Friday, February 6, 2026
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जालौर की मंदिर शैली

जालौर की मंदिर शैली गुप्तकाल में ही आकार लेने लगी थी। इस क्षेत्र में गुप्तकाल से लेकर प्रतिहारकाल तक के कालखण्ड में इस क्षेत्र में विष्णु के वराह अवतार की पूजा सर्वाधिक लोकप्रिय थी और इस क्षेत्र में भगवान के वराह अवतार के कई मंदिर स्थित थे।

जालौर की मंदिर शैली (Jalor temple style) पर विचार करने से पहले हमें इस क्षेत्र के राजनीतिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक इतिहास के साथ-साथ भौगोलिक परिस्थितियों पर भी किंचित् विचार करना होगा। जालौर क्षेत्र का भू-भाग राजस्थान के पूर्वी भू-भाग की अपेक्षा काफी बाद का है। मध्य राजस्थान में स्थित अरावली की पहाड़ियां किसी समय बहुत विशाल एवं ऊंची पर्वत शृंखला हुआ करती थीं तथा उनसे निकलने वाली नदियां तेजी से बहती हुई वर्तमान जालौर जिले तक आती थीं, जहाँ उस समय विशाल महासागर लहराता था।

वराह अवतार

नदियों के साथ बहाकर लाई हुई पर्वतीय संपदा यथा- बालू, पत्थर एवं कंकड़ इस क्षेत्र में लुढ़कती हुइ आती थी। लाखों वर्षों तक चली इस प्रक्रिया के कारण समुद्री किनारा पीछे हटता चला गया और नवीन भूमि का निर्माण होता चला गया। इस प्रक्रिया का कुछ भाग पौराणिक ऋषियों ने अपनी आंखों से देखा था। उन्होंने इस भौगोलिक घटना की तुलना भगवान विष्णु के वराह रूप में प्रकट होकर समुद्र-तल से मेदिनी का उद्धार किए जाने की घटना से की।

जालौर क्षेत्र की वराह अवतार प्रतिमाएँ

जालौर की मंदिर शैली गुप्तकाल में ही आकार लेने लगी थी। इस क्षेत्र में गुप्तकाल से लेकर प्रतिहारकाल तक के कालखण्ड में इस क्षेत्र में विष्णु के वराह अवतार की पूजा सर्वाधिक लोकप्रिय थी और इस क्षेत्र में भगवान के वराह अवतार के कई मंदिर स्थित थे।

प्रतिहार कालीन वराह प्रतिमा आज भी भीनमाल के वराह-श्याम मंदिर (Varaha-Shyam Temple) में स्थित है। यह मूर्ति किसी अन्य स्थान से खुदाई में प्राप्त हुई थी। इस मूर्ति के मूल मंदिर का अब कोई विवरण प्राप्त नहीं होता है। यह मूर्ति सात फुट ऊंची तथा ढाई फुट चौड़ी है और जैसलमेर के पीले पत्थर से निर्मित है। भगवान वराह रूपी विष्णु लक्ष्मी रूपी धरती को पाताल लोक से निकालकर अपनी बाईं भुजा पर धारण किए हुए हैं। उनके चरणों में नाग-नागिन का एक युगल विद्यमान है जो नागलोक के निवासियों का प्रतीक है। इस नाग-युगल का ऊपरी हिस्सा मानव आकृति में है। उनके पास इंद्राणी तथा नारद की प्रतिमाएं भी उत्कीर्ण हैं।

इस मूर्ति को देखने से अनुमान होता है कि यह मूर्ति मूलतः जिस मंदिर में स्थापित की गई होगी, वह मंदिर निश्चय ही बहुत भव्य एवं विशाल रहा होगा। इस मूर्ति के पास वराह की छोटी-छोटी कई मूर्तियां विद्यमान हैं। भीनमाल तथा जसवंतपुरा पंचायत समितियों के कई गांवों में स्थित प्राचीन मंदिरों में भी वराह की मूर्तियां मिलती हैं। ये मूर्तियां इस बात की प्रमाण हैं कि गुप्तकाल एवं प्रतिहारकाल में इस क्षेत्र में मंदिर-स्थापत्य समृद्ध अवस्था में था।

गजनी के आक्रांताओं द्वारा विनाश

जालौर की मंदिर शैली को विदेशी आक्रांताओं और इस्लमा की कट्टरता ने बड़ा नुक्सान पहुंचाया। हिन्दुओं के दुर्भाग्य से इस क्षेत्र को कई शताब्दियों तक गजनी, गौर एवं सिंध आदि से आए मुस्लिम आक्रांताओं ने पददलित किया, जिससे जालौर क्षेत्र के प्राचीन मंदिर नष्ट हो गए। ये मुस्लिम आक्रांता विशाल सेनाओं के साथ आते थे और सोमनाथ का शिवालय तोड़ने के लिए गुजरात की तरफ जाते थे। वे अपने मार्ग में पड़ने वाले जालोर, भीनमाल एवं सांचोर तक के क्षेत्रों के मंदिरों को भी नष्ट करते हुए चलते थे।

नर-वराह एवं वाराही देवी

भीनमाल के वराह-श्याम मंदिर की वराह मूर्ति नर-वराह की है। इसी के अनुकरण पर वाराही देवी की भी कल्पना की गई तथा वाराही देवी की मूर्तियां भी बनीं। जालौर जिले की सीमा पर स्थित सिरोही जिला मुख्यालय पर वाराही देवी का मंदिर आज भी देखा जा सकता है।

जालौर नगर में स्थित संस्कृत पाठशाला में भी 1990 के दशक में मैंने संगमरमर की बनी एक वराह मूर्ति एक मंडप के नीचे रखी देखी थी। यह मूर्ति देखकर आभास होता है कि यह राठौड़ों के शासन काल में बनी। भीनमाल नगर से बाहर एक मंदिर है, जिसमें नर-वराह तथा वाराही देवी की मूर्तियां स्थापित हैं। सुंधा पर्वत पर स्थित चामुंडा मंदिर में वाराही देवी की एक प्रतिमा लगी है जिसे सप्त-मातृकाओं में सम्मिलित किया गया है।

भगवान सूर्य के मंदिर एवं प्रतिमाएँ

भीनमाल के वराहश्याम मंदिर के जिस कक्ष में नरवराह प्रतिमा स्थित है, उसके बाहर की एक दीवार में भगवान सूर्य की एक अद्भुत प्रतिमा लगी हुई है। इस मूर्ति के सिर पर मुकुट के स्थान पर अलंकृत टोपी है तथा पैरों में जूते (बूट) धारण किए हुए हैं। यह मूर्ति पारसी शैली की है। इसे पांचवीं-छठी शताब्दी ईस्वी में इस क्षेत्र पर शासन करने वाले किसी हूण शासक ने बनवाया होगा जो पारसी पूजा पद्धति में विश्वास करता था। पर्याप्त संभव है कि वराह-श्याम की प्रमुख प्रतिमा की तरह यह प्रतिमा भी किसी अन्य स्थान से लाकर यहाँ लगाई गई हो।

यह मूर्ति इस तथ्य की पुष्टि करती है कि गुप्तों के बाद इस क्षेत्र पर हूणों ने शासन किया। भीनमाल से प्राप्त पहली शताब्दी का रोमन पत्र भी इस धारणा को पुष्ट करता है। उस काल में इस क्षेत्र में सूर्य-पूजा का विशेष प्रचलन था। भीनमाल में किसी समय जगत् स्वामी का सूर्य मंदिर था। इसके वैभव एवं स्थापत्य की समृद्धि का अनुमान इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि इस मंदिर के तोरणद्वार के बारे में कहा जाता था कि इसे प्रतिहार शासक स्वर्ग से उठाकर लाए थे।

जगत् स्वामी मंदिर अब पूर्णतया नष्ट हो गया है। इस मंदिर की कुछ दुर्लभ मूर्तियां भीनमाल के वराहश्याम मंदिर, चंडीनाथ मंदिर तथा महालक्ष्मी मंदिर में रखी गई हैं। जगत् स्वामी सूर्यमंदिर का एक शिलालेख मैंने 1990 के दशक में भीनमाल के महालक्ष्मी मंदिर के मुख्य कक्ष के सामने वाले बरामदे में नीचे फर्श पर गढ़ा हुआ देखा था।

कुछ सूर्यमंदिर अन्य गांवों में भी स्थित हैं। अनेक सूर्य मंदिर उत्तर-मध्य एवं पश्चिमवर्ती काल में अन्य देवी-देवताओं को समर्पित कर दिए गए थे। जालोर जिले की सीमा पर स्थित सिरोही जिले के ‘वरमाण’ गांव में एक प्राचीन सूर्यमंदिर के खंडहर स्थित हैं। यह भी भीनमाल के जगत् स्वामी मंदिर का ही अवशेष था। ‘वरमाण’ शब्द ‘ब्रह्मांड’ से बना है। ब्रह्मांड के स्वामी सूर्य के नाम पर इसे ‘ब्रह्माण्ड’ मंदिर कहा जाता था।

इस मंदिर के स्तंभों, पार्श्वों तथा छतों के कलात्मक खंड आस-पास बिखरे पड़े हैं। यक्ष-यक्षिणियाँ, देवी-देवता, इंद्र, कुबेर, अरुण, वरुण, ऐरावत आदि की खंडित मूर्तियां भी बिखरी पड़ी हैं। मंदिर 5 फुट ऊंची विशाल पीठिका पर निर्मित है। यह मंदिर पारसी परम्परा के सूर्य-पूजक हूणों द्वारा बनवाया गया था। मंदिर पूर्वाभिमुख है जिसके मुख्य गर्भगृह में भगवान सूर्य की प्रतिमा सात अश्वों के रथ पर सवार है। प्रतिहार-कालीन कुछ शिलालेख इस मंदिर से मिले हैं, जिनमें इन मंदिरों के जीर्णाेद्धार की सूचनाएं हैं।

शेषशायी विष्णु की प्रतिमाएँ

जालौर क्षेत्र में भगवान विष्णु एवं उनके दशावतारों की गुप्त-कालीन एवं प्रतिहार-कालीन मूर्तियां बड़ी संख्या में मिलती हैं। इनमें विशेष रूप से शेषशायी विष्णु की प्रतिमा लगभग हर मंदिर में देखने को मिलती है। इन मूर्तियों का अंकन इस प्रकार किया जाता है जिसमें भगवान विष्णु शैया पर लेटे हुए हैं, भगवती लक्ष्मी उनके चरण दबा रही हैं और आकाश में देवगण वर्षा कर रहे हैं। इन मूर्तियों को देखकर सहज ही अनुमान होता है कि किसी समय इस क्षेत्र में विष्णु मंदिर प्रचुर मात्रा में रहे होंगे। विष्णु पूजा का प्रचलन इस क्षेत्र पर रहे गुप्त शासन के काल में हुआ होगा।

1990 के दशक में मैंने भगवान् विष्णु की एक शेषशायी प्रतिमा भीनमाल के वराहश्याम मंदिर में, एक प्रतिमा काकवाराह मंदिर में, एक प्रतिमा चण्डीनाथ मंदिर में, एक मूर्ति सुंधामाता मंदिर में तथा एक मूर्ति भीनमाल के महालक्ष्मी मंदिर में देखी थी। जालौर जिले की सीमा पर स्थित बाड़मेर जिले के खेड़ गांव में भी भगवान विष्णु की विशाल शेषशायी प्रतिमा विद्यमान है।

धूमड़ा माता मंदिर की प्रतिमाएँ

भाद्राजून के पास की पहाड़ियों में स्थित धूमड़ा माता के मंदिर में भगवान विष्णु की विशालाकार प्रस्तर प्रतिमा विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इसी कक्ष में भगवान कृष्ण की त्रिभंगी मुद्रा की मूर्ति भी दर्शनीय है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार महाभारत का नायक पांडुपुत्र अर्जुन, भगवान कृष्ण की सहमति से देवी सुभद्रा का हरण करके द्वारिका से हस्तिनापुर जाते हुए इसी मार्ग से निकला था। अर्जुन और सुभद्रा का विवाह भी भाद्राजून में होना बताया जाता है। अर्जुन तथा सुभद्रा के नाम पर ही इस स्थान का नाम ‘सुभद्रार्जुन’ हुआ, जो बदलकर ‘भाद्राजून’ कहलाने लगा।

लकुलीश प्रतिमाएँ

विष्णु एवं सूर्य के साथ-साथ इस क्षेत्र में शिव एवं शक्ति की उपासना भी अत्यधिक प्रचलन में रही है। शैव संप्रदायों में से इस क्षेत्र में लकुलीश संप्रदाय (Lakulisha sect) एवं नाथ संप्रदाय विशेष रूप से प्रचलित थे। इन दोनों संप्रदायों में भगवान शिव का स्वरूप भिन्न है। लकुलीश मत, पाशुपत संप्रदाय से अलग हुई शाखा के रूप में विकसित हुआ। पाशुपत संप्रदाय में लकुलीश के अतिरिक्त कापालिक तथा रसेश्वरी आदि अन्य शाखाएं भी प्रसिद्ध रही हैं।

सुंधा पर्वत पर स्थित शिव मंदिर में लकुलीश की मूर्ति तथा एक शिवलिंग स्थापित है। इसी मंदिर में भगवान शिव के दो विग्रह नाथ-पंथ की परम्परा में हैं। जिस समय लकुलीश मत का प्रभाव क्षीण होने लगा, तब उसके उत्तराधिकारी के रूप में मारवाड़ क्षेत्र में नाथ संप्रदाय सामने आया। सुंधा पर्वत पर स्थित यह शिव मंदिर नाथ संप्रदाय की रावल शाखा के जोगियों के संरक्षण में है।

लकुलीश मत को ‘नकुलीश’ भी कहा जाता है। इस मत का नामकरण इस मत के संस्थापक लकुलीश अथवा नकुलिश के नाम पर हुआ था। उनका जन्म गुजरात राज्य के बड़ौदा जिले के कारेवण गांव में हुआ। शिवभक्त लकुलीश के जन्मस्थान की महिमा इतनी बड़ी मानी गई कि शिवपुराण में उस स्थान का वर्णन किया गया है। मथुरा से प्राप्त एक शिलालेख में लकुलीश का समय विक्रम संवत के 200 वर्ष बाद का बताया गया है।

कुषाणों के शासनकाल की एक स्वर्ण-मुद्रा पर भगवान लकुलीश का चित्र अंकित है। इस चित्र में भगवान शिव को एक हाथ में लकुट अर्थात लाठी धारण किए हुए दर्शाया गया है तथा दूसरे हाथ में अन्य प्रतीक अंकित है। इस मत के अनुसार भगवान शिव अपनी लाठी से इस जगत के समस्त प्राणियों को नियंत्रित करते हैं। सृष्टि के समस्त प्राणी पशु कहे गए हैं तथा भगवान शिव को पशुपति कहा गया है। इससे सिद्ध होता है कि लकुलीश मत, पाशुपत संप्रदाय की ही एक शाखा है।

लकुलीश मत के मंदिर एवं विग्रह राजस्थान, गुजरात तथा मध्य प्रदेश से बड़ी संख्या में प्राप्त हुए हैं।

नाथपंथ के मंदिर

गुरु गोरखनाथ के समय लकुलीश मत नाथ पंथ से मिल गया तथा नाथों की रावल शाखा इसकी उत्तराधिकारी हुई। गोरखपंथी नाथ जोगियों के हाथ का डंडा भी इसी लकुट का प्रतीक था। जालोर जिले में नाथ संप्रदाय का अत्यंत प्राचीन एवं सबसे बड़ा मंदिर जालंधरनाथ का है, जो सिरेमंदिर (SIRE MANDIR) के नाम से विख्यात है। यह मंदिर कलशाचल नामक पहाड़ी पर स्थित है। यहाँ स्थित भ्रमर-गुफा में जालंधरनाथ ने योग-साधना की थी। योग के अनुसार शरीर के छः चक्रों में से ब्रह्मरंध्र के नीचे तथा भ्रू-मध्य के बीच में ‘आज्ञा-चक्र’ स्थित है। इसी आज्ञा-चक्र को ‘भ्रमर-गुहा’ भी कहते हैं।

जालौर के देवी मंदिर

देवी मंदिरों में जालौर नगर में स्थित चामुंडा मंदिर (CHAMUNDA MANDIR), जालौर दुर्ग में स्थित जोगमाया मंदिर, महालक्ष्मी मंदिर, आहोर में स्थित चामुंडा मंदिर, सुंधा पर्वत पर स्थित अघटेश्वरी चामुंडा मंदिर, आशापुरी महोदरी माता (ASHAPURI MODRA MATA) मंदिर, भीनमाल स्थित क्षेमंकरी माता [1]  मंदिर, हर्षवाड़ा स्थित धोली माता [2] का मंदिर तथा भाद्राजून की पहाड़ियों में स्थित धूमड़ा माता (DHUMDA MATA) का मंदिर सर्वाधिक उल्लेखनीय हैं। देवी का एक नाम धूम्रविलोचिनी [3] है। अतः प्रतीत होता है कि धूमड़ा शब्द की उत्पत्ति धूम्र शब्द से हुई।

जालोर जिले के सुप्रसिद्ध शिव मंदिर

जालोर क्षेत्र के सुप्रसिद्ध शिव मंदिरों में भीनमाल का चंडीनाथ मंदिर, जालोर दुर्ग में स्थित सोमनाथ शिवालय, सिरेमंदिर परिसर में स्थित रतनेश्वर महादेव मंदिर, जालौर जिला मुख्यालय से लगभग 20 किलोमीटर दूर स्थित जागनाथ महादेव (जगन्नाथ महादेव), सराणा गांव में स्थित सोमनाथ महादेव, जिला मुख्यालय जालोर से लगभग 35 किलोमीटर दूर स्थित सूअरेश्वर महादेव, नीलकण्ठ गांव में स्थित नीलकण्ठ महादेव, भैंसवाड़ा में स्थित पीपलेश्वर महादेव, रामसीन में स्थित अपराजितेश्वर अथवा आपेश्वर महादेव (APESHWAR MAHADEV), कोटड़ा में स्थित आद्यमहेश्वर, भादरड़ा में स्थित ईश्वरेश्वर महादेव, भीनमाल नगर से बाहर स्थित नीलकंठ महादेव मंदिर, रानीवाड़ा गांव में स्थित पातालेश्वर महादेव, तावीदर गांव में स्थित वागड़ेश्वर महादेव, सिलासन गांव में स्थित सिलासन महादेव तथा सांचौर का वायवेश्वर मंदिर उल्लेखनीय हैं। रामेश्वर मंदिर मुस्लिम आक्रमणों में पूरी तरह नष्ट हो गया।

जालौर की मंदिर शैली

जहाँ तक जालौर की मंदिर शैली का प्रश्न है, इसे किसी विशिष्ट नाम से सम्बोधित नहीं किया जा सकता। अर्थात् यह नहीं कहा जा सकता कि जालौर शैली के नाम से इस क्षेत्र में कोई विशिष्ट मंदिर शैली विकसित हुई। जैसा युग रहा, उसी के अनुरूप इस क्षेत्र में मंदिरों का निर्माण हुआ।

मंदिर शैलियों की शास्त्रीय व्याख्याएं

प्राचीन भारतीय शिल्पशास्त्रों के अनुसार भारत के मंदिरों को मुख्यतः तीन शैलियों में बांटा जा सकता है जिन्हें नागर, वेसर और द्रविड़ कहते हैं। इन तीनों शैलियों की कोई निश्चित व्याख्या देखने को नहीं मिलती।

गुप्तकाल के बाद के कुछ ग्रंथ मंदिर शैलियों की दिशा में किंचित् प्रकाश डालने लगते हैं। इनमें मानसार [4] , अपराजित पृच्छा, हयशीर्ष पांचरात्र [5] , सुप्रभेदागम [6] , कामिकागम [7] , समरांगण सूत्रधार  [8] तथा शिवरत्न आदि प्रमुख हैं जो 10वीं सदी से लेकर 15वीं सदी तक की मंदिर-शिल्प परम्पराओं की चर्चा करते हैं। इन ग्रंथों में मंदिर शैलियों की चर्चा करते समय अनेक प्रसंगों पर परस्पर-विरोधी बातें कही गई हैं। यहाँ तक कि उनके नाम भी बदल दिए गए हैं।

उदाहरण के लिए, 12वीं शती में भुवन देवाचार्य विरचित ‘अपराजितपृच्छा’ (बृहच्छिल्पस्थापत्यशास्त्र) कामिकागम तथा सूत्रधार मंडल में कालिंग, वराट् और सार्वदेशिक, ये तीन प्रकार की शैलियां भी उल्लिखित हैं।

14वीं शताब्दी में वास्तुकार मण्डन द्वारा रचित ‘शिल्पशास्त्र प्रसाद मंडन’ में मंदिरों की जो शैलियाँ बताई गई हैं, उन्हें नागर, द्रविड़, ललित, भूमिज, ललित, सान्धार, विमानादि, नागर, मिश्र तथा पुष्पिकातिक कहकर संबोधित किया गया है। अपराजितपृच्छा में भी नागर, द्रविड़, वेसर, सान्धार, विमान, भूमिज भक्ति तथा बाह्य शैलियों का उल्लेख है। इन शैलियों की व्याख्याएँ भी सूत्रधार विशेष अथवा लेखक ने अपने ढंग से अलग-अलग की हैं।

कामिकागम में कहा गया है कि हिमाचल से विंध्याचल तक नागर शैली के, विंध्य पर्वत से कृष्णा नदी तक वेसर शैली के तथा कृष्णा नदी से कन्याकुमारी तक द्रविड़ शैली के मंदिर बनते हैं। यदि इस वर्गीकरण को स्वीकार कर लिया जाए तो जालौर क्षेत्र नागर शैली के क्षेत्र में आता है। उत्तरी भारत की इस मंदिर शैली में बड़े शिखर वाले मंदिर गुप्तकाल एवं उसके बाद में बनते रहे हैं। इस शैली के मंदिरों के शिखर बड़े भागों में विभक्त होते हैं।

विभिन्न कालखण्डों में नागर शैली में परिवर्तन आता रहा है। प्रारंभ में नागर शैली के मंदिर बहुत छोटे आकार के एवं वर्गाकार थे, जिनमें केवल गर्भगगृह होता था और छत चपटी होती थी। बाद में गर्भगृह के आगे मंडप बनने लगे और आगे चलकर मंडप का आकार बढ़ने लगा। उसमें भोग मंडप, नृत्य मंडप आदि जुड़ते चले गए। फिर भी गर्भगृह का आकार छोटा एवं वर्गाकार ही बना रहा।

मंदिर के गर्भगृह पर छत के स्थान पर शिखर का उद्गम पांचवीं शताब्दी से छठी शताब्दी में, अर्थात गुप्तकाल के दौरान हुआ। यही परम्परा उत्तर भारत के बहुभूमिक प्रासादों के रूप में परवर्ती काल में भी विद्यमान रही। बहुभौमिक प्रसादों में भूमियों की लंबाई-चौड़ाई उत्तरोत्तर कम होती जाती है। कुछ और काल बीत जाने पर शिखरों को नागर रेखा से विभक्त किया जाने लगा। मंदिर की भिन्न-भिन्न भूमियों एवं विभागों को ह्रस्वाकार अर्थात् लघु बनाया जाने लगा तथा प्रत्येक भूमि के प्रत्येक कोने पर आमलक शिला रखी जाने लगी।

वर्तमान समय में मान्य मंदिर शैलियाँ

यद्यपि शिल्प शास्त्र के ग्रंथों में मंदिरों की कई शैलियाँ वर्णित हैं तथापि वर्तमान समय में सामान्यतः तीन शैलियाँ ही प्रमुख रूप से मान्य हैं जिन्हें इस प्रकार परिभाषित किया जाता है-

नागर: इस शैली के मंदिरों में ऊँचा और सीधा विमान होता है। विमान को शिखर भी कहते हैं। विमान के नीचे छोटा गर्भगृह होता है तथा विमान के ऊपर आमलक और कलश होते हैं।

द्रविड़: इस शैली के मंदिरों में विशाल गोपुरम् बनाया जाता है जो मंदिर परिसर के प्रवेशद्वार का कार्य करता है। मुख्य मंदिर पर पिरामिडाकार शिखर होता है और प्रांगण में अनेक मंडप होते हैं।

वेसर: कन्नड़ शैली के मंदिरों को वेसर शैली कहा जाता है। इसमें नागर और द्रविड़ शैलियों का मिश्रण होता है। अर्थात् मंदिर का विमान अथवा शिखर नागर शैली के जैसा होता है परंतु मंडप द्रविड़ शैली के होते हैं।

जालौर क्षेत्र में चौहान राजाओं के मंदिर

जालौर क्षेत्र में वर्तमान में गुप्त-कालीन अथवा गुर्जर-प्रतिहार कालीन कोई भी मंदिर अपने मूल स्वरूप में नहीं है। चौहान-कालीन एवं राठौड़-कालीन मंदिर अवश्य दृष्टिगत होते हैं। सुंधा पर्वत पर लगे राजा चाचिगदेव के शिलालेख में राजा आशराज से लेकर राजा चाचिग देव तक के चौहान शासकों द्वारा मंदिरों पर स्वर्णकलश चढ़ाने, उनमें मंडप तथा रथ आदि बनाने का उल्लेख हुआ है। चौहान नरेश आशराज ने चौलुक्यों के विरुद्ध मालवों की सहायता की तथा विजयश्री प्राप्त करके अनेक मंदिरों पर स्वर्णकलश चढ़ाए। शिलालेख में कहा गया है कि चालुक्य नरेश जयसिंह सिद्धराज उन कलशों को नहीं चुरा सका।

राजा द्वारा मंदिरों के शिखरों पर चढ़ाए गए स्वर्णकलश ऐसे चमकते थे कि उन्हें देखकर उदयाचल के शिखर पर सहस्र-रश्मि सूर्य के उदित होने का भ्रम होता था अथवा ऐसा लगता था मानो उन्नत आकाश में सौभाग्य एवं सौंदर्य की मंजरी उदित हुई हो। इस शिलालेख में आगे कहा गया है कि आशराज ने अनेक शिवमंदिर बनवाए।

शिलालेख के द्वितीय खण्ड में कहा गया है कि आशराज के वंशज केल्हण ने भगवान शंकर के विशाल भालोचित मुकुट के समान स्वर्ण-तोरण का निर्माण करवाया। केल्हण ने यह स्वर्ण-तोरण किस मंदिर में बनवाया था, इसके बारे में अब कोई जानकारी नहीं मिलती है किंतु उक्त उल्लेखों से यह सिद्ध होता है कि चौहान काल में जालौर क्षेत्र में मंदिरों पर स्वर्णकलश चढ़ाने तथा तोरण द्वार बनवाने को धार्मिक कृत्य समझा जाता था तथा कलश एवं तोरण मंदिर स्थापत्य कला का अभिन्न अंग थे।

राजा चाचिगदेव द्वारा निर्मित सुंधा माता मंदिर

सुंधा अभिलेख में राजा चाचिगदेव द्वारा सुंधा पर्वत पर देवी के मंदिर (SUNDHA MATA TEMPLE) में मंडप बनवाए जाने का उल्लेख है। इस मंडप के मध्य-लोलक पर नृत्यांगनाएँ उत्कीर्ण की गई हैं। स्तंभों के शीर्ष भाग तथा मंडप के उठाव के योजक-स्थलों पर चारों ओर हंसों की कतार बनाई गई है। इसकी कोरणियों की खुदाई देखते ही बनती है। इस मंडप की पीठिका (कुर्सी) सागी नदी के तट से लगभग 45 फुट ऊपर उठाकर गुफा के प्रवेश द्वार के सामने बनाई गई है, जिसमें अघटेश्वरी चामुंडा तथा ‘भूर्भुवःस्वः’ शिवलिंग स्थापित है। इस मंडप का निर्माण ई.1262 में करवाया गया था।

सुंधा पर्वत पर स्थित यह पूरा मंदिर उच्च कोटि के संगमरमर से बना हुआ है। मंदिर का ऊँचा शिखर भी बहुत कलात्मक है तथा नागर शैली का है। शिखर के ठीक मध्य में ऊपर की ओर स्वर्णकलश स्वर्णकमल की तरह सुशोभित है। तोरणद्वार तथा तीन देवालयों पर भी कलश सुशोभित हैं। तोरणद्वार तथा तीन देहरियों पर भी कलश सुशोभित हैं। इन देहरियों में कुंडलधारी शिव-पार्वती, चंवर-धारिणी तथा उपासिकाओं की मूर्तियाँ हैं। मंडप में प्रवेश करने के लिए 21 फुट ऊँचे और साढ़े दस फुट चौड़े तोरण के नीचे से होकर निकलना होता है। इसके शीर्ष मध्य में चामुंडा का विग्रह सुशोभित है।

यहीं सामने के आले में शिव-पार्वती की काम-भाव की युगल मूर्ति तथा उनके पुत्र गणेशजी सुशोभित हैं। तोरण द्वार के दोनों ओर दो छतरियाँ हैं। मंडप के दूसरी ओर निकास है। यहाँ भी एक तोरण द्वार बना हुआ है, जिसके शीर्ष मध्य पर शिवजी विराजमान हैं। मंडप से चामुंडा के मंदिर में प्रवेश करने पर 11 फुट गुणा 11 फुट आकार का प्रथम गुफा-कक्ष आता है, जिसमें लगभग चार फुट ऊंची अलंकृत पीठिका पर अघटेश्वरी चामुण्डा विराजमान हैं।

मुख्य कक्ष के पास की दक्षिणी दीवार में वाराही, ब्रह्माणी, शांभवी (माहेश्वरी), इंद्राणी, वैष्णवी, कौमारी तथा नरसिंही नामक सप्तमातृकाएं [9] प्रतिष्ठित हैं। 

इसी कक्ष में लकुलीश शिव का एकमुखी लिंग तथा चतुर्भुज विग्रह स्थापित हैं। संगमरमर की एक कलात्मक चौखट को पार करके ‘श्री भूर्भुवःस्वेश्वर’मंदिर में प्रवेश करते हैं। यहाँ लगभग पूर्ण फुट ऊंचा श्यामवर्णी शिवलिंग स्थापित है। पहले यहाँ जो जलहरी लगी थी, वह नष्ट हो गई अतः सवा दो फुट गुना सवा दो फुट नाप की वर्गाकार संगमरमर की नई जलहरी लगाई गई। पास में ही काले पत्थर का नंदी विराजमान है। इसी कक्ष में एक विवर है जो पृथ्वी में काफी दूर तक चला गया बताते हैं।

अघटेश्वरी के कक्ष में घुसने से पहले प्रवेशद्वार के पास ही राजा चाचिगदेव चौहान का वह शिलालेख लगा है जिसका उल्लेख हम इसी लेख में पहले कर चुके हैं।

राजा चाचिगदेव द्वारा निर्मित अपराजितेश मंदिर

सुंधा पर्वत के शिलालेख में राजा चाचिगदेव द्वारा रामसीन के आपेश्वर मंदिर (APESHWAR MANDIR) पर कनक कलश चढ़ाने, ध्वजारोहण करने तथा एक शाला और रथ बनवाने का भी उल्लेख है। राजा चाचिगदेव ने आपेश्वर मंदिर में सोने एवं चांदी की अनेक मेखलाओं का दान किया तथा कैलाश पर्वत से प्रतिस्पर्द्धा करने वाला एक सुंदर रथ बनवाया जो तीनों लोकों की लक्ष्मी के आभूषण एवं रत्नराशि रूप था।

अपराजितेश मंदिर अब अपने मूल स्वरूप में नहीं है। राठौड़ों के शासनकाल में इस मंदिर को दुर्ग की आकृति के प्राकार (परकोटे) से घेर दिया गया। समय-समय पर इस मंदिर के स्थापत्य में इतने परिवर्तन हो गए कि अब मूल स्वरूप में पहचान पाना अत्यंत कठिन है। मंदिर का रथ अथवा विमान जैसा आकार अब ध्यान से देखने पर ही दिखाई देता है। मंदिर के दोनों पार्श्वों में शालाओं का निर्माण कर दिया गया है।

गर्भगृह के सामने का मंडप भी बहुत सुंदर है। गर्भगृह, मंडप तथा शिखर तीनों ही नागर शैली के हैं। मुख्य गर्भगृह में भगवान शिव की लगभग 5 फुट ऊंची प्रतिमा विराजमान है जो श्वेत संगमरमर से निर्मित है। इस मूर्ति पर नाथ संप्रदाय के योगियों का प्रभाव स्पष्ट दिखाई पड़ता है। भगवान शिव के कण्ठ में मालाएं, पैरों में नूपुर, कानों में कुंडल, कमर में नागपाश तथा भुजओं में भुजबंद धारण कर रखे हैं। भगवान शिव के दोनों और दो यक्ष-मूर्तियां बनी हुई हैं जिन्हें गोरा तथा काला भैंरू भी कहते हैं।

राजा चाचिगदेव द्वारा निर्मित शिवालय युगल

सुंधा पर्वत के शिलालेख में राजा चाचिगदेव चौहान के पिता उदय सिंह चौहान द्वारा जालौर नगर में शिवालय युगल बनवाए जाने का तथा उदयसिंह की बुआ रूदल देवी द्वारा भी दो शिव मंदिर बनवाए जाने का उल्लेख हुआ है। इन चारों ही मंदिरों के बारे में अब विशेष जानकारी प्राप्त नहीं होती है। 1990 के दशक में जालोर नगर से कुछ दूरी पर स्थित जागनाथ मंदिर (जगन्नाथ मंदिर) के बाहर से मुझे रूदलदेवी के कुछ शिलालेख एवं उसके द्वारा भगवान शिव के अभिषेक की कुछ मूर्तियाँ देखने को मिली थीं।

इन मूर्तियों से अनुमान होता है कि राजकुमारी रूदलदेवी द्वारा निर्मित दो शिवालयों में से एक मंदिर यही रहा होगा। इसी मंदिर के परिसर से मुझे रूदलदेवी के भाई सामंतसिंह के पुत्र उदयसिंह के शिलालेख भी देखने को मिले। अनुमान होता है कि इस मंदिर का निर्माण रूदलदेवी ने करवाया तथा कुछ समय बाद रूदलदेवी ने मंदिर के शिखर पर स्वर्णकलश भी चढ़ाया। राजा उदयसिंह ने भी इस मंदिर में पूजा-अर्चना की तथा दान किए।

रूदलदेवी द्वारा निर्मित यह जागनाथ मंदिर भी मूलतः नागर शैली का है। मंडप गर्भगृह तथा शिखर नागर शैली में ही प्रतीत होते हैं। इस मंदिर के पीछे कुछ दशक पहले एक और शिवालय रेत के टीलों के नीचे से निकला था। अतः संभव है कि राव उदयसिंह चौहान द्वारा निर्मित जिस शिवालय युगल का उल्लेख सुंधा अभिलेख में हुआ है, वह शिवालय युगल यहीं पर स्थित है।

रतनेश्वर महादेव मंदिर

सिरे मंदिर परिसर में भंवर गुफा के अतिरिक्त रतनेश्वर महादेव का मंदिर (RATNESHWAR MAHADEV MANDIR) भी स्थापत्य एवं शिल्प की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है। इसका शिखर काफी ऊंचा है जिस पर स्वर्णकलश एवं ध्वजदंड लगे हुए हैं। इस शिवालय पर छोटे-बड़े कल 21 कलश हैं। मंदिर के समक्ष खुला हुआ प्रांगण है यह शिवालय ईस्वी 1651 में राठौड़ रतनसिंह द्वारा स्थापित करवाया गया था। तब से लेकर अब तक इसके मूल स्वरूप में काफी परिवर्तन आ चुका है।

यह मंदिर उत्तराभिमुख है। इसका गर्भगृह 12 फुट गुणा 12 फुट माप की वर्गाकृति में है। मंदिर के द्वार पर रिद्धि-सिद्धि दायक श्री गणेश जी सुशोभित हैं। गर्भगृह के चारों ओर साढ़े आठ फुट चौड़ी परिक्रमा है। गर्भगृह में दो शिवलिंग स्थापित हैं। प्राचीन शिवलिंग राव रतन सिंह द्वारा स्थापित किया माना जाता है जिसे स्टील की पतली चद्दर से सुरक्षित कर दिया गया है।

प्राचीन एवं नवीन दोनों शिवलिंगों के सामने एक-एक नंदी विराजमान है। गर्भगृह में प्रवेश करते ही दाहिने कोने में जालंधरनाथ की मूर्ति के दर्शन होते हैं। पार्वती एवं गणेशजी मुख्य गर्भगृह में विराजमान हैं। रिद्धि-सिद्धि गणेशजी पर चंवर ढुला रही हैं और चरणों में जोधपुर का राठौड़ राजा मानसिंह आराधना में लीन है।

रतनेश्वर महादेव मंदिर परिसर को एक लघु दुर्ग का आकर दिया गया है क्योंकि जोधपुर नरेश भीमसिंह की सेना से बचने के लिए राजकुमार मानसिंह ने लगभग 10 वर्ष तक इसी पर्वत पर स्थित महलों में शरण ली थी।

भीनमाल के वराह श्याम मंदिर की प्रतिमाएं

भीनमाल में स्थित भगवान वराह श्याम का मंदिर किसी शास्त्रीय शैली के अनुरूप नहीं बना हुआ है। विभिन्न स्थानों से प्राप्त सूर्य, विष्णु, पार्वती, वराह, हनुमान, कुबेर, यक्ष तथा अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां यत्र-तत्र रख दी गई हैं। इस मंदिर परिसर में बने एक छोटे गर्भगृह में प्रतिहार कालीन वराह मूर्ति मूलनायक के रूप में स्थापित है।

मंदिर के गर्भगृह की बाहरी दीवार पर हूण कालीन सूर्यदेव की प्रतिमा लगी हुई है जिसने जूते पहन रखे हैं। मंदिर परिसर में सातवीं से दसवीं शताब्दी के बीच बनी अनेक दुर्लभ मूर्तियां लगी हुई हैं। इनमें गणेश शिव, पार्वती, राधा, कृष्ण, शेषशायी विष्णु, काले पत्थर की चतुर्भुज विष्णु की दो महत्वपूर्ण मूर्तियां उल्लेखनीय हैं।

जिस कक्ष में वराह श्याम की मूर्ति लगी है, उस मूर्ति के ठीक सामने की शाला में एक दीवार में पार्वती की एक अद्भुत प्रतिमा लगी है। यह प्रतिमा विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इस प्रतिमा में माता पार्वती को अत्यंत अलंकृत किरातिनी के वेश में दर्शाया गया है जो जंगल से शिकार मारकर ला रही है।

जालौर दुर्ग में स्थित जोगमाया मंदिर

जालौर दुर्ग में स्थित जोगमाया मंदिर अब एक मस्जिद की बगल में छोटे से आले में सिमट कर रह गया है। मुसलमानों ने जोगमाया मंदिर को तोड़कर उस स्थान पर एक मस्जिद बना दी है। अब जोगमाया की छोटी सी मूर्ति ही पुराने मंदिर की स्मृति के रूप में रह गई है।

जालौर दुर्ग में स्थित चामुंडा देवी मंदिर

जालौर दुर्ग में स्थित शिव मंदिर के पिछवाड़े की बावड़ी के पास चामुंडा देवी का एक बहुत छोटा मंदिर है। इस मंदिर की बाहरी दीवार में एक चौहान कालीन शिलालेख लगा है जिसमें युद्ध में शत्रुओं से घिरे हुए राजा कान्हड़देव को देवी भगवती द्वारा चमत्कारिक रूप से तलवार पहुंचने की सूचना उत्कीर्ण है। दुर्ग में स्थित मंदिरों में नाथ योगियों द्वारा बनाए गए चित्र उपलब्ध हैं जो इस बात के प्रतीक हैं कि मध्यकाल में जालोर जिले के मंदिरों में भित्तिचित्र बनवाए जाने की परम्परा विद्यमान थी।

जालोर नगर में चामुंडा देवी मंदिर

जालौर नगर में स्थित चामुंडा देवी के मंदिर में 64 योगिनियों की मूर्ति पूजी जाती है। इस पर विक्रम संवत 1175 वैशाख वदी 1 अर्थात् 29 मार्च 1119 का शिलालेख उत्कीर्ण है।

सेवाड़ा पातालेश्वर मंदिर के भग्नावशेष

सेवाड़ा का पातालेश्वर भग्न मंदिर जालौर के मंदिर स्थापत्य की दृष्टि से विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यहाँ का मूल शिवालय सातवीं-आठवीं शताब्दी का बताया जाता है। यह मंदिर अब नितांत खंडहर अवस्था में है। इसे अनेक मुस्लिम आक्रांतों द्वारा तोड़ा गया तथा अनेक हिंदू शासकों द्वारा पुनः-पुनः बनाया गया।

वर्तमान में दिखाई देने वाले मंदिर के खण्डहर, 13वीं शताब्दी में जीर्णोद्धार करके बने मंदिर के प्रतीत होते हैं। वर्तमान समय में मंदिर के शिखर पूर्णतः अदृश्य हैं। सम्पूर्ण मंदिर ऊपर से आधा नष्ट कर दिया गया है, मानो धर्म, आस्था, संस्कृति, शिल्प एवं कला का जीता-जागता हरा-भरा वृक्ष ऊपर से काटकर फैंक दिया गया हो।

मोदरा माता मंदिर (MODRA MATA TEMPLE)

मोदरां माता अर्थात् महोदरी माता को आशापुरा देवी भी कहते हैं। यह मंदिर बहुत ऊंची चौकी पर बना है जिसके चारों कोनों में पंचायत शैली में लघु देवालय स्थित हैं। ये लघु शिवालय सूर्यदेव, गणेश, विष्णु तथा भगवान शिव को समर्पित हैं। मंदिर के चारों ओर एक विशाल परकोटा खींचकर उसे लघु दुर्ग का रूप दिया गया है।

रतनपुर शिवालय के भग्नावशेष

जालोर के मंदिरों में मैं दो खण्डहर मंदिरों का उल्लेख विशेष रूप से करना चाहूंगा। रानीवाड़ा के पास रतनपुर गांव में एक शिवालय के भग्नावशेष मुझे वर्ष 1993 में देखने को मिले। मंदिर के भग्न मण्डप के ऊपरी भाग में अद्भुत मूर्तियां उत्कीर्ण हैं। इनके साथ विचित्र आकृतियों के पशु भी उत्कीर्ण किए गए थे। इस शिव मंदिर के परिसर में मुझे एक शिलालेख मिला था जिनके ऊपरी हिस्से में एक पशु तथा स्त्री को मिथुनरत दर्शाया गया था। यह शिव मंदिर अब पूरी तरह नष्ट हो गया है। इसके कुछ अलंकृत पत्थर, मूर्तियाँ एवं शिलालेख पास में ही बने नवीन मंदिर में लगाए गए हैं।

नरसिंह मंदिर के भग्नावशेष

दूसरा मंदिर जिसका मैं उल्लेख करना चाहूंगा, वह भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार को समर्पित था। इस मंदिर के खंडहर आज भी गोलाना गांव में देखे जा सकते हैं। खंडहरों के पास नरसिंह, परशुराम तथा भगवान के विविध अवतारों की मूर्तियां बिखरी पड़ी हैं। यहाँ से प्राप्त एक शिलालेख में विक्रम संवत 1239 की तिथि दी गई है तथा प्रतिहार शासक कृष्णदेव का उल्लेख किया गया है। इस खंडहर से प्राप्त नरसिंह की प्रतिमा चतुर्भुजी है तथा वे हिरण्यकश्यप का वध करने की मुद्रा में हैं। यह अद्भुत प्रतिमा देखते ही बनती है। इस प्रतिमा की भव्यता को देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि यहाँ किसी समय भव्य मंदिर रहा होगा।

गाजनखेड़ा का अद्भुत शिवलिंग

गाजनखेड़ा गांव से एक अद्भुत शिवलिंग प्राप्त हुआ है जिसके चारों ओर चार मुख हैं। ये मुख गांधार शैली से मिलते-जुलते हैं।

जालौर मंदिर शैली की अन्य विशेषताएं

संक्षेप में जालौर क्षेत्र के मंदिरों के बारे में कहा जा सकता है कि इस क्षेत्र में मध्यकाल में बने लगभग सभी प्रमुख मंदिर नागर शैली के हैं जिनके ऊंचे शिखर बड़े भागों में विभक्त हैं। इन मंदिरों का मुख्य भाग गर्भगृह होता है जिसमें मंदिर के मूलनायक की प्रतिमा, पिंडी या लिंग स्थापित किया गया है। मूलनायक के साथ ही अन्य पौराणिक देवी-देवताओं, रिद्धि-सिद्धि, विनायक, चमरधारिणी तथा यक्ष आदि उत्कीर्ण किए गए हैं। मुख्य गर्भगृह के सामने एक या एकाधिक मंडप बने हुए हैं। इन मण्डपों में कीचक, घण्टा, कमलदल, गंधर्व आदि का अंकन किया गया है।

गर्भगृह तथा मण्डप के बाहर दोनों पार्श्वों में अथवा चारों ओर शालाएं (बरामदे) निर्मित की गई हैं। किसी-किसी मंदिर के चारों ओर प्राकार बनाकर उसे दुर्ग जैसी सुरक्षा प्रदान की गई है।

मंदिरों में वनस्पतियाँ लगाने की परम्परा

मंदिरों में तुलसी, नीम, पीपल, बड़, कदम्ब आदि वनस्पतियां प्रमुखता से लगाई गई हैं। जागनाथ शिवालय, आपेश्वर शिवालय, सेवाड़ा शिवालय आदि शिव मंदिरों में बावड़ियाँ भी प्रमुखता से बनाई गई हैं। जालौर की मंदिर शैली में भी इन्हें प्रमुखता से देखा जा सकता है।

प्राचीन सामग्री का विनाश

मंदिर परिसरों में, विभिन्न स्थानों से खुदाई में प्राप्त होने वाली प्राचीन मूर्तियां, स्मारक प्रस्तर तथा शिलालेख आदि लगाने की परम्परा सी विकसित हो गई थी। उनमें से बहुत से सामग्री अब नष्ट हो चुके हैं। जागनाथ महादेव, आपेश्वर महादेव तथा वराहश्याम मंदिर के परिसरों में 1990 के दशक में जो प्राचीन प्रतिमाएं मैंने यत्र-तत्र पड़ी हुई या रखी हुई या दीवार में लगी हुई देखी थीं, उनमें से बहुत सी सामग्री विगत 35 वर्षों की अवधि में हटा दी गई हैं, संवभवतः उन्हें अनुपयोगी जानकर फैंक दिया गया।

मंदिर के जीर्णोद्धार की सूचना देने वाले शिलालेख भी मंदिर के स्थापत्य का महत्वपूर्ण अंग हैं। प्रवेश द्वार से लेकर मुख्य मंडप तथा गर्भगृह के द्वार तक पीतल के घंटे, दानपेटी, हाथ धोने के लिए जल की टंकी, दीपक तथा आरती का थाल आदि भी भारतीय मंदिर शैली के अभिन्न अंग कहे जा सकते हैं।

जैन मंदिर

आठवीं शताब्दी इसी में रचित जैन ग्रंथ कुवलयमाला में कहा गया है कि यक्ष दत्तमणि ने गुर्जर देश को देव मंदिरों से रम्य बना दिया है। कुवलयमाला द्वारा वर्णित गुर्जर देश में डीडवाना, मंडोर, जालौर तथा भीनमाल आदि क्षेत्र भी सम्मिलित होते थे। कुवलयमाला की प्रशस्ति में यक्ष दत्तमण के गुरु शिवचंद मणि महत्तर के लिए लिखा है कि यह जिनवंदन के लिए घूमते हुए भीनमाल नगर में रहे। अर्थात् आठवीं शताब्दी से पहले भी जालौर-भीनमाल क्षेत्र में जैन मंदिर थे। विविध तीर्थकल्प में भी सांचौर के जैन मंदिरों का उल्लेख हुआ है।

वैष्णव एवं शिव मंदिरों की भांति राजस्थान के प्राचीन जैन मंदिर भी अब उसे रूप में नहीं रहे जिस रूप में वे बने थे। फिर भी कुछ अंश जो प्राचीन जैन मंदिरों का बच गया है उनके आधार पर जैन मंदिर स्थापत्य का सही चित्र उपस्थित नहीं किया जा सकता। जालौर दुर्ग पर स्थित चौमुखा जैन मंदिर जैन स्थापत्य कला का प्रतिनिधित्व करता है। कुछ विद्वानों के अनुसार यह मंदिर मूलतः शिव मंदिर था किंतु जब चौलुक्य कुमारपाल ने जालौर पर आधिपत्य किया, उस काल में यह मंदिर जैन मंदिर में बदल दिया गया। आज भी मंदिर स्थापत्य की कुछ विशेषताएं इस घटना की ओर संकेत करती हैं।

 

बौद्ध मंदिर

जब चीनी यात्री ह्वेनसांग भारत आया, तब उसने भीनमाल की भी यात्रा की। अपने यात्रा-संस्मरण में उसने भीनमाल नगर में स्थित एक बौद्ध मठ का भी उल्लेख किया। इससे यह तो निश्चित है कि किसी समय इस क्षेत्र में बौद्ध मंदिर भी रहे होंगे किंतु हूणों के आक्रमणों में बौद्धों के वे मंदिर मठ एवं विहार सदैव के लिए नष्ट हो गए। बौद्ध धर्म की दुर्दशा पर ह्वेनसांग ने विधर्मियों अर्थात हिंदू धर्मावलंबियों के लिए कुछ कटु शब्दों का प्रयोग भी किया है।

कुवलयमाला के प्रणेता जैन विद्वान उद्योतन सूरि ने हूणों के नेता तोरमाण और उसके पुत्र मिहिरकुल की प्रशंसा ‘संपूर्ण धरती का स्वामी’ कहकर की है। इससे अनुमान होता है की आठवीं शताब्दी के आस-पास बौद्ध एवं जैन मतावलंबियों के बीच सम्बन्ध मधुर नहीं थे क्योंकि तोरमाण को बौद्धों का सबसे बड़ा शत्रु माना गया है।

उद्योतन सूरि लिखता है- तोरमाण समस्त विश्व का स्वामी था। वह जैन धर्म में भी आस्था रखता था। तोरमाण के पुत्र के बारे में भी ह्वेनसांग लिखता है कि उसने बौद्धों पर बड़ा अत्याचार किया। उनके विहारों तथा स्तूपों को लूट लिया और बड़ी निर्दयता से उनका सामूहिक संहार किया। उसने अपने अधिकार वाले संपूर्ण क्षेत्र में बौद्ध संघ के पूर्ण विनाश की आज्ञा दी। यही कारण है कि अब जालौर जिले में बौद्ध मंदिरों का कोई अस्तित्व नहीं है।

यदि बौद्ध मंदिर मध्यकाल तक अर्थात् राजपूत शासकों के काल तक इस क्षेत्र में अस्तित्व में रहे होते तो निश्चित रूप से जालौर की मंदिर शैली पर उनका भी गहरा प्रभाव रहा होता।

(नोट- यह आलेख वर्ष 1993-94 में जालोर जिले के मंदिरों के व्यापक भ्रमण एवं शोध के आधार पर लिखा गया था।)

-मोहनलाल गुप्ता


[1]   इसे खीमज माता भी कहा जाता है।

[2]   देवी दुर्गा के गौरी स्वरूप को धोली माता कहा जाता है।

[3] धूम्रविलोचिनी महाविद्या देवी धूमावती का एक विशेष उपनाम है। धूमावती दस महाविद्याओं में से सातवीं महाविद्या है, जिसे वैराग्य, त्याग और संकट-नाशिनी शक्ति के रूप में जाना जाता है। एक पौराणिक कथा के अनुसार, जब सती ने यज्ञ में आत्मदाह किया तो उनके शरीर से निकले धुएं से धूमावती का प्राकट्य हुआ। इसी कारण उन्हें धूम्रविलोचिनी कहा जाता है।

[4]  मानासर अपराजित पृच्छा प्राचीन भारतीय वास्तुशास्त्र और शिल्पशास्त्र का एक ग्रंथ है। यह मानसार नामक वास्तुशास्त्रीय संहिता का हिस्सा है, जिसमें मंदिर निर्माण, मूर्तिकला और स्थापत्य से जुड़े नियम दिए गए हैं।

[5] हयशीर्ष पांचरात्र वैष्णव सम्प्रदाय का एक प्रमुख आगम ग्रंथ है। इसमें भगवान विष्णु के हयशीर्ष (घोड़े-मुख वाले) अवतार की उपासना और पांचरात्र परम्परा के सिद्धांतों का वर्णन मिलता है।

[6] सुप्रभेदागम (Suprabhedagama) हिन्दू धर्म के शैव संप्रदाय का एक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है। सामान्यतः ‘आगम’ शब्द का प्रयोग जैन और शैव (हिंदू) दोनों परंपराओं में किया जाता है, जिससे कभी-कभी भ्रम की स्थिति पैदा हो जाती है।

[7] कामिकागम (Kamikagama) शैवसिद्धान्त सम्प्रदाय का एक प्रमुख संस्कृत ग्रंथ है। यह 12वीं शताब्दी में रचा गया और इसमें मंदिर-निर्माण, पूजा-विधि, देव-प्रतिष्ठा, आचार-विचार तथा दार्शनिक शिक्षाओं का विस्तृत वर्णन मिलता है।

[8]   समरांगण सूत्रधार (Samaraṅgaṇa Sutradhara)  भारतीय वास्तुशास्त्र और ललित कलाओं का एक महान ग्रंथ है। इसे परमार वंश के राजा भोज (ई.1000-1055) ने संस्कृत में रचा था। इसमें नगर-योजना, मंदिर-निर्माण, मूर्तिकला, चित्रकला और यंत्रविद्या का विस्तृत वर्णन मिलता है।

[9] ग्रंथों में सप्तमातृकाओं की सूची अलग-अलग मिलती है। कुछ ग्रंथों में नरसिंही के स्थान पर चामुण्डा को तो कुछ ग्रंथों में महालक्ष्मी को सप्तमातृकाओं में गिना गया है।

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