कान्हड़दे प्रबंध (Kanhadde Prabandh) कवि पद्मनाभ (Padmanabh) द्वारा रचित अपभ्रंश ग्रंथ है, जिसमें जालौर के चहमान शासक रावल कान्हड़देव की वीरता, अलाउद्दीन खिलजी (Alauddin Khilji) के आक्रमण और तत्कालीन समाज-संस्कृति का सजीव चित्रण मिलता है।
👉 कान्हड़दे प्रबंध मध्यकालीन भारतीय साहित्य की ऐसी अनमोल कृति है, जो न केवल वीर रस का उत्कृष्ट उदाहरण है, अपितु राजस्थान के गौरवशाली इतिहास का एक प्रामाणिक स्रोत भी है। 15वीं शताब्दी (1455 ई. ) में कवि पद्मनाभ द्वारा रचित यह ग्रंथ जालौर के चहमान शासक रावल कान्हड़दे चौहान और दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के बीच हुए भीषण युद्धों का सजीव वर्णन करता है।
इस आलेख में हमने कान्हड़दे प्रबंध की ऐतिहासिक महत्ता, साहित्यिक विशेषता और इसके सांस्कृतिक प्रभाव का विस्तार से विश्लेषण किया है।
🏰 कान्हड़दे प्रबंध का रचनाकार
कान्हड़दे प्रबंध की रचना कवि पद्मनाभ ने की थी। वे जालौर के अखैराज (अक्षयराज) चौहान के दरबारी कवि थे। पद्मनाभ की काव्य प्रतिभा और पांडित्य इस ग्रंथ में स्पष्ट झलकते हैं।
पद्मनाभ ने इस काव्य में महाकाव्य की समस्त विशेषताओं को सम्मलित करके इसे ऐतिहासिक महाकाव्य (Historical epic) की श्रेणी में खड़ा किया है, जिसमें ऐतिहासिक तथ्यों को सुरक्षित रखते हुए साहित्यिक कल्पना का सम्मिश्रण किया गया है।
🔑 कान्हड़दे प्रबंध का रचनाकाल
इस ग्रंथ की रचना विक्रम संवत 1512 (1455 ई.) के आसपास मानी जाती है। उस काल में दिल्ली सल्तनत और क्षेत्रीय राजवंशों के बीच संघर्ष चरम पर था।
⚔️ ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
कान्हड़दे प्रबंध के कथानक का केंद्र जालौर है, जो मध्यकालीन राजस्थान का एक महत्वपूर्ण दुर्ग था।
- रावल कान्हड़देव चहमान वंश के शासक थे। उन्होंने अपना सर्वस्व दांव पर लगाकर अपने राज्य, अपनी प्रजा और अपने धर्म को बचाने के लिए अपने से बड़ी शक्ति के विरुद्ध संघर्ष किया।
- अलाउद्दीन खिलजी एक विधर्मी आक्रांता था जो भारत को इस्लामिक देश में परिवर्तित करना चाहता था। ने जालौर पर आक्रमण किया और इस संघर्ष में कान्हड़देव ने अदम्य साहस दिखाया।
- ग्रंथ में इस युद्ध का वर्णन केवल राजनीतिक दृष्टि से नहीं, अपितु सांस्कृतिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य से भी किया गया है।
📌 कान्हड़दे प्रबंध कथानक का सारांश
भारतीय इतिहास में अनेक ग्रंथ ऐसे हैं जो केवल घटनाओं का विवरण ही नहीं देते, अपितु समाज, संस्कृति और मानवीय भावनाओं का भी सजीव चित्रण प्रस्तुत करते हैं। कान्हड़दे प्रबंध ऐसा ही अद्वितीय ग्रंथ है। इसे कवि पद्मनाभ ने 1455 ई. में पश्चिमी अपभ्रंश भाषा में रचा था। यह ग्रंथ जालौर के चहमान शासक रावल कान्हड़देव की वीरता और स्वाभिमान की गाथा है।
ग्रंथ की मुख्य कथा जालौर के वीर शासक राव कान्हड़दे और उनके पुत्र कुंवर वीरमदे के चारों ओर घूमती है। कथा का विस्तार मुख्य रूप से इन चरणों में है:
- सोमनाथ मंदिर की रक्षा (Protection of Somnath Temple): जब अलाउद्दीन खिलजी की सेना गुजरात विजय के बाद सोमनाथ मंदिर को लूटकर लौट रही थी, तब कान्हड़दे ने उन पर आक्रमण कर हिंदुओं के आराध्य देव भगवान सोमनाथ का शिवलिंग मुक्त कराया था। यहीं से खिलजी और कान्हड़दे के बीच शत्रुता की नींव पड़ी।
- वीरमदे और शहजादी फिरोजा का प्रसंग (Sstory of Veeramdev and Firoza): लोक मान्यताओं के अनुसार, अलाउद्दीन की पुत्री फिरोजा, कान्हड़दे के पुत्र वीरमदे के व्यक्तित्व पर मोहित हो गई थी। जब वीरमदे ने इसे अपने धर्म और कुल के विरुद्ध मानकर तुर्क राजकुमारी से विवाह करने से इनकार कर दिया। इस पर अलाउद्दीन खिलजी की सेना ने तो सुल्तान ने जालौर पर आक्रमण कर दिया।
- जालौर का घेरा और जौहर (Siege of Jalore and Jauhar): सुल्तान की सेना ने जालौर दुर्ग को घेर लिया। वर्षों तक चले इस युद्ध में कान्हड़दे के सामंतों ने अदम्य साहस दिखाया। अंततः, विश्वासघात के कारण दुर्ग की सुरक्षा दीवार टूट गई और कान्हड़दे सहित हजारों राजपूत योद्धा वीरगति को प्राप्त हुए। राजपूत वीरांगनाओं ने अपने सतीत्व की रक्षा हेतु जौहर की अग्नि में स्वयं को समर्पित कर दिया।
👉 कान्हड़दे प्रबंध की भाषा
पद्मनाभ ने इस ग्रंथ को पुरानी राजस्थानी (डिंगल-पिंगल मिश्रित) भाषा में लिखा है। इसे पश्चिमी अपभ्रंश (Apabhramsa) भी कहते हैं जो उस समय राजस्थान और गुजरात क्षेत्र में प्रचलित थी।
📖 साहित्यिक विशेषताएं
साहित्य की दृष्टि से इसकी विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
- वीर रस की प्रधानता: ग्रंथ का अंगी रस ‘वीर रस’ है। युद्ध के दृश्यों का वर्णन इतना जीवंत है कि पाठक के समक्ष रणक्षेत्र का चित्र खिंच जाता है।
- छंद विधान: इसमें दूहा, सोरठा, चौपाई और छप्पय जैसे छंदों का सुंदर प्रयोग किया गया है।
- सांस्कृतिक चित्रण: मध्यकालीन समाज, खान-पान, वेशभूषा, धार्मिक मान्यताओं और सामंती मूल्यों का इसमें गहरा चित्रण मिलता है।
- स्वाभिमान का प्रतीक: यह काव्य “स्वदेश” और “स्वधर्म” के प्रति समर्पण की भावना को उजागर करता है।
💞 प्रेम और संवेदनाएँ
कान्हड़दे प्रबंध केवल युद्धकथा नहीं है। इसमें मानवीय संबंधों और भावनाओं का भी चित्रण मिलता है।
- राजकुमार वीरभदेव और सुल्तान खिलजी की पुत्री फिरोजा के प्रेम प्रसंग का उल्लेख इस ग्रंथ की विशेषता है।
- यह प्रसंग उस समय के सामाजिक-सांस्कृतिक आदान-प्रदान और मानवीय संवेदनाओं को उजागर करता है।
🎭 सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रभाव
कान्हड़दे प्रबंध ने आने वाली पीढ़ियों के लिए राष्ट्रवाद और त्याग का आदर्श स्थापित किया। यह ग्रंथ हमें सिखाता है कि संख्या बल में कम होने के बावजूद, सत्य और धर्म के लिए शक्तिशाली साम्राज्य से टकराना वीरता का उच्चतम शिखर है। राजस्थानी संस्कृति में आज भी कान्हड़दे और वीरमदे की गाथाएं लोकगीतों के माध्यम से जीवित हैं।
🏰 ऐतिहासिक महत्व
कान्हड़दे प्रबंध कवि पद्मनाभ द्वारा 1455 ई. में रचित एक अपभ्रंश ग्रंथ है, जिसमें जालौर के शासक कान्हड़देव की वीरता, अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण, और तत्कालीन सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन का सजीव चित्रण मिलता है।
इतिहासकारों के लिए ‘कान्हड़दे प्रबंध’ केवल एक काव्य नहीं, अपितु एक ऐतिहासिक ग्रंथ की तरह है।
- युद्ध रणनीतियां: इसमें सैनिक मार्गों एवं सिवाना तथा जालोर दुर्गों की घेराबंदी, शस्त्रों और कूटनीति का विस्तार से वर्णन है।
- भौगोलिक विवरण: यह राजस्थान और गुजरात के तत्कालीन भौगोलिक क्षेत्रों, किलों और रास्तों की सटीक जानकारी देता है।
- अलाउद्दीन की विस्तारवादी नीति: यह ग्रंथ सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी की दक्षिण और पश्चिम भारत की विजय महत्वाकांक्षाओं पर प्रकाश डालता है।
🎭 साहित्यिक महत्व
- काव्य-प्रतिभा: पद्मनाभ ने इतिहास और कल्पना का सुंदर समन्वय किया।
- संस्कृति का चित्रण: तत्कालीन समाज, रीति-रिवाज, और जीवनशैली का सजीव विवरण।
- स्वदेश-प्रेम: कान्हड़देव का स्वाभिमान और मातृभूमि के प्रति समर्पण इस ग्रंथ को अमर बनाता है।
🌍 सांस्कृतिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य
कान्हड़दे प्रबंध में उस समय के समाज का जीवंत चित्रण मिलता है:
- धार्मिक जीवन: मंदिरों, पूजा-पद्धति और आस्था का उल्लेख।
- सामाजिक संरचना: राजपूत शौर्य, स्त्रियों की भूमिका और जनजीवन।
- कला और स्थापत्य: जालौर दुर्ग और नगरों की झलक।
👉 कान्हड़दे प्रबंध के मुख्य पात्रों का विश्लेषण
| पात्र | भूमिका | विशेषता |
| राव कान्हड़दे | जालौर के शासक | न्यायप्रिय, धर्मरक्षक और अडिग योद्धा। |
| कुंवर वीरमदे | कान्हड़दे के पुत्र | सुंदरता और साहस का संगम, अपने उसूलों के पक्के। |
| अलाउद्दीन खिलजी | दिल्ली सुल्तान | कूटनीतिज्ञ, महत्वाकांक्षी और आक्रामक साम्राज्यवादी। |
| शहजादी फिरोजा | सुल्तान की पुत्री | प्रेम और वियोग का मार्मिक प्रतीक। |
📖 निष्कर्ष
कान्हड़दे प्रबंध केवल एक ऐतिहासिक ग्रंथ नहीं, अपितु राजस्थान की सांस्कृतिक धरोहर है। इसमें वीरता, प्रेम, स्वाभिमान और समाज का ऐसा चित्रण मिलता है जो आज भी प्रेरणादायी है। कवि पद्मनाभ ने इतिहास और साहित्य को जोड़कर एक अमर कृति का निर्माण किया, जो भारतीय साहित्य में अद्वितीय स्थान रखती है।
कान्हड़दे प्रबंध भारतीय साहित्य की वह अनमोल मणि है, जो इतिहास और कविता के संगम पर स्थित है। कवि पद्मनाभ ने अपनी लेखनी से 14वीं शताब्दी के संघर्ष को अमर कर दिया। यह ग्रंथ आज भी शोधकर्ताओं, इतिहासकारों और साहित्य प्रेमियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। राजस्थान के शौर्य और बलिदान के वास्तविक स्वरूप को समझने के लिए ‘कान्हड़दे प्रबंध’ का अध्ययन अनिवार्य है। किसी कवि ने लिखा है-
“गया न मौरूधरा री मर्यादा, न डिगियो कान्हड़दे रो धर्म”
अर्थात्- न तो मरुधरा की मर्यादा गई, और न ही कान्हड़दे का धर्म डिगा।)



