Wednesday, February 28, 2024
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15. व्यंग्य बाण

मारवाड़ के सारे ठाकुर बखत सागर की पाल पर डेरे लगाकर बैठ गये। दीवान फतेहचंद ने उन्हें गढ़ में पधार कर दरबार के समक्ष मुजरा करने के लिये कहा। बड़े-बड़े ठाकुर, बड़े-बड़े घोड़ों पर बैठकर, अपनी बड़ी-बड़ी मूँछों पर ताव देते हुए नीम्बाज से बखत सागर तक तो आ गये थे किंतु मेहरानगढ़ में प्रवेश करने के नाम पर उनकी हिम्मत डोल गई। उनकी बड़ी-बड़ी हवेलियाँ जोधपुर में थीं किंतु वे अपनी हवेलियों में जाने की हिम्मत नहीं कर सके थे फिर भला वे गढ़ में प्रवेश करने की हिम्मत कैसे कर सकते थे! जैसे चूहे पूंछ से पूंछ जोड़कर अपने आप को सुरक्षित अनुभव करते हैं, वैसे ही ठाकुरों ने भी बखतसागर की पाल पर अपने पूंछें एक दूसरे से बांध ली थीं। पोकरण के ठाकुर देवीसिंह चाम्पावत का कद उनमें सबसे बड़ा था। उसका डील भी दूसरे सरदारों के डील से डेढ़ गुना था। उसने दीवान से कहा-‘धायभाई जगन्नाथ स्वयं आकर हमें वचन दे कि हमारे साथ गढ़ में दगा नहीं होगी, तब हम गढ़ में प्रवेश करें।’

दीवान के बुलावे पर धायभाई बड़ी शान और ठसक के साथ हाथी पर बैठकर ठाकुरों से मिलने आया। उसके वैभव और ठाठ-बाट को देखकर ठाकुरों की छाती पर साँप लोट गये। जब जगन्नाथ ने हाथी से उतर कर ठाकुर देवीसिंह के डेरे में कदम रखा तो ठाकुरों के व्यंग्य बाणों ने उसका स्वागत किया।

-‘आइये दरबार!’ रास ठाकुर जवानसिंह ने कृत्रिम विनय दिखाते हुए कहा।

-‘नवकोटि मारवाड़ के धणी का राठौड़ सामंतों के डेरे में स्वागत है।’ देवीसिंह ने भी व्यंग्य कसते हुए कहा।

ठाकुरों का ऐसा व्यवहार देखकर धायभाई चिढ़ गया। उसने ठाकुरों के व्यंग्य बाणों का उत्तर नहीं दिया। केवल इतना ही बोला-‘मैं आप सब सरदारों को गढ़ पर ले जाने के लिये आया हूँ।’

-‘आप हमें गढ़ में तो ले जायेंगे किंतु वहाँ हमारे साथ दगा नहीं होगी, इसका वचन कौन देगा।’

-‘मारवाड़ आप लोगों की है। गढ़ आप लोगों का है, आपके साथ कौन दगा कर सकता है?’ जगन्नाथ ने लापरवाही से कहा।

-‘यह तो आप भी अच्छी तरह से जानते हैं कि दगा कौन कर सकता है।’ पाली का रूपावत सरदार बोला।

-‘कौन मैं करूंगा दगा?’

-‘आप भी कर सकते हैं।’

-‘तो मैं हाथ में पानी उठाने को तैयार हूँ। मैं आपके साथ दगा नहीं करूंगा।’

-‘आपके अतिरिक्त और कोई भी कर सकता है।’

-‘कौन श्री जी?’

जगन्नाथ के उलट कर प्रश्न करने से ठाकुर सहम कर चुप हो गये। उन्हें कोई जवाब नहीं सूझा।

-‘हम यह सब नहीं जानते, हम तो यह चाहते हैं कि आप हमें वचन दें कि हमारे साथ गढ़ में दगा नहीं होगी।’ देवीसिंह ने बिगड़कर कहा।

-‘यह वचन मैं कैसे दे सकता हूँ। आप लोगों में से ही कोई दगा कर दे तो! मुझे क्या मालूम कि आपके शत्रु कहाँ-कहाँ घात लगाये बैठे हैं। मैं तो केवल इतना ही कह सकता हूँ कि न तो मैं और न श्री जी आपके साथ दगा करेंगे।’

जगन्नाथ के इस जवाब से ठाकुरों को सांप सूंघ गया। यह कैसा वचन है! इस वचन की आड़ में कौनसा खेल खेला जायेगा! उन्होंने आपस में विचार विमर्श किया। काफी देर की माथापच्ची के बाद वे इसी मत पर सहमत हुए कि जब तक जगन्नाथ हाथ में पानी लेकर यह वचन नहीं दे कि ठाकुरों के साथ गढ़ में किसी की भी तरफ से कोई दगा नहीं होगी, तब तक गढ़ में नहीं चलना चाहिये।

जगन्नाथ ने ठाकुरों को यह वचन देने से मना कर दिया। वास्तविकता यह थी कि वह ठाकुरों के व्यंग्य बाणों से इतना आहत हो चुका था कि वह नहीं चाहता था कि ठाकुरों और दरबार के बीच कोई समझौता हो। इसलिये वह उनकी उपेक्षा करके गढ़ को लौट आया। धायभाई का वचन न मिलने पर सरदार उखड़ गये। उन्होंने बखत सागर से अपने डेरे हटा लिये और उसी समय बनाड़ के लिये रवाना हो गये। जिस तरह से जगन्नाथ ठाकुरों के बीच से उठकर गया था, उससे तो ऐसा लगता था कि वह शीघ्र ही सेना लेकर लौटेगा।

जगन्नाथ ने बखतसागर की पाल पर हुए संवाद का विवरण ज्यों का त्यों मरुधरानाथ को कह सुनाया। मरुधरानाथ को लगा कि जगन्नाथ ने यह ठीक नहीं किया। उसे यह वचन दे देना चाहिये था कि गढ़ में उनके साथ दगा नहीं होगी। यहाँ गढ़ में ठाकुरों के साथ दगा कर ही कौन सकता है! मरुधरानाथ ने ठाकुरों को मनाने का एक और प्रयास किया तथा दीवान फतेहचंद सिंघवी और कुछ और आदमियों को ठाकुरों के पीछे भेजा ताकि वे उन्हें मना कर लाने का प्रयास करें।

दीवान फतेहचंद ने ठाकुरों के पास जाकर महाराजा का संदेश कह सुनाया- ‘आप लोगों को जो वचन चाहिये, हम देने के लिये तैयार हैं। किसी सरदार के साथ गढ़ में कोई दगा नहीं होगी। मारवाड़ राठौड़ों की है, किसी एक राठौड़ की नहीं, सारे राठौड़ों की। पहले ही मराठे इसे बुरी तरह उजाड़ गये हैं अब अपने हाथों से इसे क्यों उजाड़ते हो? धरती ही उजड़ गई तो फिर कहाँ रहोगे?’

दीवान की बात सुनकर केसरीसिंह तुनक गया। उसने कहा-‘आप हमारी चिंता क्यों करते हैं, दरबार को तो केवल उस मोडे आत्माराम की और धायभाई जगन्नाथ की आवश्यकता है। वे दोनों तो दरबार के पास ही हैं, हम कहीं भी जायें, आपको या दरबार को क्या अंतर पड़ता है।’

-‘साधु आत्माराम और धायभाई जगन्नाथ अपनी जगह हैं, वे आपका स्थान नहीं ले सकते।’ दीवान ने अत्यंत विनम्रता से केसरीसिंह की बात का जवाब दिया।

-‘अरे छोड़िये आप स्थान की बात। हम जिसे चाहेंगे राजा बनायेंगे। मारवाड़ का राज्य तो मेरी तलवार के पड़तले में रहता है।’ देवीसिंह ने उत्तेजित होकर कहा।

ठाकुर देवीसिंह का उत्तर सुनकर दीवान फतहचंद सन्न रह गया। यह एक ऐसी अशोभनीय बात थी जिसका जवाब उसी तरह की अशोभनीय शैली में दिया जाना चाहिये था किंतु दीवान के लिये अशोभनीय भाषा का प्रयोग करना उचित नहीं था। वह राजनीति का चतुर खिलाड़ी था, इसलिये उसने केवल इतना ही कहा-‘जैसी आप लोगों की इच्छा!’ जैसे जगन्नाथ ठाकुरों के बीच से उठकर गया था, दीवान फतहचंद भी ठीक वैसे ही उठकर चला गया और जोधपुर लौट आया। ठाकुर फिर से बात बिगड़ी हुई देखकर पछताये तो बहुत किंतु अब उनके पास अपनी बात पर टिके रहने के अतिरिक्त उपाय ही क्या था! इसलिये ठाकुर आर-पार की लड़ाई के लिये कमर कसने लगे।

मरुधरानाथ जानता था कि उसके शासन का आधार राठौड़ों की युगों पुरानी कुलीय व्यवस्था है। राज चलाने के लिये या तो राठौड़ सामंत उसके साथ रहें या फिर कुलीय व्यवस्था को समाप्त करके जगन्नाथ द्वारा गठित भडै़त सेना पर राज्य को टिकाये रखा जाये। जागीरी व्यवस्था के रहते कुलीय व्यवस्था को समाप्त करना संभव नहीं है और कुलीय व्यवस्था के रहते सामंतों का दमन करना संभव नहीं है। प्रत्येक सामंत अपने कुलीय आधार पर सदैव ही पाँच-दस हजार सैनिक एकत्रित करने की क्षमता रखता है। इस कारण सामंतों को नाराज करके निष्कंटक होकर राज्य भी नहीं किया जा सकता। इसलिये महाराजा ने निश्चय किया कि हर स्थिति में उसे अपने ठाकुरों को मना कर लाना ही होगा।

जब दीवान फतहचंद खाली हाथ लौट आया तो मरुधरानाथ स्वयं घोड़े पर चढ़कर ठाकुरों को मनाने के लिये गया। उसका मुख्तियार गोवर्धन खीची उसके पीछे-पीछे चला। वह विजयसिंह के पिता के समय से राज्य का मुख्तियार था। ठाकुरों के बीच उसकी जबर्दस्त प्रतिष्ठा थी। ऐसे समय में उसने मरुधरानाथ को अकेले जाने देना ठीक नहीं समझा। जाने कब क्या हो? दुष्ट देवीसिंह तो पहले भी मरुधरानाथ को बंदी बनाने का षड़यंत्र रच चुका था।

जब ठाकुरों को पता लगा कि राजा स्वयं घोड़ा लेकर आ रहा है तो वे और कठोर हो गये। उन्होंने राजा की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। तब गोवर्धन खीची महाराजा को आउवा ठाकुर जैतसिंह चाम्पावत के डेरे पर ले गया। जैतसिंह को ऐसी आशा न थी किंतु डेरे पर आये महाराज का स्वागत न करने से तो बात सदैव के लिये बिगड़ सकती थी। इसलिये उसने महाराज का स्वागत किया और दूसरे सरदारों को भी अपने डेरे पर बुलवाया। जैतसिंह के बुलावे पर सारे सरदार उसके डेरे पर आकर जमा हो गये।

राजा ने उन्हें एक साथ आया देखकर प्रश्न किया-‘आप लोग हमको छोड़कर क्यों आ गये हैं?’

-‘राजन्! हम और आप राठौड़ों की विभिन्न खांपों में भले ही उत्पन्न हों किंतु हम लोगों का मूल वंश एक ही है, इस कारण आप हमारे भाई हैं और समूचा मारवाड़ राठौड़ों का पुश्तैनी राज्य है।’ देवीसिंह चाम्पावत ने जवाब दिया।

-‘इस बात से कौन मना करता है?’ मरुधरपति ने हँसकर कहा।

-‘यदि आप इस बात से मना नहीं करते तो आपने राठौड़ सरदारों को दण्डित करने, उनकी गढ़ियाँ धूल में मिलाने और उनके बच्चों को मार डालने के लिये जग्गू से कहकर पुरबिया राजपूतों, ईरानियों, मुलतानियों, मकरानियों, अफगानियों, सिन्धियों, अरबियों और रूहेलों की सेनाएं क्यों इकट्ठी की हैं?’ जैतसिंह चाम्पावत ने प्रश्न किया।

-‘जब आप लोग राज की अवहेलना करेंगे और अकारण ही विरोधी हो जायेंगे तो राजकाज चलाने के लिये कोई न कोई सेना तो रखनी ही पड़ेगी!’

-‘हमने प्रसन्नता से राज की अवहेलना नहीं की, आपने ही ठाकुरो के स्थान पर मोडे आत्माराम और धाय भाई जग्गू की सलाह पर चलने का निश्चय कर रखा है।’ केसरीसिंह उदावतने उत्तेजित होकर कहा।

-‘मनुष्य को जो भी व्यक्ति हितकारी लगता है, वह उसी की सलाह मानता और अमल में लाता है।’ राजा ने स्पष्ट शब्दों में कहा।

-‘यही तो, यही तो हम भी कह रहे हैं कि आपको पूरी मारवाड़ में केवल दो ही व्यक्ति हितकारी लगते हैं, फिर हम सबकी क्या आवश्यकता है?’ देवीसिंह चाम्पावत ने बिगड़कर कहा।

-‘अब मेरा मुँह मत खुलवाओ ठाकुर! आसोप में आप क्या करने वाले थे, किसी से छिपा हुआ है क्या?’ राजा के इस सीधे उत्तर से देवीसिंह के पसीने छूट गये। उसे आशा नहीं थी कि राजा सबके सामने इस तरह खुलकर उस पर आरोप लगायेगा।

-‘क्या करने वाला था मैं आसोप में, जरा सुनूं तो।’ देवीसिंह ने पगड़ी से नीचे निकल आये पसीने को पौंछते हुए प्रतिवाद किया।

-‘ठाकुर! कुछ बातें न कही-सुनी जायें तो अच्छा होगा। कड़वाहट मिटने की बजाय और बढ़ जायेगी।’

-‘तो फिर राज क्या चाहते हैं?’

-‘हम केवल इतना चाहते हैं कि आपके और हमारे बाप-दादों ने जिस मारवाड़ को अपने रक्त से सींचकर खड़ा किया है, उसे आप अपने हाथों से न उजाड़ें। दरबार में लौट चलें।’

-‘पहले भडै़त सेना हटानी होगी।’

-‘यदि बात केवल भडै़त सेना को हटाने की है तो हम यह सेना हटा देंगे।’ महाराजा ने ठाकुरों को आश्वस्त करते हुए कहा।

-‘आप अपनी मर्जी से या जग्गू जैसे लोगों के बहकाने पर राठौड़ सरदारों की जागीरें तागीर कर रहे हैं। हम चाहते हैं कि अब जागीर बहाली या तागीरी का हुक्म आप नहीं देवें।’

-‘तो कौन दे?’

-‘हम लोग देंगे।’

-‘ये कैसी बात हुई? राजा हम हैं कि आप?’

-‘राजा तो आप ही हैं किंतु अब यह अधिकार आपके पास नहीं रहेगा।’

-‘यह अधिकार तो हमारे पास ही रहेगा, इतना अवश्य कर सकते हैं कि किसी भी सरदार की जागीर जब्त या बहाल करने से पहले दो चार सरदारों की राय अवश्य ली जाये।’ महाराजा ने जवाब दिया।

-‘वो दो-चार सरदार कौन होंगे।’

-‘आपमें से ही कोई दो-चार, जिनसे भी हम राय करना चाहेंगे।’

महाराजा के इस उत्तर से सरदार चुप होकर एक दूसरे का मुँह देखने लगे।

-‘अब तो आपको हमारे प्रति कोई रोष नहीं है?’ मरुधरानाथ वातावरण में घुल आये तनाव को कम करने के लिये हँसकरा पूछा।

-‘अब से कचहरी गढ़ में नहीं लगेगी। गढ़ से बाहर नगर में लगेगी और उसी में राज्य की बंदोबस्ती का सारा काम काज होगा।’

-‘यह भी हो जायेगा, इसमें क्या कठिनाई है। क्या और भी कोई बात शेष है?’

-‘नहीं, यदि हमारी ये तीन बातें मान ली जायें तो हम दरबार में हाजिर होकर मुजरा करने को तैयार हैं।’

-‘मैंने पहली और तीसरी बात मान ली हैं। रही दूसरी बात तो आप सब एक बार फिर सुन लें, जागीर जब्त करने या बहाल करने का अधिकार हर हाल में हमारे ही पास रहेगा। सरदारों से राय की जायेगी। जरूरी नहीं है कि वह राय मानी जाये’ मरुधरपति ने दृढ़ता से उत्तर दिया।

राजा के इस आश्वासन पर सरदारों और राजा के मध्य सहमति बन गई। इसके बाद देवीसिंह के डेरे पर दरबार का आयोजन हुआ। सारे सरदार परम्परागत रीति के अनुसार महाराजा को ठाकुर देवीसिंह चम्पावत के डेरे में लेकर गये। मरुधरपति ऊँची मसंद पर पूरी ठसक के साथ तलवार की मूठ पर हाथ रखकर बैठा। उसके दोनों ओर ठाकुर अपनी अपनी-अपनी हैसियत के अनुसार हाथ बांधकर खड़े हो गये। महाराजा ने सारे सरदारों को अभयदान दिया और अपने पास बैठने का आग्रह किया। बरसों के बिछड़े सरदार अपने राजा को अपने पास पाकर निहाल हो गये। इस समय उनके और महाराजा के बीच में कोई नहीं था, न दीवान, न साधु आत्माराम, न धायभाई और न कोई और। वे अपने मन की बात महाराज से सीधे कह सकते थे।

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