जालोर का इतिहास अत्यंत प्राचीन और गौरवशाली रहा है, जिसे समय-समय पर विभिन्न मध्यकालीन कवियों और आधुनिक इतिहासकारों ने अपनी लेखनी के माध्यम से सुरक्षित किया है। जालोर के इतिहासकार विषय पर जानकारी प्राप्त करने से पहले हमें जालोर के इतिहास के कालखण्डों को जानना होगा।
जालोर के इतिहास को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है-
📚 जालोर क्षेत्र के प्राचीन रचनाकार
उद्योतन सूरी: इन्होंने 8वीं शताब्दी में जालोर (जाबालिपुर) में बैठकर प्रसिद्ध जैन ग्रंथ ‘कुवलयमाला’ (Kuvlayamala) की रचना की थी, जो तत्कालीन सामाजिक स्थिति पर प्रकाश डालता है।
महाकवि माघ: माघ ने संस्कृत काव्य शिशुपाल वध (Shishupal Vadh) की रचना जिसमें जालोर-भीनमाल क्षेत्र की तत्कालीन संस्कृति पर किंचित प्रकाश डाला गया है।
📚 मध्यकालीन लेखक
इन लेखकों ने जालोर के शासकों, युद्धों और संस्कृति का आँखों देखा या समकालीन विवरण प्रस्तुत किया है:
- कवि पद्मनाभ: ये जालोर के इतिहास के सबसे प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं। इन्होंने ‘कान्हड़दे प्रबंध‘ और ‘वीरमदेव सोनगरा री बात’ की रचना की। ये ग्रंथ जालोर के चौहानों और अलाउद्दीन खिलजी के बीच हुए युद्ध का सबसे प्रामाणिक स्रोत हैं।
- मुहणौत नैणसी: इन्हें ‘राजस्थान का अबुल फजल’ कहा जाता है। अपनी प्रसिद्ध कृति ‘नैणसी री ख्यात’ में उन्होंने जालोर के सोनगरा चौहानों की वंशावली और उनके शौर्य का विस्तार से वर्णन किया है।
- अमीर खुसरो: अलाउद्दीन खिलजी के दरबारी कवि ने अपनी रचनाओं (जैसे ‘खजाइन-उल-फुतूह’) में जालोर विजय का विवरण सुल्तान के नजरिए से दिया है।
📚 आधुनिक इतिहासकार (Modern Historians)
20वीं और 21वीं सदी के इतिहासकारों ने शिलालेखों और पुरानी ख्यातों के आधार पर जालोर का व्यवस्थित इतिहास लिखा है-
- डॉ. दशरथ शर्मा: अपनी पुस्तक ‘Early Chauhan Dynasties’ में इन्होंने जालोर के सोनगरा चौहानों के राजनीतिक उत्कर्ष और पतन का गहन विश्लेषण किया है।
- डॉ. मोहनलाल गुप्ता: इनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘जालोर का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास’ इस क्षेत्र के संपूर्ण इतिहास को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। डॉ. मोहनलाल गुप्ता का ग्रंथ सबसे अधिक उद्धृत होता है। इसमें जालोर, भीनमाल और सांचोर नगरों का पौराणिक काल से लेकर प्रतिहार शासकों का साम्राज्य, भीनमाल की विद्वत परंपरा, अलाउद्दीन खिलजी द्वारा जालोर दुर्ग पर विजय, और आधुनिक काल तक का विस्तृत विवरण। विस्तार से दिया गया है।
- डॉ. अशोक कुमार श्रीवास्तव: इन्होंने ‘The Chahamanas of Jalor’ नामक पुस्तक लिखकर जालोर के चाहमान (चौहान) वंश के इतिहास को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत किया।
- सोहनलाल पटनी: इन्होंने ‘जालोर एवं स्वर्णगिरी दुर्ग का सांस्कृतिक इतिहास’ नामक पुस्तक लिखी है, जो विशेष रूप से जालोर के किले और उसकी वास्तुकला पर केंद्रित है।
🏰 अन्य महत्वपूर्ण स्रोत एवं लेखक
- डिस्ट्रिक्ट गजेटियर जालोर: डिस्ट्रिक्ट गजेटियर जालोर राजस्थान सरकार द्वारा प्रकाशित किया गया है। इसमें जालोर जिले के संक्षिप्त इतिहास से लेकर जिले के सम्बन्ध में विविध भौगोलिक एवं जलवायुवीय जानकारी दी गई है। साथ ही विभिन्न सरकारी कार्यालयों से प्राप्त सूचनाएं भी प्रकाशित की गई है। यह हिन्दी तथा अंग्रेजी दोनों भाषाओं में उपलब्ध है।
- गौरीशंकर हीराचंद ओझा: यद्यपि उन्होंने मुख्य रूप से उदयपुर और सिरोही का इतिहास लिखा, लेकिन ‘राजपूताने का इतिहास’ में जालोर के शासकों का संदर्भ प्रमुखता से दिया है।
- जैन मुनि कल्याण विजय: इन्होंने जालोर के जैन मंदिरों और वहाँ के प्राचीन शिलालेखों के संपादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- डॉ. हुकम चंद जैन: राजस्थान के प्रमुख इतिहासकार, जिन्होंने राजस्थान के सांस्कृतिक इतिहास के अंतर्गत जालोर के किलों और कला का विस्तृत वर्णन किया है।
- विकिपीडिया (सामूहिक लेखन), जालौर पृष्ठ : जालोर का संक्षिप्त इतिहास, भौगोलिक स्थिति और सांस्कृतिक महत्व। विकिपीडिया पर उपलब्ध सामग्री संक्षिप्त है, लेकिन यह जालोर की पहचान “ग्रेनाइट सिटी” और “सुवर्ण नगरी” के रूप में बताती है।
- स्थानीय इतिहासकार एवं शोधकर्ता : अन्य स्थानीय इतिहासकारों ने भी जालोर के सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व पर लेख लिखे हैं, जैसे भीनमाल में संस्कृत विद्या का उत्कर्ष, जालोर दुर्ग की स्थापत्य कला। विभिन्न लेख और निबंध, जालोर दुर्ग, प्रतिहार शासक, भीनमाल की विद्वत परंपरा आदि पर लेखन।
🔑 प्रमुख पुस्तकों की तालिका
| लेखक | पुस्तक का नाम | विशेष संदर्भ |
| पद्मनाभ | कान्हड़दे प्रबंध | कान्हड़दे और खिलजी का युद्ध |
| डॉ. मोहनलाल गुप्ता | जालोर का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास | व्यापक ऐतिहासिक विवरण |
| डॉ. दशरथ शर्मा | Early Chauhan Dynasties | सोनगरा चौहानों का शासन |
| मुहणौत नैणसी | नैणसी री ख्यात | वंशावली और लोक कथाएं |
⚖️ अध्ययन हेतु मार्गदर्शिका
- गहन अध्ययन हेतु डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक सबसे प्रामाणिक और विस्तृत स्रोत है।
- सामान्य जानकारी के लिए विकिपीडिया और स्थानीय इतिहास लेख पर्याप्त हैं।
- शोध या प्रकाशन हेतु मध्यकालीन पुस्तकों का संदर्भ लेना अधिक उपयुक्त रहेगा।



