चारण साहित्य भारतीय वाङ्मय की एक ऐसी अनूठी और ओजस्वी परंपरा है, जिसने सदियों तक उत्तर-पश्चिमी भारत, विशेषकर राजस्थान और गुजरात के इतिहास, संस्कृति और वीरता को जीवंत रखा है। नामवरसिंह जैसे वामपंथी चिंतक चारण साहित्य को स्तुति गायन समझकर इसकी उपेक्षा करते हैं किंतु यह मध्यकालीन समाज का दर्पण और हिन्दू शौर्य का उद्घोष है। चारण कवियों ने न केवल अपनी लेखनी से युद्धों का सजीव चित्रण किया, बल्कि स्वयं भी रणक्षेत्र में योद्धा के रूप में उतरकर अपने आदर्शों की रक्षा की।
चारण साहित्य
चारण साहित्य राजस्थानी साहित्य का एक प्रमुख अंग है, जो मुख्य रूप से वीर रस प्रधान प्रबंध काव्यों, रासो काव्यों और लोक देवताओं की कथाओं पर आधारित है। चारण कवि राजपूत शासकों के दरबारी कवि के रूप में प्रसिद्ध थे और उन्होंने डिंगल भाषा में रचनाएँ कीं।
चारण साहित्य मुख्य रूप से ‘डिंगल’ शैली (राजस्थानी का साहित्यिक रूप) में रचा गया है। इस साहित्य के ग्रंथों को हम उनकी प्रकृति के आधार पर वीरगाथा काव्य (रासो साहित्य), ऐतिहासिक ख्यात और नीति काव्य में विभाजित कर सकते हैं। चारण साहित्य की मुख्य धारा प्रबंध, छंद, वचनिका, वेलि आदि के के रूप में भी मिलती है।
चारण साहित्य की विशिष्ट शैलियाँ
चारण कवियों ने अपनी बात कहने के लिए विशिष्ट छंदों और विधाओं का विकास किया:
| विधा | विवरण |
| वात | ऐतिहासिक या काल्पनिक कहानियों का गद्य रूप। |
| ख्यात | रियासतों और राजवंशों का क्रमबद्ध इतिहास। |
| दूहा/सोरठा | नीति और वीरता की छोटी लेकिन मारक अभिव्यक्तियाँ। |
| झूलणा/छप्पय | युद्ध के वर्णन के लिए प्रयुक्त होने वाले लंबे और लयबद्ध छंद। |
चारण साहित्य की विशेषताएं
चारण साहित्य की मौलिकता उसके शिल्प और विषयवस्तु में निहित है:
- वीर रस की प्रधानता: चारण साहित्य का मुख्य स्वर शौर्य है। कवि केवल प्रशंसा नहीं करता, बल्कि ‘सांसण’ (जागीर) के बदले राजा को उसके कर्तव्य और धर्म की याद भी दिलाता है।
- डिंगल भाषा का प्रयोग: डिंगल की कर्कश लेकिन ओजस्वी ध्वनियाँ युद्ध के नगाड़ों और तलवारों की खनक को शब्दों में पिरोने के लिए सर्वथा उपयुक्त हैं।
- ऐतिहासिक प्रामाणिकता: चारण कवियों ने आँखों देखा हाल (Eye-witness accounts) लिखा। उनके ग्रंथों में तिथियों, स्थानों और व्यक्तियों का सूक्ष्म विवरण मिलता है, जो आज भी इतिहासकारों के लिए प्राथमिक स्रोत हैं।
- त्याग और बलिदान का आदर्श: इस साहित्य ने ‘केसरिया’ और ‘जौहर’ जैसी परंपराओं को अमर बनाया, जिससे समाज में स्वाभिमान और बलिदान की भावना प्रबल हुई।
चारण साहित्य के मुख्य ग्रंथ
चारण ग्रंथ बहुत बड़ी संख्या में हैं। अब तक कई सौ ग्रंथ प्रकाश में आ चुके हैं। इस आलेख में उन सब ग्रंथों का उल्लेख किया जाना संभव नहीं है। इसलिए कुछ प्रसिद्ध चारण ग्रंथों का संक्षिपत परिचय दिया जा रहा है।
पृथ्वीराज रासो (चंद बरदाई)
इस ग्रंथ में पृथ्वीराज चौहान के जीवन और शौर्य का महाकाव्यात्मक वर्णन हुआ है। इस ग्रंथ की ऐतिहासिकता पर विद्वानों के अलग-अलग मत हैं, लेकिन चारण काव्य परंपरा में इसका स्थान सर्वोपरि है। चंद बरदाई द्वारा रचित यह महाकाव्य पृथ्वीराज चौहान के जीवन, उनके युद्धों और अंतिम संघर्ष का वर्णन करता है। इसमें वीर रस के साथ-साथ श्रृंगार का भी अद्भुत संगम मिलता है। यह ग्रंथ उस ‘सामंती वीरता’ का प्रतीक है जो चारण साहित्य की आत्मा है।
वीरभायण (बादल ढाढी)
वीरभायण को ‘वीर भाण’ भी कहा जाता है। यह राजस्थानी साहित्य की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्राचीन वीरगाथात्मक रचना है। इस ओजपूर्ण काव्य की रचना 14वीं-15वीं शताब्दी के प्रसिद्ध कवि बादल ढाढी ने की थी। यह ग्रंथ मारवाड़ के वीर योद्धा राठौड़ वीरमदेव (राव चूंडा के भाई) की वीरता और उनके संघर्षों पर आधारित है। इसमें वीरमदेव और जोहिया वंश के शासकों के बीच हुए युद्धों और वीरमदेव के अदम्य साहस का बहुत ही प्रभावशाली वर्णन किया गया है। यह रचना मारवाड़ के प्रारंभिक राठौड़ वंश के इतिहास और तत्कालीन सामंती वीरता को समझने का एक मुख्य ऐतिहासिक स्रोत है। इसकी रचना प्राचीन राजस्थानी (डिंगल) में की गई है। इसमें प्रयुक्त भाषा और छंद शैली उस काल के वीर रस के साहित्य का उत्कृष्ट उदाहरण पेश करती है।
राजरूपक (वीरभाण रत्नू)
यह ग्रंथ भी जोधपुर के महाराजा अभय सिंह और गुजरात के सूबेदार सरबुलंद खां के बीच हुए युद्धों पर आधारित है। ‘राजरूपक’ की सबसे बड़ी विशेषता इसकी डिंगल शब्दावली और छंदों का प्रवाह है। यह तत्कालीन युद्ध कला, हथियारों और सैन्य विन्यास की जानकारी देने वाला एक प्रमुख स्रोत है।
बीसलदेव रासो
इस प्रसिद्ध काव्य ग्रंथ की रचना 12वीं शताब्दी (संवत 1212) में नरपति नाल्ह ने की थी। इसमें अजमेर के चौहान राजा बीसलदेव (विग्रहराज चतुर्थ) और मालवा की राजकुमारी राजमती के प्रेम, वियोग और पुनर्मिलन की कथा है। हालाँकि यह एक रासो काव्य है, लेकिन इसमें ‘वीर रस’ के बजाय ‘शृंगार रस’ (विशेषकर विप्रलम्भ या वियोग शृंगार) की प्रधानता है। यह एक ‘गेय’ काव्य है, जिसे पदों के रूप में गाया जा सकता है। इसमें राजमती के विरह का बहुत ही मार्मिक वर्णन किया गया है। यह हिंदी साहित्य की पहली ऐसी रचना मानी जाती है जिसमें ‘बारहमासा’ (बारह महीनों के माध्यम से विरह वर्णन) का प्रयोग मिलता है।
जल्ला रासो (जाल्हण)
इस ग्रंथ की रचना कवि जाल्हण ने की थी, जिन्हें कुछ विद्वान प्रसिद्ध कवि चंदबरदाई का पुत्र मानते हैं। इस काव्य में मुख्य रूप से युद्धों का वर्णन और तत्कालीन क्षत्रिय राजाओं के शौर्य व पराक्रम की गाथा गाई गई है। यह रचना मध्यकालीन भारत के राजनीतिक घटनाक्रमों और सामंती संस्कृति पर प्रकाश डालती है। इसकी भाषा डिंगल और पिंगल का मिश्रित रूप है, जो उस समय के वीरगाथा काव्यों की विशेषता थी। अन्य रासो काव्यों की तरह इसमें भी वीर रस मुख्य है, जिसमें युद्ध के दृश्यों का सजीव चित्रण मिलता है।
खुमाण रासो (दलपति विजय)
खुमाण रासो नामक विशाल ग्रंथ की रचना 9वीं शताब्दी के लगभग दलपति विजय ने की थी। इसमें मेवाड़ के महान शासक बापा रावल से लेकर महाराजा खुमाण द्वितीय तक के युद्धों और उनके शौर्य का विस्तृत वर्णन है। इस ग्रंथ की मुख्य विशेषता चित्तौड़ के शासक खुमाण और बग़दाद के खलीफा अल-मामूँ के बीच हुए भीषण युद्ध का सजीव चित्रण है। यह लगभग 5,000 छंदों का एक विशाल काव्य है, जिसमें वीर रस के साथ-साथ कहीं-कहीं शृंगार रस का भी पुट मिलता है। इसकी रचना राजस्थानी हिंदी (डिंगल) में की गई है और इसमें उस समय की सामंती संस्कृति व राजपूती आन-बान का प्रभावशाली वर्णन है।
हम्मीर रासो (शारंगधर)
हम्मीर रासो रणथंभौर के शासक महाराजा हम्मीर देव के बलिदान और वीरता की अमर गाथा है। मूल ‘हम्मीर रासो’ की रचना 14वीं शताब्दी में शारंगधर ने की थी, हालांकि बाद में 18वीं शताब्दी में जोधराज ने भी इसी नाम से एक प्रसिद्ध ग्रंथ लिखा। इस काव्य के नायक महाराजा हम्मीर देव हैं, जो अपनी शरणागत वत्सलता और ‘हठ’ (दृढ़ निश्चय) के लिए इतिहास में प्रसिद्ध हैं। इसमें हम्मीर देव और दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के बीच हुए भीषण युद्ध और रणथंभौर के ऐतिहासिक घेरे का वर्णन है। यह ग्रंथ ‘हम्मीर हठ’ की भावना पर आधारित है, जहाँ राजा अपने शरण में आए मंगोल विद्रोही की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर देते हैं। यह वीर रस प्रधान रचना है, जिसकी भाषा में डिंगल और अपभ्रंश के पुट वाली हिंदी का प्रयोग मिलता है।
परमाल रासो (जगनिक)
परमाल रासो वीरगाथा काल की एक अत्यंत प्रभावशाली और लोकप्रिय रचना है, जिसे ‘आल्हा खंड’ के नाम से भी जाना जाता है। इस वीर काव्य की रचना 12वीं शताब्दी में महोबा के राजा परमाल के दरबारी कवि जगनिक ने की थी। इसमें महोबा के दो प्रसिद्ध वीर भाइयों, आल्हा और ऊदल, की वीरता, उनके 52 युद्धों और उनके अदम्य साहस का अद्भुत वर्णन है। यह काव्य जनमानस में इतना लोकप्रिय है कि उत्तर भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में वर्षा ऋतु के समय इसके पदों को ‘आल्हा’ के रूप में बड़े उत्साह के साथ गाया जाता है। यह पूर्णतः वीर रस से ओत-प्रोत रचना है। इसकी पंक्तियाँ आज भी श्रोताओं में जोश और उत्साह भर देती हैं। इसमें महोबा और दिल्ली के शासक पृथ्वीराज चौहान के बीच हुए युद्धों का भी वर्णन मिलता है, जो तत्कालीन वीरतापूर्ण संस्कृति को दर्शाता है।
आल्हा-ऊदल की गाथा
आल्हा-ऊदल की गाथा भारतीय लोक साहित्य की सबसे ओजपूर्ण और प्रेरणादायक वीरगाथाओं में से एक है। यह गाथा महोबा (बुंदेलखंड) के दो वीर भाइयों, आल्हा और ऊदल के अदम्य साहस और उनके द्वारा लड़े गए 52 युद्धों पर आधारित है। मूल रूप से इसकी रचना कवि जगनिक ने ‘परमाल रासो’ के रूप में की थी, जिसे आज उत्तर भारत में ‘आल्हा-खंड’ के नाम से जाना जाता है। लोक मान्यताओं के अनुसार, आल्हा को मां शारदा का वरदान प्राप्त था और वे आज भी अमर माने जाते हैं। उनके साहस के किस्से आज भी बुंदेलखंड की रगों में दौड़ते हैं। यह गाथा मुख्य रूप से वर्षा ऋतु में ‘आल्हा’ शैली में गाई जाती है। इसकी लय और ढोलक की थाप श्रोताओं में जोश और वीर रस का संचार कर देती है। आल्हा-ऊदल की गाथा केवल युद्धों का वर्णन नहीं है, बल्कि यह स्वाभिमान, मातृभूमि के प्रति भक्ति और अटूट भाईचारे का प्रतीक है।
विजयपाल रासो (नल्ल सिंह)
विजयपाल रासो हिंदी साहित्य के आदिकाल की एक महत्वपूर्ण वीरगाथात्मक रचना है। इस ग्रंथ की रचना नल्ल सिंह (नलसिंह) नामक कवि ने की थी। यह काव्य करौली (राजस्थान) के यदुवंशी राजा विजयपाल के जीवन और उनकी वीरता पर आधारित है। इसमें मुख्य रूप से राजा विजयपाल और पंग राजा के बीच हुए भीषण युद्ध का सजीव और ओजपूर्ण वर्णन किया गया है। इसकी भाषा अपभ्रंश प्रभावित हिंदी है, जिसे आदिकालीन वीर काव्यों की जननी माना जाता है। यद्यपि इसके केवल 42 छंद ही उपलब्ध हैं, फिर भी यह रचना उस समय की युद्ध कला और सामंती गौरव को समझने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
राव जैतसी रो छंद (बीठू सूजा)
राव जैतसी रो छंद (राव जैतसी रो पाछड़ी छन्द) राजस्थानी साहित्य की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक वीरगाथात्मक कृति है। इस ग्रंथ की रचना 16वीं शताब्दी में बीकानेर के प्रसिद्ध चारण कवि बीठू सूजा ने की थी। इसके मुख्य नायक बीकानेर के नरेश राव जैतसी हैं, जिन्होंने अपनी वीरता से विदेशी आक्रमणकारियों को परास्त किया था। इसमें सन् 1534 में हुए उस ऐतिहासिक युद्ध का वर्णन है, जिसमें राव जैतसी ने मुगल शासक हुमायूँ के भाई कामरान को पराजित कर बीकानेर के किले की रक्षा की थी। यह रचना डिंगल भाषा में लिखी गई है और छंदों के माध्यम से इसमें युद्ध के दृश्यों का बहुत ही ओजपूर्ण और सजीव चित्रण मिलता है इस ग्रंथ को बीकानेर के इतिहास का एक प्रामाणिक स्रोत माना जाता है, क्योंकि यह समकालीन घटनाओं पर आधारित है और तत्कालीन सैन्य व्यवस्था पर प्रकाश डालता है।
पाबूजी रा छंद (बीठू मेहा)
यह राजस्थान के प्रसिद्ध लोक देवता और ‘ऊँटों के देवता’ माने जाने वाले पाबूजी राठौड़ की महिमा में लिखी गई एक महत्वपूर्ण रचना है। इस धार्मिक और वीरगाथात्मक कृति की रचना प्रसिद्ध कवि बीठू मेहा ने की थी। इसके नायक पाबूजी राठौड़ हैं, जिन्हें राजस्थान में लक्ष्मण जी का अवतार और गौरक्षक देवता के रूप में पूजा जाता है। इसमें पाबूजी के जीवन, उनके त्याग, और विशेष रूप से देवल चारी की गायों की रक्षा के लिए उनके द्वारा किए गए बलिदान का वीरतापूर्ण वर्णन है। यह रचना डिंगल भाषा में है, जिसमें ‘छंद’ शैली का प्रयोग कर पाबूजी के शौर्य और उनके चमत्कारों को जनमानस तक पहुँचाया गया है। यह काव्य राजस्थान की लोक संस्कृति का अभिन्न अंग है और आज भी स्थानीय गायकों व ‘भोपा’ समुदाय द्वारा भक्ति भाव से गाया जाता है।
अचलदास खींची री वचनिका (गाडन शिवदास)
‘अचलदास खींची री वचनिका’ राजस्थानी साहित्य की ‘वचनिका’ विधा की सबसे प्राचीन और महत्वपूर्ण रचना मानी जाती है। इस ऐतिहासिक कृति की रचना प्रसिद्ध चारण कवि शिवदास गाडण ने 15वीं शताब्दी (लगभग 1430-1435 ई.) में की थी। इसमें गागरोन के शासक अचलदास खींची और मांडू के सुल्तान होशंगशाह के बीच सन् 1423 में हुए भीषण युद्ध का सजीव वर्णन है। यह ग्रंथ गागरोन के प्रथम ‘साके’ (जौहर और केसरिया) का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है, जिसमें अचलदास खींची ने वीरतापूर्वक लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की थी। यह ‘वचनिका’ शैली में लिखी गई है, जिसमें गद्य और पद्य (तुकबंदी वाले गद्य) का सुंदर मिश्रण मिलता है। इसे डिंगल साहित्य का अनमोल रत्न माना जाता है। यह रचना न केवल युद्ध का वर्णन करती है, बल्कि तत्कालीन राजपूती आन-बान, संस्कृति और मध्यकालीन युद्ध प्रणाली पर भी गहरा प्रकाश डालती है।
रणमल-छंद (श्रीधर व्यास)
श्रीधर व्यास चारण कवि नहीं थे, 14वीं शताब्दी के उत्तरार्ध के ब्राह्मण कवि थे जो ईडर (गुजरात) के राव रणमल के आश्रय में रहे। उनकी रचना रणमल-छंद के कारण पाठक राव रिणमल रो रूपक से भ्रमित हो जाते हैं। इसलिए यहाँ पर राव रिणमल छंद का उल्लेख किया गया है। रणमल-छंद में ईडर के राव रणमल और पाटण के सुभा मीर मलिक मुफर्रह के बीच युद्ध (1390) का वर्णन हुआ है। यह ग्रंथ वीररस प्रधान है, ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है तथा इसमें अपभ्रंश भाषा का प्रयोग हुआ है। इस ग्रंथ में तैमूरलंग के आक्रमण (1398) का संकेत मिलता है, जिससे उस समय की राजनीतिक स्थिति का ज्ञान होता है। अपभ्रंश भाषा और वीररस का अद्भुत संयोजन। श्रीधर व्यास की अन्य रचनाएँ ईश्वरी-छंद , देवीकवित, भगवती भागवत, सप्तशती, सहस्रछंद भक्ति साहित्य परंपरा को आगे बढ़ाती हैं। देवी चरित्र, चंडी आख्यान पर आधारित, 120 कड़ी का धार्मिक और भक्तिपरक काव्य है। भागवत दशम स्कंध कवित भागवत पुराण पर आधारित, 127 कड़ी का अपूर्ण काव्य, धार्मिक-दार्शनिक स्वरूप है।
राव रिणमल रो रूपक (गाढण पसाइत)
‘राव रिणमल रो रूपक’ (या राव रणमल रो रूपक) मारवाड़ के इतिहास और डिंगल साहित्य की एक प्रभावशाली रचना है। इस ऐतिहासिक ग्रंथ की रचना कवि गाढण पसाइत ने की थी, जो अपनी ओजपूर्ण लेखनी के लिए जाने जाते हैं। यह काव्य मारवाड़ के प्रतापी शासक राव रिणमल (रणमल) राठौड़ के शौर्य और उनके जीवन की प्रमुख घटनाओं पर केंद्रित है। इस रूपक में राव रिणमल और मेवाड़ के महाराणा कुंभा के संबंधों का उल्लेख है। राव रिणमल द्वारा मेवाड़ और मारवाड़ की राजनीति में निभाई गई भूमिका और उनके द्वारा लड़े गए युद्धों का वीरतापूर्ण वर्णन मिलता है। यह ‘रूपक काव्य परंपरा’ का ग्रंथ है, जिसमें किसी ऐतिहासिक पात्र के गुणों और विजयों को आलंबन बनाकर कविता लिखी जाती है। इसकी रचना डिंगल भाषा में हुई है, जिसमें वीर रस की प्रधानता है और तत्कालीन राजस्थानी समाज के सामंती गौरव को दर्शाया गया है।
गुण जोधायण (गाढण पसाइत)
गुण जोधायण (Gun Jodhayana) ग्रंथ गाढण पसाइत ने लिखा है। यह डिंगल भाषा में रचित एक प्रमुख चारण साहित्य ग्रंथ है, तथा प्रबंध काव्य है। इसमें मारवाड़ (जोधपुर) के संस्थापक राव जोधा (Rao Jodha) की वीरता, गुणों, राज्य-विस्तार और प्रशंसा का वर्णन है। यह वीर रस प्रधान काव्य है और राजस्थानी साहित्य की महत्वपूर्ण कृति मानी जाती है।गाडण पसाइत (Gadan Pasait) 15वीं शताब्दी के प्रसिद्ध डिंगल कवि थे, जो मारवाड़ के राव रणमल और राव जोधा के आश्रित रहे।
कवित राणै मोकल रे मुआं री खबर अया रा
कवित राणै मोकल रे मुआं री खबर अया रा एक प्राचीन राजस्थानी कवित्त है, जो मेवाड़ के महाराणा मोकल (ई.1421-1433) की हत्या की सूचना आने पर लिखी गई थी। यह चारण साहित्य परंपरा का वीर रस प्रधान एवं करुण रस प्रधान ग्रंथ है। इस कवित्त की रचना गाडण पसाइत ने की थी। गाडण पासायत मारवाड़ क्षेत्र के प्रसिद्ध चारण कवि थे, जिन्होंने कई ऐतिहासिक घटनाओं पर कवित्त और गीत रचे हैं। महाराणा मोकल मारवाड़ के शासक रणमल (रिणमल) का भांजा था। मोकल की हत्या ई.1433 में झिलवाड़ा के पास गुजरात के सुल्तान अहमद शाह के विरुद्ध अभियान के दौरान उनके चाचा “चाचा” और “मेरा” (दासीपुत्र) ने विश्वासघात करके की थी। इस घटना की खबर चित्तौड़ या मारवाड़ पहुंचने पर चारण कवियों ने ऐसे कवित्त रचे, जो राजाओं की मृत्यु/वीरता का समाचार देने और गुणगान करने के लिए होते थे।
राव रिणमल नागौर रे धणी पेरोज ने मारीया ते समैरा
गाडण पासायत ने कवित्त राव रिणमल नागौर रे धणी पेरोज ने मारीया ते समैरा की रचना की। यह ग्रंथ मारवाड़ एवं नागौर के राव रिणमल और गुजरात के सुलतान महमूद बेगड़ा के आश्रित अमीर फीरोजशाह (पेरोज शाह) के संघर्ष पर लिखा गया। राजस्थानी डिंगल और चारण साहित्य में ‘‘समैरा” शब्द का प्रयोग युद्ध, समर या संग्राम के लिए होता है। यह किसी बड़े युद्ध या संघर्ष को दर्शाने वाला पारंपरिक शब्द है। गाडण पसाइत की ये रचनाएँ न केवल साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि मारवाड़ और मेवाड़ के मध्यकालीन इतिहास को समझने के लिए एक विश्वसनीय स्रोत भी मानी जाती हैं।
राव हमीरदेव चौपाई (गाढण पसाइत)
राव हमीरदेव चौपाई रणथंभौर के शासक राव हमीरदेव की वीरता और उनके शरणागत वत्सल स्वभाव को समर्पित एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक काव्य रचना है। यह रणथंभौर के वीर शासक राव हमीरदेव चौहान और दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के बीच हुए प्रसिद्ध युद्ध पर आधारित है। इस काव्य की रचना प्रसिद्ध जैन कवि नयचंद्र सूरी की परंपरा के प्रभाव में या उनके बाद के कवियों द्वारा की गई मानी जाती है (मुख्यतः इसे हमीर महाकाव्य का संक्षिप्त लोक-स्वरूप समझा जाता है)। इसमें हमीरदेव द्वारा मंगोल विद्रोही मीर मोहम्मद शाह को शरण देने और अपने वचन के लिए सर्वस्व बलिदान करने की गौरव गाथा का वर्णन है। इस चौपाई और इससे जुड़ी परंपरा में हमीर के यह कृति राजस्थानी साहित्य में ‘हठ’ और ‘वीरता’ के प्रतीक के रूप में जानी जाती है, जो पाठकों में वीरता और नैतिकता के आदर्शों का संचार करती है।
गुण रूपक
गुण रूपक केशवदास गाड़ण द्वारा रचित एक प्रमुख राजस्थानी (डिंगल) साहित्य की रचना है, जो जोधपुर के महाराजा गजसिंह प्रथम के समय (17वीं शताब्दी) के आसपास रचित मानी जाती है। यह ग्रंथ ऐतिहासिक और काव्यात्मक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, जिसमें शासकों के गुणों का वर्णन है। इसके रचनाकार केशवदास गाड़ण जोधपुर नरेश गजसिंह (प्रथम) के आश्रित कवि थे। इसमें ऐतिहासिक वीरगाथाओं और राजस्थानी शासकों के शौर्य का चित्रण है। यह राजस्थानी साहित्य के विकास में चारण शैली का एक प्रमुख उदाहरण है। केशवदास गाड़ण की अन्य कृतियों में गजउद्धार और विवेकवार्ता भी शामिल हैं।
रावल माला रो गुण (बारहठ आसा)
रावल माला रो गुण (रावल मालदे रो गुण या गुण मालदेव री) मारवाड़ के शक्तिशाली शासक राव मालदेव के व्यक्तित्व और उनके सैन्य अभियानों पर आधारित एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक काव्य है। यह ग्रंथ मारवाड़ (जोधपुर) के शासक राव मालदेव (जिन्हें ‘हशमत वाला राजा’ भी कहा जाता है) के गौरवशाली शासनकाल और उनकी विजयों का वर्णन करता है। इस महत्वपूर्ण काव्य की रचना प्रसिद्ध चारण कवि निहालदे (या कुछ स्रोतों के अनुसार माला संधु) द्वारा की गई थी, जिन्होंने मालदेव के समकालीन रहकर उनकी वीरता को कलमबद्ध किया। इसमें विशेष रूप से राव मालदेव द्वारा लड़े गए युद्धों, उनके द्वारा जीते गए 52 युद्धों और 58 परगनों के विस्तार का साहित्यिक चित्रण मिलता है। यह रचना राजस्थानी साहित्य की ‘गुण’ काव्य परंपरा का हिस्सा है, जिसमें शासक के गुणों, दानवीरता और युद्ध-कौशल की प्रशंसा डिंगल शैली में की जाती है। यह ग्रंथ 16वीं शताब्दी के मारवाड़ की राजनीतिक स्थिति, सामंती व्यवस्था और तत्कालीन युद्ध प्रणाली को समझने का एक प्रामाणिक स्रोत है।
झूलणा महाराज रायसिंघजी रा (माला सांदू)
यह एक प्रसिद्ध चारण साहित्य की रचना है, जो झूलणा छंद में बीकानेर के महाराजा रायसिंह (राव रायसिंह) रायसिंह (1574-1612 ई.) की वीरता, उनके पूर्वजों (राव बीका से लेकर राव कल्याणमल तक) की प्रशंसा और वंशावली का वर्णन करती है। यह डिंगल भाषा में रचित प्रबंध काव्य है। माला सांदू एक चारण कवि थे, जिनकी तीन प्रमुख झूलणा रचनाएँ उपलब्ध हैं- 1. झूलणा महाराज रायसिंघजी रा, 2. झूलणा दीवाण प्रतापसिंघजी रा (महाराणा प्रताप की प्रशंसा में), 3. झूलणा अकबर पातसाहजी रा (अकबर की गुजरात विजय पर)। यह ग्रंथ राजस्थानी/चारण साहित्य के मध्यकालीन वीर काव्य का महत्वपूर्ण उदाहरण है, और विभिन्न साहित्यिक स्रोतों (जैसे चारण साहित्य का इतिहास, राजस्थान के चारण साहित्य के प्रबंध काव्य आदि) में इसका उल्लेख लेखक के रूप में सांदू माला के नाम से ही मिलता है।
नागदमण एवं रुक्मणी हरण
सायांजी झूला (या सांयाजी झूला) एक प्रसिद्ध चारण भक्त कवि थे, जो ईडर राज्य के राजकवि थे। वे डिंगल भाषा में कृष्ण भक्ति से संबंधित ग्रंथों के रचयिता माने जाते हैं। उन्होंने मुख्य रूप से दो प्रमुख ग्रंथ लिखे-
1. नागदमण (Naagdaman) — यह उनका सबसे प्रसिद्ध और भक्ति रस से परिपूर्ण प्रमुख ग्रंथ है, जिसमें श्रीकृष्ण की लीलाओं का वर्णन है।
2. रुक्मणी हरण (Rukmani Haran) — यह भी कृष्ण-भक्ति पर आधारित एक महत्वपूर्ण रचना है। ये दोनों ग्रंथ राजस्थानी/डिंगल साहित्य में भक्ति काव्य की उत्कृष्ट कृतियाँ हैं। सांयाजी झूला गुजरात के कुवाव (कुवावा) गांव के निवासी थे और एक महान दानी व परोपकारी व्यक्ति के रूप में भी जाने जाते हैं।
गोगाजी रा रसावला (बीठू मेहा )
गोगाजी रा रसावला बीठू मेहा (Bitthu Meha) द्वारा रचित एक प्रसिद्ध राजस्थानी काव्य रचना है। इस ग्रंथ में राजस्थान के प्रसिद्ध लोकदेवता गोगाजी चौहान (जाहरवीर) के जीवन, उनके युद्धों, और उनकी वीरता का वर्णन किया गया है। यह रचना गोगाजी के शौर्य और उनके चमत्कारों को लोकगीतों के रूप में प्रस्तुत करती है। गोगाजी और उनके मौसेरे भाइयों अरजन-सुर्जन के बीच हुए संघर्ष का वर्णन। वीररस प्रधान, लोककाव्यात्मक शैली। यह ग्रंथ गोगाजी को जाहरवीर (साँपों के देवता) के रूप में स्थापित करता है और लोकमान्यता में उनकी वीरता व धार्मिक महत्ता को स्थायी रूप देता है। गोगाजी रसावला लोकदेवता गोगाजी की गाथाओं का मूल स्रोत है, जिसे आज भी राजस्थान के लोकगीतों और भजनों में गाया जाता है। इस प्रकार, “गोगाजी रसावला” न केवल साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि राजस्थान की लोकधार्मिक परंपरा का भी आधारभूत ग्रंथ है।
गुण सूरसिंघजी री
गुण सूरसिंघजी री एक राजस्थानी साहित्यिक ग्रंथ है, मारवाड़ नरेश सवाई सूरसिंह का कीर्तिगायन करती है। यह चारण कवि द्वारा रचित मानी जाती है। इस ग्रंथ के लेखक का नाम स्पष्ट रूप से ज्ञात नहीं है।
चारण साहित्य के इतिहास में महाराजा सूरसिंघजी का वर्णन बांकीदास तथा सूर्यमल मिश्रण आदि समकालीनकई चारण कवियों ने किया है। कुछ संदर्भों में इसे सूरसिंघजी रौ पाधड़ी छंद के नाम से उल्लेख मिलता है जो चारण परंपरा में राजाओं के गुणगान के लिए लिखे जाते थे।
सूरज प्रकाश (करणीदान कविया)
जोधपुर के महाराजा अभय सिंह के दरबारी कवि करणीदान कविया द्वारा रचित ‘सूरज प्रकाश’ ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसमें मारवाड़ के राठौड़ वंश का विस्तृत इतिहास मिलता है। विशेषकर अहमदाबाद के युद्ध का जो वर्णन इसमें किया गया है, वह डिंगल की शब्द-शक्ति का अनुपम उदाहरण है।
बांकीदास री ख्यात (बांकीदास आसिया)
बांकीदास जी को डिंगल का ‘महाकवि’ माना जाता है। उनकी ‘ख्यात’ पारंपरिक ख्यातों से भिन्न है क्योंकि इसमें संक्षिप्त टिप्पणियों के माध्यम से इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं को संकलित किया गया है। उनकी कविताओं में राष्ट्रीयता की प्रखर भावना मिलती है, विशेषकर उनके प्रसिद्ध गीत “आयो अंग्रेज मुलक रे ऊपर” में, जो अंग्रेजों के विरुद्ध भारतीय चेतना का पहला शंखनाद माना जाता है।
चारण साहित्य की वर्तमान प्रासंगिकता
आज के युग में चारण साहित्य केवल पुरानी पोथियों का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह राजस्थानी भाषा की अस्मिता का आधार है। ‘सगत रासो’ (गिरधर आसिया) से लेकर आधुनिक काल के कवियों तक, यह परंपरा निरंतर प्रवाहित है। डॉ. शक्तिदान कविया और अन्य आधुनिक विद्वानों ने इस साहित्य के संरक्षण और संपादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
निष्कर्ष
संक्षेप में, चारण साहित्य राजस्थान की वह ‘वीर प्रसूता’ भूमि की वाणी है, जिसने रेगिस्तान की रेत को अपने रक्त और कलम की स्याही से सींचा है। इसके ग्रंथों के बिना भारतीय मध्यकालीन इतिहास अधूरा है। यह साहित्य हमें सिखाता है कि शब्द जब शस्त्र बनते हैं, तो वे साम्राज्यों के उत्थान और पतन के साक्षी बन जाते हैं।
-डॉ. मोहनलाल गुप्ता



