Tuesday, February 27, 2024
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45. हरामखोर

-‘जो कोई सरदार, सामंत, मुत्सद्दी या उमराव, सिंध के मीर वीजड़ तालपुरिया का सिर काटकर मरुधरानाथ की खिदमत में पेश करेगा, उसे पचास हजार कलदार ईनाम में दिये जाएंगे।’ दीवान फतहचंद सिंघवी ने भरे दरबार में सनसनीखेज घोषणा की।

-‘सिंध जाने वाले सरदार को जोधपुर से बीस हजार राठौड़ों की घुड़सवार सेना और उसके निर्वहन के लिये साल भर का पूरा खर्च पहले ही दिया जायेगा। पचास हजार कलदार भी सेना के प्रयाण से पूर्व दिये जायेंगे तथा उन सरदारों का इस साल का रेखबाब भी माफ कर दिया जायेगा। चूंकि मीर वीजड़ के चालीस हजार अश्वारोही और पदाति सैन्य के समक्ष राठौड़ों की बीस हजार घुड़सवारों की सेना कम रहेगी इसलिये सिंध का अमीर मियाँ गुलामअली खाँ भी घुड़सवारों की एक सेना उपलब्ध करवायेगा। सरदार चाहें तो अपने घुड़सवार और पैदल सैनिक भी साथ ले जा सकते हैं किंतु उनका खर्च उन्हें स्वयं उठाना होगा। विजय प्राप्त होने पर सरदार, श्रीजी साहब की विशेष कृपा प्राप्त करने के अधिकारी होंगे।’ दीवान ने अगली घोषणा की।

इस घोषणा ने दरबार में उपस्थित सामंतों और मुत्सद्दियों के हृदयों की धड़कनों को बढ़ा दिया। धन, यश और राजकीय कृपा अर्जन का यह दुर्लभ अवसर था किंतु मीर वीजड़ के चालीस हजार घुड़सवारों और पदाति सेना के समक्ष बीस हजार घुड़सवारों की सेना काफी कम थी। कौन जाने सिंध तक पहुँचते-पहुँचते कितनी सेना रास्ते में समाप्त हो जाये!

-‘वीजड़ कई दिनों से गिराब और पीराऊ की रक्षा चौकियों को तोड़कर मारवाड़ की सरहद में घुसकर बड़ा नुक्सान कर रहा है। वह इससे भी आगे बढ़कर पोकरण, फलौदी और कोटड़ा पर अधिकार करने की ताक में है। यदि उस पर लगाम न कसी गई तो वह सिन्ध से लगने वाले मारवाड़ के इलाके को वैसे ही उजाड़ डालेगा जैसे रोजड़े खेत को उजाड़ डालते हैं। आपमें से जो सरदार मारवाड़ की सेवा करने को तैयार हो, वह बीड़ा उठा ले।’ मरुधरपति ने सरदारों के चेहरों पर तेजी से आ-जा रहे भावों को पढ़ने का प्रयास करते हुए कहा।

दीवान का संकेत पाकर ड्यौढ़ीदार ने चांदी की बड़ी सी थाली में, चांदी के बर्क से ढंककर रखे हुए पान के बीड़े सामंतों के सामने घुमाये। जिस किसी सरदार के सामने से थाली निकली, उसी सरदार के मुँह में पानी आ गया। प्रत्येक सरदार का मन तो कहता था कि बीड़ा उठा ले किंतु उसका मस्तिष्क उसे ऐसा करने से रोकता था।

ड्यौढ़ीदार थाली लेकर जैसे ही हरनाथसिंह माण्डणोत पर उपेक्षा भरी दृष्टि डालता हुआ उसके सामने से निकला, हरनाथसिंह ने ड्यौढ़ीदार का हाथ पकड़ लिया- ‘ठहरो!’

सारे सामंतों ने चौंककर हरनाथसिंह की ओर देखा। हरनाथसिंह ने पूरे दरबार में दृष्टि घुमाई, उसने पाया कि मोहकमसिंह पातावत उसी की ओर देख रहा है। दोनों जोधों की दृष्टियाँ परस्पर टकराईं और अगले ही क्षण उन दोनों ने एक-एक बीड़ा उठाकर मुँह में रख लिया।

-‘हमें आशीर्वाद दीजिये अन्नदाता कि वीजड़ का सिर काटकर मारवाड़ पर न्यौछावर कर दें।’ माण्डणोत और पातावत सरदारों ने अपने स्थान पर खड़े होकर मरुधरपति को मुजरा किया।

-‘हम नहीं जानते कि भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है! हम यह भी नहीं जानते कि हम अपने दो बहादुर सरदारों को खोने जा रहे हैं या उमरकोट पाने जा रहे हैं किंतु एक बात अवश्य जानते हैं….।’ मरुधरपति ने बात अधूरी छोड़कर बीड़ा उठाने वाले सरदारों की ओर देखा, ‘राठौड़ों ने अपनी प्यारी मारवाड़ की रक्षा अपने मोटे माथे देकर की है। हम इन मोटे माथों को अकारण खोना नहीं चाहते किंतु मारवाड़ को इस समय कुछ मोटे माथों की बलि की आवश्यकता है।’ महाराजा ने बात पूरी की।

-‘महाराज! मोटे माथे बनते ही खोने के लिये हैं क्योंकि इनके खोने में ही सब-कुछ पाने का रास्ता छिपा है।’ हरनाथसिंह ने हाथ जोड़कर उत्तर दिया।

-‘मरुधरानाथ! यह सेवक भी कुछ अर्ज करना चाहता है।’ जोगीदास बारठ ने हाथ जोड़कर निवेदन किया।

-‘कहो बारठ।’ मरुधरानाथ ने अभयदान की मुद्रा में हाथ उठाकर बारठ को बोलने की अनुमति प्रदान की।

-‘यह सेवक भी जोधों के साथ उमरकोट के अभियान पर जाना चाहता है।’

-‘क्या कोई विशेष कारण है?’

-‘हाँ महाराज विशेष कारण है। मुझे स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि जोधों का यह अभियान आने वाले इतिहास में अमर हो जाने वाला है। इसलिये मैं भी इस अभियान में हिस्सा लेकर अमर होना चाहता हूँ।’

-‘ठीक है, आप भी उमरकोट जायें।’ मरुधरानाथ ने मुस्कुराकर बारठ की इच्छा पूरी की और पुरस्कार स्वरूप अपने गले से मोतियों की कण्ठी उतार कर बारठ को प्रदान की।

अगले ही महीने दोनों राठौड़ सरदार जोगीदास बारठ, बीस हजार सैनिक, एक साल का खर्चा और पचास हजार कलदारों का पुरस्कार लेकर उमरकोट की ओर चल पड़े।

यह 1779 ईस्वी की एक चमकीली प्रातः थी जब राठौड़ों का कटक फलौदी, पोकरण और कोटड़ा होता हुआ सिंध की सीमा में घुसा। जब से वे जोधपुर से चले थे, चारांे ओर रेगिस्तान ही रेगिस्तान पसरा हुआ था और वे हर कदम पर घनघोर रेगिस्तान में गहरे धंसते जा रहे थे किंतु जिस सिंधु क्षेत्र में आज उन्होंने प्रवेश किया था, वह तो रेत का महासिंधु ही जान पड़ता था जिसमें उठते रेत के बगूले विशाल भंवर के समान दिखाई देते थे।

सोजत के हाकिम खूबचंद सिंघवी का वकील सेवग थानू, एक साण्ड पर बैठकर, राठौड़ सेना का मार्गदर्शन करता हुआ सबसे आगे चल रहा था। वह पहले भी इसी मार्ग से सिंध पहुँचा था और वीजड़ से मिलकर उसकी सैन्य शक्ति को भली-भाँति तौल चुका था। उसी ने महाराजा विजयसिंह को वीजड़ के चालीस हजार खूंखार सैनिकों के बारे में सूचित किया था।

जब राठौड़ों की सेना वीजड़ के डेरों से कुछ कोस दूर रह गई तब राठौड़ सरदारों ने सेवग थानू को वापस जोधपुर के लिये रवाना कर दिया। थानू ब्राह्मण था और राठौड़ सरदार नहीं चाहते थे कि युद्ध के मैदान में किसी ब्राह्मण के प्राण जायें।

जब सेवग चला गया तब दोनों राठौड़ सरदारों ने मीर वीजड़ के डेरों से केवल पाँच कोस की दूरी पर अपने डेरे लगवाये और वीजड़ के पास संदेश भिजवाया कि मारवाड़ नरेश ने हमें आपसे वार्त्ता करने के लिये भेजा है ताकि मारवाड़ और सिंध की सीमा पर शांति स्थापित हो सके। अतः या तो आप हमारे डेरे पर पधारें या हमें अपने डेरों पर बुला लें।

मीर वीजड़ मारवाड़ की सेना की सारी गतिविधियों से परिचित था। वह यह जानकर प्रसन्न था कि राठौड़ों ने केवल बीस हजार घुड़सवार लड़ने के लिये भेजे हैं जबकि उसके अपने पास चालीस हजार घुड़सवार और पदाति सेना थी। उसने राठौड़ सामंतों को अपने डेरे पर आने का निमंत्रण भिजवाया। जिस दिन दोनों राठौड़ सरदार केसरिया पाग धारण करके, पूरी तरह सज-धज कर जोगीदास बारठ के साथ मीर के डेरों पर पहुँचे, उस दिन दीपावली आने में केवल तीन दिन शेष बचे थे। मीर ने बनठन कर आये इन राठौड़ सरदारों का जोर-शोर से स्वागत किया।

वीजड़ दुष्ट स्वभाव का व्यक्ति था। वह अपने स्वामी मियाँ गुलाम अलीखाँ से भी द्रोह रखता था और अपने सामने किसी को कुछ गिनता नहीं था। उसका अनुमान था कि मारवाड़ के सामंत महाराजा के प्रति वफादारी नहीं रखते, इसलिये उन्हें लालच देकर आसानी से फुसलाया जा सकता है, वह इसी फिराक में था और इसी उद्देश्य से उसने राठौड़ सरदारों को अपने डेरों पर बुलाया था। औपचारिक स्वागत सत्कार के बाद पातावत सरदार मोहकमसिंह ने काम की बात आरंभ की। वीजड़ के साथ उसके दो अमीर भी इस वार्त्तालाप में सम्मिलित हुए।

-‘खाँ साहब, आपके सैनिक गिराब तथा पीराउ तक अंदर घुसकर उपद्रव मचाते हैं। मरुधर नरेश चाहते हैं कि आप अच्छे पड़ौसियों की तरह व्यवहार करें तथा मारवाड़ की सीमा का अतिक्रमण न करें।’

-‘सरदारां! आप हमें यह बताईये कि जब महाराजा विजयसिंह ने अपने भाई रामसिंह को ही दो मुट्ठी बाजरा खाने के लिये धरती नहीं दी, तब हमसे वह किस तरह के अच्छे पड़ौसी होने की आशा करते हैं।’ दुष्ट वीजड़ ने हँसकर जवाब दिया।

-‘वह हमारे घर का झगड़ा था, उसमें आप न पड़ें।’

-‘मत भूलिये सरदारां कि राजनीति के झगड़े घर के नहीं होते, वे पड़ौसियों से भी जुड़े हुए होते हैं।’

-‘तो क्या मरुधरानाथ यह समझें कि आपने स्वर्गीय रामसिंह का बदला लेने के लिये हमसे रार करने की ठानी है?’

-‘केवल रामसिंह ही क्यों, हम तो मारवाड़ के सारे राठौड़ सरदारों का बदला लेने के लिये महाराजा विजयसिंह से वैर ठानने को तैयार हैं।’ वीजड़ ने एक कुटिल मुस्कान के साथ अपनी बात कही। वह भेद बुद्धि उत्पन्न करने में माहिर था। उसे विश्वास था कि वह किसी को अपनी बातों से अपने पक्ष में कर सकता है। वह मारवाड़ रियासत में हो रही गतिविधियों से पूरी तरह परिचित था और राठौड़ सरदारों को बहका कर महाराजा के विरुद्ध करना चाहता था।

-‘हम आपकी बात नहीं समझे।’ हरनाथसिंह ने मदिरा का घूंट भरते हुए कहा।

-‘इसमें समझना क्या है सरदारां, जिस तरह देवीसिंह चाम्पावत, जैतसिंह चाम्पावत, केसरीसिंह उदावत, छत्रसिंह और जगतसिंह मारे गये, एक दिन आपकी भी बारी आ सकती है।’

-‘तो?’ जोगीदास ने उसकी बात में रुचि दिखाते हुए पूछा।

-‘यह क्यों भूलते हैं कि विजयसिंह उसी बखतसिंह का बेटा है जिसने अपने बाप अजीतसिंह की हत्या अपने हाथों से की। जो अपने बाप का नहीं हुआ, उसका बेटा अपने सरदारों को एक-एक करके मरवाता रहे तो अचंभा ही क्या है।’ वीजड़ को लगा कि बात जमने लगी है।

-‘बात तो आप ठीक कहते हैं, किंतु हमने सुना है कि आपने भी अपने बादशाह मियाँ गुलामअली खाँ के दीवान लिखी ताजा और सावठिया ताजा को सिंध से बाहर खदेड़कर बादशाह को कैद कर रखा है।’

-‘राठौड़ां! सिंध की धरती वीरों की धरती रही है। एक कायर बादशाह को हम पर हुकूमत चलाने का हक नहीं है। फिर भी हमने बादशाह को कैद तो नहीं किया किंतु उसे इस बात पर मजबूर कर दिया है कि वह हमारे हुकुम को बजाता रहे।

-‘जो अमीर अपने बादशाह से हुकुम बजवाते हैं, उन्हें मारवाड़ में हरामखोर कहा जाता है।’ हरनाथसिंह माण्डणोत ने गुस्से में खड़े होकर कहा। इससे पहले कि वीजड़ संभल पाता। दोनों राठौड़ों ने अपनी कटारें निकालकर वीजड़ के सीने में भौंक दीं। कटारें अमीर की पसलियों को तोड़ती हुई भीतर तक धंस गईं। उसी के साथ उसकी छाती से रक्त के फव्वारे फूट पड़े। अचानक हुए इस आक्रमण से घबराकर वीजड़ भयानक भैंसे की तरह डकराया। वीजड़ के दोनों अमीरों ने खंजर उठाकर हरनाथसिंह पर वार किया किंतु पहले से ही सतर्क बैठे जोगीदास बारठ ने उनके वार निष्फल कर दिये। तब तक दोनों राठौड़ वीजड़ से मुक्ति पा चुके थे। उन्होंने वीजड़ के साथियों पर ताबड़तोड़ वार करके उन्हें भी यमलोक पहुँचा दिया। ठीक इसी समय, भीतर चल रहे गुल गपाड़े की आवाजें सुनकर बाहर मौजूद वीजड़ के सैनिक डेरे का पर्दा पलट कर भीतर आये।

सिन्धियों द्वारा दोनांे राठौड़ सरदार और बारठ जोगीदास बुरी तरह घेर लिये गये। इससे पहले कि राठौड़ों की सेना वीजड़ के डेरों तक पहुँच पाती, ये तीनों ही उसी स्थान पर रणखेत रहे। राठौड़ों की सेना ने अपने सरदारों के अंत के बारे में सुना तो उनमें भगदड़ मच गई। उन्होंने उसी समय कुछ संदेशवाहक जोधपुर के लिये रवाना किये और स्वयं अपने डेरे तम्बू उखाड़ कर कई कोस पीछे जाकर बैठ गये। संदेशवाहक तेज दौड़ने वाली साण्डों पर बैठकर जोधाणे की ओर दौड़े।

जैसे ही डेरा गाजी खां में बैठे मियाँ गुलामअली खां को ज्ञात हुआ कि राठौड़ों ने दुष्ट वीजड़ को उसके डेरे में ही मार डाला तो उसने तत्काल अपनी सेना उमरकोट के लिये रवाना की ताकि वीजड़ की सेना राठौड़ों का अधिक नुक्सान न कर सके। उसने अपने दीवान लिखी ताजा को जोधपुर भेजकर महाराजा को विश्वास दिलाया कि यदि राठौड़ उमरकोट पर अधिकार करेंगे तो मियाँ गुलामअली खां को इस पर ऐतराज नहीं होगा।

इधर महाराजा का बख्शी भीमराज सिंघवी भी एक कटक सिंध के लिये भेजकर चैन से नहीं बैठा था। महाराजा के आदेश से वह सिंध के लिये दूसरा कटक तैयार करने में लगा हुआ था। जैसे ही वीजड़ की हत्या और तीनों राठौड़ सरदारों के बलिदान का समाचार जोधपुर पहुँचा, महाराजा ने दूसरी कटक भी सिन्ध की ओर रवाना कर दी। इस कटक ने सिंध पहुँच कर उमरकोट को घेर लिया और कुछ दिनों की घमासान लड़ाई के बाद उमरकोट पर अधिकार कर लिया।

महाराजा विजयसिंह की यह शानदार उपलब्धि थी जिसे मारवाड़ के इतिहास में युगों तक स्मरण रखा जाना था। बारठ जोगीदास तो अब संसार में नहीं रहा था किंतु उसने कुछ माह पूर्व दरबार में जो कुछ मरुधरानाथ से कहा था, वह अक्षरंशः सही सिद्ध होने वाला था।

यह उपलब्धि जोधपुर राज्य के लिये अतिरिक्त खर्चीली सिद्ध हुुई थी किंतु अपनी रेगिस्तानी सीमा को सुरक्षित बनाने के लिये महाराजा के पास अन्य कोई उपाय भी तो नहीं था! मरुधरानाथ ने हरनाथसिंह, मोहकमसिंह और जोगीदास के पुत्रों को क्रमशः अलाय, करणू और रिनिया गाँव जागीर में दिये।

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