Tuesday, February 3, 2026
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पृथ्वीराजविजयमहाकाव्यम्: ऐतिहासिक-काव्यात्मक ग्रंथ

भारतीय संस्कृत साहित्य में महाकाव्य एक ऐसी विधा है जो केवल काव्य-सौंदर्य ही नहीं, बल्कि तत्कालीन युग की सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और धार्मिक परिस्थितियों की झलक भी प्रस्तुत करती है। इसी परंपरा की एक अनमोल कड़ी है पृथ्वीराजविजयमहाकाव्यम् (Prithvirajavijaya Mahakavyam)। यह ग्रंथ 12वीं शताब्दी के अंत में रचित एक ऐतिहासिक महाकाव्य है, जो दिल्ली-आजमेर के प्रसिद्ध चौहान शासक पृथ्वीराज चौहान (पृथ्वीराज तृतीय) के जीवन, वंश-परंपरा, युद्ध-विजयों और व्यक्तित्व का जीवंत चित्रण करता है।

पृथ्वीराजविजयमहाकाव्यम् : रचयिता और रचना-काल

पृथ्वीराजविजयमहाकाव्यम् के रचयिता महाकवि जयानक (Jayanaka) मूल रूप से कश्मीर के विद्वान कवि थे। वे पृथ्वीराज (Prithviraj Chouhan) के दरबार में आश्रित थे और राजकवि के रूप में सम्मानित थे। जयानक की भाषा-शैली में कश्मीरी कवि बिल्हण (जिन्होंने विक्रमांकदेवचरित की रचना की थी) की छाप स्पष्ट दिखाई देती है।

पृथ्वीराजविजयमहाकाव्यम् रचना का समय लगभग 1191-1192 ईस्वी माना जाता है। इसका सबसे ठोस प्रमाण यह है कि महाकाव्य में तराइन के प्रथम युद्ध (1191 ई.) में पृथ्वीराज की मुहम्मद गोरी पर प्राप्त विजय का विस्तृत वर्णन है, किंतु द्वितीय तराइन युद्ध (1192 ई.) में हुई हार का कोई उल्लेख नहीं है। साथ ही, कश्मीरी विद्वान जयरथ ने अपनी विमर्षिणी टीका (1200 ई.) में इस ग्रंथ से उद्धरण दिए हैं, जिससे सिद्ध होता है कि यह 1200 ई. से पूर्व ही रचित हो चुका था। इस प्रकार यह ग्रंथ पृथ्वीराज के जीवनकाल में ही लिखा गया एकमात्र समकालीन साहित्यिक दस्तावेज है।

पृथ्वीराजविजयमहाकाव्यम् महाकाव्य की संरचना

पृथ्वीराजविजयमहाकाव्यम् एक पूर्ण महाकाव्य की सभी विशेषताएँ रखता है। यह सर्गबद्ध है और मूल रूप से कई सर्गों में विभक्त था। दुर्भाग्यवश आज यह ग्रंथ अपूर्ण रूप में ही उपलब्ध है। वर्तमान में प्राप्त प्रतियों में केवल प्रारंभिक सर्ग ही सुरक्षित हैं।

इस महाकाव्य की पांडुलिपि खंडित अवस्था में मिली है। यह ग्रंथ पृथ्वीराज की विजयों के वर्णन पर ही समाप्त हो जाता है। 1192 के ‘तराइन के द्वितीय युद्ध’ और पृथ्वीराज की पराजय का इसमें कोई उल्लेख नहीं मिलता।

संभवतः, इसकी रचना तराइन के प्रथम युद्ध के बाद और द्वितीय युद्ध से पहले की गई थी, जिसके कारण इसमें केवल नायक की विजय का ही गान है।

– प्रथम सर्ग: चौहान वंश की उत्पत्ति, वत्स गोत्र, भृगु वंश से संबंध और शाकंभरी (आजमेर) के संस्थापक वासुदेव का वर्णन।

– अन्य सर्ग: पृथ्वीराज के पूर्वजों (विग्रहराज, अजयराज, अर्णोराज आदि) के कार्य, अजमेर नगर का वैभव, पृथ्वीराज का जन्म, शिक्षा, युवावस्था, युद्ध-कौशल और तराइन प्रथम युद्ध का वर्णन।

ग्रंथ की भाषा शुद्ध शास्त्रीय संस्कृत है, जिसमें अलंकारों (उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति आदि) का भरपूर प्रयोग हुआ है। कवि ने श्लेष, यमक और चित्रकाव्य की तकनीकों का भी कुशलतापूर्वक उपयोग किया है।

2. ग्रंथ की विषय-वस्तु

मूल रूप से यह ग्रंथ पूर्ण अवस्था में प्राप्त नहीं हुआ है। इसके उपलब्ध अंशों में 12 सर्ग मिलते हैं। ग्रंथ की कथावस्तु को मुख्य रूप से तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है:

क. चौहान वंश की उत्पत्ति (पौराणिक पक्ष)

जयानक ने चौहानों की उत्पत्ति के संबंध में ‘अग्निकुंड’ के सिद्धांत के बजाय उन्हें ‘सूर्यवंशी’ बताया है। ग्रंथ के अनुसार, ब्रह्मा के यज्ञ की रक्षा के लिए सूर्य के अंश से चहमान (चौहान) का जन्म हुआ।

ख. वंशावली और पूर्वज

पृथ्वीराजविजयमहाकाव्यम् में वासुदेव चौहान से लेकर पृथ्वीराज तृतीय के पिता सोमेश्वर तक के राजाओं का क्रमबद्ध विवरण मिलता है। इसमें अजयराज द्वारा अजयमेरु (अजमेर) नगर की स्थापना और उनके द्वारा निर्मित भव्य मंदिरों का जीवंत वर्णन है।

ग. पृथ्वीराज चौहान का उदय और विजय

ग्रंथ का मुख्य हिस्सा पृथ्वीराज के जन्म, उनकी शिक्षा-दीक्षा और उनके राज्याभिषेक को समर्पित है। इसमें उनके द्वारा पड़ोसी राज्यों पर विजय और विशेष रूप से मुहम्मद गोरी (शहाबुद्दीन) के विरुद्ध उनकी प्रारंभिक सफलताओं का उल्लेख है।

विषयवस्तु के प्रमुख पक्ष

1. वंशावली का गौरव: महाकाव्य चौहान वंश को सूर्यवंशी क्षत्रिय बताते हुए उसकी प्राचीनता और पवित्रता पर बल देता है। इसमें वासुदेव से लेकर पृथ्वीराज तक की वंश-परंपरा का क्रमबद्ध वर्णन है।

2. अजमेर का सौंदर्य-वर्णन: जयानक ने अजमेर (तत्कालीन शाकंभरी) को इन्द्रपुरी की उपमा दी है। नगर के बाजार, मंदिर, तालाब, उद्यान, महल और वैभव का इतना जीवंत चित्रण है कि पाठक स्वयं को उस युग में पहुँचा हुआ अनुभव करता है।

3. पृथ्वीराज का व्यक्तित्व: कवि ने पृथ्वीराज को परमवीर, विद्वान, धर्मपरायण, कला-प्रेमी और न्यायप्रिय शासक के रूप में चित्रित किया है। उनकी शारीरिक सुंदरता, धनुर्विद्या में निपुणता और युद्ध-कौशल का अतिशयोक्तिपूर्ण लेकिन प्रभावशाली वर्णन है।

4. तराइन का प्रथम युद्ध: महाकाव्य का सबसे महत्वपूर्ण भाग। गोरी की सेना को म्लेच्छ, तुर्क आदि कहा गया है। युद्ध का वर्णन अत्यंत रोमांचक है—हाथी, घुड़सवार, पैदल सेना, तीरों की वर्षा, वीर-गति आदि का जीवंत चित्रण।

5. सामाजिक-धार्मिक चित्रण : ग्रंथ में ब्राह्मणों का सम्मान, मंदिर-निर्माण, दान-धर्म, राजा की प्रजा-पालन नीति और हिंदू साम्राज्य की रक्षा का भाव स्पष्ट झलकता है।

पृथ्वीराजविजयमहाकाव्यम् का ऐतिहासिक महत्व

पृथ्वीराजविजय का सबसे बड़ा योगदान यह है कि यह पृथ्वीराज चौहान के जीवन का एकमात्र समकालीन लिखित साक्ष्य है। पृथ्वीराज रासो (चंदबरदाई) बहुत बाद की रचना है और उसमें काल्पनिक तत्व अधिक हैं। जबकि जयानक का यह महाकाव्य प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य के निकट है।

– इसमें चौहान वंश की उत्पत्ति, गोत्र, उपाधियाँ और युद्ध-विजयों की जानकारी मिलती है।

– अजमेर के तत्कालीन स्वरूप का सबसे प्रामाणिक वर्णन।

– 12वीं शताब्दी के उत्तर भारत की राजनीतिक स्थिति, तुर्क आक्रमणों का प्रारंभिक प्रभाव और राजपूत प्रतिरोध का दस्तावेज।

3. ऐतिहासिक महत्व: सत्यता की कसौटी

इतिहासकारों के लिए ‘पृथ्वीराजविजय’ का महत्व पृथ्वीराज रासो (चंदबरदाई द्वारा रचित) से कहीं अधिक माना जाता है। इसके कुछ प्रमुख कारण हैं:

  1. सटीक तिथियां: इसमें दी गई वंशावली और तिथियां उस काल के शिलालेखों (जैसे बिजोलिया शिलालेख) से काफी मेल खाती हैं।
  2. भौगोलिक वर्णन: जयानक ने तत्कालीन अजमेर की सुंदरता, वहां के पुष्कर झील और अन्नासागर झील का जो वर्णन किया है, वह भौगोलिक रूप से सटीक है।
  3. सांस्कृतिक दर्पण: यह ग्रंथ 12वीं शताब्दी के राजस्थान की सामाजिक व्यवस्था, युद्ध कला और धार्मिक विश्वासों को समझने का एक झरोखा प्रदान करता है।

पृथ्वीराजविजयमहाकाव्यम् का साहित्यिक मूल्यांकन

जयानक ने दंडी, भामह और मम्मट के काव्य-सिद्धांतों का पालन किया है। भाषा में पांडित्य और प्रांजलता दोनों हैं। यद्यपि कुछ स्थानों पर अतिशयोक्ति है (जो महाकाव्य की प्रकृति है), फिर भी यह काव्य ऐतिहासिकता और काव्य-सौंदर्य का दुर्लभ संयोजन प्रस्तुत करता है।

साहित्यिक शैली और भाषा

‘पृथ्वीराजविजय’ की भाषा संस्कृत है और यह वैदर्भी रीति में लिखा गया है। जयानक की शैली अलंकृत और ओजपूर्ण है।

  • रस: प्रधान रस वीर रस’ है, किंतु श्रृंगार और शांत रस का भी सुंदर समन्वय मिलता है।
  • अलंकार: उपमा, रूपक और उत्प्रेक्षा अलंकारों का प्रयोग कवि ने बड़ी कुशलता से किया है।

“जयानक ने पृथ्वीराज को भगवान राम का अवतार माना है, जो पृथ्वी को म्लेच्छों (आक्रमणकारियों) के आतंक से मुक्त करने के लिए अवतरित हुए थे।”

आज के संदर्भ में प्रासंगिकता

आज जब हम मध्यकालीन भारत की समझ बनाते हैं, तब पृथ्वीराजविजय हमें केवल एक राजा की कहानी नहीं सुनाता, बल्कि उस युग की सांस्कृतिक आत्मविश्वास, वीरता, शास्त्र-शौर्य के समन्वय और आगंतुक आक्रमणों के प्रति प्रतिरोध की भावना से परिचित कराता है।

यह ग्रंथ हमें याद दिलाता है कि इतिहास केवल युद्ध-हार-जीत की नहीं, बल्कि साहित्य, कला, धर्म और समाज के उस जीवंत चित्र का भी है जो सदियों तक प्रेरणा देता रहता है।

पृथ्वीराजविजयमहाकाव्यम् केवल एक महाकाव्य नहीं—यह 12वीं शताब्दी के भारत का एक जीवंत दर्पण है, जिसे पढ़कर हम अपने गौरवशाली अतीत से जुड़ाव महसूस करते हैं।

निष्कर्ष

‘पृथ्वीराजविजयमहाकाव्यम्’ केवल एक कविता नहीं, बल्कि भारतीय अस्मिता और वीरता का दस्तावेज है। यह हमें बताता है कि किस प्रकार भारतीय राजाओं ने अपनी संस्कृति और सीमाओं की रक्षा के लिए प्राणों की बाजी लगा दी थी। यदि आप मध्यकालीन भारतीय इतिहास और संस्कृत साहित्य के शौकीन हैं, तो इस ग्रंथ का अध्ययन अनिवार्य है।

प्रमुख तथ्य एक नज़र में:

विवरणजानकारी
लेखकजयानक (कश्मीरी कवि)
मुख्य नायकसम्राट पृथ्वीराज चौहान तृतीय
भाषासंस्कृत
कुल सर्ग12 (उपलब्ध)
स्थानअजमेर, राजस्थान

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