Tuesday, January 27, 2026
spot_img

वेलि क्रिसन रुक्मणि री: राजस्थानी लोककाव्य और भक्ति का अद्भुत ग्रंथ

वेलि क्रिसन रुक्मणि री राजस्थानी लोककाव्य और भक्ति का अद्भुत ग्रंथ है, जिसमें श्रीकृष्ण और रुक्मिणी की प्रेमगाथा को भक्ति और सांस्कृतिक रंगों में पिरोया गया है। इसे राजस्थान के प्रमुख कृष्ण-भक्ति ग्रंथों में सम्मिलित किया जाता है।

राजस्थानी साहित्य की अमूल्य निधि वेलि क्रिसन रुक्मणि री पर यह विस्तृत आलेख साहित्य प्रेमियों, शोधार्थियों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए एक संपूर्ण मार्गदर्शिका है।

📚 प्रस्तावना : वेलि क्रिसन रुक्मणि री

राजस्थानी साहित्य के डिंगल काव्य में महाकवि पृथ्वीराज राठौड़ (Prithvi Raj Rathore) द्वारा रचित वेलि क्रिसन रुक्मणि री (Veli Krishan Rukmani Ri) का नाम सबसे ऊपर आता है। 16वीं शताब्दी में में रचित यह ग्रंथ न केवल एक धार्मिक रचना है, अपितु यह राजस्थानी शौर्य, संस्कृति और श्रृंगार का एक अद्भुत संगम है। इसे राजस्थानी साहित्य का पांचवां वेदअपितु और 19वां पुराण भी कहा जाता है। राजस्थान में वेलि साहित्य की सुदीर्घ परम्परा रही है।

🏰 रचनाकार का परिचय: पीथल (पृथ्वीराज राठौड़)

  • इस कालजयी कृति के रचयिता बीकानेर के शासक कल्याणमल के पुत्र और महाराजा रायसिंह के भाई पृथ्वीराज राठौड़ थे। वे मुगल बादशाह अकबर के दरबार में नवरत्न के समान सम्मानित थे। डिंगल साहित्य में उन्हें पीथल के नाम से जाना जाता है।
  • पृथ्वीराज राठौड़ का जन्म संवत् 1606 (1549 ई.) में हुआ और 1657 ई. में उनका देहावसान हुआ।
  • पृथ्वीराज राठौड़ की रचनाएँ डिंगल और पिंगल दोनों भाषाओं में मिलती हैं। वेलि क्रिसन रुक्मणि री उनकी सबसे प्रसिद्ध कृति है।
  • इटली के विद्वान एल.पी. टेसिटोरी (L.P. Tessitori) ने पृथ्वीराज राठौड़ को “डिंगल का हेरोस” कहा है, जो उनकी काव्य प्रतिभा का प्रमाण है।

📌 काव्य का कथानक और विषय-वस्तु

वेलि क्रिसन रुक्मणि री मुख्य रूप से भगवान श्रीकृष्ण और रुक्मिणी के विवाह की कथा पर आधारित है। इसमें श्रीकृष्ण और रुक्मिणी के विवाह प्रसंग को अत्यंत कलात्मक और भावपूर्ण शैली में प्रस्तुत किया गया है।

  • आधार: वेलि क्रिसन रुक्मणि री का मूल आधार श्रीमद्भागवत है। कवि ने कथा की प्रेरणा श्रीमद्भागवत महापुराण  के दशम स्कंध (अध्याय 52-55) से ली है।
  • कथानक: रुक्मिणी का कृष्ण के प्रति प्रेम, पत्र भेजना, कृष्ण द्वारा रुक्मिणी का हरण और अंततः उनका विवाह।
  • विशिष्टता: कवि ने पौराणिक कथा को राजस्थानी परिवेश, सामंती वैभव और स्थानीय रीति-रिवाजों के साथ पिरोया है, जिससे यह कथा जीवंत हो उठी है।

⚖️वेलि क्रिसन रुक्मणि री रचना का स्वरूप

  • यह कृति डिंगल भाषा में लिखी गई है।
  • इसमें वेलियो छंद का प्रयोग हुआ है।
  • संपूर्ण काव्य लगभग 305 पद्यों में संपन्न होता है।

📖 वेलि क्रिसन रुक्मणि री की साहित्यिक योजनाएँ

इस ग्रंथ की गणना विश्व के श्रेष्ठतम काव्यों में की जाती है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

🔑 क. रस प्रधानता

इस ग्रंथ में प्रयुक्त रसों में श्रृंगार रस मुख्य है, साथ ही वीर रस का पुट भी स्पष्ट दिखाई देता है। श्रीकृष्ण के शौर्य का वर्णन वीर रस में है, जबकि रुक्मिणी के सौंदर्य और प्रेम का वर्णन श्रृंगार रस की पराकाष्ठा है। इस योजना में कवि की मौलिकता और कलात्मकता झलकती है।

  • श्रृंगार रस: रुक्मिणी के सौंदर्य वर्णन में श्रृंगार रस की प्रधानता।
  • वीर रस: कृष्ण द्वारा रुक्मिणी का हरण और युद्ध प्रसंग में वीर रस का उत्कर्ष।
  • भक्ति भाव: कृष्ण के गुणगान और मंगलाचरण में गहन भक्ति।
  • अलंकार योजना: उपमा, रूपक, अनुप्रास और यथासंख्य अलंकारों का प्रयोग।
  • नखशिख : रुक्मिणी का नखशिख वर्णन
  • युद्ध प्रसंग

🔑 ख. भाषा और शैली (डिंगल)

यह ग्रंथ डिंगल शैली (मारवाड़ी का मध्यकालीन साहित्यिक रूप) में लिखा गया है। इसमें प्रयुक्त शब्द चयन इतना सटीक है कि पाठक उस समय के परिवेश को अपनी आंखों के सामने अनुभव करने लगता है। इसमें वेलियो छंद का प्रयोग हुआ है।

🔑 ग. प्रकृति चित्रण

पृथ्वीराज राठौड़ ने प्रकृति का मानवीकरण किया है। षट्-ऋतु वर्णन और प्रकृति चित्रण के माध्यम से पात्रों की मनोदशा को दर्शाना उनकी लेखनी की विशिष्टता है।

⚔️ वेलि क्रिसन रुक्मणि री को मिली ऐतिहासिक उपधियाँ

इस ग्रंथ की महत्ता को देखते हुए विद्वानों ने इसे विशिष्ट सम्मान दिया है:

  1. पांचवां वेद और 19वां पुराण: प्रसिद्ध कवि दुरसा आढ़ा ने दुरसा आढ़ा ने ‘वेलि क्रिसन रुकमणी री’ को पाँचवा वेद कहा है। दुरसा आढ़ा के अनुसार जो ज्ञान वेदों और पुराणों में है, वही भक्ति और रस इस अकेले ग्रंथ में समाहित है।
  2. उत्तर भारत की अनमोल कृति: कई इतिहासकारों ने इसे मध्यकालीन भारत की सबसे महत्वपूर्ण काव्य रचना माना है।
  3. दस सहस्र घोड़ों का बल: कर्नल टॉड ने पीथल के लिये कहा था कि इनके काव्य में दस सहस्र घोड़ों का बल है।
  4. भक्तमाल : नाभादास ने इनकी गणना भक्तमाल में की है।

👉 सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व

  • यह कृति राजस्थान में अत्यंत लोकप्रिय रही है।
  • लोकजीवन में इसके पद्य गाए जाते रहे हैं।
  • विवाह संस्कारों और धार्मिक अनुष्ठानों में भी इसका उल्लेख मिलता है।

यह ग्रंथ केवल कृष्ण-रुक्मिणी की कथा नहीं है, अपितु तत्कालीन राजस्थान के सामाजिक परिवेश को भी दर्शाती है-

  • खान-पान और वेशभूषा ।
  • विवाह की रस्में ।
  • युद्ध कौशल ।
  • महिलाओं के सामाजिक स्थान।

✍️ शोध और संपादन

आधुनिक काल में इस ग्रंथ को पुनर्जीवित करने का श्रेय एल.पी. टेसिटोरी को जाता है, जिन्होंने इसका संपादन किया। बाद में ठाकुर रामसिंह और नरोत्तमदास स्वामी ने भी इस पर महत्वपूर्ण शोध कार्य किए।

🌍 डिजिटल युग में प्रासंगिकता

आज जब भारतीय साहित्य को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत किया जा रहा है, वेलि क्रिसन रुक्मणि री  जैसी कृतियाँ हमारी सांस्कृतिक धरोहर को उजागर करती हैं।

  • शोधार्थियों के लिए यह कृति डिंगल साहित्य की समझ का आधार है।
  • ब्लॉग, वेबसाइट और यूट्यूब चैनलों पर इसके विश्लेषण से भारतीय इतिहास और संस्कृति का प्रचार-प्रसार होता है।

🎭 निष्कर्ष

वेलि क्रिसन रुक्मणि री केवल एक धार्मिक कथा नहीं, अपितु राजस्थान की साहित्यिक चेतना का जीवंत दस्तावेज है। महाकवि पृथ्वीराज राठौड़ ने इस कृति के माध्यम से न केवल कृष्ण-रुक्मिणी की प्रेमकथा को अमर किया, अपितु डिंगल साहित्य को भी अमरत्व प्रदान किया। अपितुवेलि क्रिसन रुक्मणि रीअपितु राजस्थानी भाषा की वह रचना है जिसने डिंगल साहित्य को वैश्विक पहचान दिलाई। भक्ति, प्रेम और शौर्य का ऐसा समन्वय अन्यत्र दुर्लभ है। यह रचना आज भी साहित्य के विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है।

वेलि क्रिसन रुक्मणि री के मुख्य तथ्य

विषयविवरण
रचनाकारपृथ्वीराज राठौड़ (बीकानेर)
रचना काल1580 ईस्वी के आसपास
भाषा/शैलीडिंगल (राजस्थानी)
प्रमुख छंदवेलियो
उपनामपांचवां वेद, 19वां पुराण
संपादकएल.पी. टेसिटोरी

Related Articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Stay Connected

21,585FansLike
2,651FollowersFollow
0SubscribersSubscribe
- Advertisement -spot_img

Latest Articles

// disable viewing page source