Saturday, June 15, 2024
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30. अजमेर के राजपूतों से गजनी ने भयानक प्रतिशोध लिया!

जब शहाबुद्दीन गौरी, स्वर्गीय राजा पृथ्वीराज चौहान के पुत्र गोविंदराज को अजमेर की गद्दी पर बैठाकर पुनः दिल्ली लौटा तो एक बड़े चौहान मुखिया ने हांसी के निकट मुहम्मद गौरी का मार्ग रोका। ताजुल मासिर के लेखक हसन निजामी ने इस चौहान मुखिया का नाम नहीं लिखा है और न ही उसके सम्बन्ध में कुछ अन्य विवरण दिया है। हसन निजामी के अनुसार कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा इस चौहान मुखिया का वध किया गया। कुछ भाट-ग्रंथों में इस चौहान मुखिया को पृथ्वीराज का बड़ा पुत्र रेणसी बताया है जो इस युद्ध में मारा गया।

हम जानते हैं कि पृथ्वीराज के किसी भी पुत्र का नाम रेणसी नहीं था। अतः हांसी के निकट मुहम्मद गौरी का मार्ग रोकने वाला चौहान योद्धा पृथ्वीराज का पुत्र न होकर कोई और रहा होगा। संभवतः इस योद्धा का नाम रेणसी था जिसे भाटों ने पृथ्वीराज के पुत्र के रूप में प्रचारित कर दिया।

हसन निजामी तथा फरिश्ता ने लिखा है कि जब शहाबुद्दीन गौरी कुतबुद्दीन ऐबक को भारत में विजित क्षेत्रों का गवर्नर नियुक्त करके गजनी चला गया तब पृथ्वीराज चौहान के छोटे भाई हिराज ने गोविन्दराज को अजमेर से मार भगाया तथा स्वयं अजमेर का राजा बन गया क्योंकि गोविंदराज ने मुसलमानों की अधीनता स्वीकार कर ली थी। वस्तुतः पृथ्वीराज के भाई का नाम हिराज नहीं था, हरिराज था।

इस घटनाक्रम के समय कुतुबद्दीन ऐबक, बनारस, कन्नौज तथा कोयल में उलझा हुआ था। इस कारण कुतुबुद्दीन ऐबक गोविंदराज को कोई सहायता उपलब्ध नहीं करा सका। इसलिए गोविंदराज अजमेर का दुर्ग खाली करके रणथंभौर चला गया।

जब गोविंदराज अजमेर से रणथंभौर चला गया तो उसके चाचा हरिराज ने रणथंभौर को घेर लिया। इस पर गोविंदराज ने कुतुबुद्दीन ऐबक से पुनः सहायता मांगी। जब कुतुबुद्दीन की सेना गोविंदराज की सहायता के लिये आई तो हरिराज रणथम्भौर का घेरा उठाकर अजमेर चला आया।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

ई.1194 में हरिराज ने अपने सेनापति चतरराज को दिल्ली पर आक्रमण करने के लिये भेजा। कुतुबुद्दीन ऐबक ने चतरराज को परास्त कर दिया। चतरराज फिर से अजमेर लौट आया। कुतुबुद्दीन ऐबक ने चतरराज का पीछा किया तथा वह भी सेना लेकर अजमेर आ गया और उसने तारागढ़ घेर लिया। हरिराज ने आगे बढ़कर कुतुबुद्दीन पर आक्रमण किया किंतु परास्त हो गया।

हम्मीर महाकाव्य के अनुसार अपनी पराजय निश्चित जानकर हरिराज और उसका सेनापति जैत्रसिंह, अपने स्त्री समूह सहित, जीवित ही अग्नि में प्रवेश कर गये। इस प्रकार ई.1195 में अजमेर पर फिर से मुसलमानों का अधिकार हो गया। कुतुुबद्दीन ऐबक ने हरिराज की मृत्यु के बाद अजमेर, गोविंदराज को न सौंपकर एक मुस्लिम गवर्नर के अधीन कर दिया। चौहान साम्राज्य के पतन के बाद भी चौहान शासकों द्वारा स्थापित टकसाल, अजमेर में काम करती रही जहाँ से दिल्ली के सुल्तानों के नाम के सिक्के ढाले जाते रहे।

ई.1196 में कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली का सुल्तान बना। कुतुबुद्दीन ऐबक ने सयैद हुसैन खनग सवार मीरन साहिब को अजमेर का दरोगा नियुक्त किया। इस प्रकार बारहवीं शताब्दी के अंत में अजमेर के चौहान नेपथ्य में चले गये। शाकंभरी राज्य लुप्त हो गया तथा स्वर्ग लोक से प्रतिस्पर्धा करने वाली उनकी राजधानी अजमेर का गर्व भंग हो गया।

12 अप्रेल 1202 की रात में, तारागढ़ के आसपास रहने वाले राठौड़ों एवं चौहानों के एक समूह ने अजमेर दुर्ग पर आक्रमण किया। उनकी योजना थी कि दुर्ग में स्थित मुस्लिम दरोगा सैयद हुसैन मीरन को मारकर फिर से राजपूतों का शासन स्थापित किया जाये। दोनों पक्षों के बीच रात के अंधेरे में भयानक युद्ध हुआ। इस युद्ध में दुर्ग के भीतर स्थित समस्त मुस्लिम सैनिकों को मार डाला गया। राजपूतों ने दरोगा सैयद हुसैन खनग सवार मीरन को भी मार डाला। इस प्रकार अजमेर दुर्ग एक बार फिर से हिन्दुओं के अधिकार में आ गया।

दुर्ग से भागे हुए मुस्लिम सिपाही जब यह समाचार लेकर दिल्ली पहुँचे तो कुतबुद्दीन ऐबक के होश उड़ गये। उसके पास इतनी शक्ति नहीं थी कि वह दुर्ग पर आक्रमण करके उसे फिर से अपने अधिकार में ले ले। उसने इस आक्रमण का प्रतिशोध लेने के लिये गजनी से सेना मंगवाई। गजनी से आई विशाल सेना ने राजपूतों से बीठली का दुर्ग फिर से छीन लिया तथा अजमेर में कत्ले आम किया। गजनी की सेना का यह प्रतिशोध बहुत भयानक था।

गजनी से आई सेना ने तारागढ़ में स्थित समस्त राजपूत सैनिकों को मारने के बाद दुर्ग के निकट रहने वाले राजपूत परिवारों को पकड़कर उनकी सुन्नत की और उन्हें मुसलमान बनाया। इस्लाम में परिवर्तित होने के बाद ये राजपूत परिवार तारागढ़ के निकट ही रहने लगे। बाद में इन्हें देशवाली मुसलमान कहा जाने लगा। गजनी एवं गोर से आए मुसलमानों द्वारा इन्हें बहुत नीची दृष्टि से देखा जाता था। गजनी के मुसलमानों द्वारा देशवाली मुसलमानों को बराबर का स्तर नहीं दिया गया। उन्हें सेना में भी भर्ती नहीं किया जाता था। इसलिये देशवाली मुसलमान उपेक्षित जीवन जीने लगे और उनकी आर्थिक दशा दिन पर दिन गिरने लगी। इस प्रकार अजमेर में निर्धनता का बीजारोपण किया गया।

अगली कड़ी में देखिए- कुछ ही वर्षों में विशाल चौहान साम्राज्य तुर्कों के अधीन हो गया!

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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