Sunday, April 14, 2024
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अजमेर के समाचार पत्र – स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका

राजस्थान के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अजमेर के समाचार पत्र विशिष्ठ स्थान रखते हैं। अजमेर मेरवाड़ा को छोड़कर शेष राजपूताना देशी रियासतों में विभक्त था जिनमें नाम मात्र की भी स्वतंत्रता नहीं थी। जबकि अजमेर-मेरवाड़ा प्रांत में ब्रिटिश सत्ता थी जहां जनता को कुछ सीमा तक नागरिक अधिकार प्राप्त थे।

यही कारण है कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अजमेर में कई संगठनों की स्थापना हुई तथा समाचार पत्रों का प्रकाशन हुआ जिन्होंने सम्पूर्ण राजपूताने में राजनीतिक चेतना का अलख जगाया।

हिन्दी समाचार पत्र

ई.1885 में जिस वर्ष कांग्रेस की स्थापना हुई, अजमेर का पहला समाचार पत्र राजस्थान टाइम्स प्रकाशित हुआ। यह अंग्रेजी समाचार पत्र था। इसका हिन्दी संस्करण राजस्थान पत्रिका के नाम से निकला।

दोनों पत्रों के सम्पादकीय में अंग्रेजी प्रशासन की खुलकर आलोचना की गई। ई.1888 में इन समाचार पत्रों के प्रकाशन पर प्रतिबंध लगा दिया गया तथा सम्पादक बक्शी लक्ष्मणदास को जेल में डाल दिया गया। उन पर मुकदमा चलाया गया तथा डेढ़ साल के कारावास की सजा दी गई। 1907 ई. में यह समाचार पत्र अंग्रेजी हुकूमत द्वारा किये गये दमन के कारण बंद हो गया।

विजयसिंह पथिक ने अजमेर से राजस्थान संदेश नामक साप्ताहिक समाचार पत्र का प्रकाशन किया। आर्थिक अभाव के कारण इसे बंद करना पड़ा। पथिकजी ने नव संदेश नामक पत्र निकाला किंतु वह भी अर्थाभाव के कारण नियमित नहीं चल सका। इस समाचार पत्र ने जन साधारण में काफी लोकप्रियता प्राप्त कर ली थी।

1885 ई. में अजमेर से राजपूताना हेराल्ड नामक समाचार पत्र का प्रकाशन आरंभ हुआ। इसके सम्पादक हनुमानसिंह थे तथा यह अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित होता था। इस पत्र में भारतीय राज्यों में अंग्रेज अधिकारियों के अनावश्यक हस्तक्षेप के विरुद्ध लेख एवं समाचार छपते थे। इस समाचार पत्र में इसी विषय पर इतने लेख छपे कि ब्रिटिश संसद में इनके आधार पर अनेक प्रश्न उठे।

एन. पी. अजमेर से राजपूताना गजट नामक एक समाचार पत्र 19वीं सदी के अंतिम दशक में प्रारम्भ हुआ। इसने राजपूताना एवं अन्य क्षेत्रों के शासकों के अन्याय पूर्ण निर्णयों की भर्त्सना की। इसके साथ सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध भी वकालात की। 1885 में ही अजमेर से राजपूताना मालवा टाईम्स नामक समाचार पत्र प्रारंभ हुआ।

इसकी विषय वस्तु में भी देशी रियासतों में अंग्रेज अधिकारियों के अनावश्यक हस्तक्षेप का विरोध सम्मिलित था। यह समाचार पत्र अंग्रेजी में छपने के कारण आम पाठक से दूर थे किंतु इन्होंने प्रबुद्ध वर्ग को काफी सीमा तक प्रभावित किया।

जमेर के नागरिकों में जन चेतना पैदा करने का प्रयास किया गया। 1889ई. में अजमेर से अमृतदास चारण ने राजस्थान समाचार नामक साप्ताहिक हिन्दी समाचार पत्र का प्रकाशन प्रारम्भ किया। यह आर्य समाज के विचारों से काफी प्रभावित था किंतु इसमें राष्ट्रीय आंदोलन से सम्बन्धित सामग्री भी छपती थी। इन समाचार पत्रों की उपस्थिति से अजमेर राजनीतिक चेतना का गढ़ बन गया।

1919 ई. के पश्चात् समाचार पत्रों के प्रकाशन में और अधिक प्रगति हुई। समाचार पत्रों से प्रांतों की दूरियां मिट गई थीं तथा राजनीतिक आंदोलन प्रांत की सीमाओं को पार करके राष्ट्रीय चरित्र प्राप्त करता गया था।

1919 ई. के पश्चात् देश में क्रांतिकारी आंदोलन का स्थान कांग्रेस के अहिंसा के आंदोलन ने ले लिया। गांधीजी द्वारा प्रारंभ असहयोग आंदोलन राजस्थान में अजमेर से प्रारंभ हुआ। गांधीजी की प्रेरणा से अर्जुनलाल सेठी, केसरीसिंह बारहठ, विजयसिंह पथिक आदि ने शांतिपूर्ण तरीके से राजनीतिक चेतना जागृत करने और सामाजिक सुधारों के उद्देश्य से राजस्थान सेवा संघ की स्थापना की।

1920ई. में इसका कार्यालय वरध से अजमेर में स्थानांतरित कर दिया गया। कोटा, जोधपुर, उदयपुर एवं बूंदी में इसकी शाखायें स्थापित की गईं।

इस समय अजमेर में तीन दलों के नेतृत्व में स्वतंत्रता सम्बन्धी गतिविधियां संचालित की जा रही थीं- विजयसिंह पथिक प्रथम दल का नेतृत्व कर रहे थे, दूसरे दल का अर्जुनलाल सेठी और तीसरे दल का जमनालाल बजाज एवं हरिभाऊ उपाध्याय के हाथों में था। 1919 के बाद राजस्थान केसरी व तरुण राजस्थान का प्रकाशन आरम्भ हुआ।

1918 में राजपूताना मध्य भारत सभा की स्थापना हुई तथा 1919 से राजस्थान केसरी नामक समाचार पत्र वरधा से प्रकाशित होने तक विजयसिंह पथिक को इसका सम्पादक तथा रामनारायण चौधरी को सहायक सम्पादक बनाया गया।
ई.1922 में विजयसिंह पथिक राजस्थान केसरी के सम्पादन कार्य से मुक्त हो गये।

इसी वर्ष उन्होंने अजमेर से नवीन राजस्थान नामक साप्ताहिक हिन्दी समाचार पत्र निकालना आरंभ किया। इस समाचार पत्र का उद्देश्य राजस्थान में राजनीतिक चेतना जागृत कर स्वतंत्रता आंदोलन को आगे बढ़ाना था।

इसके माध्यम से मेवाड़ के किसान आंदोलन को भारी समर्थन मिला। मेवाड़ राज्य ने विजयसिंह पथिक के विरुद्ध कार्यवाही करते हुए मई 1923 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया। इनकी गिरफ्तारी के बाद नवीन राजस्थान के सम्पादन का भार शोभालाल गुप्त पर आ गया।

मेवाड़ राज्य में राजस्थान केसरी एवं नवीन राजस्थान का प्रवेश प्रतिबन्धित कर दिया गया था। जयपुर, अलवर और बूंदी राज्यों ने भी अपने यहां इन समाचार पत्रों का प्रवेश बंद कर दिया। बूंदी, बरड़, अलवर के किसान आंदोलनों के समर्थन में लेख लिखने के कारण ऐसा किया गया।

तरुण राजस्थान पर राजा महेन्द्र प्रताप की एक चिट्ठी और अग्र लेख छापने के आधार पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया। रामनारायण चौधरी और शोभालाल गुप्त अभियुक्त बनाये गये। इन्हें जेल भेज दिया गया।

इनका मुकदमा अंग्रेज कमिश्नर हॉपकिन्स की अदालत में चला। मुकदमे में काफी धांधली हुई। रामनारायण को बरी कर दिया गया और शोभालाल को एक साल की सजा हुई।

शंकरलाल शर्मा ने भी 1928 ई. तक तरुण राजस्थान में कार्य किया। तत्कालीन समाचार पत्र समाज सुधार की भूमिका का निर्वाह करते थे।

रामनारायण चौधरी ने कम दहेज लाने वाली पुत्रवधू के प्रति अन्याय को बंद करवाया और एक महिला की समस्या सुलझाई जिसके पति किशनगढ़ की रियासत के दीवान बहादुर पौनस्कर ने हत्या कर दी थी।
1926 के बाद हरिभाऊ उपाध्याय की गतिविधियां मेरवाड़ा में बढ़ीं।

उन्होंने अजमेर में सस्ता साहित्य मण्डल की स्थापना की एवं त्यागभूमि नामक समाचार पत्र आरंभ किया। इसके माध्यम से समाज सुधार, महिला उत्थान, छुआछूत विरोध, ग्रामीण उत्थान, चरखा व खादी तथा भारतीय परम्परा एवं संस्कृति के विकास को अपना ध्येय बनाया। जवाहर लाल नेहरू ने भी त्यागभूमि की भारी प्रशंसा की। यह समाचार पत्र आर्थिक अभाव के कारण 1931 ईस्वी में बंद हो गया।

1929 में रामनारायण चौधरी एवं शोभालाल गुप्त ने अजमेर से यंग राजस्थान नामक अंग्रेजी साप्ताहिक समाचार पत्र का प्रकाशन आरम्भ किया। यह समाचार पत्र कुल एक वर्ष ही निकल पाया क्योंकि दिसम्बर 1929 में रामनारायण चौधरी वरधा चले गये थे।

विजयसिंह पथिक उग्र विचारों के व्यक्ति थे, उन्होंने 1929 से 1932 तक राजस्थान संदेश हिन्दी साप्ताहिक समाचार पत्र अजमेर से प्रकाशित किया। इसके माध्यम से वे राजस्थान में क्रांतिकारी जन चेतना उत्पन्न करने में सफल रहे।

1934 ई. में उदारवादी विचारों का दरबार नामक समाचार पत्र मदनमोहन लाल गुप्ता के सम्पादन में अजमेर से प्रकाशित होने लगा। यह व्यापारिक आधारों पर संचालित था। 2 अक्टूबर 1936 से राजस्थान सेवक मण्डल के अधीन अजमेर से नवज्योति नामक साप्ताहिक हिन्दी पत्र का प्रकाशन आरम्भ हुआ।

प्रारंभ में शोभालाल गुप्त इसके सम्पादक थे तथा शीघ्र ही यह कार्य रामनारायण चौधरी को सौंप दिया गया। इस समाचार पत्र का उद्देश्य राष्ट्रीय चेतना व राष्ट्रीय आंदोलन को विकसित करना था।

अंग्रेजों व सामंती शासकों की नीतियों का विरोध करते हुए जनता को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया। ई. 1942 में रामनारायण चौधरी के साबरमती आश्रम चले जाने के कारण दुर्गाप्रसाद चौधरी नवज्योति के सम्पादक बने। यह राजस्थान में राष्ट्रीय आंदोलन का मुखपत्र बन गया। ई.1948 से यह साप्ताहिक के स्थान पर दैनिक समाचार पत्र बन गया।
ई.1937 में अजमेर से हिन्दी साप्ताहिक पत्र मीरा का प्रकाशन जगदीश प्रसाद माथुर दीपक एवं उकने भाई अम्बालाल माथुर ने किया। यह कांग्रेस, किसान व श्रमिकों का पक्का समर्थक समाचार पत्र था। देशी रियासतों में महिलाओं के उत्पीड़न के विरुद्ध ही मीरा ने जमकर आवाज उठाई। मीरा का प्रकाशन 1964 तक होता रहा।

1938 ई. में जगदीश प्रसाद माथुर दीपक के सम्पादन में अजमेर से रियासती नामक साप्ताहिक हिन्दी समाचार पत्र प्रकाशित हुआ। यह समाचार पत्र राजस्थान के स्वतंत्रता आंदोलन का मुख पत्र बन गया। 1939 ई. में ठाकुर नारायणसिंह एवं कनक मधुकर के सम्पादन में नवजीवन नामक साप्ताहिक हिन्दी पत्र प्रकाशित हुआ।

1942 ई. के भारत छोड़ो आंदोलन में नवज्योति, मीरा, रियासती एवं नवजीवन नामक समाचार पत्रों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

सिन्धी समाज के समाचार पत्र

भारत पाक विभाजन के बाद पाकिस्तान में चले गये सिन्ध क्षेत्र से भारत में आये सिन्धी समाज ने बड़ी संख्या में अजमेर में निवास किया। इस कारण अजमेर से सर्वाधिक सिन्धी भाषा के समाचार पत्र निकले।

इनमें दैनिक समाचार पत्र- हिन्दू (सं. किशन वरियाणी) तथा भारत भूमि (सं. टीकमदास खियलदास), साप्ताहिक समाचार पत्र- हिन्दवासी (सं. किशन मोटवाणी), हिन्दुभूमि (सं. नानकराम इसराणी), संत कंवरराम (सं. किशन वरियाणी), वीर विजय (सं. नथरमल नेशूमल), संत हाथीराम (सं. भैंरू पेंहलवाणी), पाक्षिक समाचार पत्र- सहयोग (सं. गुलाबराय रानी), मासिक समाचार पत्र- आर्यवीर (सं. दीपचंद्र तिलोकचंद्र), आत्म दर्शन (सं. दीपचंद्र तिलोकचंद्र), फुलवाड़ी (सं. दीपचंद्र तिलोकचंद्र), शेवा मार्ग (सं. दीपचंद्र तिलोकचंद्र), आदर्श (सं. एम आर बलेछा), आर्य प्रेमी (सं. मोहनलाल तेजवाणी) तथा मयार (सं. राधा कृष्ण विजलाणी) सम्मिलित हैं।

उर्दू समाचार पत्र

खैरख्वाह खालिक 1860

1860 ई. में अयोध्या प्रसाद ने अजमेर से उर्दू भाषा का साप्ताहिक समाचार पत्र खैरख्वाह खालिक प्रारंभ किया। यह आठ पृष्ठों का समाचार पत्र था। यह देश विदेश के विभिन्न समाचारों के साथ राजनैतिक लेख भी प्रकाशित करता था। इसकी गणना 19 शताब्दी मंे राजपूताने के महत्वपूर्ण समाचार पत्रों में की जा सकती है।

यह ब्रिटिश नीतियों एवं ब्रिटिश जातिभेद की जमकर आलोचना करता था। ईसाई मिशनरियों द्वारा भारतीयों को बलपूर्वक ईसाई बनाने की नीति की भी इस समाचार पत्र ने जमकर भर्त्सना की। इस कारण कुछ समय पश्चात् ही इस समाचार पत्र पर प्रतिबंध लगा दिया गया।

इमदाद साबरी ने लिखा था कि सरकार ने इस अखबार की स्वतंत्र नीति को बुरी दृष्टि से देखा। विद्रोह के बाद से समाचार पत्रों को स्वतंत्रता प्राप्त नहीं थी। इसलिये सरकार ने इसके प्रकाशन को बंद कर दिया। 19वीं शताब्दी में राजपूताना का यह प्रथम ब्रिटिश विरोधी समाचार पत्र था। इस कारण सरकार ने इसे बंद कर दिया।

दूसरे पत्रों के बंद होने का कारण आर्थिक था न कि राजनैतिक। इसके सम्पादक अयोध्या प्रसाद अजमेर कॉलेज के विद्यार्थी थे तथा उन्हें अंग्रेजी भाषा का अच्छा ज्ञान था। उनकी भाषा सरल थी जिसपर हिन्दुस्तानी एवं अंग्रेजी का असर था। उन्होंने कुछ पुस्तकें भी लिखी थीं।

राजपूताना अखबार 1869

जनवरी 1869 में बूटासिंह ने अजमेर से साप्ताहिक समाचार पत्र ‘राजपूताना अखबार’ आरंभ किया। इसके सम्पादक वजीर अली और संचालक बाबा हीरासिंह थे। यह 12 पृष्ठों में छपता था। इसका वार्षिक चंदा अमीरों से 12 रुपया तथा जन साधारण से 3 रुपये 10 आना लिया जाता था। यह मेयो प्रेस अजमेर में छपता था। इसमें राजपूताना के समाचारों के साथ-साथ विदेशी समाचार पत्रों से भी समाचार लेकर प्रकाशित किये जाते थे।

ऑफिशियल गजट 1869

जनवरी 1869 में बूटासिंह ने इस साप्ताहिक समाचार पत्र को प्रारंभ किया। इसके सम्पादक भी वजीर अली थे। यह केवल चार पृष्ठों का समाचार पत्र था। इसका वार्षिक चंदा 3 रुपये था। इस पत्र में मुख्यतः ऑफिस से सम्बन्धित सूचनाएं प्रकाशित की जाती थीं। राजपूताना अखबार की तरह यह पत्र भी साधारण था किंतु इन दानों पत्रों के प्रकाशन बंद होने के सम्बन्ध में कोई सूचना नहीं मिलती।

रिखाला अन्जुमन रिफाऐ-आम राजपूताना 1873

रिखाला अन्जुमन रिफाऐ-आम नामक सोसाइटी ने 1873 ई. में अजमेर से उर्दू भाषा में ‘रिखाला अन्जुमन रिफाऐ-आम राजपूताना’ नाम से 80 पृष्ठ का त्रैमासिक समाचार पत्र आरंभ किया। सोसाइटी के सचिव पण्डित भगतराम इसके सम्पादक थे। इसका मुद्रण और लेखन बहुत संुदर था। कोहेनूर प्रेस लाहौर में इसका मुद्रण होता था।

इसका मुख्य उद्देश्य रिखाला अन्जुमन रिफाऐ-आम राजपूताना की कार्यवाहियों पर प्रकाश डालना था। इसमें सामाजिक, धार्मिक एवं उर्दू साहित्य से सम्बन्धित आलेख प्रकाशित होते थे।

चिराग राजस्थान 1875

मौलवी मुराद अली बीमार ने 29 नवम्बर 1873 को अजमेर से उर्दू भाषा में चिराग राजस्थान आरंभ किया। इसमें 8 पृष्ठ होते थे और इसका वार्षिक चंदा 8 रुपये था। दसमें देश विदेश के समाचार दूसरे पत्रों से लेकर छापे जाते थे।

राजपूताना गजट 1881

यह साप्ताहिक समाचार पत्र था जिसे मौलवी मुराद अली ने 1881 में अजमेर से उर्दू भाषा में प्रारंभ किया। इसमंे हिन्दी और उर्दू दोनों भाषाओं में लेख तथा समाचार प्रकाशित किये जाते थे।

मिफ्ता हुल कवानीन 1883

प्रो. मुंशी नंद किशोर ने 13 जनवरी 1883 को अजमेर से उर्दू भाषा में यह 16 पृष्ठों की मासिक पत्रिका प्रारंभ की। इसके सम्पादक एवं मालिक नंद किशोर थे। इसका वार्षिक चंदा तीन रुपये आठ आना था। यह एक कानूनी पत्रिका थी। इसमें अदालती कार्य वाहियों के फैसले इत्यादि प्रकाशित होते थे।

नालाऐ उश्शाक 1884

1 नवम्बर 1884 को सैयद नजर सखा और अब्दुल गफूर सखा ने अजमेर से 24 पृष्ठ की यह उर्दू मासिक पत्रिका आरंभ की जिसमें उर्दू साहित्य से सम्बन्धित लेख छपा करते थे। इसका वार्षिक चंदा एक रुपया था। यह सेठ मजीर अली प्रेस अजमेर में छपा करती थी।

दाग 1888

जनवरी 1888 में माधो प्रसाद भार्गव ने अजमेर से उर्दू भाषा की यह मासिक पत्रिका निकाली। इसका वार्षिक चंदा एक रुपया था। यह अपनी ही प्रेस में छपती थी। इस पत्रिका में केवल शायरों के कलाम छपते थे।

मोइनुल हिन्द 1893

सिकन्दरखां ने 1893 में अजमेर से यह 8 पृष्ठों का उर्दू साप्ताहिक समाचार पत्र प्रारंभ किया। इसका वार्षिक चंदा 12 रुपये था। इसमें दूसरे समाचार पत्रों से समाचार लेकर प्रकाशित किये जाते थे। इसकी अपनी स्वयं की प्रेस थी।

-डॉ. मोहन लाल गुप्ता

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