Sunday, April 14, 2024
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राजस्थानी प्रेमाख्यान

राजस्थानी प्रेमाख्यान विश्व साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं। कथ्य, तथ्य, शिल्प विधान एवं रागात्मकता की दृष्टि से ही नहीं अपितु इतिहास, सांस्कृतिक वैशिष्ट्य एवं सामाजिक परम्पराओं की विविधता के कारण इन्हें लोक संस्कृति का कोश कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

सम्पूर्ण विश्व प्रतिक्षण प्रेम का अभिलाषी है। यह मनुष्य की आत्मा का सबसे मधुर पेय है। इसके बिना जीवन अपूर्ण है। आदि काल से मनुष्य प्रेम का संधान करता आया है। यही कारण है कि धरती पर विकसित हुई समस्त सभ्यताओं में प्रेमाख्यानों की रचना हुई।

प्राचीन एवं मध्यकालीन राजस्थानी प्रेमाख्यान, गद्य एवं पद्य के साथ-साथ चम्पू विधाओं में भी मिलते हैं जिसमें गद्य एवं पद्य दोनों का मिश्रण होता है।

इस कारण प्रेमाख्यान वात, वेलि, वचनिका, विगत, दवावैत आदि शैलियों में रचे गए जिन्हें सार्वजनिक रूप से गाया एवं सुनाया जाता था। प्रेमाख्यानों के गायन अथवा वाचन में रसोद्रेक प्रस्तुतकर्ता के कौशल पर अधिक निर्भर करता था।
थार रेगिस्तान में रहने वाली लंगा जाति इन प्रेमाख्यानों का प्रमुखता से गायन करती थी।

प्रेमाख्यानों का आरम्भ प्रायः देवस्तुतियों के साथ होता था जिनमें सरस्वती एवं गणेश प्रमुख होते थे। इसके बाद कथा का स्थापना पक्ष होता था जिसमें कथानक के नायक एवं नायिका का परिचय भी सम्मिलित रहता था। कथानक के आगे बढ़ने पर प्रसंग के अनुसार स्वर के आरोह अवरोह बदलते थे।

जब प्रसंग वीर रस से ओत-प्रोत होता था तो वाणी में ओज तथा गति बढ़ जाती थी जबकि करुण रस के प्रसंग में कथावाचक अथवा गायक अपनी वाणी को भी करुण शब्दों के उपयुक्त बना लेता था। राजस्थान के कुछ प्रसिद्ध प्रेमाख्यानों का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार से है-

ढोला मारू

ढोला मारू राजस्थानी भाषा का श्रेष्ठ प्रेमाख्यान है। नरवर के राजा नल के पुत्र राजकुमार साल्ह कंवर अथवा धौलाराय को इस काव्य में ढोला कहा गया है तथा पूगल के राजा पिंगल की पुत्री राजकुमारी मारू अथवा मारवणी को को मारू कहा गया है। इस कथा के अनुसार किसी समय पूगल देश में पिंगल नामक राजा का शासन था। उन दिनों नरवर में राजा नल राज्य करता था।

पिंगल की कन्या का नाम मारवणी था तथा नल के पुत्र का नाम ढोला था। एक बार पूगल देश में अकाल पड़ने से राजा सपरिवार पुष्कर में आकर रहने लगा। उन्हीं दिनों राजा नल भी सपरिवार तीर्थयात्रा के लिये पुष्कर आया। वहाँ दोनों राजाओं में मित्रता हो गयी। पिंगल ने अपनी कन्या का विवाह ढोला से कर दिया। उस समय ढोला की उम्र तीन वर्ष और मारवणी की उम्र डेढ़ वर्ष थी।

शरद ऋतु आने पर दोनों राजा अपने-अपने राज्य को चले गये। मारवणी भी छोटी होने के कारण पिता के साथ पूगल चली गयी। जब ढोला जवान हुआ तो नल ने उसका दूसरा विवाह मारवा की राजकुमारी मालवणी से कर दिया। नल ने ढोला को उसके प्रथम विवाह की बात नहीं बतायी। इधर जब मारवणी बड़ी हुई तो उसके पिता ने ढोला को बुलाने के लिये कई दूत भेजे ंिकंतु नल ने उनको बीच में ही मरवा दिया।

एक बार नरवर से घोड़ों के व्यापारी पूगल आये, उन्होंने ढोला के दूसरे विवाह की बात मारवणी को बता दी। पूगल ने कुछ ढाढियों को नरवर भेजकर ढोला को संदेश भेजा। ढाढियों ने मालवणी द्वारा तैनात किये गये आदमियों को धोखा देकर ढोला को मारवणी का संदेश पहुंचाया। ढोला घोड़े पर सवार होकर पूगल के लिये चल पड़ा। ढोला की दूसरी पत्नी मालवणी ने आंखों में आंसू भरकर ढोला के घोड़े की रस्सी पकड़ ली।

इसलिए ढोला उस समय तो रुक गया किंतु जब मालवणी सो गयी तब वह एक ऊँट पर बैठकर पूगल चला गया। पूगल में ढोला का बड़ा स्वागत हुआ। मारवाणी को ढोला के साथ विदा कर दिया गया। मार्ग में एक पड़ाव पर मारवणी को सांप ने काट खाया और मारवणी मर गयी। ढोला मारवणी की चिता बनाकर उसी के साथ जलने को उद्यत हुआ किंतु उसी समय शिव पार्वती वहाँ आ गये और उन्होंने मारवणी को जीवित कर दिया।

मार्ग में ऊमर नाम के एक आदमी ने मारवणी को हथियाने के लिये ढोला को अफीम पिला दी। ऊमर के साथ मारवणी के पीहर की एक ढोलन थी, उसने गीत गाकर मारवणी को चेता दिया कि उसके साथ धोखा होने वाला है। मारवणी ने ढोला को ऊमर के पास से उठाने के लिये अपने ऊँट को छड़ी मारी जिससे ऊँट उछलने लगा। ढोला ऊँट को शांत करने के लिये आया तो मारवणी ने उससे ऊमर के कपट की बात कही।

इस पर ढोला और मारवणी, ऊँट पर बैठकर भाग खड़े हुए। ऊमर ने उनका पीछा किया किंतु उसे हताशा हाथ लगी। ढोला और मरवण दोनों नरवर में जाकर सुख से रहने लगे। इस प्रेमाख्यान के दोहे लोक में बड़े चाव से गाये जाते थे, यथा-

सोरठियो दूहो भलो, भल मरवण री बात
जोबन छाई नार भली, तारां छाई रात।

जेठवा ऊजली

इस प्रेमाख्यान में धूमली के राजकुमार जेठवा तथा अमरा चारण की बेटी ऊजली की कथा है। एक दिन जेठवा शिकार करता हुआ जंगल में भटक गया। वर्षा के कारण वह घोड़े पर ही अचेत हो गया। घोड़ा राजकुमार को लेकर आधी रात के समय अमरा चारण के झौंपड़े के सामने पहुंचा और हिनहिनाने लगा।

ऊजली ने बाहर आकर राजकुमार को अचेत अवस्था में देखा और शीत से ठिठुर रहे राजकुमार की देह को गर्मी देने के लिए अपने पिता की अनुमति लेकर राजकुमार के साथ सो गयी। राजकुमार के प्राण बच गये। प्रातः जब राजकुमार की नींद खुली तो उसने ऊजली को वचन दिया कि वह उसके साथ ही विवाह करेगा किंतु अपने राज्य में लौटकर ऊजली को भूल गया।

इस पर ऊजली राजकुमार से मिलने के लिये उसकी राजधानी गयी किंतु राजकुमार ने उससे विवाह करने से मना कर दिया कि एक राजपुत्र का विवाह चारणी से नहीं हो सकता। इस पर ऊजली ने कुपित होकर राजकुमार को श्राप दिया जिससे राजकुमार की मृत्यु हो गयी।

ऊजली जो कि राजकुमार को अपना पति मान चुकी थी, उसके साथ सती हो गयी। ‘जेठवा रा सोरठा’ में ऊजली की मार्मिक कथा का बखान किया गया है। इस घटना का समय 1400 से 1500 वि.सं. के मध्य माना जाता है। इस ग्रंथ का एक सोरठा इस प्रकार से है-

वीणा! जंतर तार थें छोड़या उण राग रा।
गुण ने रोवूं गमार जात न झींकू जेठवा।।

खींवो आभळ

यह राजस्थान का सुंदर प्रेमाख्यान है। इसके अनुसार चोटी वाले दुर्ग का राजकुमार खींवसिंह अत्यंत सुंदर तथा बलिष्ठ था। उसे अपनी भाभी की छोटी बहिन आभळदे से प्रेम था। आभळदे अद्वितीय सुंदरी थी। वह भी राजकुमार से प्रेम करती थी। आभलदे ने अपने परिवार वालों से कहा कि वह पुष्कर में स्नान करने जा रही है और इस बहाने से वह राजकुमार से मिलने के लिये आयी।

खींवसिंह रात्रि के अंधकार में आभळ से मिलने के लिये आता था। आभळदे के चाचा को यह जानकारी हो गयी। उसने खींवसिंह को मार डाला। आभलदे ने बड़ा करुण विलाप किया जिससे पसीज कर शिव पार्वती प्रसन्न हुए और उन्होंने प्रकट होकर खींवसिंह को फिर से जीवित कर दिया। इसके बाद दोनों का विवाह सम्पन्न हुआ।

जसमा ओडण

यह एक प्राचीन प्रेम कथा है जिसका कथानक इस प्रकार से है- ओड जाति का एक परिवार मिट्टी खोदने का काम करता था। इस परिवार की जसमा नामक स्त्री अत्यंत सुंदरी थी। एक बार उस देश के राजा की दृष्टि जसमा पर पड़ी तो वह उस पर मुग्ध हो गया और उससे विवाह करने के लिये तत्पर हो गया।

जसमा पतिव्रता स्त्री थी और अपने पति से बहुत प्रेम करती थी उसने राजा के साथ विवाह करने से मना कर दिया। इस पर राजा ने सारे ओड पुरुषों को मरवा दिया। जसमा अपने पति की मृत देह के साथ सती हो गयी।

नाग-नागमति की कथा

नाग-नागमति की कथा ‘नागजी रा सोरठा’ में वर्णित है। यह एक विरह प्रधान प्रेमाख्यान है। एक समय नागमति उद्यान में झूला झूल रही थी। नाग उसके रूप पर मोहित हो गया। दोनों प्रेम की डोर से बंध गये। नागमति के माता-पिता ने नागमति का विवाह किसी अन्य स्थान पर कर दिया।

इस पर नाग चिता सजाकर उसमें कूद पड़ा। जब नागमति ससुराल जा रही थी तब नागमति ने उस चिता को धधकते हुए देखा। नागमति भी डोली से कूद कर नाग की चिता में जा बैठी और सती हो गयी। नागजी रा सोरठा में नागमति को सुगना भी कहा गया है। इसका एक दोहा इस प्रकार से है-

मूंछ फरूके पवन सूं, हसे बत्तीस दंत।
सोरो सोज्या नागजी, मो सुगना रो कंत।

माधवानल कामकंदला

इस प्रेमाख्यान का पूरा नाम माधवानल कामकंदला प्रबंध है। इसकी रचना वि.सं.1574 में राजस्थानी कवि गणपति ने की। इसमें 2500 दोहे हैं। इस ग्रंथ की कई हस्तलिखित प्रतियां मिलती हैं। इस प्रेमाख्यान की विशेषता यह है कि रचनाकार ने ग्रंथ के प्रारंभ में गणेश स्तुति अथवा मंगलाचरण न लिखकर कामदेव की स्तुति की है।

मूमल महेन्द्र

मूमल महेन्द्र का प्रेमाख्यान राजस्थान के प्रेमाख्यानों में सबसे विशिष्ट स्थान रखता है। इस कथा के कई रूप मिलते हैं। मूल कथानक इस प्रकार है कि राजकुमार महेन्द्र सोढण राजकुमारी मूमल से प्रेम करता था और अपनी सांड पर बैठकर मूमल से मिलने आया करता था। एक रात्रि में उसने मूमल की बहिन को पुरुष वेश में मूमल के पलंग पर सोते हुए देख लिया। महेन्द्र मूमल को छोड़कर चला गया।

इधर मूमल को सूचना मिली कि महेन्द्र की मृत्यु सांप काटने से हो गयी है। यह सुनकर मूमल सती हो गयी। आज भी जैसलमेर जिले में काक नदी के तट पर मूमल की मेढ़ी बनी हुई है।

सेणी वीजानंद

इस प्रेमाख्यान के अनुसार कच्छ के भाघड़ी गाँव का चारण वीजानंद अच्छा गवैया था तथा गायें चराता था। एक बार उसने बेकरे गाँव की सेणी को देख लिया। उसने सेणी से विवाह का प्रस्ताव रखा किंतु सेणी ने एक शर्त पूरी करने को कहा। वीजानंद उस शर्त को पूरा करने के लिये घर से निकल पड़ा किंतु वह छः माह की निर्धारित अवधि में लौट कर नहीं आया।

इस पर सेणी ने हिमालय पर जाकर अपना शरीर गला लिया। वीजानंद लौट कर आया तो उसे सारी बात का पता चला। वह भी हिमालय पर चला गया और अपना शरीर गला लिया। इस कथा में सेणी के बारे में एक दोहा कहा जाता है-

कंकूवरण कळाइयां, चूड़ी रत्तड़ियांह।
वीझां गळ विलंबी नहीं, बाळूं बांहड़ियाह।।

सोरठ वींजा

इस प्रेमाख्यान के अनुसार सांचोर के राजा जयचंद के यहाँ मूल नक्षत्र में एक कन्या का जन्म हुआ। राजा ने पुत्री को अपने लिये अशुभ जानकर पेटी में बंद करके नदी में फैंक दिया। यह पेटी चांपाकुमार को मिली जिसने कन्या का नाम सोरठ रखा तथा उसे पालकर बड़ा किया।

समय पाकर कन्या अत्यंत रूपवती युवती में बदल गयी। पाटण के राजा सिद्धराज तथा गिरनार के राव खंगार दोनों ने उससे विवाह करना चाहा। चांपाकुमार ने घबराकर सोरठ का विवाह एक बणजारे के साथ कर दिया। खंगार ने बणजारे को मार डाला और सोरठ को अपने घर ले गया।

वहाँ खंगार के भाणजे वींजा को सोरठ से प्रेम हो गया। वींजा ने गुजरात के बादशाह से मिलकर खंगार पर आक्रमण किया जिसमें खंगार मारा गया किंतु सोरठ वींजा के हाथ नहीं आयी। बादशाह सोरठ को पकड़ कर ले गया और उसे अपने हरम में डाल लिया। वींजा ने दुखी होकर प्राण त्याग दिये।

सोरठ भी बादशाह के हरम से निकल भागी और शमशान में वींजा की राख पर चिता सजाकर भस्म हो गयी। ‘सोरठ वींजा रा दूहा’ नाम से डिंगल भाषा में एक ग्रंथ मिलता है।

चंद्रकुंवरी री वात

कवि प्रतापसिंह ने ई.1765 में इस डिंगल गं्रथ को लिखा। इसमें अमरावती के राजकुमार तथा वहाँ के सेठ की पुत्री चंद्रकुंवरी की प्रेम गाथा लिखी गयी है।

चंदन मलयागिरि की वात

भद्रसेन ने ई. 1740 में इस प्रेमाख्यान की रचना की। इसमें चंदन और मलयगिरि के प्रेम की गाथा कही गयी है।

अन्य प्रेम कथाएं

इनके अतिरिक्त सोरठी गाथा, जलाल बूबना की कथा, ऊमा-सांखली और अचलदास की कथा, काछबो तथा बाघो-भारमली आदि के प्रेमाख्यान भी गाये जाते थे। अधिकतर प्रेमाख्यानों के एक से अधिक रूप प्राप्त होते हैं। जलाल बूबना की कथा का यह दोहा अत्यंत मार्मिक है-

मैं मन दीन्हों तोय, नेणा जिन दिन देखिया।
सुधि क्यों रही न मोय, प्रेम लाज अब राखिया।

लेखनकला का विकास होने पर इन आख्यानों को लिपिबद्ध कर दिया गया। कुछ प्रतियों में तो अत्यंत सुंदर चित्र भी बने हुए मिलते हैं जो राजस्थानी चित्रकला की अमूल्य धरोहर हैं। परवर्ती काल में कुछ प्रेमाख्यानों को परकीया प्रेम तथा अश्लील वर्णन से दूषित कर दिया गया किंतु अधिकांश प्रेमाख्यान आदर्श प्रेम का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

वर्तमान काल में मनोरंजन के नवीन साधनों के आ जाने के कारण राजस्थानी प्रेमाख्यान लोक-जिह्वा से हटकर केवल पुस्तकों में सिमट कर रह गए हैं। परवर्ती काल में इन प्रेमाख्यानों को आधार बनाकर कुछ ऐसे ख्यालों की रचना भी हुई जिनमें इनकी मूल कथाओं को विकृत कर दिया गया। इस कारण भी जन-सामान्य को इनसे अरुचि हो गई।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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