Wednesday, February 18, 2026
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कालीबंगा दुर्ग

कालीबंगा दुर्ग कब बना और कब तक अस्तित्व में रहा, इसके बारे में कुछ भी बताना संभव नहीं है किंतु सिंधुघाटी सभ्यता के अवशेषों के आधार पर अनुमान किया गया है कि कालीबंगा दुर्ग आज से लगभग 8 हजार से 5 हजार साल पहले सरस्वती नदी के किनारे बना था। इसके अवशेष हनुमानगढ़ जिले में कालीबंगा गांव के पास मिले हैं जिसे सिंधु घाटी सभ्यता का स्थल माना जाता है।

सिंधु घाटी सभ्यता

हनुमानगढ़-सूरतगढ़ मार्ग पर, पीलीबंगा से लगभग 5 किलोमीटर दूर स्थित कालीबंगा में पूर्वहड़प्पा कालीन एवं हड़प्पा कालीन सभ्यता के अवशेष मिले हैं। कुछ पुराविदों के अनुसार कालीबंगा संभवतः सिंधु साम्राज्य की तीसरी राजधानी थी जहाँ से सरस्वती घाटी का समीपवर्ती क्षेत्र शासित होता था।

 कालीबंगा में दो टीले प्राप्त हुए हैं जो हड़प्पा से मिले अवशेषों से साम्य रखते हैं। पूर्वाभिमुख टीला 36 फुट और पश्चिमाभिमुख टीला 26 फुट ऊँचाई का है। कालीबंगा से मिले पश्चिमी टीले को कालीबंगा-1 नाम दिया गया है। यह लगभग 12 मीटर ऊंचा है और समानान्तर चतुर्भुज आकार में 250 मीटर उत्तर-दक्षिण तथा 180 मीटर पूर्व-पश्चिम में विस्तृत है। इस टीले के निचले स्तरों में प्राक्-सिंधु-सभ्यता (सिंधु सभ्यता से पहले की सभ्यता- 2400 ई.पू. से 2250 ई.पू.) के अवशेष पाये गये हैं।

टीले की ऊपरी परत में, पुरानी सभ्यता के अवशेषों पर सरस्वती नदी द्वारा बालू रेत जमा कर दिये जाने के बाद सिंधु सभ्यता (2200 ई.पू. से 1700 ई.पू.) के अवशेष मिले हैं। इन दोनों कालों की सभ्यताओं में परस्पर किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं है।

खुदाई के दौरान मिली काली चूड़ियों के टुकड़ों के कारण इस स्थान को कालीबंगा कहा जाता है। सिंधु सभ्यता के लोगों ने मिट्टी तथा कच्ची ईंटों के चबूतरे बनाकर उन पर इमारतों की नीवें रखीं। यहाँ से एक दुर्ग, जुते हुए खेत, सड़कें, बस्ती, गोल कुओं, नालियों मकानों व धनी लोगों के आवासों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। मकानों में चूल्हों के अवशेष भी मिले हैं।

कालीबंगा दुर्ग

पश्चिमी टीले में एक गढ़ी के अवशेष मिले हैं। इसे ही कालीबंगा दुर्ग कहा जाता है। वस्तुतः जिस समय यह दुर्ग बना था, उस समय इसका क्या नाम था, इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता। इस क्षेत्र में मिट्टी से बनी काले रंग की चूड़ियों के टुकड़े बहुत बड़ी संख्या में मिलते थे। इस कारण इस क्षेत्र में बसे गांव को कालीबंगा अर्थात् काली चूड़ियों का गांव कहा गया। इसी गांव के नाम पर यहाँ से मिली सिंधु सभ्यता को भी कालीबंगा की सभ्यता कहा गया और इसी आधार पर इस गढ़ी को कालीबंगा दुर्ग कहा गया।

कालीबंगा दुर्ग, दुर्ग-निर्माण कला का प्रारम्भिक प्रारूप है। इस दुर्ग को उसी स्थान के ऊपर बसाया गया जहाँ पर प्राग्-सिंधु सभ्यता के अवशेष पाये गये हैं, इसका कारण यह है कि पुराना सभ्यता स्थल रेत में दब जाने से आसपास के स्थान से ऊँचा हो गया था। इसके चारों ओर रक्षा प्राचीर बना दी गई थी जो 3 से 7 मीटर तक चौड़ी थी। इसमें प्रवेश के लिये चारों दिशाओं में दरवाजे बनाये गये थे। दक्षिणी द्वार के दानों तरफ आरक्षक-कक्ष बने थे।

कालीबंगा दुर्ग को मध्य से एक लम्बी दीवार द्वारा जो पूर्व-पश्चिम जाती थी, दो भागों में बांट दिया गया था। यह विभाजन किस उद्देश्य से किया गया था, यह यह स्पष्ट नहीं है। दुर्ग का इस तरह विभाजन किये जाने का दृष्टान्त सिंधु सभ्यता के किसी अन्य स्थल से नहीं मिला है।

कालीबंगा दुर्ग की रक्षा प्राचीर को मजबूत बनाने के लिये उसमें स्थान-स्थान पर बुर्ज बनाये गये हैं। गढ़ी की दीवार तथा बुर्ज कच्ची ईंटों से निर्मित किये गये थे। दीवार के निर्माण में दो आकार की ईंटें प्रयुक्त की गई हैं- 40 गुणा 20 गुणा 10 सेण्टीमीटर की और 30 गुणा 15 गुणा 7.5 सेण्टीमीटर की। ईंटों के आकार में अंतर निर्माण काल में अंतर के कारण है।

पहले चरण में बड़ी ईंटों का तथा दूसरे चरण में छोटी ईंटों का प्रयोग किया गया है। इसके चबूतरे कहीं भी दीवार के अभिन्न अंग नहीं थे। इसके भीतरी भाग पर लिपाई की गई थी। आगे चलकर सिंधु सभ्यता के काल में ही इस रक्षा प्राचीर का महत्व कम हो गया और संभवतः बुर्ज बाद में बनी इमारत के नीचे दब गया।

कालीबंगा दुर्ग वाले टीले के दक्षिण अर्धभाग में पांच या छः मिट्टी और कच्ची ईंटों के चबूतरे थे जो एक दूसरे से अलग और कुछ भिन्न थे। उनके बीच के मार्ग में भी भिन्नता थी। ये चबूतरे कहीं भी दीवार के अभिन्न अंग नहीं थे। बाद के लोगों द्वारा ईंटें उखाड़ लिये जाने के कारण इन चबूतरों के ऊपर निर्मित भवनों की रूपरेखा स्पष्ट नहीं है, तथापि जो भी साक्ष्य बचे हैं, वे इस बात की ओर संकेत करते हैं कि इनका कुछ धार्मिक प्रयोजन था।

एक चबूतरे पर कुआं खुदा हुआ है तथा अग्नि स्थान पर पक्की ईंटों से निर्मित एक आयताकार गड्ढा मिला है जिसमें पशुओं की हड्डियां पाई गईं। दूसरे चबूतरे पर आयताकार सात अग्नि-वेदिकाएं एक कतार में थीं। गढ़ी के इस दक्षिणी अर्ध भाग में जाने के लिये उत्तर और दक्षिण दिशा में सीढ़ियां थीं। उत्तरी दिशा का मार्ग विशिष्ट था और दुर्ग के दो बाहर निकलते हुए कौनों के मध्य में था।

इन दोनों भागों की स्थिति और रूपरेखा से यह निष्कर्ष निकाला गया है कि संभवतः दक्षिणी मार्ग निचले नगर के साधारण जन के आवागमन के लिये था और उत्तरी मार्ग गढ़ी के उत्तरी भाग में रहने वाले सम्भ्रान्त लोगों के लिये था। गढ़ी के उत्तरी भाग में सम्भ्रान्त लोगों के रहने के लिये आवास थे और उनकी सड़क निर्माण की योजना विशिष्ट ढंग की थी। इस भाग में प्रवेश करने के लिये तीन या चार मार्ग थे। कालीबंगा दुर्ग पर धार्मिक अनुष्ठानों के साक्ष्य को देखते हुए सांकलिया का अनुमान है कि कालीबंगा दुर्ग का धार्मिक महत्व था।

हड़प्पा तथा मोहेनजोदड़ो के निचले नगरों के रक्षा-प्राचीर से घिरे होने के एक स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं किंतु कालीबंगा में निचला नगर भी रक्षा प्राचीर से घिरा था। इस कारण निचला नगर एक अलग दुर्ग की तरह दिखाई देता था। इस प्राचीर की चौड़ाई सर्वत्र समान नहीं है। यह 3 से 3.9 मीटर तक मोटी है। इसकी ऊँचाई में 15 रद्दे लगे हैं।

इस रक्षा दीवार में प्रयुक्त ईंटें 40 गुणा 20 गुणा 10 सेण्टीमीटर आकार की हैं। सुरक्षा दीवार पूर्व से पश्चिम की ओर 230 मीटर क्षेत्र को घेरे हुए है, उत्तर-दक्षिण की ओर पांच और पूर्व-पश्चिम की ओर तीन मुख्य सड़कों का पता चला है। कई तंग गलियां भी मिली हैं। कालीबंगा युग से निकलने के बाद दुर्गों की स्थापत्य कला में निरन्तर विकास होता गया।

Dr. Mohanlal Gupta
Dr. Mohanlal Guptahttps://rajasthanhistory.com
डॉ. मोहनलाल गुप्ता राजस्थान के जाने-माने इतिहासकार एवं लेखक हैं। उनकी सौ से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं तथा पत्र-पत्रिकाओं में हजारों आलेख प्रकाशित हुए हैं।

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