राजस्थानी भाषा के प्राचीन ग्रंथ मुख्यतः डिंगल‑पिंगल परंपरा, ख्यात और रासो साहित्य के रूप में मिलते हैं। नीचे राजस्थानी भाषा के सात ग्रंथ संक्षिप्त विवरण के साथ दिए गए हैं।
राजस्थानी भाषा के सात ग्रंथ
1. कुवलयमाला – उद्योतनसूरी (प्राकृत)
- यह ग्रंथ मूलतः प्राकृत भाषा मिश्रित स्थानीय भाषाओं में है, किंतु 8वीं शताब्दी में जलोर (राजस्थान) में उद्योतनसूरी द्वारा रचित होने के कारण प्राचीन राजस्थान की सांस्कृतिक झलक देता है।
- कुवलयमाला में उस समय के सामाजिक जीवन, नगरों, व्यापार, धार्मिक गतिविधियों और लोकाचार का अच्छा चित्रण है।
- यद्यपि यह शुद्ध राजस्थानी नहीं, परंतु प्राकृत से अपभ्रंश और आगे राजस्थानी रूपांतरण को समझने में महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है।
- जैन आचार्यों की यह साहित्यिक परंपरा बाद के राजस्थानी जैन ग्रंथों और कथाओं का आधार बनी।
- राजस्थान की आरंभिक साहित्यिक–सांस्कृतिक पृष्ठभूमि जानने के लिए इसे प्राचीन स्रोत के रूप में पढ़ा जाता है।
2. खुमाण रासो – दलपत विजय
- दलपत विजय ने खुमाण रासो की रचना 9वीं शताब्दी ईस्वी में की।
- खुमाण रासो में मेवाड़ के शासक राणा खुमाण की वीरता, पराक्रम और समकालीन युद्धों को काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया है।
- यह भी रासो परंपरा का अंग है और राजपूत नायकों का आदर्श वीर चरित गाथा रूप में सामने लाता है।
- ग्रंथ में अनेक युद्धों, किलों, दुर्गों और शौर्यपूर्ण प्रसंगों का वर्णन है, जो लोक में गाकर भी सुनाए जाते रहे हैं।
- भाषा और शैली में डिंगल‑पिंगल के तत्व, अनुप्रास, तुक और वीर रस का प्रधान भाव दिखाई देता है।
- इतिहासकार इन रासो‑काव्यों को पूरी तरह तथ्यात्मक न मानकर, किंतु राजपूत मानसिकता, मूल्यबोध और युगीन राजनीतिक वातावरण के अध्ययन हेतु महत्त्वपूर्ण स्रोत के रूप में लेते हैं।
3. पृथ्वीराज रासो – चंदबरदाई
- पृथ्वीराज रासो की रचना 12वीं शताब्दी ईस्वी के उत्तरार्ध में हुई।
- यह पिंगल शैली में रचा वीररस प्रधान महाकाव्य है, जिसे पृथ्वीराज चौहान के दरबारी कवि चंदबरदाई से जोड़ा जाता है।
- ग्रंथ में अजमेर और दिल्ली के चौहान वंश, विशेषकर पृथ्वीराज के युद्धों, प्रेम प्रसंग (संयोगिता) और दिल्ली अभिग्रहण का वर्णन है।
- परंपरा में इसे हिंदी/राजस्थानी क्षेत्र का आरंभिक महाकाव्य माना जाता है, हालांकि वर्तमान पाठ बहुस्तरीय और संशोधित रूप में उपलब्ध है।
- भाषा में ब्रज, पिंगल और प्राचीन राजस्थानी के मिश्रित रूप मिलते हैं, जो उस समय की संक्रमणशील भाषिक स्थिति को दिखाते हैं।
- चौहानों की वीरता, स्वाभिमान और तुर्क शक्ति से संघर्ष का विस्तृत आख्यान होने के कारण यह राजपूत इतिहास की लोकप्रिय स्मृति का मुख्य स्रोत बना।
4. राव जैतसी रो छंद – बीठू सूजाजी
- राव जैतसी रो छंद की रचना 16वीं शताब्दी ईस्वी में हुई।
- यह डिंगल भाषा का प्रसिद्ध काव्य‑ग्रंथ है, जिसमें बीकानेर नरेश राव जैतसी और बाबर के पुत्र कामरान के बीच हुए युद्ध का वर्णन है।
- डिंगल परंपरा मुख्यतः चारण कवियों द्वारा विकसित की गई, जो युद्धवीरों की प्रशंसा और वीरता‑वर्णन के लिए प्रयुक्त होती थी।
- छंद में युद्ध की रणनीति, सैनिकों का उत्साह, शौर्य और राजपूत मर्यादा का अत्यंत सजीव, अतिशयोक्तिपूर्ण चित्रण मिलता है।
- ग्रंथ से बीकानेर के प्रारंभिक राजनीतिक संघर्षों और मुगल संपर्कों की झलक भी मिलती है, जो इतिहास के लिए सहायक है।
- शैलीगत दृष्टि से यह डिंगल काव्य के सुदृढ़ छंद, अनुप्रास और कठोर ध्वनि‑रचना का सुंदर उदाहरण माना जाता है।
5. हम्मीर रासो – जोधराज
- जोधराज ने हम्मीर रासो की रचना 18वीं अथवा 19वीं शताब्दी ईस्वी में की।
- यह ग्रंथ राणा हम्मीर (चित्तौड़/मेवाड़ के शासक) की वीरता और अलाउद्दीन खिलजी के विरुद्ध संघर्ष पर आधारित रासो काव्य है।
- रासो परंपरा में गाथात्मक, लंबी कथाएँ छंदबद्ध रूप में गायी/पढ़ी जाती थीं, जिनमें इतिहास, आख्यान और लोककथा सब घुल-मिल जाते हैं।
- हम्मीर रासो में राजपूत स्वाभिमान, गौ‑रक्षा, धर्मरक्षा और आत्मबलिदान की भावना को अत्यधिक महिमा के साथ चित्रित किया गया है।
- भाषा मिश्रित राजस्थानी‑पिंगल है, जो डिंगल की तुलना में अपेक्षाकृत सरल और गेय मानी जाती है।
- यह ग्रंथ मेवाड़ के मध्यकालीन इतिहास की लोकस्मृति, दुर्गों के संघर्ष और सुल्तानी सत्ता से टकराव को समझने में महत्वपूर्ण माना जाता है।
6. बीकानेर रा राठौड़ री ख्यात – दयालदास सिंधायाच
- बीकानेर रा राठौड़ री ख्यात की रचना 19वीं शताब्दी ईस्वी में हुई।
- यह दो खंडों में उपलब्ध ऐतिहासिक गद्य‑ग्रंथ है, जिसमें जोधपुर और बीकानेर के राठौड़ शासकों की आरंभ से लेकर बीकानेर के महाराजा सरदार सिंह के राज्यारोहण तक की घटनाएँ हैं।
- ख्यात साहित्य मूलतः राजपूत घरानों की वंशावली, युद्ध, संधि, दान और सामाजिक रीति‑नीति का प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत करता है।
- दयालदास ने घटनाओं को कालक्रम के साथ दर्ज किया, जिससे यह इतिहास‑लेखन और वंशावली दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण स्रोत बन गया।
- भाषा राजस्थानी गद्य की प्राचीन, लोकधर्मी शैली है, जिसमें स्थानीय बोलियों, कहावतों और मुहावरों का भरपूर प्रयोग मिलता है।
- बाद के इतिहासकारों ने राठौड़ वंश के इतिहास और राजनीतिक संरचना को समझने के लिए इस ख्यात पर विशेष निर्भरता दिखाई।
7. डिंगल कोश – मुरारिदान
- मुरारिदान ने डिंगल कोश की रचना 19वीं शताब्दी ईस्वी में की।
- डिंगल कोश डिंगल भाषा/शैली के शब्दों, मुहावरों और प्रयोगों का कोशीय संकलन है, जिसे कवि मुरारिदान ने तैयार किया।
- यह केवल भाषा‑कोश नहीं, बल्कि डिंगल काव्य परंपरा में प्रयुक्त विशेष सैन्य और सांस्कृतिक शब्दावली का दस्तावेज भी है।
- ग्रंथ से पता चलता है कि डिंगल का आधार पश्चिमी राजस्थानी बोलियाँ थीं, जो चारण कवियों के माध्यम से साहित्यिक स्तर तक पहुँचीं।
- डिंगल कोश के सहारे प्राचीन डिंगल काव्य‑पाठों को समझना, उनका अनुवाद और व्याख्या करना सरल होता है, इसलिए यह शोधार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी है।
- प्राचीन राजस्थानी साहित्य के इतिहास‑लेखन में इसे आधारग्रंथ की तरह उद्धृत किया जाता है।
इस आलेख में राजस्थानी भाषा के सात प्रमुख ग्रंथ ही विवेचित किए गए हैं। राजस्थानी भाषा के प्रमुख ग्रंथों की सूची बहुत विस्तृत है।
-डॉ. मोहनलाल गुप्ता



