Sunday, April 14, 2024
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दधिमती माता मंदिर गोठमांगलोद का इतिहास

नागौर जिले की जायल तहसील में गोठ, मांगलोद एवं दुगस्ताऊ गांवों की सीमा पर सुप्रसिद्ध एवं अति प्राचीन दधिमती माता मंदिर स्थित है। यह मंदिर दधिमती नामक देवी को समर्पित है। चैत्र तथा आश्विन मास की नवरात्रियों में इस मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ रहती है। जयाष्टमी (माघ शुक्ला अष्टमी) पर्व पर देवी के कपाल विग्रह का दुग्धाभिषेक किया जाता है।

दाहिमाओं की कुल देवी

दधिमती माता अत्यंत प्राचीन काल से इस क्षेत्र के समस्त वर्णों जैसे दाहिमा ब्राह्मण, दाहिमा क्षत्रिय, दाहिमा वैश्य तथा अन्य जातियों की कुलदेवी के रूप में पूज्य है।

दधिमती क्षेत्र

दधिमती मंदिर वनक्षेत्र में स्थित है। इसे दधिमती क्षेत्र कहते हैं। मंदिर के चारों ओर जिप्सम के विशाल भंडार हैं तथा मंदिर की सतह नीची होने से बाढ़ का जल मंदिर में भर जाता है। मंदिर-क्षेत्र के बाहर दक्षिण दिशा में एक जलकुंड है तथा उससे लगभग एक किलोमीटर दूरी पर सोहलिया नामक शुद्ध पानी का सरोवर है। मंदिर के चारों ओर सतियों के स्मारक एवं वीरों के थान आदि बने हुए हैं।

मंदिर की स्थापत्य शैली

मंदिर के गर्भगृह की मूल रचना गुप्तकालीन त्रिरथ तलच्छन्द शैली की है। इस बात का प्रमाण गर्भगृह की अन्दर की सतह है जो सभामण्डप की सतह से एक फुट नीचे है। इस प्रकार का विधान चौथी शताब्दी इस्वी से सातवीं शताब्दी ईस्वी में बने मंदिरों में रखा जाता था।

दधिमती मंदिर के शिखर तथा सभामण्डप के स्तम्भों के आधार पर प्रमाणित होता है कि वर्तमान मंदिर ‘नागर शैली’ का है। प्रतिहार काल में विकास होने के कारण इसे ‘प्रतिहार शैली’ भी कहा जाता है। मरुक्षेत्र में विकसित होने के कारण इसे ‘महामारू शैली’ भी कहा जाता है।

नागर शैली का सप्तभौम शिखर अपेक्षाकृत नाटा होता है। इसके कर्ण तथा आमलक थोड़े गोलाकार होते हैं तथा पूरे शिखर पर बाहर की ओर चन्द्रशाल का जाल उत्कीर्ण रहता है। गर्भगृह द्वार पंच शाखायुक्त तथा मण्डप स्तम्भों पर कीर्तिमुख, चैत्यमुखों, घटपल्लव, पूर्ण खिले कमल एवं पुष्पाकृतियों का सुन्दर अंकन रहता है। ये सारे लक्षण इस मंदिर में देखने को मिलते हैं।

मंदिर का गर्भगृह एवं सभामण्डप पूर्वाभिमुख है तथा जंघा भाग पंचरथ है।

मंदिर का निर्माण काल

मंदिर की स्थापना के सम्बन्ध में कोई प्राचीन लिखित सामग्री प्राप्त नहीं होती। अमेरिकन इन्स्टीट्यूट ऑफ इण्डियन स्टडीज के वास्तुशिल्पी एम. डब्ल्यू. माइस्टर तथा एम. ए. ढाकी ने दधिमती माता मंदिर का निर्माण सातवीं सदी में, विस्तार नौवीं सदी में तथा जीर्णोद्धार ग्यारहवीं सदी में माना है।

मंदिर का गर्भगृह गुप्तकालीन त्रिरथ तलच्छन्द शैली का है। इससे अनुमान होता है कि इस स्थान पर मूल मंदिर सातवीं सदी ईस्वी अथवा उससे पहले की किसी सदी में हुआ होगा। मंदिर से प्राप्त एक शिलालेख भी मंदिर के गुप्तकाल में अथवा हर्षकाल में निर्मित होने की ओर संकेत करता है।

विजयशंकर श्रीवास्तव के अनुसार दधिमती माता के मंदिर की रामायण दृश्यावली प्रतिहारकालीन है। उनके अनुसार यह मंदिर नौवीं शताब्दी इस्वी में प्रतिहार नरेश भोजदेव (प्रथम) (ई.836-892) के समय में बना।

मंदिर के शिखर की नागर शैली के आधार पर भी अनुमान किया जाता है कि शिखर का निर्माण नौंवीं शताब्दी ईस्वी में हुआ होगा। मंदिर के कुछ भागों की रचना का विधान देखकर अनुमान किया जाता है कि मंदिर के ये भाग 11वीं शताब्दी में बने होंगे अथवा पुनर्निर्मित हुए होंगे।

मंदिर के मूल एवं परवर्ती निर्माण

दधिमती माता मंदिर के मूल गर्भगृह एवं सभामंडप, वर्तमान मंदिर परिसर में दक्षिण एवं पश्चिम की ओर बने हुए हैं, मंदिर का पूर्वी तथा उत्तरी भाग परवर्ती विस्तार है जो दाहिमा ब्रह्मचारी एवं देवी दधिमती के भक्त विष्णुदास के प्रयासों से वि.सं. 1906 अर्थात् ई.1849 में किया गया। बाद में दाहिमा महासभा द्वारा दाधीच ब्राह्मणों (दाहिमा ब्राह्मणों) से अंशदान लेकर जीर्णाेद्धार कराया गया। मंदिर में इस आशय का शिलालेख लगा हुआ है।

कपाल विग्रह

मंदिर के गर्भगृह में देवी का कपाल विग्रह स्थापित है। इस कारण मंदिर परिवृत्त को कपालतीर्थ अथवा कपालपीठ भी कहते हैं।

दधिमथी पुराण

देवी के माहात्म्य का वर्णन दाहिमा समाज द्वारा रचित ‘दधिमथी पुराण’ में किया गया है। दधिमथी पुराण के 16वें अध्याय में भगवती नारायणी देवी तथा विकटासुर के युद्ध का विवरण है। इसके अनुसार दधिमथी माता पूर्व काल में ब्रह्मा के पुत्र ऋषि अथर्वा की पुत्री नारायणी के रूप में प्रकट हुई थी।

स्वर्ग के देवता दाधिसागर में रहने वाले विकटासुर नामक दैत्य से दुखी थे, उन्होंने भगवती नारायणी से विकटासुर का वध करने की प्रार्थना की। भगवती ने दधिसागर में प्रवेश करके विकटासुर का वध किया, इसीलिए अथर्वानंदिनी भगवती नारायणी ही विकटासुरमर्दिनी देवी दधिमथी माता के नाम से पूजी जाती है।

जयाष्टमी

देवी माँ ने दधिसागर का मंथन कर माघशुक्ला अष्टमी को विकटासुर का वध किया, यह तिथि जयाष्टमी कहलाती है।

दधिमती अथवा दधिमथी

डॉ. जयनारायण आसोपा ने ‘वैदिक परंपरा में महर्षि दधीचि’ नामक ग्रंथ में लिखा है कि वेदों एवं प्राचीन साहित्य में दधिमती देवी की चर्चा नहीं है। दधिमती के स्थान पर दधिमथी कहना तथा उसे समुद्र मंथन करने वाली देवी मानना निरी खींचतान है। …. दधिमती शब्द ही सबसे पहले प्रयोग में आया है।

डॉ. आसोपा का अनुमान है कि यह मंदिर प्राचीन काल की दृषद्वती नामक नदी की पवित्र धारा पर स्थित रहा होगा तथा जंगल में बनाया गया होगा। नदी की जलधारा दूध अथवा दही के जैसे रंग की होने के कारण इस धारा को दधिमती कहा जाता होगा तथा उसी जलधारा के नाम पर मंदिर की देवी दधिमती कहलाई होगी।

डॉ. आसोपा ने ‘दधिमथी’ के स्थान पर ‘दधिमती’ शब्द को प्रामाणिक एवं शास्त्रसम्मत माना है। दाधीच समाज के साहित्य में देवी के ये दोनों नाम प्रचलित हैं।

दधिमती क्षेत्र के चारों ओर जिप्सम के विशाल भण्डार हैं। जब इस क्षेत्र में वर्षा का पानी भरता होगा तो वह जिप्सम में घुलकर सफेद घोल बनाता होगा। इसी कारण उसे दधिसागर सागर कहा जाता होगा तथा मंदिर में विराजमान दवी दधिमती कहलाती होगी।

सभामण्डप के स्तम्भ

दधिमाता मंदिर के सभामण्डप में कई स्तम्भ लगे हैं जो स्थापत्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। गर्भगृह के सामने दक्षिण-पूर्व दिशा के एक अधर स्तम्भ को देवी की शक्ति का चमत्कार माना जाता है, इसलिए श्रद्धालु जन इस स्तम्भ पर मोली (कलावे) से लाल वस्त्र एवं नारियल बांधकर परिवार की सुरक्षा एवं समृद्धि की कामना करते हैं।

दधिमती मंदिर का मूर्तिशिल्प

मंदिर का गर्भगृह एवं सभामण्डप पूर्वाभिमुख है तथा जंघा भाग पंचरथ है जिसकी रथिकाओं में देवी और देवताओं की मूर्तियां, मंडोवर तथा शिखर के मध्यवर्ती कंठिका (वरण्डिका के अन्तरपट्ट) पर अंकित रामकथा के दृश्य-फलक अद्वितीय प्राचीन मूर्तिकला के परिचायक हैं।

जंघा भाग के उत्तर तथा पश्चिम दिशाओं के मध्यवर्ती ताकों में गौरी तथा दुर्गा की चतुर्भुज मूर्तियां उत्कीर्ण हैं। जंघा की तीनों दिशाओं में 6 मूर्तियां स्थानक दिक्पालों की तथा 6 मूर्तियां प्रतिरथों में स्थानक चामरधारिणि अप्सराओं की हैं। जंघा भाग की दक्षिणी भद्रा (मध्यवर्ती ताक) में एक अष्टभुजी ललितासनस्थ कुम्भोदर देव की प्रतिमा है। इस प्रकार जंघा भाग में 15 प्रतिमाएं हैं।

प्रतिमाओं का निर्माण प्राचीन शिल्पविधान के अनुसार किया गया है। गुप्तकालीन मंदिरों एवं उसके बाद के काल के मंदिरों में विष्णुधर्मोत्तर पुराण, वृहत्संहिता, मत्स्यपुराण आदि में दिए गए विधानों के अनुसार मंदिर की मूर्तियाँ बनाई जाती थीं। दसवीं-ग्यारहवीं शताब्दी तथा बाद में अग्निपुराण, समराङ्गण- सूत्रधार, अपराजितपृच्छा, रूपमण्डन आदि शिल्पशास्त्रों के विधान के अनुसार मूर्तियां बनने लगी। दधिमती माता के मंदिर का मूर्तिशिल्प नौवीं शताब्दी का है।

प्राचीन भारतीय मूर्तिशिल्प परम्परा में गौरी की 12 प्रकार की मूर्तियां बताई गई हैं। अपराजितपृच्छा में उनके नाम इस प्रकार दिए गए हैं-

उमा च पार्वती गौरी ललिता च श्रियोत्तमा

कृष्णा हेमवती रम्भा सावित्री च तथैव च

त्रिखंडा तोतला चैव त्रिपुरा द्वादशीमता।

इन 12 प्रकार की गौरी मूर्तियों में से केवल एक गौरी पार्वती ही दधिमती माता मंदिर के जंघा भाग में उत्तर की मध्यवर्ती ताक (भद्रा) में प्रतिष्ठित है। गौरी (पार्वती) की मूर्ति में निम्नांकित लक्षण स्पष्ट दिखाई देते हैं-

(1) मूर्ति चतुर्भुज है, दाहिनी ओर आगे के हाथ में कमल तथा पीछे के हाथ में सुवा है, ऊपर के दाहिने कोने में शिवलिङ्ग उत्कीर्ण है। बायीं ओर आगे के हाथ में कमण्डलु तथा ऊपर के हाथ में पुष्पशाखा एवं श्रीगणपति का शिल्पांकन है।

(2) गौरी की मूर्ति स्थानक है तथा वाहन के रूप में गोह है। इस कारण इसे गोधासना गौरी भी कहा जाता है।

(3) गौरी के सिर पर मुकुट तथा गले में आभूषण है। कमर के नीचे पैरों तक अधोवस्त्र आवृत्त है। दोनों ओर अग्निपात्र रखे हुए हैं। गौरी के गले में आजानुलम्बिनी वनमाला है।

(4) मूर्ति के दोनों ओर घटपल्लव सहित चौड़े खम्भे हैं. जो चौखट (फ्रेम) बनाते हैं।

अपराजितपृच्छा में गौरी पार्वती (गोधासना) के लक्षण इस प्रकार बताये हैं-

अक्षसूत्रं शिवोदेवो गणाध्यक्ष कमण्डलुः।

पक्ष द्वये चाग्निकुण्डं पार्वती पर्वतोद्भवा।।

भारतीय शाक्त मूर्तिशिल्प में नवदुर्गाओं के शिल्पांकन का विधान है। इन नव दुर्गाओं के नाम इस प्रकार हैं-

(1) महालक्ष्मी, (2) नन्दा, (3) क्षेमंकरी, (4) शिवदूती, (5) महारण्डा, (6) भ्रमरी, (7) सर्वमङ्गला, (8) रेवती तथा (9) हरसिद्धि।

दधिमती माता मंदिर की जंघा की पश्चिमी भद्रा (मध्यवर्ती ताक) में दुर्गा के क्षेमंकरी स्वरूप का सुन्दर शिल्पांकन किया गया है।

अपराजितपृच्छा तथा रूपमण्डन में क्षेमंकरी दुर्गा की प्रतिमा के लक्षण इस प्रकार बताए गए हैं-

वरंत्रिशूलं पद्मं च पानपत्रं करेषु च।

क्षेमंकरीति तन्नाम सर्ववृद्धि प्रदायिनी।।

अर्थात् देवी क्षेमंकरी दुर्गा के चार हाथों में त्रिशूल, पद्म, पान- पात्र एवं वरद् मुद्रा होती है, यथानाम माता क्षेम तथा समृद्धि प्रदान करने वाली है।

दुर्गा क्षेमंकरी कमल पर पद्मासन लगाये बैठी हैं। उनके दोनों ओर अलग-अलग दिशाओं में दृष्टि रखे हुए दो सिंह हैं, इसीलिए यह सिंहवाहिनी दुर्गा भी हैं। यह मूर्ति चतुर्भुज है जिसमें दाहिना (आगे) हस्त वरद मुद्रा में तथा दाहिना (पीछे) हाथ त्रिशूल धारण किये हुए है। बायां हाथ (आगे) ध्यान मुद्रा के साथ गोद में रखा हुआ है।

पीछे के बाएं हाथ का आयुध स्पष्ट नहीं है, किंतु ऊपर के बाएं कोने में सम्भवतः शिव प्रतिमा है। देवी के सिर पर मुकुट है, कलाइयों तथा भुजाओं में आभूषण हैं। क्षेमंकरी दुर्गा भी गौरी पार्वती की भांति ध्यानावस्थित सौम्य मुद्रा में है। प्रतिहार कालीन स्थापत्य में क्षेमंकरी की प्रतिमाएं बड़ी संख्या में मिलती हैं। क्षेमंकरी की सुन्दर प्रतिमाओं का अंकन 11वीं सदी में पाटन (गुजरात) में निर्मित रानी की बाव में भी हुआ है।

दधिमती मंदिर में दिक्पालों का अंकन

प्राचीन एवं मध्यकालीन मन्दिरों की जंघा एवं गर्भगृह में दिक्पालों का शिल्पांकन हुआ है। दिक्पालों का शिल्पांकन हिन्दू मन्दिरों के साथ-साथ जैन एवं बौद्ध मन्दिरों में भी मिलता है। विभिन्न ग्रन्थों में इनकी संख्या 4 से 10 तक मिलती है। कई प्राचीन भारतीय मन्दिरों में अष्टदिक्पालों का शिल्पांकन हुआ है।

दधिमती माता मन्दिर के जंघा भाग में पश्चिम के कर्ण में वरुण तथा दक्षिण-पश्चिम के कर्ण की रथिका में निऋति दिक्पाल की मूर्ति उत्कीर्ण की गई है। इसी तरह जंघा भाग के उत्तर के कर्ण में पूर्व की ओर ईशान (उत्तर-पूर्व) तथा पश्चिम की ओर पवन (वायु) दिक्पालों का शिल्पांकन है। जंघा के दक्षिण कर्ण में अग्नि तथा दक्षिण-पूर्व (आग्नेय कोण) रथिका में यम को उत्कीर्ण किया गया है।

छः दिक्पालों में यम, अग्नि, निऋति, वरुण तथा वायु द्विभुज हैं। ईशान कोण में नन्दी एवं रुद्राणी के साथ चतुर्भुज रुद्र उत्कीर्ण किए गए हैं। प्रत्येक दिक्पाल अपने वाहन एवं आयुध से पहचाना जाता है। अग्निपुराण में लोकपालों (दिक्पालों) को ‘द्विबाहवो लोकपालाः’ कहा गया है। दिक्पालों की पहचान इस प्रकार की जाती है-

इन्द्रो वज्री, गजारूढ श्छागगोऽग्निश्च शक्तिमान्

यमो दण्डी च महिषे नैऋतः खङ्गवान करे

मकरे वरुणः पाशी वायुर्ध्वजधरो मृगे

गदी कुबेरो मेषस्थ ईशानश्च जटी वृषे।।

दधिमती मंदिर के जंघाभाग की दक्षिण-पश्चिमी रथिका में नैऋति का अंकन मत्स्यपुराण के निर्देशों के अनुसार हुआ है-

राक्षसेन्द्रं तथा वक्ष्ये लोकपालश्च नैऋतम्। नरारूढं महाकायं रक्षोभिर्बहुभिर्वृतम्।।

खड्गहस्तं महानीलं कज्जलाचल सन्निभम्। नरयुक्त विमानस्थं पीताभरण भूषितम्।।

नैऋति का शरीर महाकाय, दाहिने हाथ में खड्ग, बायां हाथ पुरुषाकृति पर है। दिक्पाल की मूर्ति स्थानक, अधोवस्त्र घुटने तक अंकित है तथा इसको मानव शरीर पर खड़े दर्शाया है। रथिका की फ्रेम या चौखट के खम्भे गोल हैं।

दिक्पाल वरुण की मूर्ति भी स्थानक तथा द्विभुज है, इसकी दायीं भुजा आगे से खण्डित है, संभवतः इसमें पाश जैसा आयुध रहा होगा, बाएं हाथ में जलकुम्भ है तथा उसके नीचे मकर (मगरमच्छ) या मत्स्य (मछली) का अंकन है।

वरुण का मुखारविन्द सौम्य है तथा सिर पर किरीट (मुकुट) है। मत्स्यपुराण के अनुसार वरुण के लक्षण ‘झषासनगतं शान्तं किरीटाङ्गदधारिणम्’ बताये गये हैं।

दधिमती मंदिर में जंघा की उत्तर-पश्चिमी कर्णरथिका में वायु (पवन) दिक्पाल का सुन्दर अंकन मत्स्यपुराण के अनुसार किया गया है-

वायुरूपं प्रवक्ष्यामि घूमन्तु मृगवाहनम्। मृगाधिरूढं वरदं पताकाध्वज संयुतम्।।

वायु दिक्पाल की मूर्ति स्थानक, द्विभुज तथा आजानुलम्बिनी वनमाला से सुशोभित है, दायां हाथ कमर के नीचे जांघ पर तथा बायें हाथ में ध्वजा पताका है। वाहन रूप में पैरों के पास मृग का अंकन है।

उत्तर की ओर पूर्वी रथिका में ईशान दिक्पाल के रूप में नन्दी सहित शिव पार्वती का अंकन है, जिसमें शिव (रुद्र) चतुर्भुज एवं पार्वती (रुद्राणी) द्विभुज है। शिव के दाहिने एक हाथ में त्रिशूल है, अन्य हाथों के आयुध स्पष्ट नहीं हैं।

मत्स्यपुराण में ईशान का लक्षण ‘त्रिशूल पाणिनं देवं, यक्षं वृषगतं प्रभुम्’ बताया है। जंघा के दक्षिण भाग की आग्नेय दिशा (दक्षिण-पूर्व) में यम का शिल्पांकन है, जो महिष (भैंसा) वाहन से पहचाना जा सकता है। यह मूर्ति अतीत में खण्डित हुई है, जिसे बाद में ठीक किया गया है, इसलिए दोनों हाथों के आयुध स्पष्ट नहीं हैं, सम्भवतः दाहिने हाथ में दण्ड जैसा आयुध रहा होगा।

मत्स्यपुराण में यम की मूर्ति के लक्षण ‘दण्डपाशधरं, महामहिषमारूढं कृष्णांजनचयोपमम्’ बताये गये हैं।

दधिमती मंदिर की दक्षिणी-पश्चिमी रथिका में अग्नि दिक्पाल का शिल्पांकन है जिसमें मूर्ति के लक्षण मत्स्यपुराण अथवा अग्निपुराण के अनुसार नहीं दिखाई देते। अग्निपुराण में इसका वाहन छाग (बकरी) तथा मत्स्य पुराण में भी ‘ज्वालावितान संयुक्तम् अजवाहनमुज्वलम्’ लिखा है।

11वीं शताब्दी के बाद के शिल्प सम्बन्धी ग्रंथों में अग्नि का वाहन मेष (भेड़ा) बताया गया है। दधिमती मंदिर के जंघा भाग के दक्षिण में पश्चिम की ओर रथिका के दिक्पाल का वाहन वृष दिखाई देता है। दांये हाथ में नरमुण्ड तथा बायां हाथ कमर पर रखा हुआ है। दिक्पाल की मूर्ति द्विबाह स्थानक है। दक्षिण कर्णस्थ की इस प्रतिमा को अग्नि माना गया है।

खजुराहो के मंदिरों तथा वनेश्वर (उड़ीसा) के मंदिरों में शिल्पांकित नैऋति को हाथ में नरमुण्ड तथा वृष वाहन के साथ दर्शाया गया है। अग्नि का मुख्य स्थान आग्नेय कोण (दक्षिण-पूर्व) होना चाहिए। इस मंदिर में यम दिक्पाल को उत्कीर्ण किया गया है।

यम तथा अग्निदेव की रथिकाओं के मध्य भद्रा रथिका में एक कुम्भोदर षड्भुजी देवता उत्कीर्ण है, उसे पहचानना संभव नहीं है। पुरातत्वविद् एवं मूर्तिकला विशेषज्ञ इस मूर्ति को कुम्भोदर गणेश मानते हैं।

छः दिक्पालों, गौरी पार्वती तथा क्षेमंकरी दुर्गा के अतिरिक्त मंदिर की जंघा की तीन दिशाओं की (प्रतिरथ) रथिकाओं में छः चामरधारिणी अप्सराओं की प्रतिमाएं हैं। प्रत्येक प्रतिमा एकल, स्थानक एवं द्विबाहु है, उनके बायें अथवा दाहिने हाथ में चामर (चंवर) उत्कीर्ण है। प्रत्येक रथिका की चामरधारिणी पुष्पपीठिका (आधार) पर अथवा नरारूढ़ है। कर्ण एवं प्रतिरथ की लम्बाई समान है किंतु चौड़ाई कर्ण की अपेक्षा प्रतिरथ की कम है तथा चौखट के खम्भे पतले तथा गोलाई लिये हुए हैं। प्रत्येक रथिका (प्रतिरथ) में एक छोटी नारी अकृति संभवतः अनुचरी की है।

दधिमती मंदिर में रामकथा का प्राचीनतम शिल्पांकन

दधिमती माता मंदिर की जंघा के ऊपर की वरण्डिका के अन्तःपट्ट पर रामायण के दृश्य अंकित हैं। पुरातत्वविद् विजयशंकर श्रीवास्तव के अनुसार दधिमती माता के मंदिर की रामायण दृश्यावली प्रतिहार कालीन है। उनके अनुसार यह मंदिर प्रतिहार नरेश भोजदेव प्रथम (836-892 ई.) के समय में बना।

दधिमती माता मंदिर रामकथा का अंकन एक सुखद आश्चर्य प्रतीत होता है। इसके तीन कारण हैं-

दधिमती माता मंदिर के शिखर तथा मण्डोवर की मध्यवर्ती बाह्य कंठिका में रामकथा से सम्बन्धित 15 आयताकार श्वेत पीत प्रस्तर फलक लगभग पूर्ण सुरक्षित एवं अखण्डित हैं। इन प्रस्तर फलकों पर रामकथा प्रसंग मध्यवर्ती कंठिका पर दक्षिण-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम, पश्चिम उत्तर तथा उत्तर-पूर्व के क्रम से लगे हुए हैं।

मंदिर के शिखर पर कंठिका के दक्षिण पूर्व से दक्षिण पश्चिम के प्रथम तीन फलक अरण्यकाण्ड से सम्बन्धित हैं। प्रारम्भ खर, दूषण एवं त्रिशरा राक्षसों के युद्ध से होता है तथा तीसरे फलक में स्वर्णमृग (मारीच) वध, रावण द्वारा जटायु को घायल करना, सीता का हरण और अरण्यकाण्ड का अन्तिम प्रसंग, राम लक्ष्मण की उपस्थिति में शबरी की शरणागति तथा प्राणोत्सर्ग पश्चात दिव्य स्वरूप प्राप्त करने के साथ होता है।

दक्षिण-पश्चिम के दो फलक किष्किन्धा काण्ड से सम्बन्धित हैं, जिनमें श्रीराम द्वारा सात ताल वृक्षों का भेदन तथा बाली-सुग्रीव का द्वन्दयुद्ध अंकित है। इसके अगले फलक में श्रीराम तथा बाली संवाद, अंगद की शरणागति तथा श्रीराम का समुद्र पर (मार्ग न देने पर) क्रोध तथा समुद्र का समर्पण दर्शाया गया है।

मध्यवर्ती कंठिका के दक्षिण-पश्चिम से पश्चिमोत्तर तथा उत्तर-पश्चिम से उत्तर-पूर्व दिशा की ओर दस फलक युद्धकाण्ड से सम्बन्धित हैं जिनका आरम्भ सेतुबन्ध तथा राम-लक्ष्मण की सुग्रीव के साथ युद्ध मंत्रणा से होता है तथा अन्तिम दो शिला फलकों में रावणवध तथा राम-लक्ष्मण एवं सीता के अयोध्या आगमन का शिल्पांकन है।

भगवान श्रीराम को राजपुरुष या विष्णु अवतार के रूप में नहीं दर्शाया गया है अपितु वनवासी रूप में जटामुकुट धारण किये हुए, धनुष लिए व पीठ पर तरकस बांधे प्रत्यालीढ़ मुद्रा में अंकित किया गया है। कुशल शिल्पकार ने रामकथा का सूक्ष्म अध्ययन कर उन्हीं प्रसंगों का शिल्पांकन किया, जिनमें श्रीराम एवं लक्ष्मण का शौर्य एवं युद्ध-कौशल प्रदर्शित होता हो।

दधिमती मंदिर पर मुस्लिम आक्रमण

मंदिर-क्षेत्र में कई गुफाएं, जुझारुओं की देवलियां, सती-स्तम्भ, गोवर्द्धन एवं स्मारक छतरियां बनी हुई हैं जिनसे ज्ञात होता है कि प्राचीन काल में इस क्षेत्र में लड़ाइयाँ हुईं जिनमें अनेक वीरों ने प्राणों की आहुतियाँ दीं। ये लड़ाइयाँ उन मुस्लिम आक्रांताओं से हुईं जो इस मंदिर को तोड़ने के लिए आक्रमण करते थे और इस क्षेत्र में गौहत्या करके इस क्षेत्र को अपवित्र करते थे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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