प्राकृत साहित्य के विशाल भंडार में जैन आचार्य उद्योतन सूरि द्वारा चंपू काव्य शैली (गद्य और पद्य मिश्रण) में रचित ‘कुवलयमाला’ (8वीं शताब्दी, रचना वर्ष विक्रम संवत 835, ई. 778-779 ) एक मील का पत्थर मानी जाती है। यद्यपि यह एक धार्मिक ग्रंथ है तथापि कुवलयमाला में प्रयुक्त भाषाएँ इसे प्राचीन भारत के भाषाकोश के रूप में प्रस्तुत करती हैं।
कुवलयमाला न केवल एक उत्कृष्ट कथा ग्रंथ है, बल्कि तत्कालीन भारत की सांस्कृतिक, सामाजिक और भाषाई विविधता का एक जीवंत साक्ष्य भी है। इस ग्रंथ की सबसे बड़ी विशेषता इसका ‘बहुभाषावाद’ है। उद्योतन सूरि ने तत्कालीन भारत में प्रचलित 18 देशी भाषाओं (अट्ठारस देसी भासा) का उल्लेख किया है, जो उस समय के भाषा-भूगोल को समझने का सबसे विश्वसनीय स्रोत है। यह भाषाई विविधता तत्कालीन भारत की सांस्कृतिक बहुलता और साहित्यिक समृद्धि को दर्शाती है।
कुवलयमाला में प्रयुक्त भाषाएँ – ऐतिहासिक संदर्भ
कुवलयमाला की रचना जालोर (राजस्थान) में हुई थी। अब कुवलयमाला मूल स्वरूप में प्राप्त नहीं है किंतु इसके उद्धरण अन्य ग्रंथों में मिलते हैं। इस कारण विभिन्न विद्वानों द्वारा कुवलयमाला की भाषा सूची में थोड़े भिन्न नाम दिए जाते हैं, पर कुल संख्या 18 ही है।
ग्रंथ के एक अंश में लेखक ने एक बाजार (हाट) का वर्णन किया है, जहाँ विभिन्न प्रदेशों के व्यापारी अपनी-अपनी बोलियों में संवाद कर रहे हैं। उद्योतन सूरि ने इन व्यापारियों की शारीरिक बनावट, उनके स्वभाव और उनकी विशिष्ट भाषा के नमूनों का वर्णन किया है।
कुवलयमाला में प्रयुक्त भाषाएँ और उनकी विशेषताएँ
यहाँ उन प्रमुख 18 भाषाओं और उनसे संबंधित क्षेत्रों का विवरण दिया गया है:
1. प्रमुख क्षेत्रीय भाषाएँ
ग्रंथ में दी गई सूची के अनुसार, कुवलयमाला में प्रयुक्त भाषाएँ और उनके बोलने वालों के गुण इस प्रकार हैं:
- मज्झदेस (मध्य देश): यहाँ की भाषा को श्रेष्ठ और सुसंस्कृत बताया गया है। यहाँ के लोग विनीत और स्पष्टवादी थे।
- मारवाड़ी (मरु-भाषा): उद्योतन सूरि ने मरुस्थल के लोगों के लिए ‘अप्पु’ (आपु) शब्द के प्रयोग का उल्लेख किया है। यह राजस्थानी भाषा के विकास का सबसे प्राचीन लिखित प्रमाण माना जाता है।
- लाटी (दक्षिण गुजरात): लाट प्रदेश के लोग अपनी भाषा में ‘ते’ और ‘रे’ जैसे शब्दों का अधिक प्रयोग करते थे।
- मालवी (मालवा): मालवा के लोगों की भाषा को धीर और गंभीर बताया गया है।
- सैंधवी (सिंध): सिंधु देश के लोग ‘तरु’ और ‘बरु’ जैसे शब्दों का प्रयोग करते थे। उनकी भाषा में ध्वनि परिवर्तन स्पष्ट रूप से दिखाई देता था।
- गुर्जर (गुजरात): गुर्जर देश के लोग अपनी भाषा में ‘भल्लउ’ (भला) शब्द का प्रयोग करते थे।
2. अन्य महत्वपूर्ण भाषाएँ
सूची में निम्नलिखित क्षेत्रों की भाषाओं का भी समावेश है:
- टाक्क (पंजाब क्षेत्र): चूँकि यह सीमावर्ती क्षेत्र था, यहाँ की भाषा में विशिष्ट ध्वनि संरचना थी।
- भोट (तिब्बत/हिमालयी क्षेत्र): यहाँ की भाषा और संस्कृति का चित्रण उत्तर-पूर्वी प्रभाव को दर्शाता है।
- कोशल (छत्तीसगढ़/यूपी): यहाँ की भाषा को मृदु और सरल बताया गया है।
- महाराष्ट्र (मराठी का प्राचीन रूप): यहाँ के लोग अपनी भाषा में ‘एत्तो’ जैसे शब्दों का प्रयोग करते थे।
- कर्नाटक, आंध्र और द्रविड़: दक्षिण भारत की इन भाषाओं का उल्लेख यह सिद्ध करता है कि उस समय उत्तर और दक्षिण के बीच गहरा व्यापारिक और भाषाई संबंध था।
कुवलयमाला में प्रयुक्त भाषाएँ – अनुमानित क्षेत्र
| भाषा/बोली | क्षेत्र/प्रयोग | विशेषता |
| 1 संस्कृत | विद्वानों, धार्मिक ग्रंथों की भाषा | शास्त्रीय और दार्शनिक परंपरा |
| 2 प्राकृत | जैन साहित्य की प्रमुख भाषा | सरल, जनसुलभ |
| 3 अपभ्रंश | लोककाव्य, जनभाषा | आधुनिक भारतीय भाषाओं की पूर्वज |
| 4 पैशाची | प्राचीन कथाओं की भाषा | अब लुप्त, किंवदंतियों में प्रयुक्त |
| 5 शौरसेनी | उत्तर भारत | नाटकों और साहित्य में |
| 6 महाराष्ट्रि | पश्चिम भारत | प्राकृत का प्रमुख रूप |
| 7 मागधी | बिहार क्षेत्र | बुद्धकालीन भाषा |
| 8 अर्धमागधी | जैन ग्रंथों में | धार्मिक उपदेशों की भाषा |
| 9 राजस्थानी/मारवाड़ी | राजस्थान | लोककाव्य और गीत |
| 10 गुजराती (प्राचीन) | गुजरात | व्यापारिक और सांस्कृतिक प्रयोग |
| 11 कन्नड़ (प्राचीन) | दक्षिण भारत | द्रविड़ साहित्य की परंपरा |
| 12 तेलुगु (प्राचीन) | आंध्र प्रदेश | द्रविड़ भाषाओं में प्रमुख |
| 13 तमिल | दक्षिण भारत | संगम साहित्य की भाषा |
| 14 पाली | बौद्ध साहित्य | त्रिपिटक की भाषा |
| 15 सिंधी | उत्तर-पश्चिम भारत | व्यापारिक और सांस्कृतिक |
| 16 कश्मीरी (प्राचीन) | उत्तर भारत | क्षेत्रीय बोली |
| 17 अवधी/पूर्वी हिंदी रूप | मध्य भारत | लोककाव्य और भक्ति साहित्य |
| 18 डिंगल/पिंगल | राजस्थान | वीरगाथा और काव्य परंपरा |
भाषाई महत्व: अपभ्रंश से देशी भाषाओं की ओर
कुवलयमाला में वर्णित ये 18 भाषाएँ वास्तव में ‘अपभ्रंश’ और आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं (जैसे हिंदी, गुजराती, मराठी, पंजाबी) के बीच की कड़ी हैं।
- यथार्थवादी चित्रण: उद्योतन सूरि ने केवल भाषाओं के नाम नहीं गिनाए, बल्कि कुवलयमाला में प्रयुक्त भाषाएँ उच्चारण और लहजे (Accent) के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।
- सांस्कृतिक एकता: 18 भाषाओं का एक साथ वर्णन यह दर्शाता है कि भारत प्राचीन काल से ही एक बहुभाषी राष्ट्र रहा है, जहाँ विविधता के बावजूद एक सांस्कृतिक सूत्र विद्यमान था।
- राजस्थानी भाषा का उद्भव: राजस्थानी साहित्य के विद्वानों के लिए ‘कुवलयमाला’ सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ है क्योंकि इसमें ‘मरु-भाषा’ का पहला स्पष्ट उल्लेख मिलता है।
- साहित्यिक प्रयोग: उद्योतनसूरी ने कथा में अलग-अलग भाषाओं का प्रयोग कर इसे जीवंत बनाया।
- धार्मिक प्रसार: जैन धर्म के प्रचार में प्राकृत और अपभ्रंश का विशेष महत्व था।
- लोकजीवन की झलक: क्षेत्रीय बोलियों के प्रयोग से उस समय के समाज और संस्कृति का चित्रण मिलता है।
कुवलयमाला की साहित्यिक शैली
यह ग्रंथ ‘चंपू काव्य’ (गद्य और पद्य का मिश्रण) की शैली में लिखा गया है। इसकी भाषा मूलतः प्राकृत है, साथ ही कुवलयमाला में प्रयुक्त भाषाएँ इसे एक अद्वितीय ‘भाषा-कोश’ बना देता है। लेखक ने दिखाया है कि कैसे एक ही वस्तु को अलग-अलग प्रदेशों के लोग भिन्न-भिन्न नामों से पुकारते थे।
निष्कर्ष
उद्योतन सूरि की कुवलयमाला केवल एक धार्मिक कथा नहीं, बल्कि भारत की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता का दर्पण है। ‘कुवलयमाला’ में वर्णित 18 देशी भाषाएँ केवल व्याकरणिक सूची नहीं हैं, बल्कि वे 8वीं शताब्दी के भारत का एक जीता-जागता भाषाई मानचित्र हैं। इसमें वर्णित 18 भाषाएँ यह प्रमाणित करती हैं कि 8वीं शताब्दी का भारत बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक था। उद्योतनसूरी ने इस ग्रंथ के माध्यम से न केवल जैन धर्म का संदेश दिया, बल्कि भाषाओं की विविधता को भी संरक्षित किया।
यह ग्रंथ हमें बताता है कि उस समय तक संस्कृत और प्राकृत के साथ-साथ क्षेत्रीय बोलियाँ (जिन्हें ‘देशज’ कहा गया) इतनी समृद्ध हो चुकी थीं कि उन्हें साहित्य में स्थान मिलने लगा था। इसमें वर्णित 18 भाषाएँ आज की आधुनिक भाषाओं की पूर्वज हैं।
मध्यकालीन भाषाई विकास-क्रम एवं भाषाई इतिहास को समझने के लिए कुवलयमाला आज भी शोधार्थियों के लिए प्राथमिक और सबसे प्रामाणिक स्रोत बनी हुई है।



