा लाल किले से बाहर समूची दिल्ली में यह अफवाह फैला दी कि शहजादे दारा शिकोह तथा शहजादी जहांआरा ने बीमार बादशाह को कैद कर लिया है तथा बादशाह से जबर्दस्ती मन-मर्जी शाही हुक्म जारी करवा रहे हैं।

कुछ नौकरों ने अपने रिश्तेदारों और घर-परिवारों में जाकर यह कानाफूसी की कि बादशाह को कैद नहीं किया गया है, वास्तव में तो बादशाह मर गया है और शहजादा दारा-शिकोह तथा शहजादी जहांआरा उसकी बीमारी की अफवाह उड़ाकर उसके नाम से हुकूमत चला रहे हैं।

शाहजहाँ की अन्य तीन शहजादियों, पुर-हुनार बेगम, रोशनारा बेगम और गौहरा बेगम ने इस बात को अपना अपमान समझा कि उनके बड़े भाई दारा शिकोह तथा बड़ी बहिन जहांआरा ने बादशाह को अपने कब्जे में ले लिया है तथा जिस तरह तीनों छोटे भाइयों को राजधानी से दूर रखा जा रहा है, उसी तरह शाहजहाँ की सारी बेगमों और तीनों छोटी शहजादियों को भी बादशाह से दूर कर दिया गया है।

पुर-हुनार बेगम, रोशनारा बेगम और गौहरा बेगम ने बहुत चेष्टा की कि वे किसी भी बहाने से एक बार अपने पिता की ख्वाबगाह में घुसकर बादशाह हुजूर को अपनी आँखों से देख लें ताकि इस सच्चाई का पता चल सके कि बादशाह हुजूर वाकई में बीमार हैं या उन्हें काफिरों ने कैद करके रखा है! शाहजहाँ की तीनों छोटी शहजादियाँ दारा और जहांआरा को काफिर ही कहती थीं।

जब तीनों छोटी शहजादियाँ अपने मकसद में किसी भी तरह कामयाब नहीं हो सकीं तो उन्होंने बादशाह की बीमारी के हाल बढ़ा-चढ़ा कर अपने-अपने पक्ष के शहजादे को लिख भेजे। तीनों ही शहजादियाँ वे अपने खतों में यह लिखना भी नहीं भूलीं कि काफिर दारा और जहांआरा ने बादशाह सलामत को कैद कर लिया है तथा शाही हकीम के अलावा किसी को बादशाह की ख्वाबगाह में जाने की इजाजत नहीं है। शाही हकीम को भी हरम के भीतर ही कड़ी निगरानी में रखा गया है तथा शाही हकीम को किसी से भी बात करने की इजाजत नहीं है।

हम पहले लिख आए हैं कि शाहजहाँ की नौ बेगमें और अनगिनत चहेतियां थीं जिनसे उसे ढेरों औलादें हुई थीं। उसकी तीसरी बेगम मुमताज महल के पेट से चौदह औलादें जन्मी थीं। वह औलाद जन्मते-जन्मते ही मरी थी किंतु शाहजहाँ की अधिकांश औलादें जवान होने से पहले ही मर गई थीं। जिस समय शाहजहाँ बीमार पड़ा, उस समय उसकी केवल आठ औलादें जिंदा बची थीं।

कहने को शाहजहाँ के चार पुत्र थे लेकिन जब से वे जवान हुए थे उनमें से तीन शहजादों शाहशुजा, औरंगज़ेब और मुराद बख्श को हर समय राजधानी दिल्ली से दूर रखा जाता था। केवल दारा शिकोह को ही दिल्ली में रहने की अनुमति थी। वह न केवल लालकिले के भीतर रह सकता था अपितु बादशाह के हरम और ख्वाबगाह के भी बिल्कुल निकट बना रहता था।

शाहजहाँ की चारों शहजादियाँ यूं तो लाल किले के भीतर और बादशाह के हरम में रहती थीं किंतु इनमें से तीन शहजादियों पुरहुनार बेगम, रोशनारा बेगम और गौहरा बेगम को जवान होने के बाद शायद ही कभी अपने बाप का मुँह देखने को मिलता था। बादशाह उन्हें फूटी आँख नहीं देख सकता था। केवल जहांआरा बेगम ही शाहजहाँ की चहेती पुत्री थी और वही बादशाह के ख्वाबगाह तक जाने का अख्तियार रखती थी। इसलिए तीनों छोटी शहजादियों ने उसके बारे में अफवाह फैला रखी थी कि यह बादशाह की बेटी नहीं उसकी रखैल है। दिल्ली की जनता में भी जहांआरा के बारे में तरह-तरह की बातें कही जाती थीं।

बादशाह का हरम अकबर के समय से ही मुगल शहजादियों से भरने लगा था क्योंकि अकबर ने शहजादियों के विवाह करने की परम्परा बंद कर दी थी। इस नितांत अमानवीय परम्परा का एक खास कारण था।

अकबर की सात बहनें थीं, बक्शीबानू बेगम, अकीका सुल्ताना बेगम, अमीना बानू बेगम, बख्त उन्निसा बेगम, सकीना बानू बेगम, जहान सुल्ताना बेगम तथा फख्र उन्निसा बेगम। इन सातों के पति मिर्जा कहलाते थे और ये सातों मिर्जा स्वयं को शहंशाह अकबर के बराबर समझते थे। वे अकबर के साथ न केवल उद्दण्डता पूर्वक व्यवहार करते थे अपितु समय मिलते ही अकबर की सल्तनत उखाड़कर अपनी सल्तनत कायम करने के लिए बगावत करते थे। अकबर अपनी बहिनों के लिहाज के कारण अपने बहनोइयों को पकड़कर न तो मार ही पाता था और न उन्हें कैद कर पाता था। अंत में तंग आकर जब तक अकबर ने अपने इन बहनोइयों को मार नहीं डाला, तब तक बहनोइयों द्वारा की जाने वाली बगावत की समस्या बनी ही रही। इस कारण अकबर ने नियम बना दिया कि मुगल शहजादियों के विवाह नहीं किए जाएंगे।

इसी नियम पर चलते हुए अकबर ने अपनी चारों पुत्रियों आराम बानू बेगम, खानम सुल्तान बेगम, शकर उसनिसा बेगम तथा मेहरुन्निसा बेगम के विवाह नहीं किए थे। अकबर के पुत्र जहाँगीर ने भी अपनी तीनों शहजादियों माजियार बेहरूज, बहार बानू बेगम तथा निठार बेगम की शादियां नहीं कीं। फिर भी जहाँगीर के पुत्र शाहजहाँ को अपने राज्यारोहण से पहले अपनी सौतेली बहिन लाडली बेगम के पति से निबटना पड़ा था।

जहाँगीर ने अपनी प्रेयसी नूरजहाँ के पति शेरअफगन को मारकर नूरजहाँ से विवाह किया था। शेरअफगन से नूरजहाँ की एक बेटी थी जिसे लाड़ली बेगम कहा जाता था। जब नूरजहाँ को बंगाल से आगरा लाया गया तो लाड़ली बेगम भी उसके साथ जहाँगीर के हरम में चली आई थी तथा उसका लालन-पालन भी शहजादियों की तरह हुआ था। जब लाड़ली बेगम जवान हुई तो नूरजहाँ ने लाड़ली बेगम का विवाह अपने पति जहाँगीर की एक अन्य बेगम के पेट से जन्मे पुत्र शहरयार से कर दिया।

जब जहाँगीर बीमार पड़ा तो शाहजहाँ जो उन दिनों खुर्रम के नाम से जाना जाता था, शहरयार को मारकर ही बादशाह बन सका था। हालांकि शहरयार को तो खुर्रम के हाथों इसलिए भी मरना ही था क्योंकि वह खुर्रम का सौतेला भाई भी था तथा शाहजहाँ जानता था कि उसे अपने अठारह चाचाओं और भाइयों को मारे बिना मुगलों का तख्त हासिल नहीं होने वाला था।

इसलिए शाहजहाँ ने अपने दादा अकबर द्वारा शहजादियों का विवाह न करने के सम्बन्ध में बनाए गए नियम को अपने समय में भी सख्ती से लागू रखा था और अपनी चारों शहजादियों में से किसी का विवाह नहीं किया था। इस नियम की पालना करने से बादशाह को जंवाइयों की बगावत की संभावना से और भावी बादशाह को बहनोइयों की बगावत की समस्या से तो छुटकारा मिल गया था किंतु एक नई समस्या पैदा हो गई थी।

अब शहजादियाँ जीवन भर बादशाह के हरम का हिस्सा बनकर रहतीं थीं और वे भावी बादशाह के लिए होने वाले उत्तराधिकार के युद्ध में खुलकर भाग लेती थीं। शाहजहाँ का हरम भी इस खतरनाक समस्या से संक्रमित था। उसकी चारों शहजादियों भी अब जवान हो गई थीं। और उन्होंने भी अपने भाइयों के साथ मिलकर मुगलिया राजनीति के खूनी खेल में भाग लेना आरम्भ कर दिया था।

चारों शहजादियों ने एक-एक भाई का दामन पकड़ लिया था। जहांआरा ने दारा शिकोह को, रोशनआरा ने औरंगज़ेब को, गौहर आरा ने मुराद को और पुरहुनार बेगम ने शाहशुजा को बादशाह बनाने के लिए राजनीतिक शतरंज पर षड़यंत्रों की खूनी गोटियां बिछानी आरम्भ कर दीं थीं। चारों शहजादियाँ अपनी पसंद के भाई को अपने बाप शाहजहाँ के तख्ते ताउस, कोहिनूर हीरे तथा दिल्ली के लाल किले का जल्दी से जल्दी वारिस बनाने का ख्वाब देखा करती थीं।

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