Monday, January 5, 2026
spot_img

राजपूताना के सक्षम राज्य: भारत संघ में विलय एवं राजस्थान में एकीकरण

राजपूताना के सक्षम राज्य (Viable States) वे थे जो स्वतंत्र भारत में अलग प्रशासनिक इकाई (Administrative Units) बने रहने की पात्रता रखते थे। सरदार पटेल ने उन्हें आश्वासन दिया था कि यदि वे भारत में सम्मिलित होते हैं तो उनके राज्य ज्यों के त्यों बने रहेंगे।

राजपूताना के सक्षम राज्यों का भारत संघ में विलय एवं राजस्थान में एकीकरण

📌 पुस्तक परिचय

राजपूताना के सक्षम राज्य: भारत संघ में विलय एवं राजस्थान में एकीकरण विषय पर डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित पुस्तक राजपूताना के सक्षम राज्यों का भारत संघ में विलय एवं राजस्थान में एकीकरण स्वतंत्रता-प्राप्ति के समय राजपूताना की चार प्रमुख रियासतों के भारत संघ में विलय और राजस्थान राज्य के निर्माण की ऐतिहासिक प्रक्रिया का गहन अध्ययन प्रस्तुत करती है। यह ग्रंथ इतिहास, राजनीति और समाजशास्त्र के विद्यार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी है।

📖 विषय-वस्तु और परिप्रेक्ष्य

यह पुस्तक बीसवीं शताब्दी के मध्यकालीन भारत (Medieval Bharat) के सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रमों में से एक—देशी रियासतों का भारतीय संघ में विलय और राजस्थान का एकीकरण—पर केंद्रित है। लेखक ने विशेष रूप से राजपूताना के सक्षम राज्यों पर ध्यान दिया है।

सक्षम राज्यों से आशय उन रियासतों से है जो जनसंख्या, क्षेत्रफल और राजस्व की दृष्टि से स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखने की पात्रता रखती थीं। इनमें प्रमुख रूप से जयपुर, जोधपुर, उदयपुर एवं बीकानेर रियासतें इस पात्रता को पूरा करती थीं।

🏰 ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

  • प्राचीन काल से क्षत्रिय परंपरा पर आधारित राज्य व्यवस्था राजपूताना में विकसित हुई।
  • अंग्रेजी संरक्षण में आने के बाद इन रियासतों की स्थिति बदल गई।
  • स्वतंत्रता संग्राम और द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटिश नीति में बदलाव आया।
  • संविधान सभा में देशी राज्यों का प्रवेश और परमोच्चता का विलोपन भारतीय संघ की नींव बना।

📚 पुस्तक की संरचना

ग्रंथ में निम्नलिखित प्रमुख पहलुओं पर चर्चा की गई है:

  • 1930 के दशक में प्रस्तावित अखिल भारतीय संघ और राजपूताना की प्रतिक्रिया।
  • द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटिश नीति और उसका देशी राज्यों पर प्रभाव।
  • स्वतंत्रता के पश्चात् भारतीय संघ में विलय की प्रक्रिया।
  • राजस्थान के एकीकरण की क्रमिक अवस्थाएँ—मात्स्य संघ, राजस्थान संघ, संयुक्त राजस्थान और अंततः वृहत्तर राजस्थान का निर्माण।

🔍 विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण

लेखक ने केवल घटनाओं का वर्णन ही नहीं किया, बल्कि उनके पीछे की राजनीतिक और सामाजिक शक्तियों का भी विश्लेषण किया है।

  • जयपुर (JAIPUR) और जोधपुर (JODHPUR) जैसे बड़े राज्यों की भूमिका।
  • छोटे राज्यों की अनिच्छा।
  • सरदार पटेल (SARDAR PATEL) और वी.पी. (V. P. Menon) मेनन जैसे नेताओं की निर्णायक भूमिका।

यह पुस्तक केवल इतिहास का संकलन नहीं है, बल्कि राजनीतिक एकीकरण की जटिलताओं और चुनौतियों का विश्लेषणात्मक अध्ययन भी है।

🌟 महत्व और योगदान

  • राजस्थान के राजनीतिक इतिहास को समझने के लिए एक प्रामाणिक स्रोत
  • स्वतंत्रता के बाद भारतीय संघ के निर्माण में रियासतों की भूमिका का स्पष्ट विवरण।
  • आधुनिक भारत के संघीय ढांचे की ऐतिहासिक जड़ों को उजागर करना।
  • शोधार्थियों, विद्यार्थियों और इतिहास-प्रेमियों के लिए एक संदर्भ ग्रंथ

✍️ भाषा और शैली

  • सरल, प्रवाहपूर्ण और शोधपरक हिंदी।
  • अंग्रेजी शब्दों और अवधारणाओं का उपयुक्त प्रयोग।
  • बाइलिंगुअल पाठकों के लिए भी उपयोगी।

⚖️ आलोचनात्मक दृष्टि

  • पुस्तक अत्यंत समृद्ध है, परंतु सामान्य पाठक के लिए यह कभी-कभी अधिक अकादमिक प्रतीत हो सकती है।
  • शोधार्थियों और गंभीर पाठकों के लिए यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है।

✅ निष्कर्ष

डॉ. मोहनलाल गुप्ता की राजपूताना के सक्षम राज्यों का भारत संघ में विलय एवं राजस्थान में एकीकरण एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज है। यह पुस्तक राजस्थान के इतिहास को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य से जोड़ती है और बताती है कि किस प्रकार चार सक्षम रियासतों ने भारत संघ में सम्मिलित होकर आधुनिक राजस्थान का निर्माण किया।

संक्षेप में, यह ग्रंथ राजस्थान के राजनीतिक इतिहास, भारतीय संघ के विकास और स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद की जटिलताओं को समझने के लिए अनिवार्य अध्ययन सामग्री प्रस्तुत करता है।

Related Articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Stay Connected

21,585FansLike
2,651FollowersFollow
0SubscribersSubscribe
- Advertisement -spot_img

Latest Articles

// disable viewing page source