Monday, February 26, 2024
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31. नाक का बाल

महाराजा विजयसिंह का दीवान सुरतराम मुहणोत एक विश्वसनीय और व्यवहारिक आदमी था। आउवा के ठाकुर जैतसिंह चाम्पावत की चिकनी चुपड़ी बातों में आकर मरुधरानाथ ने सुरतराम को अपदस्थ करके जैतसिंह को अपना दीवान बनाया था। जैतसिंह बड़ा घमण्डी और महा क्रोधी व्यक्ति था। उसके पिता ठाकुर कुशलसिंह चाम्पावत ने विजयसिंह को मारवाड़ रियासत का राज्य दिलवाने के प्रयास में अपने प्राण गंवाये थे। इसलिये जैतसिंह को पूरा विश्वास था कि मरुधरानाथ उसके विपरीत कभी कोई कदम नहीं उठायेगा।

मरुधरानाथ ने राज्य में पशुवध एवं माँस-मदिरा के सेवन का निषेध कर दिया था किंतु जैतसिंह चाम्पावत देवी का भक्त था तथा स्वयं को शाक्त धर्म का अनुयायी बताता था। इसलिये वह मरुधरानाथ के आदमियों से नजर बचाकर देवी की प्रतिमा के समक्ष बकरे और भैंसे काटा करता था और मदिरा चढ़ाकर उसका प्रसाद बांटा करता था। धीरे-धीरे यह बात महाराजा के कारभारियों पर प्रकट हो गई। उन्होंने मरुधरानाथ से जैतसिंह की शिकायत की। मरुधरानाथ ने जैतसिंह को अकेले में बुलाकर समझाया कि वह पशुवध तथा माँस एवं मदिरा का सेवन करना बंद कर दे।

जैतसिंह ने मरुधरानाथ के समक्ष तो उसके आदेश को स्वीकार कर लिया किंतु उसकी पालना नहीं की। जब कई बार ऐसा हुआ तो मरुधरानाथ ने जैतसिंह को हटाकर फिर से सुरतराम मुहणोत को अपना दीवान नियुक्त किया। इससे नाराज होकर जैतसिंह चाम्पावत अपनी जागीर में चला गया। महाराजा ने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया। महाराजा रामसिंह की मृत्यु के ठीक दो साल बाद दीवान सुरतराम मुहणोत की मृत्यु हो गई। इस पर महाराजा ने जैतसिंह चाम्पावत को फिर से दरबार में बुलवाया ताकि वह दीवानी का काम संभाल ले।

जैतसिंह चाम्पावत पहले भी पूरे सात साल तक जोधपुर दरबार की नाक का बाल बना रहा था। वह महाराजा के समक्ष तो विनम्र बना रहता था किंतु पीठ पीछे लोगों पर अत्याचार करता था।

 फिर से दरबार की नाक का बाल बनने की प्रसन्नता में जैतसिंह ने मण्डोर उद्यान में विशाल प्रीतिभोज का आयोजन किया। उसने सरदारों को छककर मदिरा पिलाई। बड़ी-बड़ी मूँछों वाले उमरावों, सामंतों और सरदारों को अपने वश में करने के लिये जैतसिंह ने दर्जनों बकरे, मेष और शूकर मारकर पकवाये। पद पाने की प्रसन्नता में वह यह भी भूल गया कि मरुधरपति ने मारवाड़ रियासत में मदिरा पीने, पशुओं का वध करने और माँस रांधने-खाने पर पूरी तरह रोक लगा रखी है। पूरी रात बकरे कटते रहे, ढोलनें गाती रहीं, डवड़ियाँ दारू ढालती रहीं और पातरियाँ नाचती रहीं। मण्डोर के उद्यान में ऐसी दावत बरसों के बाद हुई थी।

मुत्सद्दियों से जैतसिंह का छत्तीस का आँकड़ा रहता था। इसलिये उनको जैतसिंह ने इस दावत से दूर ही रखा था। केवल गुलाबराय आसोपा ही एकमात्र मुत्सद्दी था जो जैतसिंह का समर्थक और मित्र था। यह एक संयोग ही था कि गुलाबराय आसोपा उसी दिन महादजी सिंधिया से मिलकर जोधपुर लौटा था। वह भी इस दावत में सम्मिलित हो गया। उसके आने से दावत की रौनक बढ़ गई।

सूर्योदय होने में कुछ ही समय शेष बचा था जब बड़ी-बड़ी मूँछों वाले उमराव और सरदार, मदिरा के प्रभाव से चित्त होकर अपने-अपने डेरों में लुढ़के। इस समय उन्हें न तो अपने पोतिये का होश था न लांग का। यहाँ तक कि बहुत से सरदारों के तो मदिरा के नशे में मुँह भी खुल गये थे। मक्षिका आदि क्षुद्र कीट अत्यंत सरलता से उनमें प्रवेश पा रहे थे। संध्या होने से पहले उनकी खुमारी उतरने वाली नहीं थी। इसलिये सारे सेवक निश्चिंत होकर आराम करने चले गये।

सरदार लोग तब भी लगभग बेसुध थे जब दोपहर ढलने के ढाई घड़ी बाद महाराजा के खास मुत्सद्दी खूबचंद सिंघवी ने महाराजा की खास दरबारी सिपाहियों की सेना को साथ लेकर मण्डोर उद्यान को घेर लिया। आदमियों के चीखने-चिल्लाने और घोड़ों के हिनहिनाने की आवाजें सुनकर सरदारों की नींद खुली। खुमारी अब भी जबर्दस्त थी किंतु सरदारों को पता नहीं था कि यह खुमारी अब उनके जीवन में कुछ ही देर की अतिथि है। सारे सरदारों की खुमारियाँ सदैव के लिये उतर जाने वाली थीं।

खूबचंद सिंघवी ने जैतसिंह चाम्पावत को महाराजा का खास संदेश दिया कि इसी समय महाराजा के हुजूर में पेश हों। जैतसिंह ने समझा कि अवश्य ही कोई विपदा आई है, इसलिये वह तुरंत स्नान करके खूबचंद सिंघवी के साथ हो लिया। इधर तो खूबचंद जैतसिंह को लेकर गढ़ के लिये रवाना हुआ और उधर गोवर्धन खीची ने मण्डोर उद्यान के चारों ओर दूसरा घेरा डाला। किसी भी उमराव, सामंत, सरदार और मुत्सद्दी को उस घेरे से बाहर जाने की अनुमति नहीं थी। किसी की समझ में नहीं आया कि गोवर्धन की इच्छा क्या है?

यह चौदह सितम्बर 1774 की गर्मी से झुलसा देने वाला भयानक दिन था जब खूबचंद सिंघवी जैतसिंह चाम्पावत को लेकर गढ़ में महाराजा के पास पहुँचा। महाराजा उस समय दरबार में ही था। जैतसिंह ज्योंही महाराजा को मुजरा करने के लिये झुका, उसी समय खूबचंद सिंघवी ने उसकी गर्दन पर कटार का वार किया। जैतसिंह असावधान था, फिर भी उसने अपना बचाव करने का प्रयास किया किंतु संतुलन नहीं बना सका और गिर गया। उसने बड़ी कातर दृष्टि से महाराजा की ओर देखा। महाराजा ने कहा- ‘पशुओं को मारने वाले, मदिरा पीने और बेचने वाले, माँस बेचने, रांधने और खाने वाले, हमारे राज्य में नहीं रह सकते।’

अगले ही क्षण खूबचंद सिंघवी ने अपनी कटार से दूसरा वार किया। जैतसिंह चाम्पावत का सिर भुट्टे की तरह कटकर दूर जा गिरा। दरबार में ही रक्त का मोटा फव्वारा छूट गया।

एक समय वह भी था जब जैतसिंह चाम्पावत जोधपुर दरबार की नाक का बाल माना जाता था। आज महाराजा ने उसी बाल को भरे दरबार में कटवाकर फिकवा दिया था। खींवसर का ठाकुर कर्णसिंह करमसोत, पोकरण का सवाईसिंह चाम्पावत और खैरवा का ठाकुर इन्द्रसिंह आदि बड़े सामंत उस समय दरबार में ही थे। यह दृश्य देखकर उनकी रूह काँप गईं। सबसे अधिक बुरा सवाईसिंह ने माना। उसे लगा कि उसके दादा देवीसिंह चाम्पावत को भी एक दिन राजा ने इसी तरह मारा होगा। वह मन ही मन महाराजा का शत्रु हो गया।

जब जैतसिंह चाम्पावत की हत्या का समाचार मण्डोर पहुँचा तो गोवर्धन खीची ने मण्डोर से घेरा हटा लिया। समस्त ठाकुर और मुत्सद्दी गुलाबराय आसोपा मुक्त कर दिये गये। मरुधरानाथ ने सिंगोरिये की भाकरी के पास जैतसिंह का दाह संस्कार करवाया। उसके पिता की सेवाओं को देखते हुए मरुधरानाथ ने वहाँ एक चबूतरा भी बनवाया।

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