Thursday, February 29, 2024
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17. यदि चौहान राज्य के नागरिकों को तंग किया तो तुझे गधे के पेट में सिलवा दूंगा!

पिछली कड़ियों में की गई पृथ्वीराज चौहान की रानियों की चर्चा के बाद हम पृथ्वीराज चौहान के युद्धों एवं विजयों की ओर चलते हैं। हम चर्चा कर चुके हैं कि ई.1182 में भण्डानकों का दमन करने के पश्चात् राजा पृथ्वीराज चौहान की शक्ति में अद्भुत वृद्धि हो गई। इस समय पृथ्वीराज की आयु मात्र 16 वर्ष थी। उसने अपनी बढ़ी हुई शक्ति का उपयोग अपने साम्राज्य की सीमाओं में वृद्धि करने के लिए किया।

चौहानों की सेना में बड़ी संख्या में अश्व सैनिक, हस्ति सैनिक और पदाति सैनिक भर्ती किए जाते थे। पृथ्वीराज के राजा बनने के समय उसकी सेना में 70 हजार अश्वारोही सैनिक थे। समय के साथ यह संख्या बढ़ती चली गई थी।

पृथ्वीराज चौहान के काल में मण्डोर के पड़िहार शासक, अजमेर के चौहानों के अधीन हो गए। दर्शकों को स्मरण होगा कि चौहानों के उद्भव काल में सपादलक्ष के चौहान शासक, गुर्जर-प्रतिहारों के अधीन हुआ करते थे। कुछ लेखकों के अनुसार मण्डोर के पड़िहार शासक ने पृथ्वीराज चौहान के हाथों पराजित होने के बाद अपनी पुत्री जतन कंवर का विवाह पृथ्वीराज चौहान के साथ किया। कुछ संदर्भ इस राजा का नाम चंद्रसेन पड़िहार बताते हैं।

तबकाते नासिरी नामक ग्रंथ में लिखा है कि जम्मू के शासक विजयराज और पृथ्वीराज चौहान के सम्बन्ध अच्छे नहीं थे। इसलिए पृथ्वीराज की सेना ने जम्मू पर आक्रमण करके जम्मू राज्य को लूटा। इससे अनुमान होता है कि पृथ्वीराज के काल में चौहान राज्य की सीमाएं दिल्ली से काफी ऊपर जम्मू तक जा पहुंची थीं।

हम्मीर महाकाव्य में जम्मू को ‘घटैक देश’ कहा गया है। पुरातन प्रबंध संग्रह में लिखा है कि प्रधानमंत्री कैमास ने राजा पृथ्वीराज को समझाया था कि वह जम्मू के राजा का विरोध न करे किंतु पृथ्वीराज चौहान ने प्रधानमंत्री कैमास की बात नहीं मानी। कुछ ग्रंथों में जम्मू के राजा का नाम चक्रदेव दिया गया है।

इस रोचक इतिहास का वीडियो देखें-

पृथ्वीराज रासो में कहा गया है कि कांगड़ा का राजा हाहुलीराय तराईन के दूसरे युद्ध में मुहम्मद गौरी की तरफ से लड़ा। कुछ ग्रंथों में बताया गया है कि तराईन के दूसरे युद्ध में जम्मू के राजा को पृथ्वीराज के सामंत चामुण्डराय दाहिमा ने मार डाला था। कुछ ग्रंथों में हाहुलीराय को जम्मू का राजा लिखा गया है।

इन तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि जम्मू अथवा कांगड़ा का राजा पृथ्वीराज चौहान से शत्रुता रखता था और वह पृथ्वीराज के किसी सेनापति द्वारा युद्ध क्षेत्र में मारा गया।

निरंतर किए गए युद्धों एवं प्राप्त विजयों के कारण पृथ्वीराज चौहान के राज्य की सीमायें उत्तर-पश्चिम में मुस्लिम सत्ता से, दक्षिण-पश्चिम में चौलुक्यों से तथा पूर्व में चंदेलों के राज्य से जा मिलीं। चंदेलों के राज्य को बुन्देलखण्ड राज्य, जेजाकभुक्ति तथा महोबा राज्य भी कहा जाता है।

पृथ्वीराज चौहान के काल में चौहान-चालुक्य संघर्ष फिर से उठ खड़ा हुआ। पृथ्वीराज रासो में इस संघर्ष के पीछे जो कारण बताए गए हैं, उनकी ऐतिहासिकता गलत सिद्ध हो चुकी है। इस संघर्ष के कारण जो भी रहे हों किंतु वास्तविकता यह थी कि चौहानों तथा चौलुक्यों के बीच शत्रुता विगत कई शताब्दियों से चली आ रही थी तथा पृथ्वीराज चौहान की राज्य विस्तार की नीति के कारण दोनों राज्यों की सीमायें आबू के आसपास एक दूसरे को छूने लगी थीं।

इधर चौहान शासक पृथ्वीराज (तृतीय) और उधर चौलुक्य शासक भीमदेव (द्वितीय) दोनों ही महत्त्वाकांक्षी राजा थे। इसलिये दोनों में युद्ध अवश्यम्भावी था। खतरगच्छ पट्टावली में ई.1187 में पृथ्वीराज द्वारा गुजरात अभियान करने का वर्णन मिलता है। वीरावल अभिलेख से इस अभियान की पुष्टि होती है। कुछ साक्ष्य इस युद्ध की तिथि ई.1184 बताते हैं। इस युद्ध में चौलुक्यों की पराजय हो गई।

बड़ी कठिनाई से चौलुक्यों के महामंत्री जगदेव प्रतिहार के प्रयासों से चौहानों एवं चौलुक्यों में संधि हुई। संधि की शर्तों के अनुसार चौलुक्यों ने पृथ्वीराज चौहान को युद्ध की क्षतिपूर्ति के रूप में काफी धन दिया।

खतरगच्छ पट्टावली के अनुसार इस युद्ध के बाद एक बार अजमेर राज्य के कुछ धनी व्यक्ति गुजरात गए। इस पर गुजरात के दण्डनायक ने उन व्यापारियों से भारी राशि वसूलने का प्रयास किया। जब चौलुक्यों के महामंत्री जगदेव प्रतिहार को यह बात ज्ञात हुई तो उसने दण्डनायक को लताड़ा क्योंकि जगदेव के प्रयासों से ही चौलुक्यों एवं चौहानों के बीच संधि हुई थी और वह नहीं चाहता था कि यह संधि टूटे।

इसलिये जगदेव ने दण्डनायक को धमकाया कि यदि तूने चौहान साम्राज्य के नागरिकों को तंग किया तो मैं तुझे गधे के पेट में सिलवा दूंगा। इस प्रकरण से यह सिद्ध होता है कि इस काल में चौलुक्यों के लिए चौहानों के साथ शांति बनाए रखना अत्यंत आवश्यक हो गया था।

वीरावल से मिले वि.सं.1244 के जगदेव प्रतिहार के लेख में इससे पूर्व भी अनेक बार पृथ्वीराज से परास्त होना सिद्ध होता है। इस अभियान में ई.1187 में पृथ्वीराज चौहान ने आबू के परमार शासक धारावर्ष को भी हराया।

अगली कड़ी में देखिए- राजा पृथ्वीराज चौहान की छाती पर गिद्ध बैठकर मांस नौचने लगे।

-डॉ. मोहनलाल गुप्ता

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