भारतीय साहित्य में अनेक ग्रंथ ऐसे हैं जो केवल धार्मिक या ऐतिहासिक महत्व ही नहीं रखते, अपितु समाज और संस्कृति की गहरी झलक भी प्रस्तुत करते हैं। कुवलयमाला ऐसा ही एक अद्वितीय ग्रंथ है।
इस आलेख में हम कुवलयमाला के रचनाकार, इसकी ऐतिहासिक प्रासंगिकता, भाषाई विविधता और साहित्यिक सौंदर्य पर विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत कर रहे हैं।
कुवलयमाला (Kuvalayamala) एक प्राचीन साहित्यिक कृति है । यह प्राचीन भारत की सामाजिक, भाषाई और सांस्कृतिक विरासत का एक जीवंत विश्वकोश है। 8वीं शताब्दी में रचित यह ग्रंथ न केवल जैन साहित्य में, अपितु संपूर्ण भारतीय साहित्य में अपना विशिष्ट स्थान रखता है।
📚 कुवलयमाला का परिचय
कुवलयमाला एक चंपू काव्य (Champu Kavya) है, जिसकी रचना जैन आचार्य उद्योतन सूरी (Udyotan Suri) ने की थी। इस ग्रंथ की पूर्णता 778 ईस्वी (विक्रम संवत 835) में हुई थी।
इस ग्रंथ की रचना राजस्थान के ऐतिहासिक नगर जाबालिपुर (वर्तमान जालोर) के एक जैन मंदिर में की गई थी। उस समय वहाँ प्रतिहार शासक वत्सराज का शासन था। उस काल में जालोर वैष्णव संस्कृति का बहुत बड़ा केन्द्र था किंतु जालोर के प्रतिहार राजाओं द्वारा जैन धर्म को भी संरक्षण दिया जाता था। ।
🏰 रचनाकार आचार्य उद्योतन सूरी
आचार्य उद्योतन सूरी महान विद्वान और दार्शनिक थे। उन्होंने कुवलयमाला के अंत में अपनी गुरु-परंपरा का भी उल्लेख किया है। वे हरिभद्र सूरी के शिष्य थे, जो स्वयं प्राकृत साहित्य के प्रकांड विद्वान थे। उद्योतन सूरी ने इस ग्रंथ के माध्यम से धर्म, दर्शन और नैतिकता को एक मनोरंजक कथा के रूप में पिरोया है।
📌 कुवलयमाला की भाषा
यह ग्रंथ मुख्य रूप से प्राकृत भाषा में लिखा गया है। बीच-बीच में संस्कृत, अपभ्रंश और पैशाची के संवाद भी हैं। आगे चलकर जब डिंगल, पिंगल और प्राचीन राजस्थानी अथवा मरु-गुर्जर आदि भाषाओं का निर्माण हुआ तो प्राकृत, पैशाची, अपभ्रंश और संस्कृत आदि भाषाओं ने प्रमुख भूमिका का निर्वहन किया।
⚖️ कुवलयमाला की शैली
यह ग्रंथ चम्पू शैली में लिखा गया है। चम्पू शैली संस्कृत साहित्य की विशिष्ट रचना पद्धति है, जिसमें गद्य और पद्य का सुंदर मिश्रण होता है। इसमें कथा का प्रवाह गद्य में चलता है और भावनात्मक, कलात्मक अभिव्यक्ति पद्य में प्रस्तुत की जाती है, जिससे रचना आकर्षक बनती है। कथा में कथा से कथा और कथा में कथा की शैली अपनाई गई है, जिससे यह ग्रंथ अत्यंत रोचक बन जाता है।
⚔️ कुवलयमाला का कथानक
- मुख्य कथा : कुवलयमाला की कथा जटिल किंतु अत्यंत रोचक है। यह कथा-साहित्य की श्रेणी में आता है, जहाँ एक मुख्य कथा के भीतर कई उप-कथाएँ चलती हैं। कुवलयमाला में मुख्यतः पाँच आत्माओं की कथा है, जो विभिन्न जन्मों से गुजरती हैं। प्रारंभ में ये आत्माएँ पाँच दुर्गुणों (क्रोध, मान, माया, लोभ, मोह) से ग्रसित होती हैं। अनेक जन्मों के बाद अंततः वे भगवान महावीर से मिलती हैं और मोक्ष प्राप्त करती हैं।
- मुख्य पात्र: इस ग्रंथ की नायिका कुवलयमाला है और नायक राजकुमार कुवलयचंद्र है।
- विषय वस्तु: ग्रंथ का मूल उद्देश्य पंच परमेष्ठी की महिमा बताना और मनुष्य के पांच दोषों—क्रोध, मान, माया, लोभ और मोह—के दुष्परिणामों को समझाना है।
- पुनर्जन्म का सिद्धांत: कथा के माध्यम से लेखक ने दिखाया है कि कैसे जीव अपने कर्मों के अनुसार अलग-अलग योनियों में जन्म लेता है और अंततः जैन धर्म के सिद्धांतों का पालन कर मोक्ष (निर्वाण) प्राप्त करता है।
👉 भाषाई महत्व: 18 देशी भाषाओं का उल्लेख
ऐतिहासिक दृष्टि से कुवलयमाला का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष इसमें वर्णित 18 देशी भाषाओं का विवरण है। उद्योतन सूरी ने अपने काल में प्रचलित विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं का उल्लेख किया है। इसमें मरु-भाषा (प्राचीन राजस्थानी/मारवाड़ी) का सबसे पहला और स्पष्ट उल्लेख मिलता है।
लेखक ने मरु-प्रदेश के लोगों की भाषा को “मीठी और ओजपूर्ण” बताया है। इसके अतिरिक्त इसमें लाट, कन्नड़, मालवी, और पहाड़ी क्षेत्रों की बोलियों के उदाहरण भी मिलते हैं।
यह ग्रंथ भाषाविदों के लिए यह समझने का सबसे बड़ा स्रोत है कि 8वीं शताब्दी में भारतीय उपमहाद्वीप में बोलियाँ किस प्रकार विकसित हो रही थीं।
ऐतिहासिक महत्व
कुवलयमाला ग्रंथ से जालोर क्षेत्र के प्राचीन काल में राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास पर भी जानकारी अनायास ही मिल जाती है।
✍️ सामाजिक दर्पण
कुवलयमाला उस समय के समाज का एक सजीव चित्रण प्रस्तुत करती है:
- व्यापार और वाणिज्य: इसमें व्यापारियों की समुद्री यात्राओं, सार्थवाहों (काफिलों) और विभिन्न देशों के साथ होने वाले व्यापार का विस्तृत वर्णन है।
- शिक्षा पद्धति: ग्रंथ में तत्कालीन मठों और विद्या केंद्रों का वर्णन मिलता है, जहाँ विभिन्न विषयों जैसे व्याकरण, तर्कशास्त्र, और युद्धकला की शिक्षा दी जाती थी।
- कला और संस्कृति: संगीत, नृत्य, चित्रकला और स्थापत्य कला के संदर्भ इस ग्रंथ को सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध बनाते हैं।
- भौगोलिक जानकारी: उद्योतन सूरी ने भारत के विभिन्न जनपदों, नदियों और पहाड़ों का जो वर्णन किया है, वह तत्कालीन भूगोल को समझने में सहायक है।
🌍 सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व
- जैन धर्म का आग्रह: ग्रंथ में जैन धर्म की शिक्षाएँ, मोक्ष की प्राप्ति और आत्मा की शुद्धि का संदेश है।
- समाज का चित्रण: तत्कालीन समाज, रीति-रिवाज, धार्मिक आस्थाएँ और स्थापत्य का विवरण मिलता है।
- दक्षिण भारत से संबंध: ग्रंथ में वर्णित यक्ष-मूर्ति जैसी मूर्तियों का अस्तित्व दक्षिण भारत में भी मिलता है, जो सांस्कृतिक आदान-प्रदान का प्रमाण है।
🎭 साहित्यिक शैली और शिल्प
कुवलयमाला को कथा कहा गया है, किंतु इसका शिल्प महाकाव्य जैसा है।
- चंपू शैली: गद्य और पद्य का ऐसा संतुलन बहुत कम ग्रंथों में देखने को मिलता है।
- अलंकरण: इसमें उपमा, रूपक और उत्प्रेक्षा अलंकारों का सुंदर प्रयोग किया गया है।
- लोक तत्व: लेखक ने लोक कथाओं, मुहावरों और कहावतों का प्रचुर मात्रा में प्रयोग किया है, जिससे यह ग्रंथ जनमानस के करीब बना रहा।
- कथा-रस: कथा में कल्पना और यथार्थ का सुंदर मिश्रण।
- भाषा-विविधता: संस्कृत, अपभ्रंश, पैशाची और प्राकृत का प्रयोग।
- कथा-योजना: ‘कथा में कथा’ और ‘कथा से कथा’ की शैली, जो पाठक को बाँधे रखती है।
- नैतिक संदेश: आत्मा की शुद्धि और मोक्ष की प्राप्ति।
📚 कुवलयमाला और प्रतिहार काल
चूंकि यह ग्रंथ वत्सराज प्रतिहार के समय में लिखा गया था, इसलिए यह प्रतिहार कालीन राजस्थान के वैभव को समझने का एक महत्वपूर्ण कड़ी है। जालोर (जाबालिपुर) उस समय विद्या और धर्म का एक बड़ा केंद्र था। यह ग्रंथ सिद्ध करता है कि प्रतिहार शासक धर्मनिरपेक्ष थे और उनके राज्य में साहित्य और कला को भरपूर संरक्षण प्राप्त था।
📖 पांडुलिपियाँ और अनुवाद
- कुवलयमाला की ताड़पत्रीय पांडुलिपि जेसलमेर के जैन ज्ञानभंडार में सुरक्षित है।
- इसका अनुवाद गुजराती, हिंदी, अंग्रेजी और फ्रेंच में हो चुका है, जो इसके वैश्विक महत्व को दर्शाता है।
- आधुनिक आलोचकों जैसे माधव हाड़ा ने इस ग्रंथ पर विस्तृत विवेचना की है।
🔑 शोध और प्रकाशन
आधुनिक काल में कुवलयमाला को प्रकाश में लाने का श्रेय मुनि जिनविजय जी और डॉ. ए.एन. उपाध्ये जैसे विद्वानों को जाता है। उन्होंने प्राचीन पांडुलिपियों का संपादन कर इसे विद्वत जगत के सामने रखा। आज यह ग्रंथ जैन धर्म के सिंघि जैन ग्रंथमाला के अंतर्गत उपलब्ध है।
🏰 कुवलयमाला का वर्तमान महत्व
आज के दौर में कुवलयमाला का महत्व निम्नलिखित कारणों से और बढ़ गया है:
- भाषा विज्ञान: राजस्थानी भाषा के उद्भव और विकास के अध्ययन के लिए यह प्राथमिक स्रोत है।
- सांस्कृतिक पर्यटन: जालोर के ऐतिहासिक महत्व को समझने के लिए पर्यटक और शोधार्थी इस ग्रंथ का संदर्भ लेते हैं।
- नैतिक शिक्षा: आधुनिक तनावपूर्ण जीवन में इस ग्रंथ में वर्णित क्रोध और लोभ के त्याग के सिद्धांत अत्यंत प्रासंगिक हैं।
📌 निष्कर्ष
कुवलयमाला केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, अपितु भारतीय साहित्य और संस्कृति का अमूल्य खजाना है। इसमें आत्मा की यात्रा, समाज का चित्रण और जैन धर्म की शिक्षाएँ एक साथ मिलती हैं। आचार्य उद्योतनसूरि ने इसे जिस शैली में रचा, वह आज भी साहित्यकारों और शोधकर्ताओं को प्रेरित करती है।
कुवलयमाला आचार्य उद्योतन सूरी की एक ऐसी अमर कृति है, जिसने समय की सीमाओं को लांघकर आज भी अपनी प्रासंगिकता बनाए रखी है। यह ग्रंथ हमें बताता है कि प्राचीन भारत केवल आर्थिक रूप से ही नहीं, अपितु बौद्धिक और भाषाई रूप से भी कितना समृद्ध था। जालोर की धरती से उपजा यह साहित्य आज संपूर्ण विश्व के लिए शोध का विषय है।
कुवलयमाला पर डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ग्रंथ जालोर का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास से विस्तृत जानकारी प्राप्त की जा सकती है।



