Sunday, January 11, 2026
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पोतेदार संग्रह में उपलब्ध है रियासती काल का वाणिज्यिक इतिहास

आधुनिक एवं मध्यकालीन राजस्थान के प्रतिष्ठित व्यापारिक परिवारों में रियासती काल का वाणिज्यिक इतिहास बहियों, पत्राचार संग्रहों एवं अन्य दस्तावेजों के रूप में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। ये दस्तावेज राजस्थान के इतिहास लेखन के लिए महत्वपूर्ण स्रोत का कार्य करते हैं। इन्हीं प्रतिष्ठित व्यापारिक परिवारों में से एक तत्कालीन बीकानेर रियासत के सेठ मिर्जामल पोतेदार (Seth Mirjamal Potedar) के परिवार का पोतेदार संग्रह (Potedar Collection) अत्यधिक महत्वपूर्ण है।

चूरु का पोतेदार परिवार

चूरु (Churu) का पोतेदार परिवार राजस्थान के उन इने-गिने प्रमुख व्यापारिक परिवारों में से एक था जिसके सदस्यों ने ईसा की 18वीं एवं 19वीं शताब्दियों में संचार, यातायात एवं सुरक्षा के साधनों के अभाव में भी अपने वाणिज्य एवं व्यापार का विस्तार राजपूताने से बाहर जाकर किया और अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की। कालांतर में इस परिवार के लोगों ने अपने व्यापार को अन्तरराष्ट्रीय स्तर तक बढ़ाया।

सेठ मिर्जामल पोतेदार

इसी व्यापारिक परिवार में सेठ मिर्जामल एक प्रभावशाली व्यक्ति हुए, जिन्होंने वाणिज्य एवं व्यापार के साथ साथ बैंकिग का कार्य भी बड़े स्तर पर किया। 19वीं शताब्दी ईस्वी के पूर्वार्द्ध में उत्तर भारत की रियासतों में चूरु के पोतेदार सेठ स्वर्गीय मिर्जामल अति-प्रतिष्ठित व्यापारी एवं बैंकर थे। सेठ मिर्जामल के वंशजों के पास पोतेदार संग्रह आज भी उपलब्ध है।

बीकानेर रियासत से बैंकिंग सम्बन्ध

बीकानेर के महाराजा सूरतसिंह (ई.1878-1828) एवं महाराजा रतनसिंह (ई.1828-1851) के साथ मिर्जामल पोतेदार का घनिठ संपर्क एवं लेन-देन था। इस सम्पर्क को स्पष्ट करने वाले सैकड़ों राजकीय कागजात पोतेदार संग्रह में हैं।

बीकानेर राज्य के इन कागजों के अवलोकन से ज्ञात होता है कि राज्य सरकार ने इन लोगों से 500 रुपये से चार लाख रुपये तक के ऋण समय-समय पर लिये थे। ये ऋण अल्पकालिक एवं दीर्घकालिक दोनों प्रवृत्तियों के थे। एक दस्तावेज से ज्ञात होता है कि बीकानेर के राजा की सरकार ने इस दस्तावेज के माध्यम से 350 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से पूरे एक वर्ष के 360 दिन तक 1,26,000 रुपये उधार लिये थे। ब्याज कटवां मिती से एक रुपया सैंकड़ा तय हुआ था।

ठोड

इन राजकीय दस्तावेजों से यह भी ज्ञात होता है कि ऋण की अदायगी अवधि के पश्चात् नकद रुपयों में नहीं होती थी अपितु ऋणों की ब्याज सहित आपूर्ति हेतु राज्य की आय के कुछ स्रोत (जिन्हें ‘ठोड’ कहा जाता था) ऋणदाता को सौंप दिये जाते थे जिनसे ऋणों की पूर्ति होती रहती थी। ऋणदाता को दी जाने वाली ‘ठोडों’ का उल्लेख ऋण-पत्र में कर दिया जाता था और ऋण के चुकता होने पर वे ‘ठोडें ऋण-दाता से ली वापस ले ली जाती थीं।

ऋणदाता को प्रदत्त ‘ठोडों’ के रुपए भर्ती करवाने हेतु उसकी ओर से जो आदमी नियुक्त किये जाते थे उनको कई बार राज्य की ओर से ‘रोजगार’ (वेतन) एवं ‘पेटिया’ (भोजन-सामग्री) भी दिया जाता था।

सिक्के

उस समय राजपूताने में विविध प्रकार के सिक्के प्रचलन में थे, अतः यह स्पष्ट करना होता था कि ऋण कौन से सिक्के में लिया गया है और ऋण चुकाते समय यदि अन्य प्रकार के सिक्के में भुगतान किया जाएगा तो उसकी कीमत के अनुपात से उसका बट्टा या बाधा जोड़ा जाएगा। पोतेदार संग्रह के कागजों से गजशाही, सूरतशाही, डूंगरशाही, कलदार व ‘दिल्ली चलन’ आदि सिक्कों की जानकारी मिलती है।

प्रत्याभूति (जामिनी)

कई बार ऋण लेने वाला व्यक्ति ऋण को ब्याज सहित चुकता करने का वचन लिखित रूप में शपथ-पूर्वक देता था और कभी-कभी उसे प्रत्याभूति (जामिनी) भी देनी होती थी। आवश्यक होने पर ऋण का भुगतान खंधी अर्थात् किस्तों में भी किया जाता था।

इस प्रकार इन दस्तावेजों से राजकीय पत्राचार के अतिरिक्त तत्कालीन लेने-देने के तरीकों, ऋणों के भुगतान, प्रत्याभूति, ब्याज, हूँडावन, आड़त, दलाली, खंधी, बट्टा, छूट, कसर आदि के सम्बन्ध में उपयोगी जानकारियां मिलती हैं।

वेतन की दरें

पोतेदार संग्रह के दस्तावेजों से विभिन्न प्रकार के लेन-देने के अतिरिक्त वेतन की दरों पर भी प्रकाश पड़ता है। वि. सं. 1884, भादों सुदि 5 के एक राजकीय कागज से ज्ञात होता है कि मिर्जामल की मार्फत रहने वाले इमामबख्श को एक रुपया प्रतिदिन एवं उसके नीचे रहने वाले आठ सवारों को आठ आना प्रति सवार, प्रतिदिन मिलता था। मुंशी सेडू को दस रुपये मासिक एवं सिक्के को 5 रुपये मासिक मिलते थे। वेतन पर्याप्त समय बाद दिया जाता था और वेतन चुकाते समय एकादशी के दिनों का वेतन काट लिया जाता था।

खेतड़ी व सीकर के राजाओं से सम्बन्ध

पोतेदार संग्रह में बीकानेर के अतिरिक्त खेतड़ी व सीकर के राजाओं के भी बहुत से कागज हैं।

पंजाब की रियासतों के साथ व्यापारिक एवं बैंकिंग सम्बन्ध

राजपूताने के राजाओं के साथ-साथ तत्कालीन पंजाब में स्थित रियासतों के राजाओं के साथ भी सेठ मिर्जामल पोतेदार का पर्याप्त लेने-देने एवं व्यवहार था। महाराजा रणजीतसिंह के दरबार में सेठ मिर्जामल का बड़ा सम्मान था।

एक विशेष भेंट के अवसर पर महाराजा रणजीतसिंह (Maharaja Ranjit Singh) ने सेठ मिर्जामल को मोतियों का एक कीमती कंठा उपहार स्वरूप दिया था। इस कंठे का एक रंगीन चित्र पोतेदार संग्रह में है। मिर्जामल के नाम लिखे गये महाराजा रणजीतसिंह के एक परवाने से ज्ञात होता है कि महाराजा ने अन्य अनेक वस्तुओं के साथ-साथ बीकानेर की लतीफ मिसरी का क्रय आदेश भी मिर्जामल को दिया था जिससे संकेत मिलता है कि उस काल में बीकानेर की मिसरी की राजपूताने से बाहर भी अच्छी मांग थी और वह राजा-महाराजाओं की प्रिय वस्तु थी।

नाभा के महाराजा देवेन्द्रसिंह (Maharaja Devendra Singh of Nabha) के एक कागज से ज्ञात होता है कि सेठ मिर्जामल ने नाभा में एक व्यापारिक कोठी की स्थापना की थी जिसमें नाभा राज्य की ओर से पचास हजार रुपये बिना ब्याज के लगाकर साझा किया गया था। इस प्रकार पंजाब के राजाओं एवं अनेक अंग्रेज पदाधिकारियों के भी बहुत से पत्र एवं अन्य दस्तावेज पोतेदार संग्रह में है जो पंजाब की तत्कालीन अर्थव्यवस्था आदि को समझने की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।

पोतेदार संग्रह के दस्तावेजों पर अंकित मोहरें

इन राजकीय कागजों पर लगी विभिन्न प्रकार की मोहरें (Seals) भी अध्ययन करने योग्य हैं। ये मोहरें अनेक प्रकार की हैं जैसे गोल, चौकोर, अंडाकार, पहलदार आदि। इनमें कई मोहरें साधारण बनावट की हैं तो कई अलंकरणयुक्त भी हैं। ये मोहरें हिन्दी, फारसी एवं और गुरुमुखी लिपियों में हैं। कुछ मोहरों में एक ऐ अधिक लिपियों का प्रयोग हुआ है।

इन मोहरों में महाराजा रणजीतसिंह की मोहरें सब से छोटी हैं और उनमें गुरुमुखी में ‘अकाल सहाय रणजीतसिंह’ लिखा है। महाराजा सूरतसिंह की मोहरें विविध प्रकार की हैं जिनमें से किसी किसी में मुगल बादशाह शाहआलम या अकबरशाह द्वितीय का नाम भी अंकित है। अग्रेज पदाधिकारियों की मोहरें भी फारसी में, हिन्दी में अथवा फारसी व हिन्दी दोनों में हैं।

राजकीय कागजों के अतिरिक्त हिसाब-किताब विषयक भी अनेक कागज संग्रह में हैं जिनसे विविध प्रकार की जानकारियाँ उपलब्ध होती हैं।

उतारे

चूंकि पोतेदारों का कारोबार विस्तृत था एवं देश के विभिन्न व्यापारिक केन्द्रों में इनकी शाखाएं थीं अतः उन सब शाखाओं के हिसाब-किताब के ब्योरे सेठ मिर्जामल के चूरु कार्यालय में आते रहते थे। ये कागज गोलाकार लपेटकर भेजे जाते थे जिन्हें ‘उतारे’ कहा जाता था। इन उतारों में संबंधित शाखा के हिसाब-किताब का विस्तृत ब्यौरा होता था। इस प्रकार के अनेक उतारे संग्रह में हैं जिनमें से कई तो बहुत लम्बे हैं। इनमें से एक उतारे की लम्बाई लगभग 41 फुट है। आयातित माल पर लगने वाले राजकीय भाषा आदि के भी बहुत से कागज हैं। आयातित माल पर स्थान-स्थान पर राहदारी भी लगती थी, अतः इन कागजों से तत्कालीन व्यापारिक मार्गों का भी पता चलता है।

रजनांवे की बही

पोतेदार संग्रह में विविध प्रकार की एवं पोतेदारों के विभिन्न फर्मों की बहुत सी बहियां भी हैं। इनमें से कई बहियां काफी मोटी एवं बड़ी हैं जिन पर चमड़े के पुठ्ठे चढ़े हुए हैं। सबसे मोटी बही का वजन 15 किलो 850 ग्राम है। यह जिंदाराम मिर्जामल की चूरु की दुकान की ‘रजनांवे’ की बही है जो वि.सं. 1897 से वि.सं. 1948 तक चलती है। इस बही से एक स्थान पर 50 वर्ष की अनेकानेक प्रकार की जानकारियां प्राप्त होती हैं।

हुण्डियाँ (Hundian)

एक दूसरी बही ‘लेखापाड़’ की है जो मिर्जामल मगनीराम की दिल्ली की दुकान की है जो वैशाख सुदि 7, सं 1884 से प्रारम्भ होती है। इस बही में चतुरभुज जिंदाराम का एक लम्बा खाता है जिसमें लगभग 16-17 लाख रुपयों की हुण्डियों का आदान-प्रदान हुआ है। अधिकतर हुण्डियाँ ‘मियादी’ हैं जैसे अमृतसर की हुण्डियाँ 27 दिन की अवधि की, हाथरस एवं फरुखाबाद की 17 दिन की, जयपुर की 21 दिन की एवं मिर्जापुर की हुण्डियाँ 41 दिन की अवधि की हैं। इससे ज्ञात होता है कि हुण्डियों का काम तब तक खूब विकसित हो चुका था। ब्याज लगाने में भी पर्याप्त कुशलता प्राप्त हो चुकी थी। इसी बही से ज्ञात होता है कि रकम का ब्याज फैलाते समय एक चौथाई आंक (Product) तक का हिसाब लगाया जाता था।

इस प्रकार इस पोतेदार संग्रह के कागजों से अनेक प्रकार की वाणिज्यिक एवं व्यापारिक जानकारियाँ उपलब्ध होती हैं जो राजस्थान के इतिहास लेखन की दृष्टि से अत्यन्त उपयोगी हैं।

पोतेदार संग्रह की अन्य जानकारियाँ

पोतेदार संग्रह के कागजों से व्यापारियों, श्रमजीवियों, किसानों, जागीरदारों व आम लोगों पर लगने वाले करों, पारस्परिक झगड़ों, चोरी, डकैती, अपहरण, आवास, निष्क्रमण, न्याय, उपहार, भेंट व दण्ड आदि के विषय में जानकारियाँ मिलती है।

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