राजस्थानी साहित्य की विरासत अत्यंत विशाल है तथा यह ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी से आरम्भ होकर आज तक चली आ रही है। इस विरासत में राजस्थानी भाषा के लाखों ग्रंथ समाहित हैं।
राजस्थानी साहित्य भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण शाखा है, जो राजस्थान की रेगिस्तानी भूमि, वीरता, भक्ति और लोक-जीवन की जीवंत अभिव्यक्ति करता है। इसकी जड़ें अपभ्रंश (Apbhramsa) और प्राकृत (Prakrit) भाषाओं से जुड़ी हैं, और यह ईस्वी 1000 से विभिन्न विधाओं में विकसित हुआ है।
राजस्थानी साहित्य मुख्यतः डिंगल (पुरानी राजस्थानी) और पिंगल (ब्रजभाषा प्रभावित) में रचा गया है, जिसमें चारण कवियों का योगदान प्रमुख है। चारण जाति ने योद्धाओं को प्रेरित करने वाले वीर काव्य से लेकर श्रृंगार और भक्ति रस तक की रचनाएँ दी हैं। सूर्यमल्ल मिश्रण की रचनाओं से इस साहित्य का व्यवस्थित अध्ययन आरम्भ माना जाता है, जिनकी “वंश भास्कर” और “वीर सतसई” जैसी कृतियाँ राजपूत इतिहास और वीरता का दर्पण हैं।
यह साहित्य न केवल ऐतिहासिक घटनाओं का संग्रह है, बल्कि राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान को भी मजबूत करता है, जिसमें लोक गाथाएँ, प्रेमाख्यान और धार्मिक पद प्रमुख हैं। राजस्थानी साहित्य की विशेषता इसकी मौखिक परंपरा है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है, और आज भी यह लोकप्रिय है।
राजस्थानी साहित्य का इतिहास तीन प्रमुख कालों में विभाजित किया जा सकता है:
1. प्राचीन काल (1050-1450 ई.),
2. मध्ययुग (1450-1850 ई.) और
3. आधुनिक काल (1850 से अब तक)।
प्राचीन काल में, अपभ्रंश से विकसित मारू-गुर्जर भाषा में जैन मुनियों की रचनाएँ प्रमुख हैं। उदाहरणस्वरूप, उद्योतन सूरी की “कुवलयमाला” (778 ई.) में मारुभाषा का उल्लेख है, जो सांस्कृतिक जीवन का वर्णन करती है।
जैन यति रामसिंह और हेमचंद्राचार्य के दोहे अपभ्रंश कालीन राजस्थानी-गुजराती रूप को दर्शाते हैं। इस काल में जैन कवियों के फागु, रास और चर्चरी काव्य उपलब्ध हैं। पद्मनाभ की “कान्हड़दे प्रबंध” पुरानी पश्चिमी राजस्थानी (मारवाड़ी) की महत्वपूर्ण कृति है, जो जालौर के चौहान शासक कान्हड़दे और अलाउद्दीन खिलजी के युद्ध का वर्णन करती है। पूर्वी राजस्थानी में “प्राकृत पैंगलम” जैसी रचनाएँ गुजराती से निकटता दिखाती हैं। इस काल का साहित्य मुख्यतः धार्मिक और नैतिक था, जो जैन प्रभाव से प्रेरित था।
मध्ययुग राजस्थानी साहित्य का स्वर्णिम काल रहा, जहाँ चारण साहित्य का उदय हुआ। चारण कवियों ने 8-10वीं शताब्दी से गीत, दोहे, ख्यात, वंशावली और अन्य छंद रचे। इस काल में वीर रस प्रधान था, जो योद्धाओं को भूमि, धर्म और सम्मान की रक्षा के लिए प्रेरित करता था। प्रमुख चारण लेखक सूर्यमल्ल मिश्रण हैं, जिनकी “वंश भास्कर” राजपूत राजाओं की वंशावली और “वीर सतसई” वीरता के दोहे हैं।
चन्दबरदाई की “पृथ्वीराज रासो” हिंदी का पहला महाकाव्य माना जाता है, जिसमें पृथ्वीराज चौहान के जीवन और युद्धों का वर्णन है। दलपत विजय की “खुमाण रासो” मेवाड़ के शासकों की गाथा है, जबकि नयनचन्द्र सूरि की “हम्मीर महाकाव्य” रणथंभौर के चौहान शासकों पर आधारित है। मुहणोत नैणसी की “मूता नैणसी री ख्यात” और “मारवाड़ रा परगना री विगत” राजस्थान के इतिहास का महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
दुरसा आढ़ा की “विरूद छतहरी” महाराणा प्रताप की शौर्य गाथा है, और “किरतार बावनौ” सामाजिक स्थिति का चित्रण करता है। गिरधर आसिया की “सगत रासो” शक्तिसिंह पर आधारित है। जैन साहित्य में उद्योतन सूरी की कृतियाँ प्रमुख हैं, जबकि संत साहित्य में मीरा बाई के भजन भक्ति आंदोलन का प्रतिनिधित्व करते हैं। लोक साहित्य में “ढोला मारू रा दूहा” (कलोल) प्रेम कथा है।
आधुनिक काल में राजस्थानी साहित्य की विरासत ने नाटक, उपन्यास और कहानी जैसी नई विधाओं को अपनाया। सूर्यमल्ल मिश्रण से आरम्भ होकर, शिवचंद्र भरतिया की “केसर-विलास” (1900) पहला आधुनिक नाटक, “कनक-सुन्दरी” (1903) पहला उपन्यास और “विश्रांत प्रवास” (1904) पहली कहानी हैं।
आधुनिक काल के लेखकों में लक्ष्मी कुमारी चुंडावत, विजयदान देथा (बिज्जी) और कन्हैयालाल सेठिया प्रमुख लेखक हैं। देथा की “बातां री फुलवारी” लोक कथाओं पर आधारित है। आधुनिक काल के लेखकों में अर्जुन देव चारण, चंद्र प्रकाश देवल, हरिश भादानी और नंद भारद्वाज शामिल हैं।
राजस्थानी साहित्य की विरासत की विशेषताएँ इसकी भाषा, शैली और विषय-वस्तु में निहित हैं। भाषा में डिंगल, पिंगल, अपभ्रंश, संस्कृत, उर्दू-फारसी और गुजराती का मिश्रण है। राजस्थानी साहित्य की शैलियों में ख्यात (इतिहासपरक, जैसे बांकीदास री ख्यात), वंशावली (राजवंशों की सूची), रासो (युद्ध महाकाव्य), वेलि (वीरता और प्रेम), विगत (ऐतिहासिक विवरण), प्रकास (उपलब्धियाँ), वचनिका (तुकांत गद्य-पद्य) और मरस्या (शोक काव्य) प्रमुख हैं।
विषय-वस्तु में वीर काव्य (शौर्य, बलिदान), श्रृंगार (प्रेम, सौंदर्य), भक्ति (देवी-देवता स्तवन), लोक कथाएँ (प्रेमाख्यान, कहावतें, पहेलियाँ), प्राकृतिक वर्णन, अस्त्र-शस्त्र प्रशंसा, अकाल की पीड़ा और सामाजिक चतुराई शामिल हैं। चारण साहित्य में वीर रस का परिपाक अन्य साहित्यों से ऊँचा है, क्योंकि कवियों ने युद्धभूमि को अपनी आँखों से देखा। लोक साहित्य में लोक गीत, नाट्य और गाथाएँ सामान्य जन की भावनाओं को व्यक्त करती हैं।
राजस्थानी साहित्य की विभिन्न विधाएँ इसे बहुमुखी बनाती हैं। चारण साहित्य मुख्य है, जो वीर, श्रृंगार और भक्ति का मिश्रण है। जैन साहित्य धार्मिक गद्य-पद्य पर केंद्रित है, जैसे “कुवलयमाला”। ब्राह्मण साहित्य सीमित है, लेकिन “बीसलदेव रासो” (नरपति नाल्ह) और “रणमल छंद” (श्रीधर व्यास) महत्वपूर्ण हैं। संत साहित्य में निर्गुण और सगुण धाराएँ हैं, जबकि लोक साहित्य में “ढोला मारू” जैसी कथाएँ लोकप्रिय हैं।
निष्कर्ष में, राजस्थानी साहित्य राजस्थान की आत्मा है, जो वीरता की गाथाओं से लेकर आधुनिक अभिव्यक्तियों तक फैला है। आज यह चुनौतियों का सामना कर रहा है, जैसे भाषा की मान्यता और प्रकाशन की कमी है। इस साहित्य का अध्ययन हमें राजस्थान की सांस्कृतिक धरोहर को समझने में सहायता करता है, और राजस्थानी साहित्य की विरासत को संरक्षित रखना आवश्यक है।



