नागौर के इतिहासकार इस क्षेत्र के इतिहास को गहराई के साथ लिखने में सफल रहे हैं। इन इतिहासकारों ने नागौर के राजनीतिक, सांस्कृतिकऔर धार्मिक इतिहास को बड़ी सूक्ष्मता से लिखा किया है।
नागौर का ऐतिहासिक परिदृश्य
राजस्थान का नागौर शहर उत्तर–पश्चिम राजस्थान में स्थित है, जिसका प्राचीन नाम अहिच्छत्रपुर (Ahichhatrapur) या अहिच्छत्र नगर बताया जाता है और इसका उल्लेख महाभारत के उद्योग पर्व में भी मिलता है। इतिहासकारों के अनुसार यह क्षेत्र कभी ‘जंगल देश’ की राजधानी रहा, जहाँ नागवंशी शासकों, चौहानों, दिल्ली सल्तनत, मेवाड़ और मारवाड़ के राजपूतों तथा बाद में मुगलों और राठौड़ों ने सत्ता स्थापित की। नागौर किले, बख्त सिंह द्वारा कराए गए महलों के कारण भी यह नगर मध्यकालीन राजनीति का महत्त्वपूर्ण केन्द्र माना जाता है।
नागौर शहर के साथ-साथ नागौर जिला भी अपने गौरवशाली इतिहास और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए प्रसिद्ध है। महाभारत काल से लेकर मध्यकालीन राजवंशों और आधुनिक युग तक, नागौर ने अनेक विद्वानों और इतिहासकारों को जन्म दिया है। इन इतिहासकारों ने न केवल स्थानीय परंपराओं को संरक्षित किया, बल्कि राजस्थान और भारत के इतिहास को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाई।
नागौर के मध्यकालीन इतिहासकार
1. अबुल फजल (Abul Fazl)
नागौर का नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज कराने वाले सबसे प्रमुख मध्यकालीन इतिहासकार अबुल फजल थे। मुगल शासक अकबर के ‘नवरत्नों’ में से एक, अबुल फजल का परिवार मूल रूप से नागौर का निवासी था।
- प्रमुख रचनाएँ: अकबरनामा और आईन-ए-अकबरी।
- योगदान: अबुल फजल ने न केवल अकबर के शासनकाल का विवरण दिया, बल्कि उस समय की सांख्यिकी, भूगोल और प्रशासनिक ढांचे का ऐसा सूक्ष्म वर्णन किया जो आज भी इतिहासकारों के लिए प्राथमिक स्रोत (Primary Source) है। उन्होंने नागौर की ख्याति को मुगल दरबार तक पहुँचाया।
2. फैजी (Faizi)
अबुल फजल के बड़े भाई शेख फैजी भी नागौर की धरती से थे। वे अकबर के राजकवि थे। हालाँकि वे मुख्य रूप से कवि थे, लेकिन उनके वृत्तांतों ने तत्कालीन सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास को समझने में बड़ी भूमिका निभाई।
3. अन्य फारसी लेखक
नागौर के स्थानीय शासकों के मुंशियों ने फारसी पांडुलिपियों के माध्यम से मारवाड़ और दिल्ली सल्तनत के संबंधों पर गहरा प्रकाश डाला है। इनके वृत्तांतों में नागौर के किलों के निर्माण और यहाँ की जल प्रबंधन प्रणाली का विस्तार से वर्णन मिलता है।
4. स्थानीय सूफी
- मध्यकाल के दौरान नागौर हमीदुद्दीन नागौरी आदि सूफियों का केंद्र रहा। स्थानीय सूफियों ने अपने दस्तावेजों में नागौर की दरगाहों को दिल्ली के तुर्की सुल्तानों एवं मुगल बादशाहों से मिलने वाली सहायताओं एवं पुरस्कारों का आदि का वर्णन किया है।
5. जैन आचार्य
जैन आचार्यों ने धार्मिक ग्रंथों में नागौर की तत्कालीन ऐतिहासिक घटनाओं, व्यक्तियों और व्यापारिक गतिविधियों को रेखांकित किया।
6. लोक इतिहासकार और कवि
- स्थानीय चारण और भाट परंपरा: नागौर की मौखिक इतिहास परंपरा (Oral History) को लिखित रूप देने में यहाँ के चारण कवियों का विशेष योगदान रहा है। उन्होंने डिंगल और पिंगल भाषा में राजाओं के शौर्य के साथ-साथ आम जनजीवन का भी वर्णन किया है।
- नागौर के कवि, संत और लोककथाकार भी इस क्षेत्र के ‘लोक–इतिहासकार’ की भूमिका निभाते रहे हैं। हिंदवी पोर्टल पर संकलित सूची में मीरा, जांभोजी, हरिदास निरंजनी, कृपाराम खिड़िया, संत दरिया तथा अन्य रचनाकारों को नागौर क्षेत्र से संबंधित बताया गया है। उनकी वाणियों, पदों और साखियों में मरुस्थली जीवन, स्थानीय संघर्ष, जाट–राजपूत समाज और सूफी–भक्ति–परंपरा की झलक मिलती है, जो लिखित राजनीतिक इतिहास से अलग एक सांस्कृतिक इतिहास को सामने लाती है।
- नागौर के लोक कवियों ने वीरगाथाओं और लोककथाओं के माध्यम से इतिहास को जनमानस तक पहुँचाया। इनकी रचनाएँ आज भी मारवाड़ी और राजस्थानी लोकगीतों में जीवित हैं।
आधुनिक काल के इतिहासकार और शोधकर्ता
पुरातत्वविद
नागौर के ऐतिहासिक स्थलों के उत्खनन और उनके संरक्षण में स्थानीय शोधकर्ताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिससे नागौर के प्रागैतिहासिक काल के अवशेष दुनिया के सामने आए।
आर्थिक और व्यापारिक इतिहास के शोधकर्ता
अंग्रेज़ी और हिंदी में काम करने वाले कुछ आधुनिक इतिहासकारों ने नागौर को मध्यकालीन व्यापार और वाणिज्य के दृष्टि से ‘थ्राइविंग ट्रेड सेंटर’ बताया है। 15वीं–16वीं सदी में यह नगर गुजरात, दिल्ली, सिंध और मारवाड़ के बीच ऊँट‑करवाँ व्यापार का महत्त्वपूर्ण पड़ाव था; इस विषय पर किए गए शोधपत्रों में सिकंदर लोदी द्वारा जैन संत जांभोजी को दी गई भूमि‑दान जैसी घटनाओं का उल्लेख मिलता है, जो यहाँ की बहुधार्मिक एवं व्यावसायिक उन्नति को दर्शाते हैं। ऐसे शोध नागौर के इतिहास को केवल युद्ध और किले तक सीमित न रखकर व्यापार, जैन साधु‑संतों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से भी जोड़ते हैं।
आधुनिक इतिहास लेखन के शिखर पुरुष: डॉ. मोहनलाल गुप्ता
नागौर और राजस्थान के आधुनिक इतिहास लेखन में डॉ. मोहनलाल गुप्ता का नाम अत्यंत श्रद्धा और सम्मान के साथ लिया जाता है। नागौर का इतिहास अबुल फजल की कलम से शुरू होकर डॉ. मोहनलाल गुप्ता के शोध तक एक लंबी यात्रा तय करता है। जहाँ पुराने इतिहासकारों ने दरबारी इतिहास लिखा, वहीं डॉ. गुप्ता जैसे आधुनिक मनीषियों ने ‘मिट्टी के इतिहास’ और ‘जनमानस के नायक’ को प्रधानता दी।
नागौर के इतिहास को समझने में डॉ. मोहनलाल गुप्ता का योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, इसलिए नागौर के इतिहासकारों पर लिखे गए किसी भी विस्तृत लेख में उनका उल्लेख अवश्य होना चाहिए। डॉ. गुप्ता ने न सिर्फ नागौर जिले का राजनैतिक‑सांस्कृतिक इतिहास लिखा, बल्कि राजस्थान और भारत के व्यापक इतिहास को भी नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया।
डॉ. मोहनलाल गुप्ता समकालीन हिंदी इतिहासकार, शोधकर्ता और लेखक हैं, जिन्होंने विशेष रूप से राजस्थान, जाट इतिहास और मुगल काल पर अनेक ग्रंथ लिखे हैं। उनकी पुस्तकों में प्राचीन भारत का इतिहास, हल्दीघाटी का युद्ध और महाराणा प्रताप, राजस्थान में राजशाही का अन्त तथा भारत में साम्प्रदायिकता की समस्या एवं हिन्दू प्रतिरोध का इतिहास जैसे शीर्षक शामिल हैं, जो उन्हें एक व्यापक दृष्टि वाला इतिहासकार सिद्ध करते हैं।
नागौर विषय पर उनका प्रमुख ग्रंथ “नागौर का राजनैतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास” (Political and Cultural History of Nagaur District) है, जो हिंदी में प्रकाशित एक विस्तृत शोधग्रंथ है। यह पुस्तक नागौर जिले के प्रागैतिहासिक संकेतों से लेकर आधुनिक काल तक की राजनैतिक घटनाओं, सामाजिक संरचनाओं, जातीय समूहों, धार्मिक स्थलों और सांस्कृतिक परंपराओं का क्रमबद्ध विवरण देती है। इससे नागौर को केवल एक किले या सूफी केंद्र के रूप में नहीं, बल्कि बहु‑स्तरीय सामाजिक‑राजनैतिक इकाई के रूप में समझने में मदद मिलती है।
डॉ. गुप्ता ने नागौर पर लिखते समय फारसी इतिहासों, लोक‑दस्तावेज़ों, रियासती अभिलेखों, शिलालेखों और स्थानीय मौखिक परंपराओं—सभी का उपयोग किया। उनकी पद्धति की विशेषता यह है कि वे दिल्ली‑केंद्रित या जयपुर‑जोधपुर‑केंद्रित इतिहास के बजाय जिला‑स्तर पर राजनीतिक और सांस्कृतिक विकास की कड़ियाँ जोड़ते हैं, जिससे नागौर जैसे क्षेत्र “माइक्रो‑रीजन” के रूप में इतिहास लेखन में उभरते हैं।
डॉ. मोहनलाल गुप्ता के इतिहास लेखन की सबसे बड़ी विशेषता ‘तथ्यों की शुद्धता’ है। उन्होंने केवल लोकश्रुतियों पर भरोसा न कर, पुरातात्विक साक्ष्यों और प्राचीन पांडुलिपियों को आधार बनाया। उनके द्वारा लिखित पुस्तकें आज राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों के लिए सबसे प्रामाणिक स्रोत मानी जाती हैं।
डॉ. गुप्ता की एक और विशेषता यह है कि उन्होंने जाट‑इतिहास और घुमंतू/कृषक समुदायों की भूमिका को भी नागौर के परिप्रेक्ष्य से समझने की कोशिश की। उनकी पुस्तक Origins & History of Jaats and other allied nomadic tribes of India में नागौर और आस‑पास के क्षेत्रों को जाट और अन्य समुदायों के राजनीतिक‑सांस्कृतिक उभार से जोड़ा गया है। इससे नागौर के इतिहास में केवल राजपूत या सल्तनती अभिजात वर्ग ही नहीं, बल्कि कृषक‑समुदायों की भी सक्रिय उपस्थिति सामने आती है।
डॉ. गुप्ता की प्रसिद्ध पुस्तक तीसरा मुगल: जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर में अकबर के अभियानों—विशेषतः गुजरात, राजपूताने और पश्चिमी भारत—का अत्यंत विस्तार से वर्णन है। इन अभियानों में नागौर, अजमेर और मारवाड़ के इलाकों की सामरिक स्थिति, सूबेदारी व्यवस्था और स्थानीय सरदारों के साथ संबंध बार‑बार चर्चा में आते हैं, जिससे नागौर की भूमिका सम्पूर्ण मुगल साम्राज्य की राजनीति के संदर्भ में स्पष्ट होती है। इस तरह, भले ही यह पुस्तक सीधे “नागौर” पर न हो, लेकिन नागौर क्षेत्र के मध्यकालीन इतिहास को समझने के लिए यह एक महत्त्वपूर्ण सहायक स्रोत बन जाती है।
डॉ. मोहनलाल गुप्ता का समग्र काम मुख्यधारा के कुछ स्थापित निरपेक्ष निष्कर्षों पर प्रश्न उठाने और वैकल्पिक व्याख्याएँ देने के लिए जाना जाता है। वे जाट, राजपूत, घुमंतू जातियों और लोक‑समाज के योगदान को उभारते हैं तथा साम्प्रदायिकता और प्रतिरोध के इतिहास को भी जोड़ते हैं। नागौर के संदर्भ में यह दृष्टि किले, बादशाहों और दरबारों से आगे जाकर किसानों, चरवाहों, सूफियों, संतों और स्थानीय नायकों के योगदान को इतिहास में स्थान दिलाती है, जिससे क्षेत्रीय इतिहास अधिक संतुलित और बहुआयामी बनता है।
डॉ. गुप्ता ने जटिल ऐतिहासिक तथ्यों को सरल भाषा में प्रस्तुत किया, जिससे इतिहास केवल विद्वानों के कमरों तक सीमित न रहकर आम जनता तक पहुँचा। उन्होंने नागौर के स्थानीय मेलों, हस्तशिल्प और लोक-कलाओं को भी इतिहास के दायरे में लाकर ‘सांस्कृतिक इतिहास’ (Cultural History) को समृद्ध किया।
डॉ. मोहनलाल गुप्ता ने नागौर के इतिहास को ‘क्षेत्रीय’ दायरे से बाहर निकालकर उसे राजस्थान और भारत के व्यापक परिप्रेक्ष्य में स्थापित किया।
नागौर के इतिहासकारों की सूची में डॉ. मोहनलाल गुप्ता का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है, क्योंकि उनकी पुस्तक “नागौर का राजनैतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास” ने इस जिले के अतीत को वैज्ञानिक पद्धति से संकलित करके आधुनिक पाठकों तक पहुँचाया।
डॉ. मोहनलाल गुप्ता की सबसे बड़ी उपलब्धि ‘राजस्थान ज्ञानकोश’ का संपादन और लेखन है। उन्होंने नागौर के जिलेवार इतिहास को इतनी गहराई से लिखा है कि वह शोधार्थियों के लिए एक ‘गीता’ के समान माना जाता है। उनके लेखन में नागौर के प्रत्येक कस्बे (जैसे मेड़ता, डीडवाना, लाडनूँ) की ऐतिहासिक महत्ता का विस्तृत विवरण मिलता है।
जहाँ मध्यकाल में अबुल फजल ने नागौर को वैश्विक पहचान दिलाई, वहीं आधुनिक युग में डॉ. मोहनलाल गुप्ता ने नागौर और संपूर्ण राजस्थान के इतिहास को वैज्ञानिक और तथ्यपरक दृष्टिकोण से संकलित करने का बीड़ा उठाया।
नागौर का ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक दिग्दर्शन :डॉ. गुप्ता ने अपनी रचनाओं के माध्यम से नागौर की गौरवशाली परंपराओं को लिपिबद्ध किया। उन्होंने विशेष रूप से-
- अमर सिंह राठौड़ की वीरता और उनके स्वाभिमान की ऐतिहासिक व्याख्या की।
- नागौर के सूफी संतों परंपरा की परम्परा को विस्तार से लिखा।
- नागौर जिले के चारण कवियों एवं संत कवियों को उन्होंने प्रमुखता से चित्रित किया।
- मध्यकालीन भंक्ति आंदोलन में मीराबाईऔर करमा बाई की भूमिका को स्पष्ट किया।
- नागौर दुर्ग की स्थापत्य कला और यहाँ के प्राचीन शिलालेखों का विश्लेषण किया।
नागौर के इतिहास लेखन की चुनौतियाँ और विशेषताएँ
नागौर के इतिहासकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती स्रोतों की विविधता और कमी दोनों हैं—एक ओर पुरानी संस्कृत‑प्राकृत शिलालेख, फारसी इतिहास, राजस्थानी व नागौरी भाषा की लोककथाएँ और सूफी मलफ़ूज़ात मिलते हैं, दूसरी ओर इन सबका व्यवस्थित, आलोचनात्मक संपादन अभी सीमित है। परिणामस्वरूप, कुछ स्थानीय लेखकों द्वारा नागौर की प्राचीनता को अत्यधिक पीछे (जैसे 25,000 वर्ष) तक ले जाने के दावे आधुनिक अकादमिक समुदाय में विवादास्पद माने जाते हैं, जबकि फिर भी ये दावे इस क्षेत्र के सांस्कृतिक आत्म‑बोध और गौरव भाव को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।
इसके साथ ही, नागौर पर अध्ययनों की एक विशिष्ट विशेषता यह है कि यहाँ का इतिहास केवल किसी एक समुदाय या वंश के इर्द‑गिर्द नहीं घूमता; नागवंशी शासक, चौहान और राठौड़ राजपूत, सूफी संत, जैन साधु, मारवाड़ी व्यापारी और ग्रामीण खेतीहर—सभी मिलकर इस क्षेत्र की बहुस्तरीय ऐतिहासिक पहचान बनाते हैं। इसी कारण आधुनिक इतिहासकार नागौर को राजस्थान के भीतर एक ‘‘माइक्रो रीजन’’ के रूप में देखते हैं, जहाँ से पूरे पश्चिमी भारत के राजनीतिक, आर्थिक और धार्मिक नेटवर्क को समझा जा सकता है।
नागौर के इतिहासकारों की विशेषताएँ
- प्रामाणिकता: ऐतिहासिक घटनाओं को तथ्यात्मक रूप से दर्ज करना।
- स्थानीयता: नागौर की परंपराओं, रीति-रिवाजों और लोककथाओं को संरक्षित करना।
- सांस्कृतिक दृष्टिकोण: केवल राजनीतिक घटनाओं पर नहीं, बल्कि सामाजिक और धार्मिक पहलुओं पर भी ध्यान।
- वैश्विक दृष्टि: नागौर को राजस्थान और भारत के व्यापक इतिहास से जोड़ना।
निष्कर्ष
नागौर के इतिहासकारों ने इस क्षेत्र की राजनीतिक घटनाओं, धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक धरोहरों को संरक्षित कर अमूल्य योगदान दिया है। उनकी रचनाएँ आज भी शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों के लिए मार्गदर्शक हैं। नागौर का इतिहास केवल राजस्थान का नहीं, बल्कि भारत की गौरवशाली विरासत का हिस्सा है।
नागौर के इतिहासकार केवल राजाओं की वंशावलियाँ ही नहीं नहीं लिखते रहे अपितु उन्होंने समाज के हर पहलू को छुआ है। अबुल फजल की प्रशासनिक दूरदर्शिता से लेकर चारण कवियों की वीरगाथाओं तक, नागौर का इतिहास लेखन भारत की विविधता का प्रतिबिंब है। आज आवश्यकता है कि इन प्राचीन पांडुलिपियों का आधुनिक भाषाओं में अनुवाद किया जाए ताकि आने वाली पीढ़ी अपनी विरासत को समझ सके।
समग्र रूप से देखा जाए तो नागौर के इतिहासकार— चाहे वे अकादमिक शोधकर्ता हों, स्थानीय अभिलेखविद, सूफी–जीवनी लेखक या लोककवि— सभी ने मिलकर इस क्षेत्र के समृद्ध अतीत को संरक्षित और व्याख्यायित करने का कार्य किया है। उनके लेखन से नागौर केवल एक जिला मुख्यालय न होकर महाभारतकालीन अहिच्छत्रपुर, मध्यकालीन सामरिक दुर्ग, सूफी–भक्ति केन्द्र और व्यापारिक नगर के रूप में उभर कर सामने आता है।
नागौर के इतिहासकारों की कलम ने इस भूमि को अमर बना दिया है, और उनकी रचनाएँ आने वाली पीढ़ियों के लिए ज्ञान का दीपक हैं।



