Wednesday, June 19, 2024
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गोरा हट जा-एक : वे भारत की कालीमिर्च, कपास और रेशम के लिए बर्बाद हो रहे थे!

ईश्वर ने भारत की भूमि को प्राकृतिक संसाधनों से सम्पन्न बनाया। इस कारण दुनिया भर के लोग भारत भूमि पर आश्रय भोजन एवं सुरक्षा प्राप्त करने के लिए मानव सभ्यता के आरम्भिक काल से ही आते रहे हैं।

इस बात का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि ईसा मसीह के जन्म से लगभग एक हजार साल पहले रोम के एक शासक ने कहा था भारतीयों के बागों में मोर, उनके खाने की मेज पर काली मिर्च तथा उनके बदन का रेशम, हमें पागल बना देता है। हम इन चीजों के लिये बर्बाद हुए जा रहे हैं।

इस वक्तव्य से भारत के प्राकृतिक संसाधनों के प्रति विश्व के दृष्टिकोण को समझा जा सकता है। आपने अक्सर लोगों को कहते हुए सुना होगा कि वास्कोडिगामा ने इस्वी 1524 में भारत की खोज की।

यह नितांत भ्रामक बात है। भारत की खोज किसी ने नहीं की। भारत तो इस धरती का सबसे पहला देश था जो सांस्कृतिक, एवं आर्थिक रूप से अस्तित्व में आया। वास्कोडिगामा ने तो यूरोप से भारत के बीच के समुद्री मार्ग की खोज की। और वह खोज भी उसकी अपनी नहीं थी, अपितु एक भारतीय व्यापारी ही वास्कोडिगामा को अपने साथ कालीकट लेकर आया था।

विदेशी आक्रांता हर समय भारत को लूटने एवं भारत में अपना राज्य जमाने के लिए उत्सुक रहते थे जबकि भारतीय राजा, परस्पर रक्त एवं वैवाहिक सम्बन्ध रखते हुए भी राज्य विस्तार की लालसा के कारण, एक-दूसरे से लड़ते रहते थे।

इस कारण विदेशी आक्रांता भारत भूमि पर अपना अधिकार जमाने में सफल हो जाते थे। ऐतिहासिक कालक्रम में शक, कुषाण, हूण, यूनानी, पह्लव खिजर आदि अनेकानेक जातियां भारत में आती गईं और अपने शासन स्थापित करती रहीं। विदेशी आक्रांता, भारत में राज्य तो स्थापित करते थे किंतु भारत की सांस्कृतिक एकता को छिन्न-भिन्न नहीं कर पाते थे। अपितु वे स्वयं ही भारतीय संस्कृति में विलीन हो जाते थे।

बारहवीं शताब्दी ईस्वी में जब मुसलमानों ने भारत में शासन स्थापित किया, तब देश की सांस्कृतिक एकता नष्ट हो गई तथा भारत के लोगों में विदेशियों के विरुद्ध पहले जैसी प्रतिरोधक क्षमता नहीं रह गई।

इस कारण देश में ईरानी, तूरानी, अफगानी, मुगल, मंगोल, तातार, तुर्क, चगताई, कज्जाक, हब्शी, बलोच, पठान, सिन्धी आदि विभिन्न कबीलों के मध्यएशियाई देशों के मुसलमान बड़ी संख्या में भारत में घुस आए।

भारत के चक्रवर्ती सम्राटों का स्थान तुर्क सुल्तानों एवं मंगोल बादशाहों ने ले लिया। छोटे-छोटे भूभागों में बंटे हुए हिन्दू राज्य इन सुल्तानों एवं बादशाहों के अधीन करद अर्थात् कर देने वाले राज्य बन कर रह गए।

दक्षिण भारत के विजयनगर साम्राज्य एवं उत्तर के भारत के मेवाड़ राज्य को छोड़ दें तो कोई भी हिन्दू राज्य ऐसा न था जो मुसलमान सुल्तानों एवं बादशाहों के अधीन नहीं हुआ हो।

15वीं शताब्दी के अन्तिम दशक में यूरोप के विभिन्न देशों ने सुदूर देशों के समुद्री मार्गों का पता लगाने का अभियान चलाया ताकि उनके साथ व्यापार किया जा सके। इनमें पुर्तगाली, डच, फ्रांसीसी तथा अंग्रेज नामक चार जातियाँ सर्वाधिक अग्रणी थीं।

पंद्रहवीं एवं सोलहवीं शताब्दी ईस्वी में ये लोग व्यापारियों के रूप में भारत में घुसे। उस समय भारत के छोटे-छोटे हिन्दू राज्य मुगल सत्ता के अधीन थे।

वास्कोडिगामा ने यूरोप से भारत आने वाले समुद्री रास्ते की खोज इसलिए की क्योंकि जब से मध्य एशिया में इस्लामी राज्य स्थापित हुए थे तब से यूरोपीय व्यापारियों का भारत तक पहुंचने तथा भारतीय व्यापारियों का भूमध्यसागर के तट तक पहुंचने के स्थल मार्ग बंद हो गए थे।

आपको यह जानकर हैरानी हो सकती है कि वास्कोडिगामा भारत में मुगल सल्तनत की नींव डालने वाले बाबर से केवल दो साल पहले ही भारत पहुंचा। उसके पीछे-पीछे अन्य यूरोपीय जातियां भी भारत पहुंचने लगीं और भारतीय मसाले, कालीमिर्च, कपास, आभूषण, सूती एवं रेशमी कपड़े, अपने जहाजों में भर-भरकर यूरोप ले जाने लगीं। जहां ये सामान बहुत ऊंची कीमत पर बिकता था।

इन यूरोपीय कम्पनियों को भारत में अपनी सत्ता स्थापित करने में लगभग दो सौ साल की समय लग गया। इस बीच बाबर के वंशजों ने लगभग सम्पूर्ण भारत पर अपनी सत्ता स्थापित की और अठारहवीं शताब्दी में औरंगजेब की मौत के बाद बालू की दीवार की तरह ढह गई।

मुगल सत्ता के बिखरने की शुरुआत होते ही छोटे-छोटे हिन्दू राज्य फिर से अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए एक-दूसरे के विरुद्ध युद्धों में संलग्न हो गए। भारत में अराजकता मच गई।

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भारत की अराजकता का लाभ उठाने के लिए भारत में व्यापार कर रही पुर्तगाली, डच, फ्रांसीसी तथा अंग्रेज नामक चारों यूरोपीय जातियाँ, परस्पर लड़ रहे छोटे-छोटे राज्यों को हड़पने लगीं।

भारतीय राज्यों पर कब्जा कौन करेगा, इसके लिए यूरोपीय कम्पनियों में खूनी संग्राम छिड़ गया। इन चारों जातियों के बीच यह संग्राम केवल भारत की भूमि पर ही नहीं मचा अपितु यूरोप के सभी बड़े देशों ने एक दूसरे पर तोपें चलाईं। जब यूरोप की पूरी धरती खून से भीग रही थी तो समुद्र में चलने वाले जहाज भी भला कैसे पीछे रह सकते थे।

यूरोप से लेकर भारत के बीच लहराने वाले हरे-नीले समुद्रों का रंग भी इंसानी खून से लाल हो गया। अंत में इस खूनी संग्राम में अंग्रेज जाति विजयी रही और उसने भारत पर अधिकार कर लिया।

अंग्रेजों ने भारत को दो तरह की राजनीतिक व्यवस्था के अंतर्गत रखा। पहली तरह की व्यवस्था में भारत के बहुत बड़े भू-भाग पर अंग्रेजों का प्रत्यक्ष नियंत्रण था। इसे ब्रिटिश भारत कहा जाता था जिसे उन्होंने 11 ब्रिटिश प्रांतों में विभक्त किया।

दूसरी तरह की व्यवस्था के अंतर्गत भारत के लगभग 565 देशी रजवाड़े थे जिनकी संख्या समय-समय पर बदलती रहती थी। देशी राज्यों को रियासती भारत कहते थे।

उन्नीसवीं सदी के आरम्भ में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भारत के देशी रजवाड़ों के साथ अधीनस्थ सहायता के समझौते किए जिनके अनुसार राज्यों का आंतरिक प्रशासन देशी राजा या नवाब के पास रहता था और उसके बाह्य सुरक्षा प्रबन्ध अंग्रेजों के नियंत्रण में रहते थे।

उन दिनों राजपूत शासकों द्वारा शासित क्षेत्र राजपूताना कहलाता था जिसमें 17 देशी राज्य थे- जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, बीकानेर, सिरोही, कोटा, करौली जैसलमेर, किशनगढ़, बूंदी प्रतापगढ़, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, अलवर, धौलपुर, भरतपुर, तथा शाहपुरा।

 बाद में अंग्रेजों ने टोंक तथा झालावाड़ नामक दो देशी रियासतों की स्थापना और करवाई।

मराठे और पिण्डारी भी इन राज्यों को लूटते थे। इसलिए ये रजवाड़े ईस्ट इण्डिया कम्पनी से संरक्षण की मांग करते रहते थे। उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने राजपूताना रियासतों से अधीनस्थ सहायता के समझौते किए तथा उन पर नियत्रंण स्थापित करने के लिए राजपूताना एजेंसी स्थापित की।

राजपूताना एजेंसी का सर्वोच्च अधिकारी एजेण्ट टू दी गवर्नर जनरल कहलाता था। उसके अधीन रेजीडेण्ट तथा पॉलिटिकल एजेण्ट होते थे जो विभिन्न देशी राज्यों में रहकर अंग्रेज सरकार के हितों को देखते थे।  अंग्रेजों ने अधीनस्थ सहायता के समझौते देशी रजवाड़ों की बाह्य सुरक्षा के नाम पर किए थे किंतु शीघ्र ही अंग्रेज अधिकारी, देशी राज्यों के सर्वेसर्वा बन गए। प्रस्तुत धारावाहिक में अंग्रेजों के भारत में आगमन से लेकर उनके पलायन तक राजपूताना रियासतों में घटी प्रमुख घटनाओं को लिखा गया है। राजपूताना की रियासतों की कहानी 30 मार्च 1949 तक चलती है जब उनका राजस्थान में विलय हुआ।

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