Sunday, April 14, 2024
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राजस्थान की खेल शब्दावली

राजस्थान की लोकसंस्कृति में राजस्थानी भाषा के कुछ रोचक एवं विशिष्ट शब्दों का प्रयोग किया जाता है। राजस्थान की खेल शब्दावली आलेख में हम राजस्थान के ग्रामीण अंचल के खेलों के नामों की संक्षिप्त जानकारी दी रहे हैं।

अमर गाळियो और हींगदड़ो: इस खेल में खिलाड़ी कपड़े की गेंद से एक दूसरे को मारते हैं।

आँधल घोटा: इस खेल में एक बच्चे को चोर बनाकर उसकी आंखों पर कपड़ा बांधते हैं और दिशाभ्रम में डालकर उसे एक घर के समक्ष खड़ा करके पूछते हैं कि यह घर किसका है। यदि चोर घर के खिड़की दरवाजे छूकर सही पहचान बताता है तो फिर किसी अन्य को चोर बनाया जाता है।

आडुलो-पाडुलो: इसमें दो दल होते हैं। एक दल छिपता है तथा दूसरा दल खोजता है। छिपने वाला दल आडुलो-पाडुलो चम्पाभरणी कहकर चिल्लाता रहता है।

उतर भीखा म्हारी बारी: इस खेल में दो दल होते हैं। एक दल के खिलाड़ी किसी पेड़ का सहारा लेकर घोड़ी बनते हैं तथा दूसरे दल के खिलाड़ी उन पर चढ़ने का प्रयास करते हैं।

काना माछी: इस खेल में एक लड़की को मोर बनाते हैं जिसकी आंखों पर कपड़ा बंध रहता है। अन्य लड़कियां मोर के सिर पर हलकी चपत लगाकर कहती हैं- काना माछी भों भों, जाके पावी ताके छो।

खीला-गधी: इस खेल में जमीन पर कील रोपते चले जाते हैं। जहां कील नहीं गढ़ती है वहां से हारने वाला खिलाड़ी अपने साथी को पीठ पर चढ़ाकर ले जाता है।

खोड़िया: एक बच्चा एक पैर पर कपड़ा बांधकर लंगड़ी टांग बनाता है और एक घेर के भीतर खड़े बच्चों को पकड़ने का प्रयास करता है। वह जिसे छू लेता है उसीको अगली बार टांग पर कपड़ा बांधना पड़ता है।

खोड़ियो खाती: यह बालिकाओं को खेल है। एक गोल घेरे में खड़ी लड़कियां बकरी बनती हैं तथा घेरे के बाहर बैठी लड़की दादी बनती है। एक लड़की खोड़िया खाती बनती है।

चंगा पौ: इसे दो या चार खिलाड़ी कौड़ियों और गोटियों की सहायता से खेलते हैं।

चर-भर: इसे दो खिलाड़ी आयताकार आकृति में बने खानों में गोटियों की सहायता से खेलते हैं।

चिरमी ठोला: इसमें कम से कम 4 और अधिकतम 15 खिलाड़ी भाग लेते हैं। एक खिलाड़ी को डाई बनाते हैं। शेष लड़के उसके चारों ओर बैठते हैं। एक लड़का डाई के पीछे बैठकर उसकी आंखें बंद कर देता है। शेष लड़के बारी-बारी से उसे ठोले माते हैं। डार्ड को उसे पहचानना होता है।

स्पष्ट है कि राजस्थान की खेल शब्दावली बड़ी ही रोचक है। यह न केवल खेलों के नामों को बताती है अपितु उस खेल के ढंग को भी प्रदर्शित करती है।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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