Tuesday, February 17, 2026
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डिंगल भाषा: योद्धाओं में उत्साह भरने वाले गीतों की जननी

डिंगल भाषा विगत तेरह शताब्दियों से भी अधिक समय से अस्तित्व में है। इस लोकप्रिय भाषा में सैंकड़ों सालों तक वीर योद्धाओं के रक्त में उत्साह भरने वाले गीतों की रचना हुई।

उद्भव, विकास, मुख्य ग्रंथ, महत्व और अन्य तथ्य

डिंगल भाषा (Dingal Bhasha), जिसे मरु-भाषा (Maru Bhasha), मरु-गुर्जरी (Maru Gurjari) , चारणी भाषा (Charani Bhasha) या प्राचीन पश्चिमी राजस्थानी (Old Western Rajasthani) भी कहा जाता है, वीरभूमि राजस्थान की शौर्यपरक संस्कृति की उद्घोषक भाषा है। यह नागरी लिपि (Devnagri Script) में लिखी जाने वाली प्राचीन हिन्द-आर्य (Hind-Arya Bhasha) परिवार की भाषा है, जिसमें गद्य और पद्य दोनों रूपों में समृद्ध साहित्य उपलब्ध है।

डिंगल भाषा की विशेषता उसकी उच्च स्वर वाली, ओजस्वी और वीर रस प्रधान शैली है, जो सुनने वाले को रोमांचित कर देती है। यह भाषा केवल एक बोली नहीं, अपितु एक विशिष्ट काव्य-शैली है, जो अपभ्रंश से विकसित हुई और मरवाड़ी तथा गुजराती की पूर्वज मानी जाती है। यह भाषा न केवल राजस्थान अपितु गुजरात, कच्छ, मालवा और सिंध के क्षेत्रों में भी प्रचलित रही।

डिंगल मुख्यतः चारण कवियों (Charan Poets) द्वारा रचित वीर रस प्रधान काव्य के लिए प्रसिद्ध है, जो राजपूत योद्धाओं के पराक्रम, वंशावली और ऐतिहासिक घटनाओं का वर्णन करती है। चारण कवियों ने युद्ध के मैदान में सैनिकों का मनोबल बढ़ाया और पीढ़ी-दर-पीढ़ी इतिहास को मौखिक परंपरा के माध्यम से संरक्षित रखा। डिंगल की उच्च स्वर वाली, वीरतापूर्ण शैली इसे एक अनोखी काव्य भाषा बनाती है, जो श्रोताओं के हृदय में जोश भर देती थी।

आज यह भाषा लुप्तप्राय है, किंतु इसके ग्रंथ और गीत राजस्थानी संस्कृति की पहचान हैं।

नामकरण और व्युत्पत्ति

डिंगल शब्द ‘डिम् + गल’ से व्युत्पन्न माना जाता है, जहाँ ‘डिम्’ डमरू की ध्वनि और ‘गल’ गले को संदर्भित करता है, अर्थात् वीर रस की गर्जना वाली भाषा।

“डिंगल” शब्द की व्युत्पत्ति पर विद्वानों में मतभेद हैं। टेसिटोरी  के अनुसार यह “अनियमित” या “गँवारू” अर्थ देता है क्योंकि यह ब्रज की तुलना में कम परिष्कृत थी। हरप्रसाद शास्त्री इसे “डगर” (जांगल देश की भाषा) से जोड़ते हैं। चंद्रधर शर्मा गुलेरी इसे यादृच्छिक अनुकरण शब्द मानते हैं। शक्तिदान कविया इसे पश्चिमी राजस्थान के अपभ्रंश से व्युत्पन्न मानते हैं।

उद्भव और विकास

डिंगल का उद्भव पश्चिमी राजस्थान के अपभ्रंश (विशेषकर मारु-गुर्जरी अपभ्रंश या गुर्जरी अपभ्रंश) से हुआ। भाषाविदों के अनुसार, संस्कृत और प्राकृत से निकले अपभ्रंश शब्दों ने पश्चिमी अपभ्रंश को जन्म दिया। पश्चिमी अपभ्रंश से बोलचाल की भाषा के रूप में डिंगल का विकास हुआ जिसने बाद में साहित्यिक स्वरूप धारण कर लिया। 

डिंगल शब्द का सबसे प्राचीन उल्लेख 8वीं शताब्दी में जैन आचार्य उद्योतन सूरी (Udyotan Suri) द्वारा रचित ‘कुवलयमाला’ (Kuvlayamala) में मिलता है। शक्तिदान कविया के अनुसार ९वीं शताब्दी तक डिंगल पूर्ण रूप से अस्तित्व में आ चुकी थी और पूरे क्षेत्र की साहित्यिक भाषा बन गई।

झवेरचंद मेघाणी इसे अपभ्रंश और प्राकृत से विकसित चारणी भाषा मानते हैं, जो राजस्थान-सौराष्ट्र के बीच स्वतंत्र रूप से प्रचलित हुई और सिंधी, कच्छी जैसी ध्वन्यात्मक भाषाओं से प्रभावित हुई। १२वीं शताब्दी के आस-पास गुर्जरी-गोजरी प्रभाव से इसका और विकास हुआ।

इस प्रकार यह भाषा 12वीं-13वीं शताब्दी तक राजस्थानी और गुजराती में विकसित हो गई। यह मरुभाषा या मारवाड़ी का साहित्यिक रूप थी, जो बोलचाल की भाषा से भिन्न किंतु निकट थी।

चारण समुदाय ने इसे अपना लिया, वे राजपूत दरबारों के इतिहासकार, वंशावलीकार और युद्ध-प्रेरक थे। डिंगल में रचे गए हजारों डिंगल गीत (वीर गीत) मौखिक रूप से पीढ़ियों तक चले। लिखित साहित्य १४वीं-१५वीं शताब्दी में फला-फूला।

16वीं शताब्दी में जैन कवि कुशलाभ की ढोलामारु री चौपाई (Dhola Maru Ri Choupai) या ढोला मारू रा दूहा (Dhola Maru Ra Duha), उडिंगल नाम माला  (Udingal Nam Mala) और सायांझी झूला के नाग-दमन  (Nag Daman) में भी इसका प्रयोग हुआ।

बांकीदास आशिया ने कुकवि बत्तीसी  (वि.सं. १८७१) में इसे साहित्यिक शैली के रूप में प्रयुक्त किया-

 “डींगलियाँ मिलियाँ करै, पिंगल तणो प्रकास”।

17वीं शताब्दी में पदम भगत की ‘रुकमणी मंगल’ (Rukmani Mangal) में इसे अपनी भाषा कहा गया है। इस प्रकार डिंगल 16वीं से 19वीं शताब्दी तक चरम पर थी।

ब्रिटिश काल में इसका ह्रास हुआ, किंतु साहित्यिक रूप में 19वीं शताब्दी तक जीवित रही। 19वीं शताब्दी में जोधपुर नरेश मानसिंह राठौड़ इस भाषा में साहित्यिक रचना करने वाले प्रमुख व्यक्ति थे। २०वीं शताब्दी में मुरारीदान, सूर्यमल मीसण तथा शक्तिदान कविया आदि ने इस भाषा में साहित्यिक रचनाएं लिखीं।

इस प्रकार डिंगल लगभग 1200-1300 वर्ष पुरानी है, जो अपभ्रंश युग से लेकर वर्तमान समय तक रचे गए राजस्थानी साहित्य की महत्वपूर्ण कड़ी है।

डिंगल भाषा की विशेषताएँ

डिंगल उच्च स्वर वाली, ओजपूर्ण भाषा है जिसे विशेष शैली में बोला जाता है। इसमें प्राचीन शब्द संरक्षित हैं, जो अन्य हिन्द-आर्य भाषाओं में नहीं मिलते। शब्दावली में संस्कृत, सिंधी, फारसी, पंजाबी और गुजराती के तत्व हैं। व्याकरण पुराने रूपों और नव-निर्माण से युक्त है।

इसमें तद्भव, अर्ध-तत्सम, देशज और प्राचीन अपभ्रंश शब्दों का भरपूर प्रयोग होता है, जिससे यह सामान्य लोगों के लिए कठिन समझ आती है। इसमें सिंधी, फारसी, पंजाबी और संस्कृत के शब्द मिश्रित हैं। व्याकरण पश्चिमी राजस्थानी के अनुरूप है, किंतु शब्दावली अत्यंत समृद्ध और पुरातन है।

डिंगल गीत इसकी सबसे अनोखी विशेषता है। ये गाए नहीं जाते, अपितु वैदिक मंत्रों की तरह एक साँस में उच्च स्वर में पाठ किए जाते हैं। 120 प्रकार के गीत हैं, जिनमें 70-90 प्रचलित। विकटबंध गीत इतने जटिल होते हैं कि 54 मात्राओं वाली पंक्ति भी एक स्वर में बोली जाती है। छंदों में 22 प्रकार के छप्पय, 12 प्रकार के निशानी और 23 प्रकार के दोहे प्रमुख हैं। जत्था (18 प्रकार), वैणसगाई (अनुप्रास) और उक्ति जैसे तत्व रचना को समृद्ध बनाते हैं।

डिंगल भाषा के कवियों में  11 दोषों से बचाव का कठोर नियम है।

डिंगल भाषा के प्रमुख कवि

डिंगल साहित्य मुख्यतः चारण कवियों का है। किंतु राजपूत, पंचोली, मोतीसर, ब्राह्मण, जैन आदि ने भी योगदान दिया। प्रारंभिक चारण कवि मुख्यतः राजपूत शासकों के दरबारी कवि थे। बहुत से डिंगल कवियों का समय निश्चित नहीं किया जा सका है। दलपत विजय (Dalpat Vijay)  जैसे महान डिंगल कवि का कालखण्ड कुछ विद्वान 9वीं शताब्दी मानते हैं तो कुछ विद्वान 17वीं – 18वीं शताब्दी मानते हैं।

क्रमकवि / लेखककालखण्डप्रमुख ग्रंथ / रचनाएँ
1दलपति विजय  9वीं शताब्दी (17वीं-18वीं शताब्दी)खुमाण रासो
2नरपति नाल्ह12वीं शताब्दी ईस्वीबीसलदेव रासो
3चंदबरदाई12वीं शताब्दी ईस्वीपृथ्वीराज रासो
4बादर ढाढी14वीं-15वीं शताब्दी ईस्वीमारवाड़ के राठौड़ वीरम, रावल मल्लीनाथ और गोगादेव के वीरतापूर्ण कार्यों का वर्णन है।                                
5श्रीधर व्यास14 वीं -15वीं शताब्दी ईस्वीरणमल छंद, कवित्त भागवत, सप्तसती रा छंद,
6पदम भगत15वीं शताब्दी ईस्वीरुकमणी मंगल 
7मालदेव सोनगरा15वीं शताब्दी ईस्वीराठौड़ा रासो
8सायांजी झूला16वीं शताब्दीरुक्मणी हरण, नागद मण
9पृथ्वीराज राठौड़16वीं शताब्दी (1549-1600 ईस्वी)वेलि क्रिसण रुकमणी री, दसरथ राउत, गंगा लहरी
10दुरसा आढ़ा16वीं-17वीं शताब्दी ईस्वीविरुद छहतरी, किरतार बावणी, राव सुरताण रा कवित्त
11इसरदास जी16वीं-17वीं शताब्दी ईस्वीहरिरस, देवीयाण, हालां झालां रा कुंडलिया
12नैनसी17वीं शताब्दी ईस्वीनैनसी री ख्यात, मारवाड़ रा परगना री विगत
13गिरधर आसिया18वीं शताब्दी ईस्वीसगत रासो (महाराणा प्रताप के भाई शक्ति सिंह पर आधारित)
14बांकीदास आशिया18वीं–19वीं शताब्दी ईस्वीबांकीदास री ख्यात, राजपूताना री ख्यात
15सूर्यमल्ल मिश्रण19वीं शताब्दी ईस्वीवंश भास्कर, वीर सतसई, बलवंत विलास
16कवि करणीदान18वीं शताब्दी ईस्वीराव जोधा रासो
17दूदा कवि16वीं शताब्दी ईस्वीवीरगाथात्मक डिंगल कविताएँ
18हरिदास चारण17वीं शताब्दी ईस्वीयुद्ध-वर्णन एवं प्रशस्तियाँ
19करणीदान कविया18वीं शताब्दी ईस्वीसूरज प्रकाश (जोधपुर के महाराजा अभय सिंह के दरबारी कवि)
20स्वामी स्वरूपदास 19वीं शताब्दी ईस्वीपांडव यशेंदु चंद्रिका (राजस्थानी भाषा में महाभारत पर आधारित काव्यात्मक रचना जिसमें पांडवों के यश का चंद्रिका के रूप में वर्णन)
21मुरारीदान मिश्रण (सूर्यमल मीसण के पुत्र)1886 ईस्वीसूर्यमल मीसण की मृत्यु के बाद वंश भास्कर को पूर्ण किया। जसवंत जसोभूषण नामक प्रमुख ग्रंथ लिखा। यह जोधपुर के महाराजा जसवंत सिंह के यशोगान पर आधारित ऐतिहासिक काव्य है। वे डिंगल कोश के रचयिता भी माने जाते हैं।
22मुरारिदान कविया20वीं शताब्दी ईस्वीडिंगल काव्य-संकलन एवं शोध
23हमीर दान रतनू1774 ईस्वीहमीरनाममाला
24कुशलाभ+ हरराज (जैसलमेर)1618 ईस्वीउडिंगल नाममाला
25नागराज पिंगल1821 ईस्वीनागराज डिंगल कोष
26सुखदेव प्रसाद काकआधुनिकडिंगल कोष (60,000+ शब्द)
27सीताराम लालासईस्वीराजस्थानी शब्द कोष (2 लाख+ शब्द)।
28किसनाजी आढ़ादुरसाजी आढ़ा (1535-1655) के समकालीनरघुवर जस प्रकाश  
29मंछाराम सेवक  लगभग 1770 ईस्वी के आसपासरघुनाथ रूपक (Raghunath Rupak) या रघुनाथ रूपक गीता रो
30चतुरसिंह (बावजी)1880-1929 ईस्वीचतुर चिंतामणि सबसे प्रसिद्ध कृति, जिसमें दोहे, सोरठे और नीति-परक विचार हैं (लोकनीति, वैराग्य और चेतावनी के दोहे प्रसिद्ध)। चतुर प्रकाश, अनुभव प्रकाश, परमार्थ विचार, मानव मित्र रामचरित्र, अलख पच्चीसी, हनुमत पंचक, चन्द्रशेख स्तोत्र, शूरी सतियां, जगदीश्वर जीवाय दियो, योग सूत्र की भूमिका आदि।
31उदयराम बारहठलगभग 1750-1800 ईस्वी के आसपास  अवधान-माला (Avdhan Mala): डिंगल छंदों और शब्दों का संग्रह, जिसमें बादल, वर्षा आदि के पर्यायवाची दिए गए हैं। यह ‘कवि-कुल-बोध’ का भाग है। अनेकार्थी कोष (Anekarthi Kosh): डिंगल शब्दों के अनेकार्थी अर्थों का संकलन, संस्कृत और लोक भाषा के शब्दों सहित। एकाक्षरी कोष या अन्य छोटे कोष: डिंगल के पर्यायवाची, एकाक्षरी और छंदोबद्ध प्राचीन कोषों का संकलन। कवि-कुल-बोध (Kavi Kul Bodh): मुख्य ग्रंथ, जिसमें उपरोक्त कोष शामिल हैं। यह डिंगल साहित्य के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण है।

अन्य महत्वपूर्ण रचनाएँ

उपरोक्त ग्रंथों के अतिरिक्त डिंगल साहित्य में रासो ग्रंथ, वंशावलियों एवं ख्यातों का भी महत्वपूर्ण स्थान है। इसी प्रकार वेलि, झूलणा, दूहा, नाममालाएँ आदि अनेक ग्रंथ लिखे गए जिनकी जानकारी अलग लेखों में दी गई है।

डिंगल भाषा के प्रमुख ग्रंथों की सूची हमारे दो आलेखों- “चारण साहित्य : राजस्थान की गौरवशाली वाचिक और लिखित परंपरा” तथा “वीरगाथा काल : हिंदी साहित्य का आदिकाल” में उपलब्ध है।

डिंगल भाषा का महत्व

डिंगल भाषा राजस्थान की सांस्कृतिक स्मृति को सुरक्षित रखने का सबसे शक्तिशाली माध्यम है। चारण कवि इसे वीरों को प्रेरित करने, वंशावलियों को संरक्षित करने और नैतिक मूल्यों को स्थापित करने के लिए प्रयोग करते थे। यह मौखिक परंपरा थी, जो दरबारों, युद्धक्षेत्रों और सभाओं में गूँजती थी। डिंगल ने राजपूत वीरता, स्वाभिमान और बलिदान की भावना को अमर किया। यह पिंगल (प्रेम-भक्ति प्रधान, भाट कवियों की) से भिन्न है –

डिंगल ने राजस्थानी सांस्कृतिक पहचान को मजबूत किया। यह इतिहास का वैकल्पिक स्रोत है, जो शिलालेखों से परे मानवीय भावनाएँ बखानती है। आधुनिक राजस्थानी और गुजराती का पूर्वज होने के नाते यह भाषाई विकास की कड़ी है। आज भी यह राजस्थान की लोक स्मृति में जीवित है, जहाँ डिंगल गीत वीरता जगाते हैं।

डिंगल का सबसे बड़ा महत्व यह है कि इसने राजपूत शौर्य, चारण ओज, राजवंशावलियाँ और ऐतिहासिक घटनाओं को लिखित-अलिखित रूप में संरक्षित किया, जब औपचारिक इतिहास-लेखन था। चारण युद्धक्षेत्र में जाकर गीत गाते थे, जिससे सैनिकों में अदम्य साहस आता था। यह भाषा जीवन मूल्यों (वीरता, औदार्य, भक्ति, नीति, लोकव्यवहार) का प्रतिनिधित्व करती है। डॉ. गजादान के अनुसार, “डिंगल मूलतः जीवन मूल्यों से जुड़ी भाषा है… इसका मूल स्वर ओज है”।

यह पिंगल (पूर्वी राजस्थानी, भाटों की भाषा, ब्रज प्रभावित, शृंगार-भक्ति प्रधान) से स्पष्ट भिन्न है। डिंगल वीर रस की, पिंगल शृंगार की।

डिंगल पश्चिमी राजस्थानी का साहित्यिक रूप है। इसने क्षेत्रीय संस्कृति, भाषाई विविधता और हिन्द-आर्य भाषाओं के विकास में योगदान दिया। आज भी राजस्थानी गौरव, लोकगीतों और सिनेमा-नाटकों में डिंगल गीतों का प्रभाव दिखता है।

अन्य महत्वपूर्ण तथ्य

  • क्षेत्रीय विस्तार: राजस्थान, गुजरात, कच्छ, मालवा, सिंध।
  • शब्दकोश: हमीरनाममाला (1774, हमीर दान रतनू), डिंगल कोष (मुरारीदान मिश्रण, 1886), उडिंगल नाममाला (1618, कुशलाभ), नागराज डिंगल कोष (1821) आदि। आधुनिक: सुखदेव प्रसाद काक का डिंगल कोष (60,000+ शब्द), सीताराम लालास का राजस्थानी शब्द कोष (2 लाख+ शब्द)।
  • कवि समुदाय: चारण प्रमुख, किंतु अन्य जातियाँ भी। सूर्यमल्ल मिश्रण, बांकीदास, इसरदास, वीरभाण रतनू आदि।
  • डिंगल कोष और नाममालाएँ शब्दावली संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण हैं।
  • डिंगल गीत “साख री कविता” (गवाही की कविता) कहलाते हैं, क्योंकि चारण इन्हें साक्षी के रूप में प्रस्तुत करते थे।
  • जटिलता के कारण केवल दीक्षित विद्वान ही इसे पूर्णतः समझ और उच्चारण कर पाते थे।
  • राजपूत राजा जैसे महाराजा मानसिंह राठौड़ (मारवाड़) भी डिंगल में कविता करते थे।
  • आधुनिक विद्वान (शक्तिदान कविया, सुखदेव प्रसाद काक, सीताराम लालस आदि) ने कोश और अध्ययन किए।
  • अन्य: डिंगल में 11 दोष निषिद्ध, विशिष्ट अनुप्रास। यह प्राकृत का बच्चा जैसी भाषा मानी जाती है।
  • वर्तमान स्थिति: 19वीं शताब्दी बाद ह्रास हुआ, किंतु आज संरक्षण प्रयास जारी। डिंगल अब कम बोली जाती है, किंतु साहित्य अध्ययन में महत्वपूर्ण। वर्तमान में यह भाषा संकट में है; UNESCO जैसी संस्थाओं द्वारा संरक्षण की जरूरत है।

निष्कर्ष

डिंगल भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं, अपितु राजस्थान की आत्मा है। इसका उद्भव अपभ्रंश से हुआ, विकास चारणों के माध्यम से हुआ और महत्व आज भी उतना ही प्रासंगिक है। कान्हड़दे प्रबंध  जैसे ग्रंथ देशभक्ति की अमर गाथाएँ हैं, जबकि हजारों डिंगल गीत शौर्य की अमिट यादें। जब तक राजस्थानी माटी में वीरता का स्वर गूँजता रहेगा, डिंगल का ओज जीवित रहेगा। हमें इसे संरक्षित करने, पढ़ने-समझने और नई पीढ़ी तक पहुँचाने का दायित्व निभाना चाहिए।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

Dr. Mohanlal Gupta
Dr. Mohanlal Guptahttps://rajasthanhistory.com
डॉ. मोहनलाल गुप्ता राजस्थान के जाने-माने इतिहासकार एवं लेखक हैं। उनकी सौ से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं तथा पत्र-पत्रिकाओं में हजारों आलेख प्रकाशित हुए हैं।

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