Tuesday, March 5, 2024
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महाराणा संग्रामसिंह द्वारा मालवा के विरुद्ध कार्यवाही

मेदिनीराय की सहायता

मालवा के सुल्तान महमूद (द्वितीय) के विरुद्ध उसके अमीरों ने षड़यंत्र किया। प्राणों का भय होने पर महमूद माण्डू से भाग निकला। इस पर अमीरों ने उसके भाई साहिबखां को मालवा का सुल्तान बना दिया। ऐसी स्थिति में मालवा के राजपूत सरदार मेदिनीराय ने महमूद द्वितीय की बड़ी सहायता की तथा साहिबखां को परास्त कर महमूद को फिर से मालवा का सुल्तान बनाया।

महमूद ने मेदिनीराय को मालवा राज्य का प्रधानमंत्री बना दिया। विद्रोही अमीरों ने दिल्ली के सुल्तान से यह कहकर सहायता मांगी कि मालवा का राज्य हिन्दुओं के हाथों में चला गया है तथा महमूद तो नाम मात्र का सुल्तान रह गया है। दिल्ली के सुल्तान ने साहिबखां को 12 हजार सैनिकों की एक सेना दी। उसकी सहायता के लिये गुजरात का सुल्तान मुजफ्फर भी मालवा की ओर बढ़ा।

मेदिनीराय ने इन दोनों सेनाओं को भी पराजित कर दिया और मालवा में महमूद का राज्य स्थिर कर दिया।  निराश अमीरों ने मेदिनीराय के विरुद्ध महमूद के कान भरने शुरू कर दिये। इस पर महमूद ने मेदिनीराय को मारने का षड़यंत्र रचा। इस षड़यंत्र के कारण मेदिनीराय बुरी तरह घायल हो गया किंतु जीवित बच गया। इसके बाद मेदिनीराय सतर्क रहने लगा तथा 500 राजपूतों के साथ महल में जाने लगा।

इस पर महमूद भयभीत होकर गुजरात भाग गया।  महमूद ने गुजरात के सुल्तान मुजफ्फर को अपने साथ लेकर माण्डू पर आक्रमण किया। इस पर मेदिनीराय माण्डू दुर्ग की रक्षा का भार अपने पुत्र को सौंपकर, महाराणा सांगा से सहायता मांगने के चित्तौड़ पहुंचा।

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महाराणा ने मेदिनीराय के साथ माण्डू को प्रस्थान किया किंतु मार्ग में सारंगपुर पहुंचने पर ज्ञात हुआ कि मुजफ्फरशाह ने हजारों राजपूतों को मारकर माण्डू पर अधिकार कर लिया है तथा महमूद को फिर से मालवा का सुल्तान बना दिया है। इस पर महाराणा मेदिनीराय को लेकर चित्तौड़ लौट आया और उसने गागरौन एवं चंदेरी के इलाके जागीर में देकर मेदिनीराय को अपना सरदार बनाया।

मालवा के सुल्तान के विरुद्ध कार्यवाही

ई.1519 में माण्डू के सुल्तान महमूद (द्वितीय) ने गुजरात की सेना के भरोसे, गागरौन पर चढ़ाई की। वहाँ सांगा के सामंत मेदिनीराय का प्रतिनिधि भीमकरण नियुक्त था। सांगा ने भी अपनी सेना लेकर महमूद के विरुद्ध प्रस्थान किया। सांगा ने मालवा के तीस सरदार तथा गुजरात की समस्त सेना को मार डाला। गुजरात का सेनापति आसफखां घायल हुआ तथा उसका पुत्र मारा गया। मालवा का सुल्तान महमूद (द्वितीय) भी युद्ध क्षेत्र में घायल होकर गिर गया।

महाराणा ने उसे युद्ध के मैदान से उठवाकर अपने तम्बू में पहुंचाया तथा उसके घावों को उपचार करवाकर अपने साथ चित्तौड़ ले गया  और कैद में रख दिया। जिस समय सुल्तान राणा सांगा के हाथों कैद हुआ उस समय प्रसिद्ध ताजकुला (रत्नजटित मुकुट) और सोने की कमरपेटी सुल्तान के पास थी। सांगा ने सुल्तान से ये दोनों वस्तुएं ले लीं।

ये दोनों वस्तुएं राज्य चिह्न के रूप में सुल्तान हुशंगशाह के समय से ही मालवा के सुल्तान के पास रहती थीं। महाराणा ने तीन माह बाद महमूद को मुक्त करके एक हजार राजपूतों के संरक्षण में उसे मालवा भेज दिया।  महाराणा ने मालवा से रणथंभौर, गागरौन, कालपी, भिलसा तथा चंदेरी छीनकर अपने राज्य में मिला लिये।  इस प्रकार मेवाड़ राज्य का अत्यंत विस्तार हो गया और वह उत्तर एवं मध्य भारत में सबसे बड़ा राज्य बन गया।

गुजरात तथा मालवा की संयुक्त सेनाओं के विरुद्ध कार्यवाही

दिसम्बर 1520 में सोरठ का हाकिम मलिक अयाज, 20 हजार सैनिकों तथा तोपखाने के साथ गुजरात के सुल्तान मुजफ्फर के पास आकर बोला कि आपकी आज्ञा हो तो मैं या तो राणा को कैद करके ले आऊँ या फिर उसे मार डालूं। सुल्तान ने इस प्रस्ताव से प्रसन्न होकर उसे अपने एक लाख सवार, एक सौ हाथी और तोपखाना भी सौंप दिया।

बीस हजार सवारों और 20 हाथियों की एक दूसरी सेना किवामुल्मुल्क की अध्यक्षता में मलिक की सहायतार्थ दी गई। मंदसौर से दस कोस दूर नांदसा गांव के पास राणा सांगा ने इस सेना का रास्ता रोका। माण्डू (मालवा) का सुल्तान महमूद भी मलिक अयाज की सेना से आ मिला। इस तरफ रायसेन का तंवर सलहदी, 10 हजार सवारों के साथ आ गया। आसपास के समस्त हिन्दू राजा भी महाराणा की सहायता के लिये आ गये। सांगा का प्रताप देखकर मुस्लिम सेनापतियों की हिम्मत टूट गई और वे बिना लड़े ही सांगा से संधि करके लौट गये।

सुल्तान महमूद तो सांगा के पास ओल (एवज) में रखे हुए अपने पुत्र को वापस प्राप्त करने के लिये संधि करके लौट गया।  ओझा का मत है कि दोनों पक्षों में लड़ाई के बाद संधि हुई थी। इस लड़ाई में मुसलमानों की हार हुई तथा मालवा के सुल्तान ने महाराणा सांगा को जुर्माना देकर अपने पुत्र को छुड़वाया था।  जब मलिक अयाज पराजित होकर, गुजरात के सुल्तान मुजफ्फर के पास पहुंचा तो मुजफ्फर ने अयाज को कसकर फटकार लगाई तथा उसे वापास सोरठ भेज दिया।

कुछ समय बाद गुजरात के सुल्तान मुजफ्फरशाह का पुत्र बहादुरशाह अपने दो भाइयों चांदखां तथा इब्राहीमखां के साथ महाराणा की शरण में आया। महाराणा ने उसे आदरपूर्वक अपने पास रखा। सांगा की माता जो हलवद के राजा की पुत्री थी, बहादुरशाह को बेटा कहा करती थी।  एक बार बहादुरशाह तथा राणा सांगा के भतीजे के बीच झगड़ा हो गया जिसमें सांगा का भतीजा मारा गया।

जब राणा के राजपूत, बहादुरशाह को मारने लगे तब राजमाता ने बहादुरशाह की रक्षा की।  जब मुजफ्फरशाह मर गया तब उसका पुत्र सिकंदरशाह गुजरात का सुल्तान हुआ। उसने अपने सेनापति मलिक लतीफ को बहादुरशाह का दमन करने के लिये भेजा। मलिक लतीफ ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया जहाँ वह बुरी तरह से हारा और उसके 1700 सिपाही मारे गये।

संग्रामसिंह ने अपने जीवन काल में ही कुंवर भोजराज की मृत्यु हो जाने पर अपने पुत्र रत्नसिंह को युवराज घोषित कर दिया तथा विक्रमादित्य एवं उदयसिंह को रणथंभौर का दुर्ग देकर बूंदी के हाड़ा सूरजमल को उनका संरक्षक नियुक्त कर दिया। कुंवर भोजराज की रानी मीरांबाई भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति करके सम्पूर्ण विश्व में विख्यात हुई तथा उसने विशद कृष्ण साहित्य की रचना की। इस प्रकार सांगा अपने शत्रुओं को दबाकर सुख से राज्य करता था। उत्तर एवं मध्य भारत में उसका परचम सबसे ऊंचा था।

– डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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