राजस्थान में सूखे की समस्या सदियों पुरानी है। इस आलेख में राजस्थान में सूखे और अकाल की समस्या के कारण, प्रभाव और पारंपरिक जल संरक्षण विधियों पर संक्षेप में सारगर्भित जानकारी दी गई है। साथ ही यह भी बताया गया है कि कैसे आधुनिक तकनीक और प्राचीन ज्ञान को मिलाकर इस संकट को टाला जा सकता है।
राजस्थान में सूखे की समस्या और समाधान
- भौगोलिक चुनौती: राजस्थान का 61% भू-भाग मरुस्थलीय है, जहाँ अरावली की स्थिति मानसून को रोकने में विफल रहती है।
- त्रिकाल का संकट: यहाँ का अकाल केवल पानी तक सीमित नहीं, बल्कि अन्न और चारे (अण, जल, घास) की भी भारी कमी पैदा करता है।
- पारंपरिक समाधान: टांका, जोहड़, खड़ीन और बावड़ियाँ—राजस्थान की वो प्राचीन तकनीकें जो आज भी सबसे प्रभावी हैं।
- आधुनिक दृष्टि: ड्रिप इरिगेशन, ‘नदी जोड़ो परियोजना’ और ‘ERCP’ जैसे प्रोजेक्ट्स भविष्य की उम्मीद हैं।
राजस्थान की धरती जहाँ अपने शौर्य के लिए जानी जाती है, वहीं प्रकृति के साथ इसके संघर्ष की गाथा भी उतनी ही पुरानी है। यहाँ ‘सूखा’ (Drought) कोई अचानक आने वाली आपदा नहीं, बल्कि एक स्थायी चक्र बन चुका है।
1. राजस्थान में बार-बार सूखा क्यों पड़ता है?
इसके पीछे मुख्य रूप से तीन कारण हैं:
- अरावली की स्थिति: अरावली पर्वतमाला मानसूनी हवाओं के समानांतर खड़ी है, जिससे बादल बिना टकराए आगे निकल जाते हैं।
- अनियमित वर्षा: राज्य के पश्चिमी जिलों (जैसे जैसलमेर, बाड़मेर) में औसत वर्षा मात्र 10-15 सेमी होती है।
- बढ़ता मरुस्थलीकरण: पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और अवैध खनन ने रेगिस्तान के प्रसार को बढ़ावा दिया है।
2. सामाजिक और आर्थिक प्रभाव
जब वर्षा नहीं होती, तो इसका असर केवल खेतों तक सीमित नहीं रहता:
- पशुधन की हानि: राजस्थान की ग्रामीण अर्थव्यवस्था पशुपालन पर टिकी है। सूखे में चारा न मिलने से पशु दम तोड़ देते हैं।
- पलायन का दंश: हज़ारों परिवार पानी और काम की तलाश में पड़ोसी राज्यों की ओर पलायन करने को मजबूर होते हैं।
- पेयजल संकट: महिलाओं को मीलों दूर से पानी लाना पड़ता है, जिससे उनका स्वास्थ्य और बच्चों की शिक्षा प्रभावित होती है।
3. समाधान: परंपरा और तकनीक का मेल
हमें अपनी पुरानी विरासत की ओर लौटना होगा। ‘खड़ीन’ तकनीक (जैसलमेर के पालीवाल ब्राह्मणों द्वारा विकसित) इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहाँ वर्षा के पानी को रोककर खेती की जाती है।
साथ ही, इज़रायली तकनीक (Drip Irrigation) का उपयोग कर कम पानी में अधिक फसल पैदा करना अब समय की मांग है। राजस्थान सरकार की ‘पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना’ (ERCP) 13 जिलों की प्यास बुझाने के लिए एक क्रांतिकारी कदम साबित हो सकती है।
निष्कर्ष
सूखा हमारी नियति हो सकती है, लेकिन जल संकट हमारी लापरवाही का परिणाम है। यदि हम अपनी प्राचीन जल संचयन पद्धतियों को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ लें, तो राजस्थान की यह मरूधरा फिर से सुजलां-सुफलां बन सकती है।
-डॉ. मोहनलाल गुप्ता



