Monday, March 4, 2024
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53. मराठों से अदाबदी

कच्छवाहे पिछले चालीस सालों से मराठों को खण्डनी चुकाते आ रहे थे किंतु जब उन्होंने देखा कि मरुधरानाथ महाराजा विजयसिंह भी कई सालों से खण्डनी नहीं चुका रहा है तो उसके देखादेखी कच्छवाहों ने भी कुछ बरसों से मराठों को खण्डनी भेजना बंद कर दिया। यहाँ तक कि कच्छवाहों के वकील ने महादजी को स्पष्ट कहलवा दिया कि यदि महाराजा विजयसिंह से मामलत की राशि ले लोगे तो हम भी दे देंगे। वकील का स्पष्ट जवाब सुनकर महादजी ने कच्छवाहों के राजा को धमकाया कि यदि भला चाहते हो तो मामलत की राशि के तेबीस लाख रुपये तुरंत भिजवाओ। इस पर जयपुर नरेश ने महादजी सिन्धिया के पास दूसरा वकील भेजकर अपनी ओर निकलने वाली मराठों की तेबीस लाख की मामलत की राशि का चुकारा करने का प्रस्ताव किया। जब कच्छवाहों को इस प्रकार ढीला पड़ते देखा तो महादजी का सरदार अम्बाजी इंगले अड़ गया कि राठौड़ों की ओर से किये जाने वाले चुकारे का भुगतान पहले किया जाये क्योंकि सारी अव्यवस्था राठौड़ों के कारण हुई है।

इतना ही नहीं, इंगले आदि सरदार तो मिर्जा इस्माईल बेग पर भी आक्रमण करना चाहते थे। उनका मानना था कि बेग के बल पर ही मरुधरानाथ कूद रहा था और मराठों को भाव नहीं दे रहा था किंतु महादजी सिन्धिया ने इंगले तथा अन्य सरदारों से कहा कि पहले जोधपुर पर आक्रमण किया जाये, वास्तविक अपराधी तो वही है।

महदाजी के इस निर्णय पर अम्बाजी इंगले ने राणाखाँ को अपने साथ लेकर महादजी सिन्धिया को समझाया कि दुराग्रह ठीक नहीं है। यश या अपयश ईश्वर के अधीन है। शूल को उखाड़कर कन्धे पर लेना और जहाँ आसानी से विजय हो सकती है, उसे छोड़कर निरुद्देश्य प्रयत्न करना, थोड़े से लाभ के लिये अधिक नुक्सान सहन करना और सारे उत्तर भारत में शत्रुता मोल लेना उचित नहीं है।

महादजी सिन्धिया ने मराठा सरदारों के इस सुझाव को मान लिया। इस पर राणाखाँ, सूबेदार तुकोजी राव होलकर, शिवाजी विट्ठल तथा अम्बाजी इंगले ने विचार किया कि विजयसिंह अजमेर का पैसा दे दे तथा जोधपुर एवं जयपुर के राजा में से कोई भी मिर्जा इस्माईल बेग का पक्ष न लें। मिर्जा को जो पहले पाँच परगने दिये गये थे, वह उसमें संतोष कर दिल्ली-आगरा के इलाके के लिये दावा छोड़ दे। ये बातें तय करके नवलराय सरावगी के साथ अम्बाजी इंगले के हस्ताक्षरों से युक्त पत्र महाराजा विजयसिंह को भिजवाया गया। महाराजा इस पत्र को देखकर एकदम चुप हो गया।

मरुधरानाथ को चुप देखकर जयपुर नरेश भी फिर से चुप लगा गया और उसने महादजी को मामलत का चुकारा नहीं किया। इस पर महादजी ने पहले जयपुर से ही निबटने का मन बनाया।

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