# राजस्थान हिस्ट्री > राजस्थान के इतिहास पर शोधपरक आलेख ## Posts - [संक्षिप्त जीवन वृत्तांत (9)](https://rajasthanhistory.com/brief-biography-of-bheron-singh-shekhawat/): इस पृष्ठ पर भैंरोसिंह शेखावत का संक्षिप्त जीवन वृत्तांत दिया गया है जिससे उनके जीवनवृत्त को त्वरित गति से समझा जा सकता है। नाम श्री भैरोंसिंह शेखावत जन्म 23 अक्टूबर 1923 पिता का नाम श्री देवीसिंह शेखावत माता का नाम श्रीमती बन्नेकंवर गांव खाचरियावास (सीकर जिला) ननिहाल सहनाली बड़ी गांव (चूरू जिला) प्रारंभिक शिक्षा बीछीदाना […] - [सवाई जयसिंह - तिथिक्रम (16)](https://rajasthanhistory.com/sawai-jai-singh-chronology/): सवाई जयसिंह – तिथिक्रम पृष्ठ पर जयसिंह के जीवन में घटित इतिहास की महत्वपूर्ण तिथियों को क्रमवाद दिया गया है। 3 नवम्बर 1688 :  आमेर के महलों में महाराजा बिशनसिंह की राठौड़ रानी इन्द्रकुंवरी के गर्भ से, महाराजा बिशनसिंह के पहले राजकुमार का जन्म। राजकुमार का नाम विजयसिंह रखा गया। 1696 ई. :  राजकुमार विजयसिंह […] - [मराठों से सामना](https://rajasthanhistory.com/confront-the-marathas/): महाराजा सूरजमल के नेतृत्व में जाटों का राज्य अब इतना बड़ा और समृद्ध हो चुका था कि मराठे उसकी ओर आकषित हुए। इस लिए महाराजा सूरजमल का मराठों से सामना होना निश्चित ही था। जब सफदरजंग अवध को चला गया तब मराठों की सेना ने मल्हारराव होलकर के पुत्र खांडेराव के नेतृत्व में राजपूताने में […] - [महाराजा सूरजमल](https://rajasthanhistory.com/maharaja-suraj-mal-received-kingdom/): यद्यपि राजकुमार सूरजमल विगत 14 वर्षों से भरतपुर राज्य का काम देख रहा था किंतु ई.1756 में राजा बदनसिंह की मृत्यु होने पर सूरजमल विधिवत् भरतपुर का राजा बना। महाराजा सूरजमल को अनेक युद्धों में भाग लेने का तथा लम्बे समय तक राज्य प्रबन्ध करने का अनुभव प्राप्त था। नादिरशाह द्वारा दिल्ली पर आक्रमण किये […] - [महाराजा सूरजमल का व्यक्तित्व](https://rajasthanhistory.com/maharaja-surajmals-personality/): महाराजा सूरजमल का व्यक्तित्व आकर्षक था। वह कद में लम्बा, शरीर से किंचित् मोटा तथा रंग से सांवला था। उसकी आंखें बहुत चमकदार थीं। महाराजा सूरजमल व्यवहार से शालीन, विनम्र, बुद्धिमान, धैर्यवान, विवेकी, वीर, धर्मप्राण, शरणागत वत्सल एवं दूरदर्शी राजा था। महाराजा सूरजमल अपने पिता बदनसिंह तथा पुत्रों से बहुत प्रेम करता था। उसने अपने […] - [महाराजा सूरजमल के निर्माण कार्य](https://rajasthanhistory.com/construction-of-buildings-by-maharaja-suraj-mal/): महाराजा सूरजमल के निर्माण कार्यों की सूचि देखकर कोई भी इतिहासकार अचम्भित हो सकता है। महाराजा सूरजमल ने मुगलों से जो रुपया लूटा, उस रुपए का सदुपयोग उसने भवन बनाने में किया। अकबर तथा शाहजहां के काल में आगरा, फतेहपुर सीकरी तथा दिल्ली आदि अनेक नगरों में अनेक भव्य भवनों का निर्माण किया गया। ये […] - [प्राक्कथन - युगनिर्माता सवाई जयसिंह (1)](https://rajasthanhistory.com/preface-yugnirmata-sawai-jaisingh/): प्राक्कथन – युगनिर्माता सवाई जयसिंह पृष्ठ पर इस पुस्तक की प्रस्तावना को स्पष्ट किया गया है। यह पुस्तक अमेजन डॉट इन पर प्रिण्ट फॉर्मेट पर उपलब्ध है। प्रारम्भिक काल में ढूंढाढ़, मध्यवर्ती काल में आमेर तथा परवर्ती काल में जयपुर राज्य के नाम से अभिहित जयपुर राज्य में जयसिंह नाम के तीन राजा हुए। जयसिंह […] - [सवाई जयसिंह के पूर्वज (2)](https://rajasthanhistory.com/ancestors-of-sawai-jai-singh/): किशनसिंह ने कई हजार जाटों का कत्ल किया तथा कई हजार कच्छवाहे खोये। उसका सारा जीवन जाटों से संघर्ष करने में बीता। - [सवाई जयसिंह का सिंहासनारोहण (3)](https://rajasthanhistory.com/political-conditions-during-the-ascension-of-sawai-jai-singh/): दिल्ली में अब भी मुगल शासन कर रहे थे किंतु उनकी सल्तनत खण्ड-खण्ड होकर बिखर रही थी। मराठे, जाट, राजपूत, गोण्ड आदि विभिन्न शक्तियां एक दूसरे के खून की प्यासी थीं। - [औरंगजेब और सवाई जयसिंह (4)](https://rajasthanhistory.com/aurangzeb-and-sawai-jaisingh/): औरंगजेब और सवाई जयसिंह का सम्बन्ध दो राजाओं जैसा नहीं था, अपितु स्वामी और सेवक जैसा था। औरंगजेब एक ऐसा मालिक था जो अपने नौकरों के शरीर की चमड़ी उतरवाकर ही प्रसन्न नहीं होता था अपितु उसके बदल का रक्त भी पीता था। औरंगजेब ने सवाई जयसिंह का ऐसा ही बुरा हाल किया। जयसिंह का […] - [बहादुरशाह और सवाई जयसिंह (5)](https://rajasthanhistory.com/sawai-jai-singh-after-the-war-of-succession/): कामबख्श से निपटकर बहादुरशाह जब वापस उत्तर भारत में लौटा तो उसे सिक्ख विद्रोह के समाचार मिले। बहादुरशाह ने अनुभव किया कि राजपूतों की सहायता के बिना सिक्खों को दबाना असम्भव है। - [फर्रूखसीयर और सवाई जयसिंह (6)](https://rajasthanhistory.com/farrukhseer-and-sawai-jaisingh/): फर्रूखसियर ने बादशाह बनते ही सवाई जयसिंह को सात हजार का मनसब प्रदान कर मालवा का सूबेदार नियुक्त किया। - [मुहम्मदशाह और सवाई जयसिंह (7)](https://rajasthanhistory.com/muhammad-shah-and-sawai-jaisingh/): नवम्बर 1720 में फर्रूखसीयर को गद्दी से उतारकर मौत के घाट उतार दिया गया तथा पहले रफी-उद्-दराजात को और बाद में मुहम्मदशाह रंगीला को बादशाह बनाया गया। - [सवाई जयसिंह का प्रभाव (8)](https://rajasthanhistory.com/sawai-jai-singhs-influence-on-rajputana-princely-states/): बादशाह के आदेश थे कि जयसिंह की अनुशंसा के बिना, राजपूत राज्यों के सम्बन्ध में कोई निर्णय नहीं लिया जायेगा। - [सवाई जयसिंह और जोधपुर (9)](https://rajasthanhistory.com/jodhpur-state-and-sawai-jai-singh/): आम्बेर के राजा सवाई जयसिंह और जोधपुर के राजा अजीतसिंह युवावस्था में ही मित्र बन गये थे। दोनों ने साथ मिलकर ही बहादुरशाह की दाढ़ में से अपने-अपने राज्य वापस छीने थे। बाद में दोनों ही मुगलों के नौकर हो गये थे। - [सवाई जयसिंह का राज्य विस्तार (10)](https://rajasthanhistory.com/state-expansion-of-sawai-jai-singh/): माना जाता है कि जयसिंह अंतिम भारतीय राजा था जिसने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया। - [जयसिंह और हिन्दू धर्म (11)](https://rajasthanhistory.com/sawai-jai-singh-invaluable-service-to-hindu-subjects/): सवाई जयसिंह और हिन्दू धर्म एक-दूसरे के पर्याय थे। मुसलमान बादशाह की नौकरी करते हुए भी जयसिंह ने कभी भी हिन्दू धर्म के उच्च आदर्शों का त्याग नहीं किया। उसने हिन्दू प्रजा की अमूल्य सेवा की। औरंगजेब के अत्याचार सवाई जयसिंह के कंधों पर जिस काल में उत्तर भारत की राजनीति को दिशा देने की […] - [सवाई जयसिंह का विद्यानुराग (12)](https://rajasthanhistory.com/sawai-jaisings-vidyanurag/): जयसिंह ने सूरत से अंग्रेजों के कीप जैसे यंत्र, मानचित्र तथा ग्लोब भी मंगवाये। उसने गोआ के वायसराय के माध्यम से पुर्तगाल के बादशाह से किसी वैज्ञानिक चिकित्सक को जयपुर भिजवाने का अनुरोध किया। - [सवाई जयसिंह के निर्माण कार्य (13)](https://rajasthanhistory.com/sawai-jai-singhs-construction-work/): सवाई जयसिंह ने 1726 ई. में आम्बेर दुर्ग के निकट चील का टीला पर जयगढ़ दुर्ग का निर्माण करवाया। इसकी संरचना काफी कुछ आम्बेर दुर्ग से मिलती-जुलती है। - [जयपुर नगर की स्थापना (14)](https://rajasthanhistory.com/establishment-of-jaipur-city/): जयपुर नगर की स्थापना अठारहवीं शताब्दी ईस्वी में भारत की प्रमुख घटनाओं में से एक थी। सवाई जयसिंह को स्थापत्य कला से विशेष लगाव था। - [सवाई जयसिंह की मृत्यु एवं अंतिम दिन (15)](https://rajasthanhistory.com/last-days-of-sawai-jai-singh/): मुगलों, अफगानों, मराठों और जाटों के बीच राजनीति करना और राजनीति के मैदान में लगातार 45 साल तक टिके रहना कोई सरल काम नहीं था। फिर भी वह धैर्य से टिका रहा। अपमान के घूंट भी उसने बड़ी सहजता से पिये। - [युग निर्माता राव जोधा - भूमिका](https://rajasthanhistory.com/preface-yugnirmata-rao-jodha/): युग निर्माता राव जोधा ने थार मरुस्थल में जिस साम्राज्य की स्थापना की, उसने आगे चलकर भारत भूमि का भाग्य संवारने में बड़ी भूमिका निभाई। भारत में चौदहवीं शताब्दी का अंत तैमूर लंग के भयानक आक्रमण से हुआ। यह आक्रमण उत्तर भारत के लिये ऐसा नासूर बन गया जिसमें से शताब्दियों तक भारत की आत्मा […] - [राव जोधा के पूर्वज](https://rajasthanhistory.com/ancestors-of-rao-jodha/): राव जोधा के पूर्वज राव सीहा पहले व्यक्ति थे जो मारवाड़ में आए। सीहा ने मरुस्थल में अपने राज्य की स्थापना का कार्य आरम्भ किया। अनसुलझी गुत्थी राव जोधा के पूर्वज राव सीहा थे और कहाँ से आए थे, इस सम्बन्ध में इतिहासकारों में प्रबल मतभेद हैं। मारवाड़ के राठौड़़ मानते आये हैं कि वे […] - [मरुस्थल की राजनीति में राठौड़ों का उदय](https://rajasthanhistory.com/rathore-rise-in-desert-politics/): राव सीहा के बारे में भाटों से लेकर मुहणोत नैणसी तथा कर्नल टॉड ने अनेक कपोल कल्पित बातें लिखी हैं जो ऐतिहासिक घटना क्रम की कसौटी पर खरी नहीं उतरतीं। - [राव रणमल द्वारा मेवाड़ की रक्षा](https://rajasthanhistory.com/ranmal-protects-the-state-of-mewar/): रणमल ने अपने पिता के जीवित रहते ही पिता का राज्य त्याग दिया और वह नागौर से चलकर नाडोल के निकट धणला गांव में जाकर ठहरा जहाँ सोनगरा चौहान राज्य करते थे। - [राव जोधा का संघर्ष](https://rajasthanhistory.com/jodhas-long-term-struggle/): ख्यातों में वर्णन आया है कि एक दिन जोधा मण्डोर के मोर्चे से पराजित होकर भागता हुआ एक गांव में एक जाट के घर ठहरा। जाट की स्त्री ने थाली में गरम घाट (मोठ और बाजरे की खिचड़ी) भरकर जोधा को खाने के लिये दी। - [मण्डोर पर अधिकार](https://rajasthanhistory.com/jodha-gains-mandor-state/): राव जोधा का मण्डोर पर अधिकार थार मरुस्थल के इतिहास में एक बड़ा मोड़ थी। इस घटना ने मारवाड़ का भाग्य बदल दिया तथा राठौड़ों का राज्य फिर से जम गया। राव जोधा की सफलता में जोधपुर की राजकुमारी हंसाबाई का बहुत बड़ा योगदान था। वह राव जोधा की बुआ थी। हंसाबाई की सहृदयता मारवाड़ […] - [मारवाड़-मेवाड़ संधि](https://rajasthanhistory.com/treaty-in-marwar-and-mewar-states/): यद्यपि मारवाड़-मेवाड़ संधि महाराणा कुम्भा की दादी हंसाबाई के आग्रह पर हुई थी किंतु राव जोधा तथा महाराणा कुम्भा दोनों ने यह दिखाने का प्रयास किया कि राव जोधा ने मण्डोर पर बलपूर्वक अधिकार किया तथा मेवाड़ राज्य को अपनी राजकुमारी शृंगारदेवी सौंपकर मेवाड़ से संधि कर ली। जोधपुर की ख्यातों में वर्णन आया है […] - [मेहरानगढ़ दुर्ग की स्थापना](https://rajasthanhistory.com/establishment-of-jodhpur-fort-and-city/): राव जोधा ने लोहा पोल से चामुण्डाजी के बुर्ज तक कोट तथा बुरजें बनवाईं एवं फलसे तक दुर्ग का निर्माण करवाया। - [राव जोधा की तीर्थयात्रा](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b5-%e0%a4%9c%e0%a5%8b%e0%a4%a7%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be/): जोधा की तीर्थ यात्रा का उल्लेख उसकी पुत्री शृंगार देवी की घोसुंडी गांव में बनवाई हुई बावली पर लगे वि.सं. 1561 (1504 ई.) के लेख में आया है। - [मारवाड़ राज्य का विस्तार](https://rajasthanhistory.com/marwar-state-expanded-by-jodha/): जोधा ने अपने राज्य के उत्तर में हिसार तक का क्षेत्र मिलाने का प्रयत्न किया किंतु अफगान प्रतिरोध के कारण जोधा सफल नहीं हो सका। - [राव जोधा का परिवार](https://rajasthanhistory.com/rao-jodhas-family/): राव जोधा ने वरसिंह और दूदा को सम्मिलित रूप से मेड़ता दिया था। जोधा की मृत्यु के बाद वरसिंह ने दूदा को मेड़ता से बाहर निकाल दिया। इस पर दूदा बीकानेर चला गया। - [युग प्रवर्तक राव जोधा](https://rajasthanhistory.com/history-maker-rao-jodha/): युग प्रवर्तक राव जोधा सचमुच ही थार रेगिस्तान में नवीन युग का प्रवर्तन करने में सफल रहा। यदि उस काल में राव जोधा जैसा संघर्षशील राजा न हुआ होता तो थार मरुस्थल का यह भाग भी उसी तरह मुस्लिम बहुल क्षेत्र में बदल जाता जिस प्रकार थार रेगिस्तान में स्थित सिंध तथा धाट के क्षेत्र […] - [राव जोधा के वंशज](https://rajasthanhistory.com/descendants-of-rao-jodha/): 13 मार्च 1491 को सातल अजमेर के हाकिम मल्लू खाँ से हुई लड़ाई में अत्यधिक घायल हो जाने के कारण मृत्यु को प्राप्त हुआ। उसके बाद सूजा को मारवाड़ का राव बनाया गया। - [जोधा राठौड़ों के राज्य](https://rajasthanhistory.com/state-established-by-the-descendants-of-jodha/): राव दूदा ने बीकानेर से मेड़ता आकर सीहा को हटा दिया और स्वयं मेड़ता का स्वतंत्र शासक बन गया। राव मालदेव के समय में मेड़ता राज्य, जोधपुर राज्य में सम्मिलित हो गया। - [जोधा वंश के प्रसिद्ध व्यक्ति](https://rajasthanhistory.com/prominent-person-of-jodhas-dynasty/): दो हाथों से जयमल द्वारा एवं दो हाथों से कल्ला द्वारा तलवार चलाये जाने के कारण कहा जाता है कि कल्लाजी चतुर्भुज रूप में प्रकट हुए। उन्हें चार हाथों वाला लोकदेवता तथा शेषनाग का अवतार माना जाता है। - [राव जोधा : तिथिक्रम](https://rajasthanhistory.com/rao-jodha-chronology/): 1478 ई. : जोधा के निर्देश पर जोधा के चचेरे भाई वरजांग द्वारा जालोर के शासक उस्मान खाँ तथा सिरोही के रावल लाखा का दमन। - [क्रांतिकारी बारहठ केसरीसिंह - प्राक्कथन](https://rajasthanhistory.com/preface-of-kesrisingh-batath/): क्रांतिकारी बारहठ केसरीसिंह – प्राक्कथन पृष्ठ पर इस पुस्तक की विषय-वस्तु को स्पष्ट किया गया है। यह पुस्तक इस महान् क्रांतिकारी के जीवन पर प्रकाश डालने वाली अपनी तरह की पहली पुस्तक थी जिसे पाठकों के बीच अपार प्रसिद्धि मिली। वर्तमान समय में इस पुस्तक की प्रतियां अनुपलब्ध हैं। इसलिए इसे पाठकों की सुविधा के […] - [केसरीसिंह बारहठ](https://rajasthanhistory.com/early-life-of-kesarisingh-barath/): जब कोटा राज्य के शासक महाराव उम्मेदसिंह ने उनके गुणों की प्रशंसा सुनी तो महाराव ने केसरीसिंह को ई.1900 में कोटा बुला लिया और 60 रुपये मासिक पर नियुक्ति देकर उनको सम्मानित दरबारी बनाया। - [केसरीसिंह बारहठ के कार्य](https://rajasthanhistory.com/kesari-singh-on-road-to-social-reform/): केसरीसिंह बारहठ के कार्य किसी एक क्षेत्र में सीमित नहीं थे। उन्होंने धर्म-सुधार से लेकर समाज सुधार, जन-जागृति, राजनीतिक चेतना, सशस्त्र क्रांति, साहित्य-सृजन आदि विविध क्षेत्रों में कार्य किये। धर्म सुधार के कार्य ठाकुर केसरीसिंह हिन्दू धर्म के बड़े प्रशसंक थे। उन्हें विश्वास था कि हिन्दू धर्म मानव को सच्चा मानव बनाता है और उसे […] - [दिल्ली दरबार 1911 और केसरीसिंह](https://rajasthanhistory.com/delhi-durbar-and-kesari-singh-barath/): दिल्ली दरबार 1911 भारत के इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी। इस दरबार में इंग्लैण्ड के बादशाह जॉर्ज पंचम ने भारत सम्राट की उपाधि धारण की तथा भारत के समस्त राजाओं, राजनीतिक दलों एवं जन साधारण के समक्ष अपनी असाधारण शक्ति का प्रदर्शन करके ब्रिटिश क्राउन को चुनौती रहित एवं अजेय शक्ति के रूप में […] - [सशस्त्र क्रांति की ओर बाहरठ केसरीसिंह](https://rajasthanhistory.com/kesrisingh-batath-towards-an-armed-revolution/): सरीसिंह के ज्येष्ठ पुत्र प्रताप के पास बम निर्माण की सामग्री प्राप्त हुई थी। इसलिये उन्हें बरेली जेल में रखा गया था। - [राजाओं को चेतावनी](https://rajasthanhistory.com/warning-to-the-british-government-and-kings/): केसरीसिंह इतनी दूर की सोच रखते थे कि ई.1919 में उन्होंने राजाओं के भविष्य का अनुमान लिया था। - [गांधीवाद की राह पर ठाकुर केसरीसिंह बारहठ!](https://rajasthanhistory.com/on-the-road-to-gandhism/): क्रांतिकारी संगठन के बिखर जाने के कारण केसरीसिंह के कई साथी गांधीजी की ओर मुड़ गए थे। - [केसरीसिंह बारहठ का व्यक्तित्व एवं मूल्यांकन](https://rajasthanhistory.com/personality-and-evaluation/): केसरीसिंहजी की जबान और कलम में मिठास और संतुलन अधिक था। उनके व्यवहार में अपने पन, धीरज और गम्भीरता का सामंजस्य था। उनकी कोई चेष्टा शान के खिलाफ न होती थी। - [वीर सावरकर से साम्य](https://rajasthanhistory.com/same-with-veer-savarkar/): वीर सावरकर और केसरीसिंह दोनों ने सशस्त्र क्रांति का मार्ग अपनाया। दोनों ने अपने परिवार के समस्त सदस्यों को क्रांति मार्ग पर झौंक दिया। - [केसरीसिंह की साहित्य सेवा](https://rajasthanhistory.com/kesari-singhs-sahitya-seva/): वीर सावरकर, अरविंद घोष तथा केसरीसिंह तीन ऐसे महान क्रांतिकारी थे जिन्होंने शस्त्र उठाने के साथ-साथ शास्त्र भी रचा। - [चेतावणी के चूंगटिये](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%9a%e0%a5%87%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%a3%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%9a%e0%a5%82%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a4%9f%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%87/): जिस समय मेवाड़ के महाराणा फतहसिंह दिल्ली दरबार में भाग लेने के लिए उदयपुर से दिल्ली जा रहे थे, उस समय ठाकुर केसरीसिंह ने चेतावणी के चूंगटिये नामक साहित्य रचना लिखकर महाराणा की सेवा में प्रस्तुत की। चेतावणी के चूंगटिये नाम से सृजित दोहों में न केवल मेवाड़ के गौरवशाली अतीत की अपितु भारत की […] - [नीति के दोहे](https://rajasthanhistory.com/couplets-of-morality/): नीति के दोहे कवि के सामाजिक सरोकार का प्रतिबिम्ब हैं। ठाकुर केसरीसिंह बारहठ द्वारा लिखे गये नीति के दोहे भारतीय समाज को आज भी नव ऊर्जा प्रदान करने में सक्षम हैं। - [केसरीसिंह की आत्मकथा](https://rajasthanhistory.com/autobiography-of-kesari-singh-barath/): क्षत्रिय-शिक्षा को दई, राज-विरोध उपाधि। अंग-भंग के रंग तें, तजी बंग हिय हार। - [केसरीसिंह का पत्नी प्रेम](https://rajasthanhistory.com/kesari-singhs-love-to-his-wife/): ई.1927 में पत्नी माणिक कुंवर का निधन हो गया। उस समय केसरीसिंह केवल 55 वर्ष के थे। प्रताप की शहादत के बाद यह दूसरा बड़ा आघात था। एकबारगी तो वे संसार से विरक्त ही हो गये। ठाकुर केसरी सिंह ने अपनी पत्नी को समर्पित करते हुए इतनी भावभरी कविताएं लिखी हैं जिनकी कहीं कोई अन्य […] - [कविताओं में केसरीसिंह](https://rajasthanhistory.com/kesari-singh-in-poems/): माथो देय स्वराज, लीनो अजमेरी पतै। इण रो हुयो अकाज, सेठी सठग्यो सोग में।। - [अमर वीर जोरावरसिंह बारहठ](https://rajasthanhistory.com/amar-veer-joravarsingh-barath/): अपने अज्ञात वास के दौरान अमर वीर जोरावरसिंह बारहठ ने एक दिन संचई निवासी जगमालसिंह को बताया कि दिल्ली में वायसराय पर किन्हीं व्यक्तियों ने बम फैंका, उस सयम दो व्यक्ति अपनी चारण जाति के थे। ऐसा कभी तुमने सुना ? उनके हाँ करने पर जोरावसिंह ने उन्हें बताया कि वह सारी करतूत इसी शरीर […] - [कुंवर प्रतापसिंह बारहठ](https://rajasthanhistory.com/kunwar-pratap-singh-barath/): कुंवर प्रतापसिंह बारहठ को राष्ट्रप्रेम की भावना अपने पिता केसरीसिंह से प्राप्त हुई। प्रताप का बाल्यकाल उदयपुर, कोटा, अजमेर तथा दिल्ली में बीता।  उनकी प्रारंभिक शिक्षा कोटा में हुई। - [हल्दीघाटी का युद्ध - प्रस्तावना](https://rajasthanhistory.com/preface-of-haldighati-ka-yuddh-aur-maharana-pratap/): हल्दीघाटी, भारत के उन प्रसिद्ध समरांगणों में से एक है जिनमें भारतीय शौर्य, साहस, पराक्रम, विजय एवं आत्मोत्सर्ग की गौरव गाथाएं लिखी गईं। - [गुहिल वंश](https://rajasthanhistory.com/guhil-dynasty/): बापा रावल, शैव सम्प्रदाय के कनफड़े साधु हारीत ऋषि का शिष्य था। इसलिये उसने शैव सम्प्रदाय को अपना राजधर्म बनाया। - [भारत में मुस्लिम सत्ता का प्रसार](https://rajasthanhistory.com/spread-of-muslim-power-in-india/): मध्य एशिया में स्थित 'सउदी अरेबिया' नामक देश के 'मक्का' नगर में रहने वाले 'कुरेश कबीले' में ई.570 में 'हजरत मुहम्मद' का जन्म हुआ। - [गुहिल-इस्लाम संघर्ष](https://rajasthanhistory.com/guhilas-struggle-with-muslim-rulers/): आठवीं शताब्दी ईस्वी से मुस्लिम आक्रांता, भारत भूमि पर आक्रमण कर रहे थे तथा भारत में छोटे-छोटे मुस्लिम राज्यों की स्थापना होती जा रही थी। - [भीलों से मित्रता](https://rajasthanhistory.com/bhilamitra-keika/): भीलों में सैनिक संगठन जैसी व्यवस्था नहीं थीं किंतु संकट के समय ये लोग मिलकर लड़ते थे। - [चित्तौड़ से निष्क्रमण](https://rajasthanhistory.com/exodus-from-chittore/): भले ही चित्तौड़ के रक्षक थोड़े से थे किंतु इनके सामने 'अकबर' की दाल गलनी कठिन थी। - [हल्दीघाटी की ओर](https://rajasthanhistory.com/towards-haldighati/): अकबर चाहता था कि महाराणा प्रताप से संधि न की जाये अपितु उसे सम्मुख युद्ध में मारा जाये और यह कार्य, महाराणाओं के पुराने चाकर अपने हाथों से करें। - [हल्दीघाटी](https://rajasthanhistory.com/field-of-haldighati/): गोगूंदा और खमणोर के बीच अरावली की विकट पहाड़ी श्रेणियाँ स्थित हैं। इनमें से एक तंग रास्ते वाली घाटी को हल्दीघाटी कहते हैं। - [हल्दीघाटी का युद्ध](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%80%e0%a4%98%e0%a4%be%e0%a4%9f%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%af%e0%a5%81%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a7/): राणा ने मुगल सेना पर सीधा आक्रमण किया। उस समय मुगलों की सेना, हल्दीघाटी के प्रवेश स्थान की पगडण्डी के उत्तर-पश्चिम के मैदान में लड़ने के लिये खड़ी थी जो अब बादशाह का बाग कहलाता है। - [अल्बदायूनी की हल्दीघाटी](https://rajasthanhistory.com/haldighati-of-albaduni/): हल्दीघाटी का युद्ध कहने को तो एक ही था किंतु हल्दीघाटी के मैदान में उपस्थित प्रत्येक योद्धा अपनी-अपनी हल्दीघाटी लड़ रहा था। अकबर के दरबार में रहने वाले मुल्ला अल्बदायूनी की हल्दीघाटी मानसिंह या महाराणा की हल्दीघाटी से बिल्कुल अलग थी। इस कारण उसे हल्दीघाटी का युद्ध वैसा नहीं दिखा जैसा कि वह हिन्दू पक्ष […] - [मानसिंह कच्छवाहा की हल्दीघाटी](https://rajasthanhistory.com/mansingh-kachhwahas-haldighati/): जिस प्रकार अल्बदायूनी की हल्दीघाटी और अबुल फजल की हल्दीघाटी अलग-अलग थीं, उसी प्रकार महाराणा प्रताप की हल्दीघाटी और मानसिंह कच्छवाहा की हल्दीघाटी भी अलग-अलग थीं। इस युद्ध में महाराणा प्रताप स्वतंत्र राजा की तरह लड़ा तो मानसिंह अकबर के सेनापति की तरह। दोनों के उद्देश्य भी अलग-अलग थे और दोनों के लिए इस युद्ध […] - [झाला मानसिंह का बलिदान](https://rajasthanhistory.com/jhala-mansinghs-sacrifice/): ग्वालियर नरेश रामशाह तोमर का बलिदान तथा झाला मानसिंह का बलिदान हल्दीघाटी युद्ध की दो बड़ी घटनाएं हैं जिनके पवित्र आलोक से भारत का सम्पूर्ण इतिहास जगमगा रहा है। ये दोनों बलिदान भारतीय वीरों की स्वातंत्र्य भावना, स्वामिभक्ति तथा देश की मिट्टी के प्रति समर्पण की गाथा कहते हैं। जब महाराणा प्रताप, हल्दीघाटी के मैदान […] - [थर्मोपेली](https://rajasthanhistory.com/james-todds-thermopoly/): कर्नल टॉड ने हल्दीघाटी युद्ध को अत्यंत महत्त्व देते हुए इसे मेवाड़ की थर्मोपेली और दिवेर युद्ध को मेवाड़ का मेरथान लिखा है।[1] आधुनिक काल में कर्नल टॉड को ही हल्दीघाटी युद्ध को प्रसिद्ध करने का श्रेय जाता है। वास्तव में हल्दीघाटी का युद्ध कई प्रकार से थर्मोपेली के युद्ध से बढ़-चढ़कर था। थर्मोपेली के […] - [चेटक का प्राणोत्सर्ग](https://rajasthanhistory.com/chetaks-death/): महाराणा प्रताप के घोड़े चेटक का प्राणोत्सर्ग भी हल्दीघाटी युद्ध की एक बड़ी घटना है जो महाराणा प्रताप के प्रति उनके सामंतों एवं सैनिकों की ही नहीं अपितु उनके पशुओं की भी स्वामिभक्ति को प्रदर्शित करती है।  चेटक, महाराणा प्रताप को हल्दीघाटी से बाहर तो निकाल लाया किंतु मानसिंह के हाथी की सूण्ड में बंधी […] - [हल्दीघाटी युद्ध का स्थल](https://rajasthanhistory.com/actual-site-of-haldighati-war/): इस सारे प्रदेश में पर्वत, जंगल, घाटी और झरने हैं, इसमें ऐसे खुले स्थान भी थे जहाँ बड़ी सेनाएं अपने पड़ाव डाल सकें। - [हल्दीघाटी के बाद की घटनाएँ](https://rajasthanhistory.com/events-after-haldighati/): हल्दीघाटी का युद्ध भले ही जिस दिन आरम्भ हुआ, उसी दिन कुछ घण्टों में समाप्त हो गया किंतु हल्दीघाटी के बाद की घटनाएँ बतानी हैं कि यह युद्ध कभी समाप्त होने वाला नहीं थ। आज भी भारत की हिन्दू जनता इस्लाम से अपनी रक्षा करने के लिए हल्दीघाटी के मैदान में खड़ी है और हल्दीघाटी […] - [मेवाड़ पर आक्रमणों की झड़ी](https://rajasthanhistory.com/showers-of-attacks-on-mewar/): हल्दीघाटी की विफलता के बाद अकबर की क्रोधाग्नि और भी भड़क उठी। वह प्रताप को मार डालना चाहता था किंतु उसके सेनापति प्रताप को छू भी नहीं पा रहे थे। अकबर ने मेवाड़ पर आक्रमणों की झड़ी लगा दी। शाही सेनाओं के मेवाड़ से लौट जाने के बाद महाराणा प्रतापसिंह ने अपनी सेना के साथ […] - [दिवेर युद्ध](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%af%e0%a5%81%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a7/): हल्दीघाटी के युद्ध की तरह दिवेर युद्ध भी मेवाड़ के इतिहास का महत्वपूर्ण पन्ना है। दिवेर युद्ध में महाराणा प्रताप तथा उनके कुंवर अमरसिंह ने मुगल थानेदारों को मारकर मेवाड़ का अधिकांश भूभाग मुगलों के अधिकार से मुक्त करवा लिया। हल्दीघाटी के युद्ध को सात साल बीत चुके थे। चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़, गोगूंदा और उदयपुर पर […] - [राजा मानसिंह की दुर्दशा](https://rajasthanhistory.com/akbars-unfulfilled-hope-and-mansinghs-plight/): राजा मानसिंह कच्छवाहा ने अपने प्राणों की बाजी लगाकर हल्दीघाटी का युद्ध लड़ा था किंतु युद्ध में मिली हार के कारण मुगलों द्वारा मानसिंह को कभी भी वह सम्मान नहीं मिला, जिस सम्मान का वह अधिकारी था। पहले अकबर ने और बाद में जहांगीर ने राजा मानसिंह की दुर्दशा की। मालपुरा को नष्ट करने के […] - [हल्दीघाटी का विजेता कौन ?](https://rajasthanhistory.com/who-is-the-winner-of-haldighati/): हल्दीघाटी के युद्ध में दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी जीत बताई है किंतु वास्तव में हल्दीघाटी का विजेता कौन था? इसका निर्णय तथ्यों के आधार पर ही लिया जा सकता है जिनमें न केवल युद्ध के मैदान में घटित घटनाएं अपितु हल्दीघाटी के बाद की घटनाएं भी सम्मिलित की जानी चाहिए। 18 जून 1576 में हल्दीघाटी […] - [श्यामनारायण पाण्डेय की हल्दीघाटी](https://rajasthanhistory.com/shyamnarayan-pandeys-haldighati/): श्यामनारायण पाण्डेय की हल्दीघाटी एक काव्य रचना है जिसमें हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा प्रताप के शौर्य का अनूठा वर्णन किया गया है। इस खण्ड काव्य ने महाराणा प्रताप के बल एवं पराक्रम का जैसा रोचक वर्णन किया है, वैसा रोचक वर्णन और किसी कवि द्वारा नहीं किया जा सका है। महाराणा प्रताप द्वारा हल्दीघाटी में […] - [महाराणा प्रताप का क्षत्रियत्व](https://rajasthanhistory.com/maharana-pratap-did-not-sell-kshatriyatva-in-delhi-market/): अकबर के समय में महाराणा प्रताप का क्षत्रियत्व ही सब राजाओं से अलग दिखाई देता था। जयपुर, जोधपुर, बीकानेर आदि समस्त बड़े राजाओं ने अकबर से संधि करके उसकी अधीनता प्रदर्शित की किंतु उस काल में महाराणा प्रताप किसी के डिगाए नहीं डिगा। इस कारण हिन्दी एवं डिंगल भाषाओं के कवियों ने महाराणा प्रताप का […] - [घास की रोटी](https://rajasthanhistory.com/did-maharana-eat-grass-bread/): कतिपय मध्यकालीन चारणों और भाटों की रचनाओं में इस तरह के भाव व्यक्त किये गये हैं कि महाराणा ने जंगलों में निवास के दौरान अनेक दुःख उठाये तथा घास की रोटी खाकर दिन बिताये। इस तरह की रचनाएं महाराणा प्रताप के वीरत्व और स्वातंत्र्यप्रेम को प्रदर्शित करने के भाव से लिखी गई थीं किंतु इन […] - [पातळ'र पीथळ](https://rajasthanhistory.com/kanhaiyalal-sethias-pathal-aur-pithal/): बहुश्रुत राजस्थानी कवि, पद्मश्री, राजस्थान रत्न, स्वर्गीय कन्हैयालाल सेठिया की रचना पातळ’र पीथळ सुप्रसिद्ध रचना है जिसमें जंगल में अपने परिवार के कष्टों से दुःखी होकर राणा प्रताप द्वारा अकबर की अधीनता स्वीकार करने के लिये पत्र लिखने, अकबर द्वारा बीकानेर के राजकुमार एवं सुप्रसिद्ध राजस्थानी कवि पृथ्वीराज राठौड़ को बुलाकर उसे ताना देने, पृथ्वीराज […] - [महाराणा प्रताप की प्रशंसा में रचित काव्य](https://rajasthanhistory.com/other-poems-composed-in-praise-of-maharana-pratap/): महाराणा प्रताप की प्रशंसा में बहुत बड़ी मात्रा में काव्य रचा गया है। उसे यहाँ प्रस्तुत करना संभव नहीं है फिर भी पाठकों की सुविधा के लिए कुछ कविताओं के अंश दिए जा रहे हैं- अज्ञात रचनाकर- ओछो तिल न कूं न कूं तिल अधको मुणतां सुकव करां ले माप। तूं  ताहरा  राण  टोडरमल  परियां […] - [महाराणा प्रताप का सपना साकार](https://rajasthanhistory.com/maharana-prataps-dream-come-true/): महाराणा प्रताप का सपना था कि देश म्लेच्छों के शासन से मुक्त हो। देश पर हिन्दू शासक राज्य करें। जिस दिन भारत आजाद हुआ और राजस्थान का निर्माण हुआ, तब सरदार पटेल ने कहा था कि आज महाराणा प्रताप का सपना साकार हुआ। नौवीं शताब्दी ईस्वी से ही इस बात के प्रमाण मिलने लगते हैं […] - [राजस्थान में बौद्ध स्मारक तथा मूर्तियाँ](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ac%e0%a5%8c%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a7/): राजस्थान में बौद्ध स्मारक तथा मूर्तियाँ उतनी बड़ी संख्या में प्राप्त नहीं की जा सकी हैं जितनी बड़ी संख्या में उनके मिलने की संभावना थी। इसका कारण संभवतः यह रहा कि राजस्थान लम्बे समय तक हूण-आक्रमणों की चपेट में रहा जिन्होंने बौद्ध स्मारकों एवं मूर्तियों को नष्ट कर दिया। भारत में धर्म नामक संस्था के […] - [बौद्ध धर्म की आंधी](https://rajasthanhistory.com/even-upanishads-could-not-stand-in-the-storm-of-buddhism/): क्षिण में बौद्ध एवं जैन धर्म की जड़ें हिल गईं। नायनारों तथा आलवारों का भक्ति आंदोलन छठी शताब्दी से नौवीं शताब्दी ईस्वी तक चला। - [बौद्ध धर्म की उन्नति के कारण](https://rajasthanhistory.com/reasons-of-advancement-of-buddhism/): बौद्ध धर्म की उन्नति बहुत तेजी से हुई। इसके कई कारण थे। बुद्ध के धर्म में किसी तरह के यज्ञ, जप, तप तथा कर्मकाण्ड आदि की आवश्यकता नहीं थी। केवल बुद्ध की शरण ग्रहण करनी थी और आडम्बर रहित जीवन यापन करना था। इस कारण लोग बड़ी तेजी से बुद्ध के धर्म की तरफ अग्रसर […] - [बुद्ध के उपदेश का सैद्धांतिक पक्ष](https://rajasthanhistory.com/theoretical-aspect-of-buddhas-teachings/): बुद्ध के उपदेश का सैद्धांतिक पक्ष मानव जीवन में दिखाई देने वाले सुखों-दुखों और शुचिताओं के आधार पर खड़ा है। उसमें आत्मा तथा परमात्मा का कोई विवेचन नहीं किया गया है। बौद्ध भिक्षु को किसी प्रकार का दार्शनिक चिंतन नहीं करना है। उसे केवल सत्य पर आधारित जीवन जीना है। चत्वारी-आर्य-सत्यानि बुद्ध ने सर्वप्रथम अपने […] - [बौद्ध धर्म में निर्वाण का दर्शन](https://rajasthanhistory.com/nirvana-system-is-different-from-the-salvation-of-vedic-religion/): बौद्ध धर्म में निर्वाण का दर्शन है जो उपनिषदों के मोक्ष सम्बन्धी दर्शन से नितांत भिन्न है। मोक्ष में आत्मा का परमात्मा से मिलन होता है जबकि बौद्ध धर्म के निर्वाण में आत्मा समस्त बंधनों से मुक्त हो जाती है। वैदिक धर्म में कर्मकाण्डों के माध्यम से मोक्ष की कामना की गई थी तथा कर्मकाण्डों […] - [बौद्ध विहार](https://rajasthanhistory.com/the-emergence-of-buddhist-viharas/): हिन्दू धर्म में नागरिकों के लिए अपने घर से बाहर रहने की दो व्यवस्थाएं थीं। बाल्यकाल में विद्याध्ययन हेतु गुरुकुल तथा प्रौढ़ हो जाने पर वानप्रस्थ। बौद्ध धर्म में इन दोनों व्यवस्थाओं को नकार कर बौद्ध विहार स्थापित किए गए। महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं और उपदेशों से प्रभावित होकर बहुत से लोगों ने भिक्षुव्रत ग्रहण […] - [दुर्लभ गोलाकार बौद्ध चैत्य](https://rajasthanhistory.com/rare-spherical-buddhist-chaitya/): भारत भर में दुर्लभ गोलाकार बौद्ध चैत्य केवल राजस्थान में ही प्राप्त हुआ है। यह संभवतः लकड़ी का बना हुआ था जिसे हूणों ने जलाकर राख कर दिया था, इसलिए इस दुर्लभ गोलाकार बौद्ध चैत्य का केवल आधार ही मिला है जो राख से ढका हुआ था। अशोक का शासन काल 273 ई.पू. से 232 […] - [राजस्थान में बौद्ध अवशेष](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ac%e0%a5%8c%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a7-%e0%a4%85%e0%a4%b5%e0%a4%b6%e0%a5%87%e0%a4%b7/): राजस्थान में बौद्ध अवशेष कई प्राचीन स्थलों से प्राप्त हुए हैं। ये बौद्ध अवशेष मौर्य कालीन एवं शुंग कालीन सभ्यताओं के हैं। इनमें कपड़े से लेकर मृदापात्र, मूर्तियां, लोहे की सामग्री तथा शिलालेख तक शामिल हैं। यह सही है कि राजस्थान में बौद्ध अवशेष कई प्राचीन स्थलों से प्राप्त हुए हैं किंतु इन्हें जितनी बड़ी […] - [शुंग कालीन नगर माध्यमिका](https://rajasthanhistory.com/sung-period-city-madhyamika/): शुंग कालीन नगर माध्यमिका अथवा नगरी के अवशेष चित्तौड़गढ़ जिले से प्राप्त हुए हैं। नगरी से प्राप्त ब्राह्मी लिपि के एक शिलालेख में लिखा है- “स वा भूतानाम् दयाथम् कारिता।” अर्थात् इस शिलालेख में भगवान बुद्ध द्वारा समस्त जीवों के प्रति दया करने के उपदेश की ओर संकेत किया गया है। यह शिलालेख दूसरी शताब्दी […] - [कुषाण कालीन बौद्ध स्मारक](https://rajasthanhistory.com/saka-and-kushan-period-memorials/): शक एवं कुषाण विदेशी कबीले थे जिन्हें भारत के इतिहास में सीथियन कहा जाता है। वे चीन से चलकर मध्यएशिया होते हुए भारत पहुंचे। शकों एवं कुषाणों का इतिहास मिला-जुला सा है। इस कारण इनके समय के स्मारकों को अलग करना कठिन हो जाता है। कुषाणों ने भारत में आकर बौद्ध धर्म अपना लिया था। […] - [छोटी खाटू के अवशेष](https://rajasthanhistory.com/remnants-of-chhoti-khatu/): छोटी खाटू के अवशेष नागौर जिले के छोटी खाटू कस्बे से मिले हैं। छोटी खाटू से मिली कुछ मूर्तियों पर ब्राह्मी लिपि से युक्त कुछ लेख अंकित हैं। ये लेख चौथी या पांचवीं शताब्दी के हैं तथा गुप्तकालीन अनुमानित होते हैं। छोटी खाटू से मिले मूर्तियों के खजाने में बुद्ध की कई मूर्तियां हैं। मुथारी […] - [ह्वेनसांग का वर्णन](https://rajasthanhistory.com/description-of-huensang/): चीनी यात्री ह्वेनसांग ने सातवीं शताब्दी ईस्वी में भारत की यात्रा की। वह राजस्थान के भीनमाल आदि नगरों में भी आया। उसने अपनी आंखों से उस काल में भारत में बौद्ध धर्म की स्थिति को अपने संस्मरणों में लिखा है। ह्वेनसांग का वर्णन आज सातवीं शताब्दी ईस्वी के बौद्ध कालीन इतिहास का प्रमुख स्रोत बन […] - [शैव धर्म में समन्वय का प्रयास](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b6%e0%a5%88%e0%a4%b5-%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%af/): ऐसा प्रतीत होता है कि हूणों के आक्रमण से घबराये हुए मालवा क्षेत्र के बौद्धों ने शैव धर्म में समन्वय स्थापित कर अपने धर्म की रक्षा करने का भी प्रयास किया। झालावाड़ के जिला कलक्टर डॉ. जितेन्द्र कुमार सोनी ने वर्ष 2016 में पिड़ावा गांव के एक शिवमंदिर में ऐसा शिवलिंग खोजा जिसमें नीचे का […] - [प्रतिहारकाल में बौद्ध स्मारक एवं मूर्तियां](https://rajasthanhistory.com/buddhist-monuments-and-sculptures-in-pratihara-period/): राजस्थान में प्रतिहारकाल में बौद्ध स्मारक एवं मूर्तियां बड़ी संख्या में बनी होंगी। इसका कारण यह है कि प्रतिहार राजा भी अन्य हिन्दू राजाओं की तरह बौद्ध एवं जैन धर्म को प्रश्रय देते थे। उनके शासन में राजस्थान में बौद्ध भिक्षु बड़ी संख्या में रहते थे किंतु राजस्थान से प्रतिहारकाल में बौद्ध स्मारक एवं मूर्तियां […] - [जय हो जग में जले जहाँ भी पुनीत अनल को](https://rajasthanhistory.com/jay-ho-jag-mein-jale-jahaan-bhee-puneet-anal-ko/): मैंने 18 मई 2010 को एक लेख लिखा- कहाँ गई दुनिया की वह सादगी, सरलता एवं भोलापन ! यह मेरी ओर से उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि थी। मैं उन्हें शाब्दिक श्रद्धांजलि के अतिरिक्त और दे ही क्या सकता था! - [युग-पुरुष भैरोंसिंह शेखावत (2)](https://rajasthanhistory.com/yugpurush-bhairon-singh-shekhawat/): युग-पुरुष भैरोंसिंह शेखावत राजनेता थे किंतु आज के नेताओं से बिल्कुल अलग थे। उनमें राजनीतिक चतुराई थी किंतु वे राजनीतिक धूर्त्तताओं से कोसों दूर रहते थे। युग-पुरुष भैंरोसिंह शेखावत राजनेता थे किंतु आज के नेताओं से बिल्कुल अलग थे। उनमें राजनीतिक चतुराई थी किंतु वे राजनीतिक धूर्त्तताओं से कोसों दूर रहते थे। उनकी जीवनी का […] - [लगातार चार बार विधायक बने (3)](https://rajasthanhistory.com/political-carrier-of-bheron-singh-shekhawat/): वर्ष 1952 में दांता रामगढ़ विधान सभा सीट जीतने के बाद भैरोंसिंह शेखावत वर्ष 1957 में श्रीमाधोपुर सीट से विधायक निर्वाचित हुए। 1962 और 1967 में वे जयुपर की किशनपोल सीट से विधायक चुने गये। इस प्रकार वे अपने राजनीतिक जीवन के आरंभ में ही लगातार चार बार विधायक बने । गांधीनगर सीट से हारे […] - [कर्मचारियों को वापस नौकरी में लिया (4)](https://rajasthanhistory.com/took-employees-back/): वर्ष 1980 में जनता पार्टी का विघटन हुआ। अटलबिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी तथा भैरोंसिंह शेखावत ने मिलकर भारतीय जनता पार्टी का गठन किया। इस प्रकार वे भाजपा के संस्थापक सदस्यों में से थे। - [भैरोंसिंह शेखावत की दूसरी सरकार (5)](https://rajasthanhistory.com/second-government-of-bhairon-singh-shekhawat/): भैरोंसिंह शेखावत की दूसरी सरकार 4 मार्च 1990 से 6 दिसम्बर 1992 तक अस्तित्व में रही। ईस्वी 1992 में जब अयोध्या का विवादित ढांचा तोड़ा गया तब प्रधानमंत्री पी.वी.नरसिम्हाराव ने भैरोंसिंह शेखावत की दूसरी सरकार को भंग कर दिया। वर्ष 1990 में राजस्थान में नवम् विधानसभा के लिये चुनाव हुए जिनमें भारतीय जनता पार्टी को […] - [केन्द्र सरकार हमें रेल दे दे (6)](https://rajasthanhistory.com/central-government-should-give-us-railways/): राजस्थान के विपुल खनिज भण्डार की शक्ति से भैरोंसिंह भलीभांति परिचित थे। इसलिये वे प्रायः कहते थे कि केन्द्र सरकार हमें रेल दे दे , हमारा राज्य देश भर की सीमेण्ट तथा मार्बल की मांग पूरी करने में सक्षम है। चुंगी की समाप्ति अपनी तीसरी सरकार के कार्यकाल में भैरोंसिंह शेखावत ने नगर पालिका नाकों […] - [गुटखा खाने वाले बाबोसा (7)](https://rajasthanhistory.com/gutkha-eater-babosa/): अपने गांव खाचरियावास में भैरोंसिंह शेखावत को बाबोसा के नाम से जाना जाता था। वे गुटखा (पान मसाला) खाने के शौकीन थे, राजस्थान का शायद ही ऐसा कोई गांव या नगर हो जिसमें उन्होंने अपने ऐसे मित्र न बना रखे हों जिनसे वे गुटखा मांगकर न खाते हों। कुछ प्रशंसकों के लिए वे गुटखा खाने […] - [लोकतांत्रिक मर्यादाओं के प्रतिमान (8)](https://rajasthanhistory.com/he-set-high-standards-of-democratic-values/): भारत की राजनीति में लोकतांत्रिक मर्यादाओं के प्रतिमान लोकतांत्रिक मर्यादाओं के प्रतिमान स्थापित करने वाले नेता कम नहीं हुए हैं किंतु सहज, सरल एवं व्यावहारिक बुद्धि वाले नेता ही अपने समय से आगे जाने वाले सिद्ध हुए हैं। भैंरोसिंह शेखावत ऐसे ही नेता थे। उन्होंने अपना जीवन बहुत छोटे स्तर के सरकारी अधिकारी के रूप […] - [संधि (10)](https://rajasthanhistory.com/the-treaty/): मराठों से संधि हो जाने पर मारवाड़ की सम्पन्नता जाती रही। कृषि नष्ट हो गई। व्यापार समाप्त हो गया। इसके उपरांत भी मराठों की मांगें दिनों-दिन बढ़ती चली गईं। इन परिस्थितियों के चलते राजा और प्रजा दोनों ही निर्धन हो गये। - [दियों में तेल (11)](https://rajasthanhistory.com/fuel-to-lamps/): सेठों ने राजा के कोप से बचने के लिये कुछ ही दिनों में गढ़ में इतना रुपया जमा करवा दिया जिससे राजा को संतोष हो जाये। महाराजा के पास इतना धन जमा हो गया था कि संध्या काल में दरबार के आयोजन के लिये दियों में तेल डाला जा सके। जून की चिलचिलाती धूप में […] - [संधि भंग (12)](https://rajasthanhistory.com/breach-of-treaty/): मालकोट इस समय पण्डित सदाशिव के अधिकार में था। वह इस अप्रत्याशित आक्रमण से हक्का-बक्का रह गया और भयभीत हो, मेड़ता छोड़कर भाग गया। मेड़ता पर दीवान फतेहचंद सिंघवी का अधिकार हो गया। - [पंचारिया बावरी (13)](https://rajasthanhistory.com/pancharia-bawari/): पंचारिया के बावरी रात के समय अचानक किसी गाँव में घुसकर रक्तपात मचा देते। सोई हुई औरतों के पैर काटकर उनमें से चांदी के कड़े निकाल लेते, कानों में पहने हुए गहनों को इस तरह छीनते कि औरतों के कान फट जाते। - [जग्गू जगन्नाथ (14)](https://rajasthanhistory.com/jaggu-jagannath/): हार-थककर जग्गू जगन्नाथ अपनी माँ के पास पहुँचा और उससे पचास हजार रुपये मांगे। उसकी माँ को राजा की धाय होने के कारण हर साल पाँच हजार रुपये वेतन मिलता था। इसलिये जग्गू को ज्ञात था कि माँ के पास अच्छी खासी पूंजी जमा है। बावरियों के आतंक से तो मारवाड़ की प्रजा को निजात […] - [व्यंग्य बाण (15)](https://rajasthanhistory.com/taunts/): जब दीवान फतहचंद खाली हाथ लौट आया तो मरुधरानाथ स्वयं घोड़े पर चढ़कर ठाकुरों को मनाने के लिये गया। उसका मुख्तियार गोवर्धन खीची उसके पीछे-पीछे चला। वह विजयसिंह के पिता के समय से राज्य का मुख्तियार था। - [मोडा आत्माराम (16)](https://rajasthanhistory.com/atmaram/): मोडा आत्माराम परम संतोषी, ईश्वर का भक्त और निस्पृही साधु था। महाराजा विजयसिंह उसी को अपना गुरु, पथ-प्रदर्शक और संरक्षक मानता था। उसी के कहने पर महाराजा अपने नाराज सरदारों के पीछे घोड़ा लेकर गया था और सरदारों की सारी बातें स्वीकार करके उन्हें दरबार में बुला लाया था। जोधपुर लौटने के बाद राजा की […] - [गढ़ के कैदी (17)](https://rajasthanhistory.com/prisoner-of-fort/): मारवाड़ के लगभग सभी बड़े ठाकुर रस्सियों में बांधकर गढ़ के कैदी बना लिए गए। अब उन्हें राजा की जेल से छुड़ा पाना किसी के लिए संभव नहीं रहा। धायभाई जगन्नाथ ने इन ठाकुरों को एक-एक करके अपने रास्ते से हटाना आरम्भ कर दिया। मारवाड़ के इतिहास में इससे पहले शायद ही कभी ऐसा हुआ […] - [कटारें (18)](https://rajasthanhistory.com/the-daggers/): धायभाई जगन्नाथ, मेड़ता में अपनी धाक जमाकर रहने लगा। उन दिनों ऐसी धाक मारवाड़ में बड़े से बड़े ठाकुर की नहीं थी। - [सोने का प्याला (19)](https://rajasthanhistory.com/cup-of-gold/): ये वही सरदार थे जिनके पूर्वजों ने मारवाड़ रियासत की श्री वृद्धि के लिये अपने प्राण न्यौछावर किये थे और इस गढ़ को खड़ा करने के लिये अपना रक्त बहाया था किंतु विद्रोही हो जाने के कारण न तो वे कुल के लिये किसी काम के रहे थे, न राज्य के और न गढ़ के। - [गढ़ बीठली अजमेर (20)](https://rajasthanhistory.com/fort-of-beethlee/): गढ़ बीठली तो हाथ आता नहीं था, इसके विपरीत हर बार मरुधरानाथ द्वारा मराठों को धन देना पड़ रहा था। इस बात का मरुधरानाथ को बहुत शोक होता था किंतु उसके पास कोई उपाय नहीं था। - [संताप (21)](https://rajasthanhistory.com/anguish/): जगन्नाथ की मृत्यु हो गई। महाराजा विजयसिंह के संताप का पहले से ही पार नहीं था। यह एक नया पहाड़ महाराजा पर टूट पड़ा। अजमेर नगर और बीठली गढ़ मरुधपति के चित्त से उतरे नहीं। रात को स्वप्न में भी उसे बीठली गढ़ दिखाई देता। उसे पाने का कोई उपाय भी दिखाई नहीं देता था। […] - [गोड़वाड़ (22)](https://rajasthanhistory.com/godwaad/): शिशु रतनसिंह की मृत्यु की बात गोपनीय रखी गई और किसी दूसरे बालक को रतनसिंह की जगह स्थापित कर दिया गया। अब वे इसी बालक को उदयपुर का महाराणा बनाने के लिये संघर्ष करने लगे। - [अणदाराम की वडारण (23)](https://rajasthanhistory.com/maid-of-andaram/): सेठ अणदाराम की वडारण गुलाब, अपनी सुदीर्घ ग्रीवा को विशेष मुद्रा में इधर-उधर घुमाती हुई सर्र से आगे निकल जाती। जैसे कोई मयूरी, उपवन के किसी कुंज की ओट से अचानक प्रकट होकर तेजी से दूसरे झुरमुट की ओर उड़ गई हो। - [बालकृष्ण लाल (24)](https://rajasthanhistory.com/baalkrishna-lal/): मरुधरानाथ विजयसिंह, बालकृष्ण लाल की शरण में आकर अपने समस्त शोक और संताप को भूल गये। मंदिर के दिव्य अनुभूति प्रदान करने वाले निर्मल वातावरण ने उनके मन को एक नया आनंद प्रदान किया। आज उन्हें पहली बार ऐसा लगा कि इस आनंद की अनुभूति से वंचित रहकर, उनका अब तक का सारा जीवन व्यर्थ […] - [मयूरगढ़ में वन मयूरी (25)](https://rajasthanhistory.com/peahen-in-mayurgadh/): गुलाबराय ने जोर-जोर से धड़कती छाती पर किसी तरह नियंत्रण पाकर श्री जी साहब, उनकी पटराणी साहिबा, राजमाता, महाराणियों, राणियों, कुँवराणियों, सरदारों और मुत्सद्दियों को मुजरा किया। - [पड़दायत (26)](https://rajasthanhistory.com/mistress/): पड़दायत हो जाने से गुलाब वडारण से राणी तो नहीं बनी किंतु राणियों से कम भी नहीं रही। अब वह परदे में भले ही चली आई किंतु उसके आदेशों की पालना करना हर किसी के लिये शासकीय अनिवार्यता बन गया। गुलाब की सुगंध फैलनी आरंभ हुई तो फैलती ही चली गई। मरुधरानाथ महाराजा विजयसिंह उस […] - [जाट राजा से दोस्ती (27)](https://rajasthanhistory.com/friendship-with-jaat-king/): इसी घाट पर मरुधरानाथ, जाट राजा के साथ पगड़ी बदल कर उसका भाई बन गया। दोनों राजाओं ने मराठों के विरुद्ध एकजुट होकर लड़ने का वचन दिया। उन्होंने मराठों को उत्तर भारत से खदेड़ने के लिये अन्य राजाओं से सहयोग लेने की भी योजना बनाई। - [पचास हजार राठौड़ (28)](https://rajasthanhistory.com/fifty-thousand-rathod/): इससे पहले कि मरुधरानाथ कुछ कहे, खींवसर के ठाकुर जोरावरसिंह करमसोत ने महाराजा विजयसिंह की ओर से उत्तर दिया – ‘महाराजा विजयसिंह हमारे स्वामी अवश्य हैं, पर धरती देना इनके अधिकार की बात नहीं है। जब तक पचास हजार राठौड़ सैनिकों के धड़ पर सिर हैं, मेवाड़ को गोड़वाड नहीं दी जावेगी।’ गोड़वाड़ मरुधरानाथ के […] - [ऊन का गोला (29)](https://rajasthanhistory.com/ball-of-wool/): वह तो बकरी की ऊन का गोला था जो ऊँट के बिदक जाने से बोरे में से निकल कर मार्ग पर लुढ़क गया था। आज प्रातः यह बात मेरे कानों तक भी आई थी कि कुछ लोगों ने उसे बकरे का कटा हुआ सिर समझकर हल्ला मचा दिया था। इसलिये मैं पहले से ही यह […] - [श्रीजी की गौएँ (30)](https://rajasthanhistory.com/cows-of-shree-ji/): नया महाराणा हम्मीरसिंह इस समय बालक था। इसलिये राजमाता ने अपने सरदारों की सलाह से मरुधरानाथ से आग्रह किया कि वह राठौड़ों की चौकियाँ मेवाड़ में बनी रहने दे। - [नाक का बाल (31)](https://rajasthanhistory.com/prestige-issue/): पूरी रात बकरे कटते रहे, ढोलनें गाती रहीं, डवड़ियाँ दारू ढालती रहीं और पातरियाँ नाचती रहीं। मण्डोर के उद्यान में ऐसी दावत बरसों के बाद हुई थी। - [अपनों से दुश्मनी (32)](https://rajasthanhistory.com/enmity-with-dears/): उस युग के सामंतों के लिये इतना संकेत भर पर्याप्त था। उसी रात जोधों ने रात में आक्रमण करके अपने गाँव छुड़ा लिये तथा किशनगढ़ के चार-पाँच गाँवों को लूट कर तहस-नहस कर दिया। - [स्वामीभक्त राणी (33)](https://rajasthanhistory.com/loyal-queen/): स्वामीभक्त राणी ने शांत स्वर से उत्तर दिया – ‘सिसोदिया वंश के सौभाग्य का सूरज दिन रात आकाश में चमकता रहे। सर्वनाश तो हम छोटे ठाकुरों का ही हो सकता है।’ महादजी सिन्धिया ने मरुधरानाथ से संधि तो कर ली थी किंतु वह संतुष्ट नहीं था। वह तो मारवाड़ को नष्ट-भ्रष्ट करके मरुधरानाथ को हमेशा […] - [परदेशियों की रोटी (34)](https://rajasthanhistory.com/foreigners-bread/): गोवर्धन खीची फौजी बेड़े के जमादार से मिला और आँखें गरम करके बोला- ‘क्यों अपनी जान और पाँच हजार परदेशियों की रोटी गंवाते हो? चलकर दरबार से माफी क्यों नहीं मांग लेते?’ धायभाई जगन्नाथ ने अपनी माँ से पचास हजार रुपये लेकर वेतन भोगी सेना खड़ी की थी जिसमें परदेशी मुस्लिम सैनिकों को मासिक वेतन […] - [पासवान (35)](https://rajasthanhistory.com/paswaan/): बडारण गुलाबराय उपलब्धि के चरम शिखर पर थी। प्रारब्ध के प्रभाव से वह राणी तो नहीं बन सकती थी किंतु राजा की पासवान होकर वह राणियों से खुलकर प्रतिस्पर्धा कर सकती थी। सफलता के जिस उच्च शिखर पर अब वह आरूढ़ थी, राणियों और महाराणियों के लिये खुले तौर पर ईर्ष्या का विषय बन गई […] - [पट्टराणी शेखावतजी (36)](https://rajasthanhistory.com/maharani-shekhawat-ji/): सामान्यतः कपूर की तरह शांत रहने वाली शेखावतजी भी चिन्गारी पाकर भभक गईं- 'कैसा कुँवर और कैसी राणी! तू बडारण है, बडारण की तरह रह।' - [पश्चाताप](https://rajasthanhistory.com/repentance/): मरुधरानाथ की दशा भी कुछ भिन्न नहीं थी। उसके नेत्रों से भी पश्चाताप के आँसुओं की अविरल धारा प्रवाहित हो रही थी। वह काफी शिथिल और कमजोर दिखाई दे रहा था। गुलाब के मुँह से चीत्कार निकल गया। वह करुण क्रंदन करती हुई महाराज के चरणों में गिर पड़ी। तिमिर को यह अनुमान तो हो […] - [तारां छाई रात ! (38)](https://rajasthanhistory.com/night-with-stars/): जब महाराज को नींद आई और शेखावतजी दबे पाँव उनके महल से बाहर निकलीं तो आकाश में कुछ निस्तेज तारे ही शेष बचे थे। तारों छाई रात विदा होने को थी और मरुधरानाथ नींद के गहरे समुद्र में जा धंसा था। - [महारानी](https://rajasthanhistory.com/highness/): महाराजा की ओर से कोई प्रतिक्रिया न देखकर किसी ठाकुर की हिम्मत नहीं हुई कि और कुछ कह सके। महाराजा ने दरबार समाप्त कर दिया किंतु पासवान को महारानी मानने का आदेश यथावत् प्रभावी रहा। मरुधरानाथ ने शेखावतजी की सम्मति से गुलाब को फिर से गढ़ में लौटने का आग्रह किया। यह आग्रह वह पहले […] - [तेजकरण को जागीर (40)](https://rajasthanhistory.com/estate-to-tejkaran/): गुलाब ने महाराज से अपने बेटे तेजकरण को जागीर दिलवा दी क्योंकि उसका पुत्र तेजकरण सिंह राणियों के कुँवरों की भाँति सुरक्षित नहीं था । महाराज की कृपा फिर से पाने के बाद गुलाब अकिंचन नहीं रही। अब वह पहले से भी अधिक मजबूत होकर उभरी। गुलाब के बाग में महाराज के गढ़ जैसा अनुशासन […] - [महाराजा को इन्कार (41)](https://rajasthanhistory.com/refusal-to-king/): वृद्ध मुत्सद्दी, पासवान द्वारा इस प्रकार प्रत्यक्षतः महाराजा के आदेश की अवहेलना करने तथा महाराजा द्वारा उसका बुरा न मानने को देखकर आश्चर्य चकित रह गया। पासवान अपनी सेना भेजने से इन्कार कर रही है। महाराजा को इन्कार मारवाड़ रियासत के लिये किसी तरह हितकर नहीं माना जा सकता। -‘घणी खम्मा, अन्नदाता।’ -‘कहो सैनिक क्या […] - [तिरिया हठ (42)](https://rajasthanhistory.com/arrogance-of-a-woman/): पासवान गुलाबराय अब सेठ अणदाराम की वडारण नहीं थी। वह मरुधरानाथ की पासवान थी और विगत तीन दशकों से मारवाड़ की राजनीति को अपनी मुट्ठी में कसकर बांधे हुए थी। राजहठ तो था ही, पासवान ने तिरिया हठ भी ठान लिया। गुलाब के गुस्से का पार न था। खीची उसके साथ ऐसा खेल खेलेगा, इसकी […] - [पलायन (43)](https://rajasthanhistory.com/getaway/): वह जानता था कि पासवान की गरम आँखें जलते हुए अंगारों की तरह उसका स्वागत करेंगी। वह महाराजा की उपस्थिति में ही इतने गंदे शब्दों का प्रयोग करेगी कि सुनने वाला शर्म से धरती में समा जाये किंतु उसके पास पासवान के समक्ष जाकर उपस्थित होने और अपनी असफलता स्वीकारने के अतिरिक्त उपाय ही क्या था! - [गालियाँ पर गालियाँ (44)](https://rajasthanhistory.com/abuses-on-abuses/): गुलाब के स्वभाव में पुरुषों की सी कठोरता आने लगी थी। उसका सुकमोल शांत स्वभाव बहुत पीछे छूट चुका था। वह गालियाँ पर गालियाँ दिए जा रही थी। - [हरामखोर (45)](https://rajasthanhistory.com/basterd/): धन, यश और राजकीय कृपा अर्जन का यह दुर्लभ अवसर था किंतु मीर वीजड़ के चालीस हजार घुड़सवारों और पदाति सेना के समक्ष बीस हजार घुड़सवारों की सेना काफी कम थी। कौन जाने सिंध तक पहुँचते-पहुँचते कितनी सेना रास्ते में समाप्त हो जाये! - [साँप को दूध (46)](https://rajasthanhistory.com/empowerment-of-enemy/): महाराजा ने सवाईसिंह की अमूल्य सेवा को देखते हुए उसके पिता और पितामह के सारे अपराध क्षमा कर दिये थे किंतु महाराजा नहीं जानता था कि वह साँप को दूध पिला रहा था। ऐसा साँप जो एक दिन अजगर बनकर महाराजा के पूरे खानदान को निगल जाने के लिये जोधाणे पर झपटने वाला था। जब […] - [सिर पर पाँव (47)](https://rajasthanhistory.com/head-to-toe/): बहराम खाँ किसी तरह सिर पर पाँव रखकर अपने प्राणों को लेकर उमरकोट से इतनी दूर गहन रेगिस्तान में भाग गया, जितनी दूर वह भाग सकता था। उसके मन में अब केवल एक ही लालसा शेष रह गई थी कि फिर कभी स्वप्न में भी उसे युद्ध के दर्शन न हों। तालपुरों के सरदार मीर […] - [चिर परिचित शत्रु (48)](https://rajasthanhistory.com/long-known-enemy/): ब मरुधरपति ने अपनी सेना शक्तावतों की सहायता के लिये मेवाड़ भेजी तो चूण्डावतों ने महादजी सिन्धिया से सहायता की पुकार लगाई। - [कृष्णाजी जगन्नाथ (49)](https://rajasthanhistory.com/krishnaji-jagannath/): कृष्णाजी जगन्नाथ, जोधपुर दरबार में राजपूताना की अन्य रियासतों की ओर से नियुक्त वकीलों से भी मिलता रहता था और उनसे प्राप्त जानकारी भी नाना फड़नवीस को पहुँचाता रहता था। - [तेजकरणसिंह (50)](https://rajasthanhistory.com/tej-karan-singh/): गुलाब, कुँवरों की इस स्थिति को देखकर अत्यंत प्रसन्न रहती थी, भीतर ही भीतर उसे लगने लगा था कि अवसर आने पर तेजकरणसिंह इन सब पर भारी पड़ेगा किंतु होनी को संभवतः कुछ और ही स्वीकार्य था। - [मेहंदी भरे हाथ (51)](https://rajasthanhistory.com/hands-full-of-henna/): मरुधरानाथ की राजधानी जोधपुर में पैंतालीस हजार घरों की बस्ती थी। कदाचित् ही कोई घर बचा था जिसके आगे मटकियां न फोड़ी गई हों। जब धरती डोलने लगी तो लोगों ने घरों के बाहर मेहंदी भरे हाथ अंकित करके नगर की रक्षक देवी चामुण्डा की टेर लगाई। आधी घड़ी बाद सारा उत्पात समाप्त हो गया।  […] - [दिन में अंधेरा (52)](https://rajasthanhistory.com/dark-day/): खीची, पासवान को एक दासी से अधिक नहीं मानता था। उसका यह भी मानना था कि दासी-पुत्र को राज्य दे देने पर राणियों के कुँवर क्या करेंगे? - [मराठों से अदाबदी (53)](https://rajasthanhistory.com/enmity-with-marathas/): मरुधरानाथ को चुप देखकर जयपुर नरेश भी फिर से चुप लगा गया और उसने महादजी को मामलत का चुकारा नहीं किया। इस पर महादजी ने पहले जयपुर से ही निबटने का मन बनाया। इस प्रकार राठौड़ों और कच्वाहों की पुनः मराठों से अदाबदी हो गई। इस काल की राजनीति में जैसलमेर तथा बीकानेर जैसी घोर […] - [फिर से गढ़ बीठली (54)](https://rajasthanhistory.com/fort-beethlee-again/): शेरखान ने जहर खाकर आत्मघात कर लिया और 24 दिसम्बर 1787 के दिन बीठली गढ़ पर धनराज सिंघवी का ध्वज फहराने लगा। - [महादजी की शपथ (55)](https://rajasthanhistory.com/mahadji-oath/): नये सैनिक सुबह शाम अपने फ्रांसिसी कमाण्डरों के निर्देशन में मथुरा की चिकनी पीली मिट्टी में परेड करते और दोपहर में पुराने सैनिकों के साथ मिलकर युद्ध की यूरोपीय शैली से अभ्यास करते। - [रूपनगर पर चढ़ाई (56)](https://rajasthanhistory.com/roopnagar-invasion/): जब करकेड़ी का राजा अमरसिंह, रूपनगर पर अधिकार नहीं कर सका तब अमरसिंह तथा महाराजा विजयसिंह की सेनाओं ने रूपनगर पर संयुक्त आक्रमण किया। - [मक्षिकापात (57)](https://rajasthanhistory.com/bad-omen/): मरुधरपति को लगा कि प्रथम ग्रासे मक्षिकापात हो गया। उन्होंने तुंगा विजय के बाद मराठों के विरुद्ध राजपूतना के राज्यों का संघ बनाने के लिये यह पहला प्रयास किया था जिसमें कोटा का वकील मक्षिकापात करके चला गया। - [बुढ़ापा(58)](https://rajasthanhistory.com/old-age/): वह एक बूढ़ा और समझदार आदमी था। उसने समय के बड़े थपेड़े झेले थे और कुलीय प्रतिस्पर्धा के चलते अपने बाप दादों का राज्य छोड़कर मरुधरानाथ के राज्य में अपने दिन काट रहा था। - [भतीजे को कपड़े (59)](https://rajasthanhistory.com/nephew-clothes/): चार शहजादे लालकिले के कोट से कूदकर मर गये। कितने ही शहजादे गुलाम कादिर की शरण में रहे। रूहेला ने बादशाह के विश्वस्त सरदार अली गौहर की औरतों की इज्जत लूट कर उन्हें पहने हुए कपड़ों में ही लाल किले से बाहर निकाल दिया। - [हाथियों की लड़ाई (60)](https://rajasthanhistory.com/elephant-fight/): महाराजा की यह दृढ़ता देखकर कृष्णाजी जगन्नाथ सहम गया। उसे अपने भविष्य की चिंता सताने लगी। उसे लगा कि हाथियों की लड़ाई में हाथियों का तो पता नहीं कुछ बिगड़ेगा या नहीं किंतु वकील जरूर पिस जायेंगे। मराठों के वकील कृष्णाजी जगन्नाथ ने मरुधरानाथ विजयसिंह द्वारा गुलाम कादिर को दिये जा रहे समर्थन के समाचार […] - [नाना साहब का आदेश (61)](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%ac-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%86%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b6/): वैसे भी आज तक मरुधरानाथ ने मराठा सरदारों को दिया ही दिया है, लिया क्या है। इसलिये आपसे विनती है कि रार न बढ़ायें। दोस्ती चल रही है, उसे आगे भी चलने दें। - [नये मित्र (62)](https://rajasthanhistory.com/new-friends/): जब तक नजफकुली रेवाड़ी पहुँचा, अली गौहर दिल्ली के तख्त पर बैठ चुका था। मरुधरानाथ की योजनानुसार नजफकुली ने अलीगौहर के कानूड़, रेवाड़ी तथा कोटपूतली खालसा परगनों पर अधिकार कर लिया। - [तैमूरशाह को निमंत्रण (63)](https://rajasthanhistory.com/invitation-to-taimurshah/): महाराजा विजयसिंह का पक्का निमंत्रण पाकर तैमूरशाह काबुल से चलकर पंजाब को पार करता हुआ जोधपुर से दो सौ पचास कोस की दूरी पर दाउद पौत्र बरुलखाँ के प्रदेश में प्रविष्ठ हुआ तथा बहावलपुर से अठारह कोस की दूरी पर दिलावल की सराय में आ ठहरा। - [अविश्वास का सूत्रपात (64)](https://rajasthanhistory.com/herald-of-mistrust/): राठौड़ों और कच्छवाहों के बीच एक बार फिर नये सिरे से अविश्वास का सूत्रपात हो गया। फिर भी मरुधरानाथ ने जयपुर वालों से कुछ कहा नहीं और रिश्तेदारी के साथ-साथ मैत्री भी बनाये रहा। अपने चालीस हजार सैनिक तैमूरशाह की सहायता के लिये सिन्ध की ओर रवाना करके मरुधरानाथ ने अपने वकील लालजी मेहता को […] - [वकीलों की पंचायती (66)](https://rajasthanhistory.com/arbitral-by-advocates/): मरुधरानाथ अब तक वकीलों की पंचायती अच्छी तरह समझ चुका था इसलिये मरुधरानाथ ने जसकरण बोहरा को काशी जाने की अनुमति नहीं दी। मरुधरानाथ अच्छी तरह जानता था कि वह यहाँ से सीधा कहाँ जायेगा! कोटा के फौजदार झाला जालिमसिंह को जब अपने वकील के माध्यम से जोधपुर महाराजा का संदेश मिला तो उसने पण्डित […] - [खीची का पलायन (66)](https://rajasthanhistory.com/getaway-of-khichi/): खीची का उत्तर पाकर महाराजा का दिल बैठ गया। वह समझ गया कि चालाक मुत्सद्दियों ने षड़यंत्र करके राजा के हाथों उसके वृद्ध सलाहकार का अपमान करवाया है। - [मैत्री भंग (67)](https://rajasthanhistory.com/breach-of-friendship/): तैमूरशाह कुछ दिन तक तो महाराजा की तरफ से सहायता आने की प्रतीक्षा करता रहा किंतु जब वहाँ से कोई उत्तर नहीं आया तो वह भी महाराजा से रुष्ट हो कर पीछे को लौट गया। - [जयपुर का पलटवार (68)](https://rajasthanhistory.com/counterattack-of-jaipur/): महादजी सिंधिया ने जयपुर नरेश को प्रस्ताव भिजवाया कि यदि वह राठौड़ों के विरुद्ध हमारी सहायता करे तो तुंगा की लड़ाई से पूर्व कच्छवाहों से लेने तय हुए बावन लाख रुपये छोड़े जा सकते हैं। महाराजा प्रतापसिंह ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। मराठों की तरफदारी करके मारवाड़ पर आंखें तरेरने वाला जयपुर का […] - [श्वसुर को उलाहना (69)](https://rajasthanhistory.com/remonstrate-with-father-in-law/): जयपुर नरेश प्रतापसिंह ने मरुधरपति को उलाहना भरी चिट्ठी लिखी कि आपने यह सलाह दी है कि हम इस्माईल बेग को अपने साथ ले लें, अपना प्रदेश दे दें और खर्च के लिये पैसा भी दे दें। यह सब तब ठीक होता यदि वह हमारे राज्य की रक्षा करता आया हो। - [हाथी के दाँत (70)](https://rajasthanhistory.com/hypocrisy/): कृष्णाजी जगन्नाथ ने नाना साहब पेशवा को जवाब भिजवाया कि हाथी के दाँत की तरह इनके भी खाने के दाँत और दिखाने के दांत अलग हैं। नाना साहब फाड़नवीस दूरदर्शी व्यक्ति था। उसीने पेशवा की ओर से उत्तर भारत में खण्डनी वसूल करने के लिये महादजी सिन्धिया तथा तुकोजीराव को नियुक्त किया था। उसने ही […] - [शत्रु आगमन की सूचना (71)](https://rajasthanhistory.com/enemy-arrival-notice/): बोयने ने दो-आब के उपजाऊ मैदानों में घूम-घूम कर ग्यारह बटालियनें तैयार कर लीं जिनका प्रशिक्षण यूरोपीय युद्ध पद्धति से किया। जब यह तैयारी पूरी हो गई तो महादजी ने मराठा सूबेदार तुकोजीराव को भी इस युद्ध के लिये आमंत्रित किया। - [पाटन (72)](https://rajasthanhistory.com/paatan/): डी बोयने ने अपनी पूरी सेना जयपुर के नागा एवं जमातिया सैनिकों पर झौंककर उनका लगभग सफाया कर दिया। तब तक रात घिर आई और हाथ को हाथ सूझना बंद हो गया। राठौड़ सैनिक पाटन में घुस तो गये किंतु वे मार्गों, भवनों, गलियों आदि से परिचित नहीं थे। मरुधरपति ने महादजी के विरुद्ध जयपुर […] - [मेड़ता की ओर (73)](https://rajasthanhistory.com/towards-merta/): गंगाराम भण्डारी अब भी अपने दो हजार सैनिकों को साथ लेकर युद्ध के मैदान में डटा हुआ था किंतु जब उसने देखा कि बाजी राठौड़ों के हाथ से निकल गई तो उसने अपने दो हजार सैनिकों के साथ युद्ध का मैदान छोड़ दिया और मेड़ता की ओर भाग लिया। उसने मेड़ता के छोटे से मैदानी […] - [भगदड़ (74)](https://rajasthanhistory.com/stampede/): प्रजा गढ़ छोड़कर जाने की बजाय महाराजा के महल के समक्ष आकर जयघोष करने लगी। सैंकड़ों नौजवानों ने अपने पुश्तैनी धंधे छोड़कर युद्ध कौशल सीखने की इच्छा जताई। - [महादजी सिंधिया से संधि (75)](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%9c%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a4%bf/): जब मराठों के साथ कोई सुलह नहीं हो सकी तब मरुधरानाथ ने राज्य कार्य से उदासीन होकर गोकुलस्थ गुरु गुसाईं के साथ ईश्वर भक्ति और पाठ पूजा में तल्लीन होने का प्रयास किया। - [दुर्दशा (76)](https://rajasthanhistory.com/predicament/): भीमराज सिंघवी डांगावास का युद्ध हारने के बाद दरबार में कम ही आता था। गोरधन खीची सलाह तो देता था किंतु राजा हर सलाह के बाद गुलाब की ओर देखकर मौन हो जाता था। - [उद्दण्ड चाम्पावत (77)](https://rajasthanhistory.com/defiant-champawat/): मरुधरानाथ सवाईसिंह की यह हरकत देखकर स्तम्भित रह गया किंतु वह अपने इस उद्दण्ड चाम्पावत और षड़यंत्री सरदार के विरुद्ध न तो कुछ करने की स्थिति में था और न उसने कुछ किया। खीची फिर से सवाईसिंह की हवेली में जाकर बैठ गया। गोवर्धन खीची हाथ नहीं आया और सवाईसिंह ने उसे अपनी हवेली में […] - [मक्कार की मक्कारी (78)](https://rajasthanhistory.com/cunningness-of-cunning/): जब चार घड़ी के विचार विमर्श का कोई परिणाम निकलता नहीं देखा तो मरुधरपति ने अपने सरदारों से कहा- 'मुझे मारकर कहीं भी जाना।' इतना कहकर महाराजा वहाँ से उठकर चला गया। - [उत्तराधिकारी (79)](https://rajasthanhistory.com/successor/): गुलाब को कुँवर के आने की सूचना की भनक लग गई, इससे उसने मंदिर जाने का निश्चय त्यागकर, कक्ष में से विषबुझी कटार उठाकर सावधानी से अपने कपड़ों में छुपा ली और महाराज के निकट आकर खड़ी हो गई। - [नागिन की फुंफकार (80)](https://rajasthanhistory.com/the-serpents-hiss/): इधर मरुधरानाथ गढ़ को गया और उधर गुलाब ने अपने विश्वासपात्र खींवा खीची को कुँवर भीमसिंह की हत्या का दायित्व सौंपा। पासवान ने उसे आदेश दिया कि यह कार्य हर हालत में कल का सूर्य निकलने से पहले हो जाना चाहिये। - [दैत्याकार मशालें (81)](https://rajasthanhistory.com/giant-torches/): मरुधरानाथ ने गुलाब को उसका मन-चीता करने की स्वीकृति तो दे दी किंतु उसका मन अपार पीड़ा से भर गया। एक प्रश्न बार-बार उसके मस्तिष्क में कौंधता था। क्या वह इतना अधम है जो अपने ही रक्त का नाश करेगा! - [टेढ़ी निगाहें (82)](https://rajasthanhistory.com/angry-eyes/): जब गोवर्धन खीची ने सुना कि मेहकरण, शाहमल और मिर्जा इस्माईल विद्रोही होकर लूटमार कर रहे हैं तो एक दिन अवसर पाकर वह गढ़ पर गया। - [दासीपुत्र के लिये टीका (83)](https://rajasthanhistory.com/fifty-thousand-rupees/): जिस समय आप शेरसिंह को टीका दिलायेंगी, उस समय हम भी नये स्वामी के सेवक हो जाते हैं। अतः हमारे लिये भी टीका भिजवाया जाना चाहिये। आज से ठीक दसवें दिन हम टीका लेकर आयेंगे। - [नया युवराज (84)](https://rajasthanhistory.com/new-prince/): मारवाड़ की परम्परा के अनुसार कुँवर जालमसिंह सबसे बड़ा जीवित पुत्र होने के नाते युवराज पद पाने का अधिकारी था किंतु उसकी माता मरुधरानाथ से नाराज होकर अपने पुत्र को लेकर उदयपुर चली गई थी तथा वहीं रहती थी इस कारण युवराज पद पर उसका दावा उतना प्रबल नहीं रहा था। - [दगा ही दगा (85)](https://rajasthanhistory.com/cheat-on-cheat/): भवानीराम भण्डारी पीढ़ी दर पीढ़ी से जोधपुर राज्य का नौकर था। वह मरुधरानाथ की ओर से संधि का प्रस्ताव लेकर महादजी के पास गया किंतु वापस लौट कर आने के स्थान पर महादजी सिन्धिया के कारभारी आबाजी रघुनाथ चिटनिस की सहायता से वहीं जम गया। - [वकील का गुस्सा (86)](https://rajasthanhistory.com/lawyers-anger/): इस पत्र में वकील का गुस्सा स्पष्ट दिखाई देता था। उस काल के वकील भी बड़े से बड़े योद्धा, सामंत, राजकुमार और रानी के विरुद्ध स्पष्ट टिप्पणियां करते थे। यह पत्र आज भी मराठों के दस्तावेजों में पड़ा उस काल के इतिहास की गवाही दे रहा है। पाठक इस बात से परिचित हैं कि नाना […] - [भवानीराम भण्डारी (87)](https://rajasthanhistory.com/bhawaniram-bhandhari/): भवानीराम भण्डारी चाहता था कि उसे जोधपुर राज्य का दीवान बनाया जाए। उसने पासवान गुलाबराय को प्रसन्न करके अपनी उन्नति का मार्ग खोलना चाहा। पासवान तक पहुंचना आसान नहीं था इसलिए भण्डारी ने महादजी सिंधिया की शरण ली। भवानीराम भण्डारी को पता था कि पासवान गुलाबराय अपने पुत्र शेरसिंह को जोधपुर का राजा बनाना चाहती […] - [धोरों में नरमुण्ड](https://rajasthanhistory.com/skulls-in-sandunes/): जोधपुर में बैठा सवाईसिंह चाम्पावत यह समाचार पाकर तिलमिलाकर रह गया। उसने आदेश दिया कि जैसलमेर के ऊँटसवारों को मार्ग में ही घेरकर मारा जाये। - [महाषड़यंत्र (89)](https://rajasthanhistory.com/grand-conspiracy/): नवकोटि मारवाड़ के धणी के विरुद्ध महाषड़यंत्र की रचना होने लगी। इसके रचयिता कोई और नहीं, मरुधरानाथ के लिए मर-मिटने वाले ठाकर ही थे। राजों-रजवाड़ों में ऐसा होता ही रहता था, यह कोई नई बात नहीं थी। मरुधरपति द्वारा समस्त राज्यकार्य अपनी प्रेयसी गुलाबराय को दे दिये जाने के कारण मुत्सद्दियों में द्वेष भावना तेजी […] - [जगन्नाथ की मुसीबत](https://rajasthanhistory.com/jagannaths-trouble/): जगन्नाथ की मुसीबत दो तरफा थी। एक तरफ तो पासवान गुलाबराय नाराज थी और दूसरी ओर राज्य के ठाकुर उसकी जान के दुश्मन हुए बैठे थे। गुलाब का संकेत पाकर खींवसर के ठाकुर भौमसिंह, पासवान के मुख्तियार भैरजी साणी, प्रधान सवाईसिंह चाम्पावत और दीवान भवानीराम भण्डारी ने कृष्णाजी जगन्नाथ को हवेली में जान से मार […] - [हाथी घोड़े पालकी (91)](https://rajasthanhistory.com/elephants-horses-sedan/): दुष्ट धनसिंह इस समय पासवान की कैद में था। चार दिन पूर्व ही पासवान ने सब लोगों के सामने हथकड़ी पहनाकर उसकी जोरदार बेइज्जती की थी - [महाराजा पर खंजर (92)](https://rajasthanhistory.com/daggers-on-the-maharaja/): इस समय चारों ओर उपद्रव का वातावरण है। सरदार और मुत्सद्दी रुष्ट होकर मालकोसनी जा बैठे हैं तथा गुलाब का मन भी शान्त नहीं है। दो-चार दिन धीरज रखो। जागीर फिर से तुम्हारे नाम करवा दूंगा। - [सिर पर खून सवार (93)](https://rajasthanhistory.com/run-amok/): महाराजा के सिर पर खून सवार था। उसका विचार था कि नमक हराम कर्मचारियों तथा सवाईसिंह आदि पाँच-सात षड़यन्त्रियों को मार डाला जाए ताकि गुलाब का इन दुष्ट लोगों से पीछा छूट जाये और वह भी सही मार्ग पर आकर दरबार की राजनीति से अलग हो जाये। जब मरुधरानाथ ने देखा कि दो-चार ठाकुरों को […] - [सवाईसिंह चाम्पावत (94)](https://rajasthanhistory.com/clash-of-pots/): सवाईसिंह गढ़ से तो चुपचाप चला तो गया किंतु वह चुप बैठने वालों में से नहीं था। उसने घात लगाकर भैरजी की हत्या करने की योजना बनाई। - [कुँवर जालमसिंह (95)](https://rajasthanhistory.com/the-rebellion-of-jalamsingh/): जालमसिंह ने जोधपुर के सरदारों को पत्र लिखकर सूचित किया कि हम जोधपुर और नागौर पर अधिकार करने का प्रयास कर रहे हैं। आप सब ठाकुर और मुत्सद्दी हमारी सेवा में आ जायें। - [पासवान की दुर्दशा (96)](https://rajasthanhistory.com/paswans-predicament/):   राज्य में चारों तरफ से संकट के बादल गहराने लगे। पासवान की दुर्दशा का समय आया जानकर उसके अपने ही वफादार सामंत, नौकर और मित्र पासवान को छोड़कर बागियों के खेमे में जाकर शामिल होने लगे। जब सरदार राज्य छोड़कर चले गये, सवाईसिंह ने भी आँखें पलट लीं और मरुधरपति शेरसिंह के स्थान पर […] - [कुँवर भीमसिंह (97)](https://rajasthanhistory.com/hidden-subject/): जब शीतला सप्तमी भी निकल गई तो मरुधरपति ने सरदारों को जोधपुर कूच का आदेश दिया। सरदार इस बार जोधपुर कूच के लिये सहमत हो गये। अभी ये लोग मालकोसनी तक पहुँचे ही थे कि जोधपुर से भयानक सूचना आई- कुँवर भीमसिंह ने जोधपुर नगर और गढ़ पर अधिकार कर लिया। जब राज्य के लगभग […] - [गुलाबराय की हत्या (98)](https://rajasthanhistory.com/caged-bird/): जैसे ही गुलाब का सिर घाटी में लुढ़का, उसी समय अंधेरे में से निकलकर दुष्ट सवाईसिंह और जवानसिंह प्रकट हुए। उन्होंने पीनस में रखी हीरे मोती और जवाहरों से भरी हुई पोटली उठा ली तथा गुलाब की शेष रही सम्पत्ति को लूटने के लिये उद्यान महल की ओर बढ़ गये। - [मरुधरानाथ का धैर्य (99)](https://rajasthanhistory.com/fort-again/): मरुधरानाथ का धैर्य देखकर मारवाड़ के सामंत हैरान थे। महाराज को इस बात की चिंता नहीं थी कि उनके पौत्र ने मेहरानगढ़ पर अधिकार कर लिया है और वह महाराज को गढ़ में घुसने तक नहीं दे रहा। उसे तो केवल और केवल अपनी गुलाब की चिंता थी। मरुधरानाथ को बालसमंद के बगीचे में रहते […] - [छल (100)](https://rajasthanhistory.com/deceit/): दासियों के जवाब सुनकर मरुधरानाथ की दशा एक बार फिर खराब हो गई। एक चक्कर आया और वह पुनः बेसुध होकर ढोलिये पर एक ओर को लुढ़क गया। ड्यौढ़ीदार ने मरुधरानाथ की देह को संभाला। - [करनी का फल (101)](https://rajasthanhistory.com/brought-upon/): मरुधरानाथ चाहता था कि कुंवर भीमसिंह को उसकी करनी का फल मिले किंतु मारवाड़ के सामंत भीमसिंह को किसी प्रकार की हानि नहीं पहुंचाना चाहते थे। वे रूपावत सरदार पर सारा दोष डालकर उसी को दण्ड दिलवाने के लिए आतुर थे। मरुधरानाथ से विदा लेकर कुँवर भीमसिंह सिवाना के लिये चल दिया। जब तक वह […] - [भाग्यहीन युवराज (102)](https://rajasthanhistory.com/luckless-prince/): महाराज को इस तरह क्रोध करता देखकर शेरसिंह की हैरानी का पार न रहा। उसकी माता पहले ही मर गई थी। सूरजमल ने उसे जालौर से निकाल दिया था और अब मरुधरपति भी उससे रुष्ट हो गया था। - [महाराजा का मौन (103)](https://rajasthanhistory.com/maharajas-silence/): वात का प्रकोप इतना बढ़ गया कि उठना, बैठना, बोलना और चलना भी लगभग बंद हो चला। महाराजा का मौन पूरे मारवाड़ की बेचैनी बढ़ा रहा था। मरुधरपति और भी वृद्ध और अशक्त हो गया। उससे राज-काज बिलकुल भी नहीं होता था। कई बार वह सोचता था कि शासन के पूरे अधिकार अपने छोटे पौत्र […] - [अनंत गगन की ओर (104)](https://rajasthanhistory.com/to-the-infinite-sky/): ठीक इसी समय उसकी मूर्च्छा टूटी और अगले ही क्षण उसके प्राण पंखेरू अनंत गगन की ओर उड़ चले। आकाश में ऊपर उठती हुई गुलाब उसे लेने के लिये फिर से नीचे उतरी। दोनों पागल प्रेमी फिर से एक थे। पेड़ों के ऊपर से उड़ते हुए चले जा रहे थे। राजा के पुरखों का गढ़ […] - [महाराजा सूरजमल - प्राक्कथन](https://rajasthanhistory.com/foreword-maharaja-surajmal/): महाराजा सूरजमल – प्राक्कथन पृष्ठ पर डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित पुस्तक महाराजा सूरजमल का युग एवं प्रवृत्तियाँ की विषय-वस्तु को स्पष्ट किया गया है। महाराजा सूरजमल अठारहवीं सदी के भारत का निर्माण करने के लिये उत्तरदायी प्रमुख व्यक्तियों में से एक थे। उनका जन्म ऐसे समय में हुआ जब उत्तर भारत की राजनीति जबर्दस्त […] - [जाटों का संघर्ष](https://rajasthanhistory.com/background-of-the-birth-of-maharaja-surajma/): जब सत्रहवीं शताब्दी ईस्वी के आरम्भ में दिल्ली के मुसलमान सेनापतियों ने जाटों पर अत्याचार आरम्भ किए, तब जाटों ने अत्याचारों के विरुद्ध आवाज उठानी आरम्भ की तथा इस प्रकार जाटों का संघर्ष आरम्भ हुआ। जाटों का अधिवास एवं प्रवृत्तियां जाट एक अत्यंत प्राचीन भारतीय समुदाय है। यह प्रायः कृषि एवं पशुपालन से जुड़ा हुआ, […] - [जाट राज्य की स्थापना](https://rajasthanhistory.com/establishment-of-jat-principality/): ईस्वी 1722 में भारत के इतिहास में पहली बार जाट राज्य की स्थापना हुई तथा भरतपुर नामक नवीन रियासत का गठन हुआ। जाट राज्य की स्थापना इस बात का द्योतक है कि उस काल में जयपुर नरेश सवाई जयसिंह राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण राजनीति कर रहा था। वह मराठों को रोकना चाहता था और इस […] - [राजकुमार सूरजमल के कार्य](https://rajasthanhistory.com/surajmals-work-as-a-prince/): बीस वर्ष तक राज्य का संचालन करने के बाद अर्थात् 1742 ई. के लगभग, राजा बदनसिंह की आंखों की ज्योति घटने लगी। अतः उसने राज्य विस्तार, सैन्य संगठन तथा राजनैतिक वार्त्ताओं के अधिकार अपने ज्येष्ठ पुत्र राजकुमार सूरजमल को सौंप दिये तथा स्वयं कौमी परिषद के साथ बैठकर राज्य का आन्तरिक प्रबंध करने लगा। ई.1745 […] - [चरम उत्कर्ष की ओर](https://rajasthanhistory.com/towards-the-climax/): बदनसिंह तथा सूरजमल द्वारा किए जा रहे सहयोग से प्रभावित होकर मुगल वजीर सफदरजंग ने बादशाह से अनुशंसा की कि सूरजमल को 3000 जात और 2000 घुड़सवार का मनसब दिया जाये तथा उसके पुत्र रतनसिंह को राव की उपाधि दी जाये। सूरजमल के पुत्र जवाहरसिंह के मनसब में भी वृद्धि की जाये। इस प्रकार जाट […] - [महाराणा राजसिंह एवं औरंगजेब (39)](https://rajasthanhistory.com/maharana-raj-singhs-struggle-against-aurangzeb/): महाराणा राजसिंह वीर, बुद्धिमान और प्रतिष्ठित राजा था। उसमें राजनीतिक चातुर्य कूट-कूट कर भरा था। - [महाराणा राजसिंह - औरंगजेब संघर्ष (40)](https://rajasthanhistory.com/struggle-between-maharana-raj-singh-of-mewar-and-aurangzeb/): महाराणा राजसिंह – औरंगजेब संघर्ष भारत के इतिहास का गौरवमयी पृष्ठ है। इस संघर्ष में महाराणा राजसिंह ने औरंगजेब को अनेक मोर्चों पर मात दी तथा उसे उत्तर भारत छोड़कर दक्षिण भारत भाग जाने पर विवश कर दिया। मेवाड़ की पहाड़ियों में औरंगजेब का घमण्ड ठीक वैसे ही चूर-चूर कर दिया जिस प्रकार महाराणा प्रताप […] - [औरंगजेब और महाराणा जयसिंह (41)](https://rajasthanhistory.com/aurangzebs-treaty-with-maharana-jai-singh/): औरंगजेब और महाराणा जयसिंह के सम्बन्धों को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है। पहले हिस्से में महाराणा जयसिंह ने अपने पिता राजसिंह के समय से जारी मेवाड़-मुगल संघर्ष को जारी रखा तथा दूसरे हिस्से में मेवाड़-मुगल संधि फिर से पुनर्जीवित हो गई जो महाराणा अमरसिंह के समय में स्थापित हुई थी। महाराणा राजसिंह के […] - [मुगल सल्तनत का विघटन (42)](https://rajasthanhistory.com/decline-of-mughal-power/): ई.1707 में औरंगजेब की मृत्यु के समय देश में हाहाकार मचा हुआ था। क्या हिन्दू क्या मुसलमान, सब उससे घृणा करते थे। जाट, सिक्ख, मराठे और राजपूत उसके बैरी हुए फिरते थे। इस कारण मुगल सल्तनत का विघटन आरम्भ हो गया। वस्तुतः मुगल सल्तनत के विघटन की प्रक्रिया तो औरंगजेब के जीवनकाल में ही आरम्भ […] - [मुगलों का पतन और मेवाड़ की भूमिका (43)](https://rajasthanhistory.com/role-of-mewar-in-the-disintegration-of-the-mughal-state/): मुगलों का पतन कोई आकस्मिक घटना नहीं थी। इसकी एक लम्बी प्रक्रिया थी जो औरंगजेब की मजहबी कट्टरता के कारण आरम्भ हुई थी। जब औरंगजेब उत्तर भारत छोड़कर दक्षिण भारत में चला गया तब मुगलों का पतन बड़ी तेजी से हुआ। मुगलों के पतन में मेवाड़ की बड़ी भूमिका थी, विशेषकर महाराणा राजसिंह की! 23 […] - [होल्कर सिन्धिया और पंवार (44)](https://rajasthanhistory.com/mewar-in-maratha-poltitics-holkar-sindhia-panwar/): ई.1724 के बाद पेशवा के तीन सेनानायकों- होल्कर सिन्धिया और पंवार ने क्रमशः इन्दौर, ग्वालियर और धार में मराठा शक्ति का विस्तार किया। शिवाजी के वंशज सतारा में निवास करने लगे। अब वे मराठा संघ के नाम मात्र के मुखिया थे। राज्य का संचालन पेशवा द्वारा किया जाता था जो पुणे में रहता था। छत्रपति […] - [मराठों के विरुद्ध कार्यवाही (45)](https://rajasthanhistory.com/mewar-in-maratha-politics-action-against-maratha/): जब मराठे मुगल क्षेत्रों को लूटने लगे और राजपूत राजाओं के नियंत्रण से बाहर हो गए तब मुगल बादशाह मुहम्मदशाह रंगीला ने मराठों के विरुद्ध कार्यवाही करने का विचार किया। मुगलों द्वारा मराठों के विरुद्ध किया गया यह अंतिम प्रयास था। इसके बार मुगल सेनाएं कहीं भी कुछ भी करने योग्य नहीं रहीं। इस समय […] - [मराठा राजनीति में मेवाड़ (46)](https://rajasthanhistory.com/mewar-in-maratha-politics/): अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी ईस्वी में मराठा राजनीति में मेवाड़ को जो सशक्त भूमिका निभानी चाहिए थी, मेवाड़ उस भूमिका को निभाने में असमर्थ रहा। इसका बड़ा कारण अल्पवय महाराणाओं के काल में मराठों द्वारा मेवाड़ राज्य को लूटने की प्रवृत्ति रहा। राजपूत राजाओं को मराठा राजनीति का सामने करने लिए एकजुट होकर राजपूताने के […] - [ईस्ट इण्डिया कम्पनी की राजनीति (47)](https://rajasthanhistory.com/east-india-companys-politics-towards-maratha-and-pindaris/): ई.1608 से ईस्ट इण्डिया कम्पनी भारत में व्यापार कर रही थी तथा व्यापारिक सुविधाओं के प्रसार के नाम पर, भारत के देशी राज्यों को हड़पती जा रही थी। अठारहवीं शताब्दी के अंत में कम्पनी के भारतीय क्षेत्र एक विशाल साम्राज्य में बदल गये थे जिनकी सुरक्षा के लिये कम्पनी, विभिन्न भारतीय शक्तियों से न केवल […] - [ईस्ट इण्डिया कम्पनी का राजपूताना में प्रवेश (48)](https://rajasthanhistory.com/entry-of-east-india-company-into-rajputana-politics/): ईस्ट इण्डिया कम्पनी का राजपूताना में प्रवेश अनायास ही नहीं हुआ था। इसके लिए कम से कम दो दशकों से कम्पनी सरकार के उच्च स्तर पर मंथन चल रहा था। अंग्रेज राजपूताना की राजनीति में प्रवेश नहीं करना चाहते थे किंतु जब उन्होंने देखा कि यदि कम्पनी सरकार ने राजपूताना राज्यों को अपने अधीन नहीं […] - [महाराणा जवानसिंह की राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका (49)](https://rajasthanhistory.com/effective-role-in-national-politics-by-maharana-jawan-singh/): 16 मार्च 1828 को महाराणा भीमसिंह का निधन हो गया तथा जवानसिंह, मेवाड़ का महाराणा हुआ। महाराणा भीमसिंह के 50 वर्षों के दीर्घ शासनकाल में मेवाड़ राज्य तथा ईस्ट इण्डिया कम्पनी के बीच जो नये सम्बन्ध स्थापित हुए थे, उन सम्बन्धों को महाराणा जवानसिंह के समय में गति मिली तथा राष्ट्रीय राजनीति में महाराणा की […] - [महाराणा स्वरूपसिंह राष्ट्रीय राजनीति में (50)](https://rajasthanhistory.com/role-of-maharana-swaroop-singh-in-national-politics/): 3 जून 1842 को महाराणा सरदारसिंह का निधन हुआ। उसके निःसंतान होने के कारण उसके छोटे भाई सरूपसिंह को मेवाड़ का महाराणा बनाया गया। महाराणा स्वरूपसिंह मेवाड़ का पहला महाराणा था जिसने राज्य के कार्यों में अपने अधिकारों का प्रयोग किया और राज्य की आर्थिक सम्पन्नता को पुनर्स्थापित किया। महाराणा स्वरूपसिंह ने सामंतों पर अपने […] - [महाराणा शंभुसिंह के काल की घटनाओं का राष्ट्रव्यापी प्रभाव (51)](https://rajasthanhistory.com/nationwide-impact-of-the-events-of-maharana-shambhu-singhs-time/): महाराणा शंभुसिंह ने राजराणा पृथ्वीसिंह से नसीराबाद में भेंट की। कोटा के राजा के समान उसका आदर करके उसे अपनी बाईं तरफ बैठाया तथा मोरछल, चंवर आदि लवाजमा रखने की अनुमति दी और हाथी, घोड़े, खिलअत तथा जेवर देकर उसे विदा किया। अठारह सौ सत्तावन का विद्रोह समाप्त हो जाने के बाद भारत में अंग्रेजों […] - [महाराणा सज्जनसिंह का राष्ट्रीय राजनीति पर प्रभाव (52)](https://rajasthanhistory.com/maharana-sajjan-singhs-influence-on-national-politics/): 16 जुलाई 1874 को महाराणा शम्भुसिंह का निधन हो गया। महाराणा के निःसंतान होने के कारण बागोर के महाराज शक्तिसिंह का 15 वर्षीय पुत्र सज्जनसिंह महाराणा की गद्दी पर बैठाया गया। महाराणा सज्जनसिंह के काल में देश में आर्य समाज आंदोलन बड़ी तेजी से चल पड़ा था। महाराणा सज्जनसिंह द्वारा बड़ौदा नरेश के पीछे बैठने […] - [महाराणा फतहसिंह का ब्रिटिश सत्ता से विवाद (53)](https://rajasthanhistory.com/maharana-fatehsinghs-dispute-with-british-officials/): 23 दिसम्बर 1884 को महाराणा सज्जनसिंह का निधन हो गया। सज्जनसिंह के पुत्र नहीं होने के कारण, शिवरती के महाराज दलसिंह का तीसरा पुत्र फतहसिंह, मेवाड़ का महाराणा हुआ। राष्ट्रीय राजनीति पर महाराणा फतहसिंह ने जो प्रभाव स्थापित किया, उसकी तुलना युग-धर्म परिवर्तन के कारण भले ही महाराणा सांगा, महाराणा कुंभा, महाराणा प्रताप तथा महाराणा […] - [महाराणा फतहसिंह और दिल्ली दरबार (54)](https://rajasthanhistory.com/maharana-fatehsinghs-absence-in-delhi-durbar/): हाराणा उदयपुर से रवाना होकर 31 दिसम्बर 1903 की रात को दिल्ली पहुंचा परंतु ज्वर हो जाने के कारण दरबार में सम्मिलित नहीं हुआ। - [राष्ट्रीय राजनीति में महाराणा फतहसिंह का प्रभाव (55)](https://rajasthanhistory.com/maharana-fateh-singhs-influence-in-national-politics-2/): राष्ट्रीय राजनीति में महाराणा फतहसिंह का प्रभाव काफी बढ़ा-चढ़ा था। वे अंग्रेजी सत्ता के लिए चुनौती बन गए थे। अंग्रेज उन्हें पसंद नहीं करते थे। इसलिए अंग्रेजों ने उन्हें जबर्दस्ती शासन के अधिकार से वंचित करके उनके पुत्र भूपालसिंह को शासन के समस्त अधिकार सौंप दिए। महाराणा की तीर्थयात्रा ई.1909 में महाराणा फतहसिंह, एकलिंग मंदिर […] - [नरेन्द्र मण्डल में मेवाड़ की उदासीनता (56)](https://rajasthanhistory.com/mewars-apathy-in-the-politics-of-narendra-mandal/): नरेन्द्र मण्डल में मेवाड़ की उदासीनता आधुनिक भारत के इतिहास में मेवाड़ की उस प्रवृत्ति को स्पष्ट करती है जिसमें मेवाड़ यह दिखाना चाहता था कि वह अंग्रेजी परमोच्चता को थोपने वाली संस्थाओं में राजनीति करने के स्थान पर अपनी स्वतंत्रता को अधिक महत्व देता है। युवराज के पद पर रहते हुए ही महाराजकुमार भूपालसिंह […] - [महाराणा भूपालसिंह द्वारा भारत संघ योजना को समर्थन (57)](https://rajasthanhistory.com/maharana-bhupal-singh-supported-the-union-of-india-plan/): जिस समय भारत की लगभग समस्त रियासतों के राजा अंग्रेजों द्वारा प्रस्तावित भारत संघ योजना से दूर रहकर भारत राष्ट्र के निर्माण में बाधा बने हुए थे, उस कठिन काल में महाराणा भूपालसिंह द्वारा भारत संघ योजना को समर्थन दिया गया जिससे भारत राष्ट्र के निर्माण का स्वप्न साकार हो सका। भारत संघ योजना बीसवीं […] - [मेवाड़ में प्रजामण्डल आंदोलन के प्रति महाराणा का व्यवहार (58)](https://rajasthanhistory.com/mewars-behavior-towards-prajamandal-movement-and-national-movement/): राजगोपालाचारी ने वर्मा को आश्वासन दिया कि यदि वे महाराणा को दिया गया अल्टीमेटम वापिस ले लें तो महाराणा, उदयपुर में उत्तरदायी शासन की स्थापना कर देंगे किंतु वर्मा ने स्वीकार नहीं किया। - [क्रिप्स कमीशन एवं कैबीनेट मिशन से मेवाड़ की उदासीनता (59)](https://rajasthanhistory.com/mewar-was-not-interested-in-cripps-commission-and-cabinet-mission/): जब लंदन की सरकार ने भारत को स्वतंत्र करने के लिए भारत के भावी स्वरूप की संभावनाओं का पता लगाने हेतु क्रिप्स कमीशन एवं कैबीनेट मिशन भिजवाए तब मेवाड़ ने इन मिशनों के प्रति उदासीनता का प्रदर्शन किया। ई.1942 में जब द्वितीय विश्वयुद्ध चल रहा था और युद्ध में अंग्रेजों की हालत पतली होने लगी […] - [मेवाड़ का भारत संघ में प्रवेश (60)](https://rajasthanhistory.com/accession-of-mewar-to-the-union-of-india/): मेवाड़ का भारत संघ में प्रवेश कई प्रकार की राजनीतिक संभावनाओं को तलाशने के बाद हुआ। मेवाड़ भारत की आजादी के बाद भी हर हाल में अपनी स्वतंत्रता और सर्वोच्चता को बनाए रखना चाहता था किंतु कांग्रेसी नेता प्रत्येक राज्य को बराबरी के स्तर पर भारत संघ में मिलाना चाहते थे। राजस्थान, गुजरात एवं मालवा […] - [संयुक्त राजस्थान से इन्कार (61)](https://rajasthanhistory.com/maharana-refused-to-enter-united-rajasthan/): मेवाड़ महाराणा भूपालसिंह अपने स्तर पर देशी राज्यों का एक समूह बनाकर एक अलग राज्य बनाना चाहते थे किंतु अन्य राज्यों ने महाराणा के इस प्रयास को नकार दिया। जब भारत सरकार ने अपनी ओर से संयुक्त राजस्थान बनाना चाहता तो महाराणा ने संयुक्त राजस्थान से इन्कार कर दिया। भारत की आजादी के बाद छोटी-छोटी […] - [महाराणा का प्रजामण्डल से टकराव (62)](https://rajasthanhistory.com/confrontation-between-maharana-and-praja-mandal/): जिस समय भारत में ब्रिटिश प्रांतों की जनता आजादी की लड़ाई लड़ रही थी, उस समय देशी राज्यों की जनता प्रजामण्डलों के माध्यम से अपने राज्यों में उत्तरदायी शासन के लिए संघर्ष करने लगी। वस्तुतः ये दोनों प्रकार के संघर्ष भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के दो प्रमुख अंग थे। मेवाड़ रियासत में महाराणा का प्रजामण्डल […] - [संयुक्त राजस्थान में प्रवेश (63)](https://rajasthanhistory.com/mewar-states-entry-into-the-united-states-of-rajasthan/): मेवाड़ रियासत का संयुक्त राजस्थान में प्रवेश न केवल राजस्थान निर्माण के लिए महत्वपूर्ण घटना सिद्ध हुई अपितु भारत के भविष्य के लिए भी मील का पत्थर सिद्ध हुई। मेवाड़ के सुयंक्त राजस्थान में विलय ने रियासती भारत एवं स्वतंत्र भारत को मजबूती से जोड़कर एक कर दिया। जनसंख्या, राजस्व तथा क्षेत्रफल के आधार पर […] - [राममूर्ति की सलाहकार पद पर नियुक्ति (64)](https://rajasthanhistory.com/ramamurthy-appointed-as-consultant-of-udaipur-state/): महाराणा भूपालसिंह, अपने प्रधानमंत्री सर राममूर्ति को, संयुक्त राजस्थान राज्य का सलाहकार नियुक्त करना चाहते थे ताकि उन्हें राजनीतिक विषयों पर उचित सलाह मिलती रहे। चूंकि राज्य में लोकप्रिय सरकार का गठन हो चुका था इसलिये केन्द्र सरकार की स्वीकृति के बिना ऐसा किया जाना संभव नहीं था। अतः महाराणा ने भारत सरकार से वार्त्ता […] - [महाराणा भूपालसिंह वृहत् राजस्थान में (65)](https://rajasthanhistory.com/greater-rajasthan-and-maharana-bhupal-singh/): महाराणा भूपालसिंह वृहत् राजस्थान में मिलने के लिए भारत सरकार के सामने बहुत कड़ी शर्तें रख रहे थे। इस कारण भारत सरकार को इस विषय पर अत्यधिक माथापच्ची करनी पड़ी तथा महाराणा के सम्मान को देखते हुए एक उचित समाधान ढूंढा गया। मेवाड़ के संयुक्त राजस्थान में विलय हो जाने के बाद जयपुर, जोधपुर, बीकानेर […] - [स्वतंत्र भारत में मेवाड़ राजवंश की रचनात्मक भूमिका (66)](https://rajasthanhistory.com/creative-role-of-mewar-in-independent-india/): स्वतंत्र भारत में मेवाड़ राजवंश की रचनात्मक भूमिका भारत के अन्य राजवंशों की तुलना में कहीं अधिक दिखाई देती है। जिस प्रकार रियासती काल में मेवाड़ सब राज्यों का सिरमौर रहा, स्वतंत्र भारत में भी मेवाड़ राजवंश अपनी रचनात्मक भूमिका के कारण भारत के प्राचीन राजवंशों का सिरमौर बना हुआ है। जब राजे-रजवाड़े समाप्त हो […] - [उपसंहार - राष्ट्रीय राजनीति में मेवाड़ का प्रभाव (67)](https://rajasthanhistory.com/conclusion-on-role-of-mewar-in-national-politics/): उपसंहार – राष्ट्रीय राजनीति में मेवाड़ का प्रभाव पृष्ठ पर डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित पुस्तक राष्ट्रीय राजनीति में मेवाड़ का प्रभाव का निष्कर्ष प्रस्तुत किया गया है। ई.566 से पूर्व किसी समय में स्थापित होने वाला गुहिल राजवंश, भारत की राष्ट्रीय राजनीति में लगभग 1400 वर्ष तक महत्ती भूमिका निभाता रहा। इस तरह की […] - [कोलवी की बौद्ध गुफाएं](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%b2%e0%a4%b5%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a5%8c%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a7-%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%ab%e0%a4%be%e0%a4%8f%e0%a4%82/): इसमें कोई संदेह नहीं कि कोलवी की बौद्ध गुफाएं बेहद रहस्यमय, रोमांचक और विस्मयकारी हैं किंतु बहुत कम लोग जानते होंगे कि ये गुफाएं अपने आप में खूनी इतिहास समेटे बैठी हैं। भगवान बुद्ध कभी राजस्थान नहीं आये किंतु उनके निर्वाण के बाद के 1000 सालों में राजस्थान बौद्ध धर्म के बहुत बड़े केन्द्र के […] - [अग्निकुण्ड से प्रकट हुए चौहान (1)](https://rajasthanhistory.com/chauhan-appeared-from-fire-pool-on-mount-abu/): अनेक ग्रंथों की मान्यता है कि देश एवं धर्म की रक्षा के लिए अग्निकुण्ड से प्रकट हुए चौहान तब तक देश के शत्रुओं से मोर्चा लेते रहे जब तक कि वे स्वयं पूरी तरह निर्बल नहीं हो गए। भारत में क्षत्रिय राजवंश वैदिक काल में ही स्थापित होने आरम्भ हो गए थे। वेदों में अनेक […] - [चांदी की झील शाकंभरी ने बनाकर चौहानों को दी (2)](https://rajasthanhistory.com/mata-shakambhari-gave-the-chauhans-a-silver-lake/): कुछ प्राचीन ग्रंथों में कहा गया है कि शाकंभरी ने चौहानों को चांदी की झील बनाकर दी। नमक के सफेद रंग के कारण नमक की झील को चांदी की झील कहा गया। - [चौहान राजकुमार लोत खलीफा की सेना से लड़ा! (3)](https://rajasthanhistory.com/the-seven-year-old-prince-lot-of-the-chauhans-fought-the-army-of-khalifa/): दुर्लभराज के परिवार के प्रत्येक पुरुष ने युद्ध में तलवार लेकर शत्रु का सामना किया तथा चौहान रानियों ने तारागढ़ दुर्ग में जौहर का आयोजन किया। - [चौहान शासक चार सौ साल तक तुर्कों को भारत में घुसने से रोकने में सफल रहे! (4)](https://rajasthanhistory.com/the-chauhans-did-not-allow-the-turks-to-enter-india-for-four-hundred-years/): इसे मध्यकालीन इतिहास की महत्वपूर्ण उपलब्धि समझा जाना चाहिए कि राजपूत शासक अरब रेगिस्तान से आए मुसलमानों को भारत में घुसने से रोकने में चार सौ साल तक सफल रहे। इनमें चौहान शासक भी प्रमुख थे। गूवक (प्रथम) के बाद उसका पुत्र चंद्रराज (द्वितीय) अजमेर का शासक हुआ। उसके बाद गूवक (द्वितीय) अजमेर का राजा […] - [राजा वीर्यराम चौहान ने महमूद गजनवी को युद्ध में घायल करके भगा दिया! (5)](https://rajasthanhistory.com/king-of-ajmer-veer-ram-chauhan-wounded-mahmud-ghaznavi/): भारत की पश्चिमोत्तर सीमा पर स्थित अफगानिस्तान में गजनी एवं गोर नामक छोटे राज्यों  के तुर्क स्वामी महमूद गजनवी ने ई.1000 में बगदाद के खलीफा से अनुमति लेकर भारत पर इस्लामिक आक्रमण करने आरमभ किए। - [हिमालय से विंध्य तक का प्रदेश चौहानों ने तुर्कों से मुक्त करवा लिया! (6)](https://rajasthanhistory.com/the-chauhans-liberated-the-region-from-the-himalayas-to-the-vindhyas-from-the-turks/): अजयराज को अजयराज चक्री भी कहते थे क्योंकि उसने चक्र की तरह दूर-दूर तक बिखरे हुए शत्रुदल को युद्ध में जीता था। अर्थात् वह चक्रवर्ती विजेता था। - [शवों पर झील बना दी अर्णोराज ने (7)](https://rajasthanhistory.com/arnoraj-killed-thousands-of-turks-and-built-a-lake-on-their-dead-bodies/): शत्रु सैनिकों के शवों पर झील बनावाने की घटना अजमेर के इतिहास को गौरवमयी बनाता है। बनाती है। यह अपने आप में एकेली ऐसी ऐतिहासिक घटना है। अजयदेव चौहान के बाद उसका पुत्र अर्णोराज अजमेर का स्वामी हुआ। अर्णोराज को आनाजी भी कहते हैं। अर्णोराज ई.1133 के आसपास चौहानों के सिंहासन पर बैठा तथा ई.1155 […] - [चौहान और चालुक्य परस्पर नष्ट हो गए (8)](https://rajasthanhistory.com/chauhans-and-chaulukyas-killed-each-other/): बारहवीं शताब्दी ईस्वी में चौहान और चालुक्य उत्तर भारत की दो बड़ी शक्तियां थे। राज्य विस्तार की लालसा के कारण दोनों ने परस्पर युद्धरत रहकर एक-दूसरे को नष्ट कर दिया! चौहान और चालुक्य शक्तियों के बीच राज्य विस्तार को लेकर पिछली कई शताब्दियों से संघर्ष चला आ रहा था। अर्णोराज चौहान के समय में यह […] - [राजा वीसलदेव चौहान ने तुर्कों को अटक नदी के पार खदेड़ दिया (9)](https://rajasthanhistory.com/king-visaladeva-chauhan-drove-the-turks-across-the-river-atak/): राजा वीसलदेव चौहान ने देश से मुसलमानों का सफाया कर दिया तथा तथा उन्हें अटक नदी के उस पार फैंक दिया। अटक नदी भारत की पश्चिमी सीमा बन गई। चौलुक्य शासक कुमारपाल के हाथों चौहान राजा अर्णोराज की पराजय के बाद अर्णोराज ने अपनी खोई हुई शक्ति का पुनः संकलन करके अपनी विजय पताका सिंधु […] - [सोमेश्वर को भाग्यवश मिला चौहानों का सिंहासन (10)](https://rajasthanhistory.com/prithvirajs-father-someshwar-luckily-got-the-throne-of-the-chauhans/): राज्य पर सोमेश्वर का अधिकार सबसे कम था क्योंकि स्वर्गीय राजा विग्रहराज (चतुर्थ) के दो पुत्र जीवति थे किंतु अजमेर के मंत्रियों ने अपदस्थ राजा अमरगागेय तथा उसके छोटे भाई नागार्जुन को राजा बनाने की बजाय स्वर्गीय विग्रहराज (चतुर्थ) के एक मात्र जीवित छोटे भाई सोमेश्वर को राजा बनाने का निर्णय लिया। ई.1163 में विग्रहराज […] - [रानी कर्पूरदेवी ने चौहानों का राज्य संभाल लिया (11)](https://rajasthanhistory.com/rani-karpoordevi-took-over-the-kingdom-of-chauhans/): रानी कर्पूरदेवी अजमेर का शासन चलाने लगी। कर्पूरदेवी, चेदि देश की राजकुमारी थी तथा कुशल राजनीतिज्ञ थी। उसने बड़ी योग्यता से अपने अल्पवयस्क पुत्र के राज्य को संभाला। ई.1178 में सोमेश्वर की मृत्यु हो गई। पृथ्वीराज रासो के अनुसार सोमेश्वर के भाई कानराई ने अजमेर के भरे दरबार में एक गलतफहमी के कारण अन्हिलवाड़ा के […] - [पृथ्वीराज चौहान को राज्याधिकार (12)](https://rajasthanhistory.com/prithviraj-chauhan-has-come-to-play-role-in-history/): ई.1180 में केवल 14 वर्ष की आयु में राजा पृथ्वीराज चौहान को राज्याधिकार प्राप्त हो गए। उसने राज्य के समस्त उच्च पदों पर नियुक्त अपनी माता के विश्वस्त मंत्रियों एवं अधिकारियों को हटाकर अपने विश्वास के मंत्रियों एवं अधिकारियों को नियुक्त कर दिया। ई.1180 में केवल 14 वर्ष की आयु में राजा पृथ्वीराज चौहान ने […] - [पृथ्वीराज की सोलह रानियाँ (13)](https://rajasthanhistory.com/there-were-sixteen-queens-of-emperor-prithviraj-chauhan/): जैसे-जैसे पृथ्वीराज चौहान की विजययात्रा आगे बढ़ती गई, वैसे-वैसे उसका वैभव बढ़ता गया और वैसे-वैसे ही उत्तर भारत के विभिन्न राजकुलों ने अपनी राजकुमारियां पृथ्वीराज से ब्याहनी आरम्भ कर दीं। विभिन्न ग्रंथों में पृथ्वीराज चौहान की रानियों की अलग-अलग संख्या एवं अलग-अलग नाम मिलते हैं। कुछ संदर्भ पृथ्वीराज की सोलह रानियाँ बताते हैं। पृथ्वीराज विजय […] - [रानी इच्छिनी की कथा (14)](https://rajasthanhistory.com/story-of-queen-ichhini-of-emperor-prithviraj-chauhan/): चंदबरदाई कृत पृथ्वीराज रासो में रानी इच्छिनी की कथा मिलती है किंतु अन्य किसी भी प्रमाण से रानी इच्छिनी की कथा ऐतिहासिक सिद्ध नहीं होती। अजिया की ही तरह सम्राट पृथ्वीराज की कुछ अन्य रानियों के साथ प्रेम कथाएं भी जुड़ी हुई हैं जिनके अध्ययन से ज्ञात होता है कि विभिन्न राज्यों की राजकुमारियां सम्राट […] - [रानी चंद्रावती पुण्डीर की कथा (15)](https://rajasthanhistory.com/story-of-queen-chandravati-pundir-of-emperor-prithviraj-chauhan/): रानी इच्छिनी की तरह रानी चंद्रावती पुण्डीर की कथा भी चंद बरदाई कृत पृथ्वीराज रासो में मिलती है। इस रानी के सम्बन्ध में कुछ अन्य ऐतिहासिक तथ्य भी प्राप्त होते हैं। पृथ्वीराज रासो नामक काव्य में यह वर्णन मिलता है कि राजा चंद्र पुण्डीर की राजकुमारी चंद्रावती का विवाह पृथ्वीराज चौहान के साथ हुआ था […] - [रानी पद्मावती की कथा (16)](https://rajasthanhistory.com/history-of-emperor-prithviraj-chauhans-queen-padmavati/): रानी इच्छिनी तथा रानी चंद्रावती पुण्डीर की तरह की तरह रानी पद्मावती की कथा भी चंद्र बरदाई द्वारा लिखित पृथ्वीराज रासो में मिलती है। रानी पद्मावती की कथा की ऐतिहासिकता संदिग्ध है। पृथ्वीराज रासो नामक काव्य में ‘पद्मावतीसमय’ नामक एक आख्यान भी दिया गया है। इसके अनुसार पूर्व दिशा में समुद्रशिख नामक प्रदेश पर विजयपाल […] - [चौहान-चालुक्य संधि (17)](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%9a%e0%a5%8c%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a4%bf/): चौहान-चालुक्य संघर्ष कई शताब्दियों से चला आ रहा था। दोनों ही शक्तियां एक-दूसरे को मिटाकर अपने राज्य का विस्तार करना चाहती थीं। इस कारण राष्ट्र शक्ति की बहुत क्षति हो रही थी। अंत में चौलुक्यों के प्रधानमंत्री ने चौहान-चालुक्य संधि करवाकर दोनों पक्षों में शांति स्थापित करवाई। ई.1182 में भण्डानकों का दमन करने के पश्चात् […] - [चंदेलों से युद्ध (18)](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%9a%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%af%e0%a5%81%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a7/): चौहान साम्राज्य की पूर्वी सीमा चंदेलों के राज्य से मिलती थी। चंदेल राजा परमारदी देव गाहड़वालों से मित्रता रखता था। गाहड़वालों की चौहानों से दुश्मनी थी। इस कारण पृथ्वीराज चौहान का चंदेलों से युद्ध हुआ। चौहान साम्राज्य की पूर्वी सीमा चंदेलों के राज्य से मिलती थी। चंदेल राजा परमारदी देव गाहड़वालों से मित्रता रखता था। […] - [आल्हा-ऊदल (19)](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%86%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%b9%e0%a4%be-%e0%a4%8a%e0%a4%a6%e0%a4%b2/): आल्हा-ऊदल भारतीय मध्यकालीन इतिहास के ऐसे रहस्यमय योद्धा हैं जिनके किस्से लोकगीतों में भी गाए जाते हैं तथा इतिहास की पुस्तकों में भी पढ़ाए जाते हैं। इनकी प्रशंसा में लिखे गए गीत वीर-रस से ओत-प्रोत होते हैं। पिछली कड़ी में हमने विभिन्न इतिहासकारों द्वारा प्रस्तुत मतों एवं शिलालेखों के आधार पर चौहान-चंदेल संघर्ष की चर्चा […] - [आल्ह-खण्ड (20)](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%86%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%b9-%e0%a4%96%e0%a4%a3%e0%a5%8d%e0%a4%a1/): आल्ह-खण्ड मूलतः एक मौखिक महाकाव्य है जिसकी कहानी पृथ्वीराज रासो और भाव पुराण नामक ग्रंथ की मध्यकालीन पांडुलिपियों में पाई जाती है। इसे कलियुग का महाभारत भी कहा गया है। हमने पिछली दो कड़ियों में चौहान-चंदेल संषर्ष पर चर्चा की थी। इस कड़ी में हम राजा परमारदी देव की ओर से लड़े दो भाइयों आल्हा-ऊदल […] - [राजकुमारी संयोगिता (21)](https://rajasthanhistory.com/king-prithviraj-chauhan-kidnaps-princess-sanyogita/): पृथ्वीराज रासो एवं अन्य भाट ग्रंथों में पृथ्वीराज एवं जयचंद की शत्रुता का जो कारण बताया है वह गलत है। - [बर्बर तुर्क (22)](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ac%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ac%e0%a4%b0-%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%95/): तुर्कों के पूर्वज हूण थे तथा वे चीन की पश्मिोत्तर सीमा पर रहते थे। - [गुजरात के चौलुक्य (23)](https://rajasthanhistory.com/chaulukyas-of-gujarat-beaten-muhammad-gauri-tightly/): भारत के अन्य हिन्दू राजाओं ने मुहम्मद गौरी को कोई बड़ी मुसीबत नहीं समझा और भारतीय हिन्दू राजा अपनी परस्पर लड़ाइयों में व्यस्त रहे। - [मुहम्मद गौरी पंजाब के रास्ते भारत में घुस गया (24)](https://rajasthanhistory.com/muhammad-ghori-entered-india-through-punjab/): राजा पृथ्वीराज ने आगे बढ़कर सरहिंद के दुर्ग पर फिर से अधिकार कर लिया ताकि गौरी के किलेदार काजी जियाउद्दीन को बंदी बनाकर अजमेर ले आया। - [पृथ्वीराज चौहान का व्यक्तित्व विरूपति किया लोकसाहित्य ने (25)](https://rajasthanhistory.com/to-make-him-extremely-great-the-personality-of-prithviraj-chauhan-was-distorted/): राजा पृथ्वीराज सम्बन्धी लोकसाहित्य ने ऐतिहासिक तथ्यों को विरूपित करके ऐसा घनघोर वितण्डा मचाया है कि राजा पृथ्वीराज चौहान का व्यक्तित्व ही बदल गया है। पृथ्वीराज रासो के अनुसार पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गौरी के बीच 21 लड़ाइयां हुईं जिनमें राजा पृथ्वीराज चौहान की सेनाएं विजयी रहीं। हम्मीर महाकाव्य ने पृथ्वीराज द्वारा सात बार गौरी […] - [राजा जयचंद गाहड़वाल गद्दार नहीं था (26)](https://rajasthanhistory.com/king-jaichand-gahadwal-was-not-a-traitor/): भारतीय जनमानस में यह धारणा गहराई तक पैठ गई है कि राजा जयचंद गाहड़वाल ने राजा पृथ्वीराज चौहान से अपनी पुरानी शत्रुता का बदला लेने के लिए ई.1192 में गजनी के शासक मुहम्मद गोरी को भारत पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया था। इस धारणा का मुख्य आधार मिनाहाजुद्दीन सिराज द्वारा लिखी गई पुस्तक […] - [मुहम्मद गौरी का छल (27)](https://rajasthanhistory.com/muhammad-ghori-tricked-king-prithviraj-in-the-guise-of-a-treaty/): मुहम्मद गौरी जानता था कि वह सम्मुख युद्ध में राजपूतों से नहीं जीत सकता। इसलिए उसने एक कपटजाल बुना जिसे अति आत्मविश्वास से भरा हुआ राजा पृथ्वीराज समझ नहीं सका और मुहम्मद गौरी का छल सफल हो गया। ई.1192 में जब मुहम्मद शहाबुद्दीन गौरी पृथ्वीराज पर आक्रमण करने आया तो कुछ भारतीय शक्तियां भी उसके […] - [पृथ्वीराज चौहान की हत्या 28](https://rajasthanhistory.com/muhammad-ghori-blinded-king-prithviraj-and-took-his-life-with-stones/): पृथ्वीराजा रासो ने राजा पृथ्वीराज चौहान की हत्या का प्रकरण इतना सुलझा दिया है कि सत्य का निश्चय नहीं किया जा सकता। फिर भी आधुनिक काल में हुई शोधों ने स्पष्ट कर दिया है कि पृथ्वीराज चौहान की हत्या अजमेर में हुई थी न कि गजनी में। पिछली कड़ी में हमने पृथ्वीराजा रासो में दिए […] - [दिल्ली पर तुर्कों का शासन](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a4%a8/): राजा पृथ्वीराज चौहान की पराजय के बाद दिल्ली पर तुर्कों का शासन हो गया। न केवल दिल्ली अपितु अजमेर, हांसी, सिरसा, समाना तथा कोहराम के क्षेत्र भी मुहम्मद गौरी के अधीन हो गये। तराइन के युद्ध में पृथ्वीराज की हार से हिन्दू धर्म की बहुत हानि हुई। इस युद्ध में हजारों हिन्दू योद्धा मारे गये। […] - [गजनी का प्रतिशोध (30)](https://rajasthanhistory.com/ghazni-took-terrible-revenge-from-the-rajputs-of-ajmer/): गजनी का प्रतिशोध बहुत भयानक था। गजनी से आई विशाल सेना ने राजपूतों से बीठली का दुर्ग फिर से छीन लिया तथा अजमेर में कत्ले आम किया। गजनी से आई सेना ने तारागढ़ में स्थित समस्त राजपूत सैनिकों को मारने के बाद दुर्ग के निकट रहने वाले राजपूत परिवारों को पकड़कर उनकी सुन्नत की और […] - [चौहान साम्राज्य तुर्कों के अधीन हो गया (31)](https://rajasthanhistory.com/vast-chauhan-empire-came-under-the-control-of-the-turks/): पृथ्वीराज चौहान के पुत्र गोविंदराज ने रणथंभौर की चौहान शाखा की नींव रखी। आगे चलकर इस वंश में हम्मीर चौहान नामक विख्यात राजा हुआ जो अपनी शरणागत वत्सलता, प्रण और वीरता के लिए प्रसिद्ध हुआ। - [प्रस्तावना - भगवान कल्याण राय के आंसू](https://rajasthanhistory.com/preface-bhagwan-kalyan-rai-ke-ansu/): अकबर के जीवन के अंतिम हिस्से में, जयपुर एवं जोधपुर रियासतों के मध्य में 858 वर्गमील क्षेत्रफल वाली किशनगढ़ रियासत ने जन्म लिया। - [खून और वफादारी का घालमेल (1)](https://rajasthanhistory.com/mixing-blood-and-loyalty/): मुगलिया सल्तनत में जगत गुसाइन को जोधाबाई के नाम से भी पुकारा जाता था। जहाँगीर के राज्य में शासन का काम भले ही उसकी पत्नी नूरजहाँ संभाल रही थी किंतु हिन्दू सरदारों में जोधाबाई की अच्छी प्रतिष्ठा हो गई तथा उसका रुतबा, मुगलिया सल्तनत में नूरजहाँ से कम नहीं था। - [दोस्ती (2)](https://rajasthanhistory.com/friendship/): र्रम इस समय पैंतीस साल का युवक था और किशनगढ़ का तेजस्वी राठौड़ महाराजा सहसमल उससे छः साल छोटा होने से अट्ठाईस साल का बांका जवान था। - [अठारह मुगलों का कत्ल (3)](https://rajasthanhistory.com/murder-of-eighteen-mughals/): राठौड़ राजा सहसमल ने अपने फुफेरे भाई और अपने मित्र शहजादे खुर्रम के डेरे में उपस्थित होकर यह होश उड़ा देने वाली सूचना दी। - [शरणागत वत्सल (4)](https://rajasthanhistory.com/protecting-refugee/): महाराजा सहसमल ने आखिरी सांस ली और केवल तीस साल की आयु में किशनगढ़ का राजसिंहासन खाली छोड़कर, सदैव के लिए आँखें मूंद लीं। - [महाराजा हरिसिंह (5)](https://rajasthanhistory.com/irony-of-fate/): इस प्रकार पूरे सोलह साल तक महाराजा हरिसिंह मुगलों के लिए लड़ाइयाँ करता रहा। वह एक अच्छा चित्रकार था और युद्ध के मोर्चे पर भी अवसर मिलते ही अपनी तूलि, रंग और कागज लेकर बैठ जाता था। - [श्याम सुंदर लाल (6)](https://rajasthanhistory.com/shyam-sunder-lal/): गंगा-यमुना के इस मिलन में सरस्वती भला कैसे पीछे रह सकती थी! आम्बेर के कच्छवाहों ने भी महाराज रूपसिंह की जय-जयकार से आकाश गुंजा दिया। भाटी सबलसिंह इन्हीं कच्छवाहों की राजकुमारी के पेट से जन्मा था। - [दुर्लभ चित्र (7)](https://rajasthanhistory.com/rare-picture/): इन्हीं दुर्लभ चित्रों के बीच एक चित्र ऐसा भी था जो बादशाह सिकंदर लोदी के समय से दिल्ली के बादशाहों के खास महल की शोभा बढ़ा रहा था। - [बलख बदखशाँ (8)](https://rajasthanhistory.com/balakh-badkhashan/): शाहजहाँ भी अपनी पिछली चार पीढ़ियों से चली आ रही परम्परा का निर्वहन करते हुए मध्य एशिया को जीतने और उस पर अधिकार जमाए रखने का लगातार प्रयास कर रहा था। - [शाह अब्बास के भयानक सपने](https://rajasthanhistory.com/shah-abbass-nightmares/): शाह अब्बास चाहता था कि मुगलों को ट्रांस-ऑक्सियान में घेर कर पीस दिया जाए ताकि उसके बाद कांधार पर आसानी से अधिकार किया जा सके। - [औरंगज़ेब की मक्कारी (10)](https://rajasthanhistory.com/aurangzebs-cravings/): औरंगज़ेब जब ऑक्सस के तट पर पहुँचा तो अब्दुल अजीज, दनदनाती तोपें लेकर उसका सामना करने के लिए तैयार था। एक ओर तो भयानक ऑक्सस नदी के तट पर खड़े लाखों क्रूर उजबेकों को बंदूकों और तोपों के साथ सन्नद्ध देखकर तथा दूसरी ओर औरंगजेब की मक्कारी देखकर औरंगज़ेब के सेनापतियों के होश उड़ गए। […] - [मन चाही मुराद (11)](https://rajasthanhistory.com/desired-wish/): मेरे नेकदिल दोस्त! आप अपनी इच्छा बताएं। या तो आज हम आपकी मन चाही मुराद पूरी करेंगे या फिर कभी आपसे कुछ मांगने के लिए कहने का दुःसाहस नहीं करेंगे।’ शाहजहाँ ने भावुक होकर कहा। इस बार भी जब महाराजा रूपसिंह दिल्ली आया तब बादशाह ने पहले की ही भांति उसका भव्य स्वागत किया। लाल […] - [रूपनगढ़ (12)](https://rajasthanhistory.com/roopangarh/): महाराजा रूपसिंह ने पहाड़ी नदी का नामकरण करके उसे रूपनदी घोषित किया और उसके किनारे पर अपनी स्मृति के आधार पर लगभग एक मील के घेरे में काहमर्द जैसा ही एक दुर्ग बनवाना आरंभ किया। महाराजा ने दुर्ग के चारों ओर गहरी और चौड़ी खाइयां खुदवाईं और उनमें रूपनदी का जल भर दिया ताकि शत्रु […] - [कान्धार में (13)](https://rajasthanhistory.com/kandhaar/): औरंगज़ेब को ऑक्सस नदी के तट से अपने डेरे समेट कर आगरा लौटने की इतनी हड़बड़ी थी कि वह एक दिन भी मार्ग में व्यर्थ नहीं जाने देना चाहता था। - [पांच हजारी जात (14)](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%9a-%e0%a4%b9%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a4/): शाहजहाँ ने रूपसिंह को चित्तौड़ के लिए रवाना करने से पहले दरबारे आम का आयोजन किया तथा उसमें महाराजा रूपसिंह को पांच हजारी जात और पांच हजार सवारों का मनसब देने की घोषणा की। किशनगढ़ के राजाओं के लिए चरमोत्कर्ष का क्षण आ पहुँचा था। अब किशनगढ़ का राजा भी आम्बेर के मिर्जा राजा जयसिंह, […] - [भगवान वल्लभाचार्य की वापसी (15)](https://rajasthanhistory.com/return-of-lord-vallabhacharya/): शहजादे दारा ने बादशाह के हाथों से चित्र लेकर पास में ही रखी एक मेज पर रख दिया। मुगलों के महल में भगवान वल्लभाचार्य की वापसी एक बार फिर हो गई। ‘शहंशाहे आलम, राजा रूपसिंह राठौड़ मुजरा अर्ज कर रहे हैं।’ दारा शिकोह ने बूढ़े और बीमार बादशाह की ख्वाबगाह में प्रवेश करके उसे सूचित […] - [मुगलिया हरम की शहजादियाँ (16)](https://rajasthanhistory.com/princess-of-mughals/): चारों शहजादियाँ अपनी पसंद के भाई को अपने बाप शाहजहाँ के तख्ते ताउस, कोहिनूर हीरे तथा दिल्ली के लाल किले का जल्दी से जल्दी वारिस बनाने का ख्वाब देखा करती थीं। - [हत्यारिन मुगलिया राजनीति (17)](https://rajasthanhistory.com/mughals-deadly-politics/): खुर्रम शाहजहाँ के नाम से बादशाह था और उसके शहजादे उसका तख्ते ताउस, कोहिनूर हीरा तथा लाल किला पाने के लिए अपने बाप और भाइयों के खून के प्यासे हो रहे थे। - [भगवान कल्याणराय के आँसू (18)](https://rajasthanhistory.com/tears-of-lord-kalyan-rai/): महाराजा रूपसिंह के आश्चर्य का पार नहीं था कुछ क्षणों के लिए वैसे ही हतप्रभ से बैठा रहा और फिर प्रभु को नमस्कार करके पूजागृह से बाहर हो गया। - [भगवान कल्याणराय माण्डलगढ़ में (19)](https://rajasthanhistory.com/lord-kalyan-rais-visit-to-mandalgarh/): भगवान कल्याणराय माण्डलगढ़ में आए हुए अभी अधिक समय नहीं बीता था कि दिल्ली में बादशाह शाहजहाँ फिर से बीमार पड़ गया। इस बार उसकी बीमारी पहले से भी ज्यादा गंभीर थी। जब मेवाड़ के महाराणा राजसिंह ने शाहजहाँ की बीमारी के बारे में सुना तो उसने माण्डलगढ़ पर आक्रमण कर दिया। महाराजा रूपसिंह जब […] - [फिर से आगरा (20)](https://rajasthanhistory.com/agra-again/): शाहजहाँ यद्यपि पूर्ण स्वस्थ हो गया था फिर भी शरीर में पहले जैसी फुर्ती नहीं आ पाई थी। हकीमों ने उसे सलाह दी कि संभवतः दिल्ली की आबोहवा बादशाह के लिए मुफीद नहीं है। - [मुमताज महल की औलादें (21)](https://rajasthanhistory.com/mumtaz-mahal-and-her-children/): तब मुमताज महल के शव को एक बार फिर कब्र से बाहर निकाला गया तथा इस बार उसे ताजमहल के एक तहखाने में दफनाया गया। - [वली-ए-अहद (22)](https://rajasthanhistory.com/vali-e-ahad/): पिछली बीमारी के अनुभव के कारण इस बार की बीमारी में शाहजहाँ ने झरोखा दर्शन देना जारी रखा। - [वेशिकोह - दारा शिकोह (23)](https://rajasthanhistory.com/veshikoh-dara-shikoh/): मुहम्मद काजिम नामक एक लेखक ने अपने ग्रंथ ‘आलमगीरनामा’ में  दारा शिकोह को ‘ वेशिकोह – दारा शिकोह ‘ अर्थात् बिना इज्जत वाला लिखा दारा शिकोह लिखा तथा उसने अपना ग्रंथ औरंगज़ेब को भेंट किया। मुहम्मद काजिम को उम्मीद थी कि औरंगज़ेब उसे शाबासी देगा किंतु औरंगज़ेब ने वह पुस्तक उठाकर फैंक दी क्योंकि उसमें […] - [खूनी जंग की शुरुआत (24)](https://rajasthanhistory.com/beginning-of-bloody-battle/): शाहशुजा ने अपनी सेना के साथ आगरा के लिए कूच कर दिया और अपने कूच की जानकारी दोनों छोटे भाइयों को लिख भेजी तथा एक स्वतंत्र बादशाह की तरह उन्हें परवाने भिजवाए कि वे भी अपनी-अपनी सेनाओं के साथ बिना किसी विलम्ब के आगरा की ओर कूच करें। इस प्रकार खूनी जंग की शुरुआत हो […] - [बगल में छुरियाँ (25)](https://rajasthanhistory.com/betrayal/): जब दारा ने सुना कि दोनों शाहजादों की संयुक्त सेनाएँ दिपालपुर में आकर मिल गई हैं तो उसने बादशाह की तरफ से फरमान जारी किया कि मारवाड़ नरेश जसवन्तसिंह अपनी सेनाएं लेकर बनारस से सीधे ही दिपालपुर की तरफ बढ़ें। - [आगरा के दरवाजे (26)](https://rajasthanhistory.com/doors-of-agra/): जब शाहजहाँ को ज्ञात हुआ कि दारा शिकोह ने आगरा की हिफाजत के नाम पर आगरा के दरवाजे बंद करके शाही सेनाएं आगरा के दरवाजों के बाहर ही तैनात कर दी हैं तो वह, दारा की ओर से भी आशंकित हो गया। उधर महाराजा जसवंतसिंह ने उज्जैन की राह ली और इधर वली-ए-अहद दारा शिकोह […] - [कासिम खाँ की नमक हरामी (27](https://rajasthanhistory.com/treacherous-qasim-khan/): कासिम खाँ की नमक हरामी देखकर महाराजा जसवंतसिंह सन्न रह गया। महाराजा को अपनी और अपने सैनिकों की मृत्यु सामने दिखाई देने लगी किंतु फिर भी महाराजा जसवंतसिंह ने हिम्मत नहीं हारी और वह कमर कसकर मरने-मारने को तैयार हो गया। एक जमाने में कासिम खाँ बहुत छोटा सा सिपाही हुआ करता था किंतु शहजादे […] - [भगवान कल्याणराय की आँखों में आँसू](https://rajasthanhistory.com/tears-in-lord-kalyan-rais-eyes/): राजकुमारी चारुमती के कोमल हाथों को ही अब न केवल इस टिमटिमाते हुए दिए की रक्षा करनी थी अपितु स्वयं को भी औरंगज़ेब के क्रूर थपेड़ों से बचाना था। - [प्राक्कथन पासवान गुलाबराय](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a4%a5%e0%a4%a8-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%ac%e0%a4%b0%e0%a4%be/): खवास उस दासी को कहते थे जो राजा को खास अर्थात् विशेष प्रिय होती थी। पड़दायत उससे उच्च श्रेणी की स्त्री होती थी जो राजा की प्रीतपात्री होने के कारण रानियों की तरह पर्दे में रहती थी, जबकि पासवान वह होती थी जिसे राजा ने अपने पास उपस्थित रहने का अधिकार दे रखा हो। - [नवकोटि मारवाड़ के धणी (1)](https://rajasthanhistory.com/lords-of-marwar/): मुगल सान्निध्य के प्रभाव से, जयपुर नरेश के षड़यंत्र से और मारवाड़ के दुर्भाग्य से 23 जुलाई 1724 को अजीतसिंह के पुत्र बखतसिंह ने अपने बड़े भाई अभयसिंह के उकसाने पर, नींद में सोते हुए अपने पिता महाराजाधिराज अजीतसिंह और उसकी पड़दायत गंगा की हत्या कर दी। - [मदमत्त मरहठे (2)](https://rajasthanhistory.com/arrogant-marathe/): 1526 इस्वी के बाद दिल्ली की जिन गलियों में मुगलों के रौब-दाब और शानोशौकत के डंके बजते थे और जिनकी धूम दक्खिन में भी पूरी बुलंदी के साथ सुनी जाती थी, उन डंकों की आवाजें 1680 ईस्वी के पश्चात् धीमी पड़नी लगी थीं। मदमत्त मरहठे अपने घोड़ों पर बैठकर नर्मदा पार करने लगे थे। छत्रपति […] - [नया महाराजा (3)](https://rajasthanhistory.com/new-emperor/): नया महाराजा फलौदी पहुंचा तथा उसने जैसलमेर के महारावल अखैराज का सहयोग लेकर फलौदी का दुर्ग बारूद से उड़ा दिया। - [रामसिंह का दूत (4)](https://rajasthanhistory.com/ramsinghs-messenger/): रामसिंह, जयप्पा सिन्धिया के साथ लगा हुआ था। उसने मार्ग में किशनगढ़ तथा आसपास के परगनों को लूट लिया। कुछ दिन अजमेर में विश्राम करके ये सेनाएँ पुष्कर आ गईं। - [रूपनगर का राजकुमार (5)](https://rajasthanhistory.com/prince-of-roopnagar/): रूपनगर का राजकुमार सरदारसिंह राठौड़ों के सबसे बड़े राजा मरुधरानाथ विजयसिंह के पास आया। मरुधरानाथ ने भी उसे टके सा जवाब देकर लौटा दिया कि हमारे लिये तो सावंतसिंह और बहादुरसिंह में कोई अंतर नहीं है। दोनों हमारे भाई हैं। - [काकड़की (6)](https://rajasthanhistory.com/kakadki-village/): मरुधरानाथ विजयसिंह को समाचार मिले कि जैतारण में भी मराठों की एक वाहिनी भरतसिंह ऊदावत के नेतृत्व में इकट्ठी हो रही है। इस पर मरुधरानाथ ने डेवढ़ी के दरोगा अणदू को एक सेना देकर जैतारण की तरफ रवाना किया ताकि भरतसिंह उस सेना को लेकर मेड़ता नहीं पहुँच सके। - [अहिच्छत्रपुर (7)](https://rajasthanhistory.com/aahichhatrapur-fort/):  नागौर दुर्ग का प्राचीन नाम अहिच्छत्रपुर था। यह एक प्राचीन दुर्ग था जिसकी नींव गुप्त साम्राज्य का उद्भव होने से पहले नागवंशीय राजाओं ने मिट्टी के दुर्ग के रूप में रखी थी। इसके चारों ओर काफी गहरी और चौड़ी परिघा खुदी हुई थी। परिघा में जल भरा रहता था जिसमें खतरनाक मगरमच्छ पड़े रहते थे। […] - [खोखर बड़ो खुराकी (8)](https://rajasthanhistory.com/kesar-khan-khokhar/): मारवाड़ की जनता अपने राजा की रक्षा करने के लिये घरों से निकल पड़ी। दूरस्थ गाँवों से भी मई-जून की भयानक गर्मियों की परवाह किये बिना, सजे-धजे, सजीले नवयुवकों के बड़े-बड़े जत्थे हथियारों से सुसज्जित होकर नागौर पहुँचने लगे। - [खोटी नजर (9)](https://rajasthanhistory.com/malafide-intention/): महाराजा माधोसिंह की राठौड़ी महारानी अेजन कंवर को अपने पति की भयानक योजना के बारे में पता लग गया। उसने राठौड़ महाराजा के पास अपने गुप्तचर भेजकर कच्छवाहा महाराजा की खोटी नजर से बचने के लिये सावधान किया। जयप्पा की हत्या से मराठों में खलबली मच गई। ठीक उसी समय राठौड़ सैनिकों ने नागौर दुर्ग […] - [कच्छी घोड़ी लोकनृत्य](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%95%e0%a4%9a%e0%a5%8d%e0%a4%9b%e0%a5%80-%e0%a4%98%e0%a5%8b%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a5%80-%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%95%e0%a4%a8%e0%a5%83%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af/): इस नृत्य का कोई लिखित इतिहास प्राप्त नहीं होता किंतु आजादी से पहले उन्नीसवीं सदी में कच्छीघोड़ी लोकनृत्य के कुछ संदर्भ मिलते हैं। आजादी से पहले के दिनों में जब कच्छी घोड़ी के नर्तक, यह नृत्य करते थे तब उनके साथी गायक कलाकार, शेखावाटी के उदार हृदय वाले डाकुओं की गाथाएं गाते थे। - [लांगुरिया लोकगीत एवं लोकनृत्य](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be/): कुछ मनचली युवतियां लांगुरिया पर तानाकाशी करते हुए अपनी सहेलियों को लांगुरिया से सावधान रहने की चेतावनी देवी प्रतीत होती हैं- नैक औढ़ी- ड्यौढ़ी रहियो, नशे में लांगुर आवगो। विवाह योग्य युवतियां मां कैला देवी से वर की कामना करते हुए लांगुर को संबोधित करते हुए कहती है- अब लग ना रहूंगी मैया बाप के, मोहे उड़-उड़ पीहर खाय-लांगुरिया। अन्य गृस्थगण भवन के आगे विशाल चौक में गाते हुए कहते हैं- कैला मैया ने बुलायो, जब आयो लांगुरिया। अलग-अलग अवसरों पर इन गीतों में शब्दावली बदलती जाती है यथा- इबके तो मैं बहुअल लायो, आगे नाती लाऊंगो, दे-दे लम्बो चौक लांगुरिया, बरस दिनां में आऊंगो। - [तेरहताली नृत्य](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a4%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%a8%e0%a5%83%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af/): तेरहताली नृत्य कामड़ जाति का अनोखा नृत्य है। यह नृत्य धरती पर बैठकर किया जाता है। स्त्रियां अपने हाथ, कलाई, कोहनी, पैर में पीतल, ताम्बे, कांसे आदि धातु से बने तेरह मंजीरे बांध लेती हैं और फिर दोनों हाथों में एक एक मंजीरा लेकर उसे डोरी से बांध लेती हैं और हाथ में बंधे हुए मंजीरों को दु्रतगति की ताल और लय से घुमाते हुए शरीर पर बंधे मंजीरों पर प्रहार करती हैं। - [राजस्थान शासन पर अधिकारियों का कब्जा!](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a4%a8/): इस प्रकार भारत सरकार ने हीरालाल शास्त्री के मुख्यमंत्रित्व में गठित राजस्थान सरकार का काम चलाने के लिए केन्द्र से तीन अनुभवी अधिकारी भेज दिए गए। इन्होंने राजस्थान का प्रशासन अपने नियंत्रण में ले लिया। हीरालाल शास्त्री मंत्रिमंडल के शासन के दौरान भारत सरकार से सलहाकार के रूप में नियुक्त होकर आने वाले इन आई. सी. एस. अधिकारियों का बोलबाला रहा। भारत सरकार ने इन अधिकारियों को अधिकार दे दिया कि वे मंत्रिमंडल, मुख्यमंत्री एवं मंत्री के किसी भी निर्णय को वीटो कर सकते हैं। इन अधिकारियों की सहमति के बिना मुख्यमंत्री अथवा मंत्री एक चपरासी तक की भी नियुक्ति अथवा स्थानांतरण नहीं कर सकते थे। अतः ये सलाहकार ही राज्य के सर्वेसर्वा बन गए। - [देवताओं की साल](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b5%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%93%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b2/): Devtaon ki saal or School of Gods and Goddesses Is An Amazing Temple of Mandore Garden In Jodhpur. It has statues of deities or lokdevtas of Marwar. It was built by maharaja Ajeet singh. - [काला गोरा भैंरू मंदिर मण्डोर](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%97%e0%a5%8b%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%ad%e0%a5%88%e0%a4%82%e0%a4%b0%e0%a5%82-%e0%a4%ae%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b0/): भैरव के इस विकराल स्वरूप को मृत्यु के भय से छुटकारा दिलाने वाला माना जाता है। इसे काल भैरव भी कहा जाता है तथा यह आपराधिक प्रवृत्तियों पर नियंत्रण करने वाले दंडनायक के रूप में प्रसिद्ध है।  - [तीन पैरों के भैंरूजी](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a4%e0%a5%80%e0%a4%a8-%e0%a4%aa%e0%a5%88%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ad%e0%a5%88%e0%a4%82%e0%a4%b0%e0%a5%82%e0%a4%9c%e0%a5%80/): बटुक भैरव की चार भुजाएं प्रदर्शित की गई हैं। दक्षिण अधो कर में खड्ग है जबकि दक्षिण ऊर्ध्व कर में आयुध स्पष्ट नहीं है। वार्म ऊध्व कर में एक कपाल है तथा वाम अधो कर में एक नरमुण्ड के केश पकड़े हुए हैं। भैरव के सिर पर मुकुट है तथा मुख के भाव उग्र हैं। - [वीर दुर्गादास राठौड़ को देश-निकाला हुआ था ?](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b5%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a0%e0%a5%8c%e0%a4%a1%e0%a4%bc/): It is said that Veer Durgadas Rathore was exiled from Jodhpur in last part of his life. Is this thing even historically correct ? - [महाराजा अजीतसिंह के शंख ईरान तक सुनाई दिए !](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%be-%e0%a4%85%e0%a4%9c%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%b9/): महाराजा अजीतसिंह को नाहर खां की नियुक्ति पसंद नहीं आई। अतः 6 जनवरी 1723 को अजीतसिंह ने मुगल शिविर पर आक्रमण करके नाहर खां, रूहुल्ला खां तथा उनके 25 आदमियों को मार डाला। - [अजमेर का इतिहास भारत का इतिहास है!](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%85%e0%a4%9c%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%87%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b8/): मेवाड़ के महाराणाओं ने प्रसिद्ध इतिहासकार गौरीशंकर हीराचंद ओझा को अजमेर में एक हवेली दी जो आज भी अजमेर के गौरवशाली अतीत का स्मरण करवाती है। - [थार रेगिस्तान के व्यंजन](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%97%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%82%e0%a4%9c%e0%a4%a8/): थार रेगिस्तान के व्यंजन भारत के शेष हिस्सों से बिल्कुल अलग हैं। थार रेगिस्तान में दूध, घी, दही तथा छाछ से कई प्रकार के व्यंजन बनाए जाते हैं। - [रेगिस्तानी सूखी सब्जियाँ](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%97%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a5%82%e0%a4%96%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%9c%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%81/): खेजड़ी की फलियों अर्थात् ‘सांगरी’ को पीसकर आटा बना लिया जाता है। इसे पानी तथा छाछ में घोलकर पिया जाता है। - [रूठी रानी शेरशाह सूरी का रास्ता रोककर बैठ गई](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a5%82%e0%a4%a0%e0%a5%80-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80/): जोधपुर की भटियाणी रानी उमादेवी, इतिहास में रूठी रानी के नाम से प्रसिद्ध है। वह कभी अपने ससुराल जोधपुर में नहीं रही किंतु जब जोधपुर राज्य पर संकट आया तो उसने सेना लेकर शत्रु का रास्ता रोका। - [जोधपुर की महारानी जो कभी दुर्ग से बाहर नहीं निकली !](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%9c%e0%a5%8b%e0%a4%a7%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80/): जोधपुर की महारानी जो कभी दुर्ग से बाहर नहीं निकली! यह बात सुनने में विचित्र एवं अविश्वसनीय लगती है किंतु राजपूताने के इतिहास की एक सच्चाई है। - [जोधपुर के राजा अजीतसिंह की हत्या के लिए भारत की बड़ी ताकतें एक हो गईं !](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%9c%e0%a5%8b%e0%a4%a7%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%be-%e0%a4%85%e0%a4%9c%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%b9/): Maharaja of Jodhpur was murdered by big powers of India. - [पृथ्वीराज रासो से आई है मलिक मुहम्मद जायसी की पद्मावती !](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%aa%e0%a5%83%e0%a4%a5%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%8b/): मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित पद्मावत को हिन्दी साहित्य में सूफी परम्परा के महाकाव्य के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त है। जायसी की पद्मिनी अथवा पद्मावती तो पृथ्वीराज रासो से उधार ली हुई है। - [शेखावाटी क्षेत्र की बोली](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b6%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%9f%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a5%87%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a5%8b%e0%a4%b2%e0%a5%80/): शेखावाटी क्षेत्र की बोली (dialect of Shekhawati region) वस्तुतः एक बोली न होकर कई बोलियों का समूह है। इस आलेख में शेखावाटी क्षेत्र की बोली के विविध रूपों की जानकारी दी गई है। राजस्थानी भाषा का विकास बंगाल से लेकर गुजरात तक तथा काश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक विस्तृत भू-क्षेत्र में इतनी अधिक बोलियां बोली […] - [भेड़ों का मालवा-प्रवास](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ad%e0%a5%87%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a4%b5%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b8/): रेगिस्तानी भेड़ों का मालवा-प्रवास के लिए प्रस्थान एक युग-युगीन घटना है। रेगिस्तान में पानी एवं घास की कमी होने के कारण प्रतिवर्ष लाखों भेड़ें तथा ऊँटों के टोले मध्य प्रदेश के मालवा पठार पर घास एवं पानी की आशा में जाते हैं। तीन लाख भेड़ें मालवा प्रवास पर जाती हैं झालावाड़ से! राजस्थान एवं मध्यप्रदेश […] - [किशनगढ़ की चित्रकला पर वल्लभ एवं निम्बार्क मतों का प्रभाव](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b6%e0%a4%a8%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%95%e0%a4%b2%e0%a4%be/): This article is regarding Impact of Vallabh and Nimbark Sampradaya on Kishangarh painting. - [राजस्थानी पद्य साहित्य की रचना परम्परा](https://rajasthanhistory.com/rajasthani-sahitya-ki-padya-parampara/): राजस्थानी भाषा में ई.788 में जालोर में उद्योतन सूरि द्वारा रचित 'कुवलयमाला' (प्राकृत ग्रंथ) से लेकर, 12वीं शताब्दी ईस्वी में सिरोही में सिंह कवि द्वारा रचित 'पज्जुन्न कहा' (अपभ्रंश ग्रंथ), 15वीं शताब्दी में श्रीधर व्यास द्वारा रचित 'रणमल्ल छंद' (प्राचीन राजस्थानी ग्रंथ) आदि समस्त महत्वपूर्ण रचनाएं पद्य विद्या में हैं। - [राजस्थानी गद्य साहित्य की रचना परम्परा](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%97%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af/): राजस्थानी गद्य साहित्य की रचना परम्परा प्राचीन काल से ही आरम्भ हो जाती है जब हिन्दी भाषा का विकास भी नहीं हुआ था तथा देश में संस्कृत और प्राकृत जैसी भाषाएं प्रचलन में थीं। - [मरुभाषा का वेलि साहित्य !](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b5%e0%a5%87%e0%a4%b2%e0%a4%bf-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af/): ‘वेलि’ शब्द का निर्माण, संस्कृत संज्ञा ‘वल्लि’ से अपभ्रंश होकर हुआ है। वेलि साहित्य का आशय लम्बी कविता से लिया जा सकता है। - [राजस्थानी प्रेमाख्यान](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%96%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a8/): राजस्थानी प्रेमाख्यान विश्व साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं। कथ्य, तथ्य, शिल्प विधान एवं रागात्मकता की दृष्टि से ये लोक संस्कृति के कोश हैं।। - [राजस्थानी दवावैत](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%a6%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a5%88%e0%a4%a4/): राजस्थान की मध्यकालीन साहित्य रचना परम्परा में सिलोका, झूलना, वचनिका, ख्यात, निसाणी, दूहा, रूपक, आदि विधाएं तो अपना विशिष्ट स्थान रखती ही हैं किंतु दवावैत भी कुछ कम नहीं। - [ख्यात साहित्य](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%96%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a4-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af/): राजस्थान का ख्यात साहित्य विश्व भर में अनूठा है। ‘ख्यात’ शब्द ‘ख्याति’ से अपभ्रंश होकर बना है जिसका आशय प्रसिद्धि होना अथवा प्रकाशित होना है। - [नागौर की स्थापना](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%97%e0%a5%8c%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a4%be/): नागौर वासियों के लिए यह प्रश्न सदा से ही जटिल रहा है कि नागौर की स्थापना कब हुई। नागौर क्षेत्र में मानव अधिवास के प्रमाण प्रस्तर युग से मिलते है किंतु नगर के रूप में नागौर की स्थापना का कोई इतिहास उपलब्ध नहीं है। - [सैंपउ महादेव मंदिर](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b8%e0%a5%88%e0%a4%82%e0%a4%aa%e0%a4%89-%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b5-%e0%a4%ae%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b0/): सैंपउ महादेव मंदिर धौलपुर राज्य के इतिहास का एक भूला-बिसरा पन्ना है। - [अजमेर के समाचार पत्र - स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%85%e0%a4%9c%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0/): स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अजमेर में कई संगठनों की स्थापना हुई तथा समाचार पत्रों का प्रकाशन हुआ जिन्होंने सम्पूर्ण राजपूताने में राजनीतिक चेतना का अलख जगाया। - [पिण्डारियों एवं मराठों की चौथ से अधिक खिराज अंग्रेजों ने वसूला! (23)](https://rajasthanhistory.com/history-of-marathas-and-pindaries-in-rajputana/): ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा राजपूत के 19 में से 18 राज्यों के साथ की गई संधियों के आरम्भ होने से राजपूताने में एक नए युग का सूत्रपात हुआ। राज्यों को पिण्डारियों एवं मराठों से छुटकारा मिला तथा ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकारी देशी राज्यों में रेजीडेण्ट एवं पोलिटिकल एजेण्ट बन कर आए जिससे मराठों और […] - [अंग्रेजों ने भारत हिन्दुओं से लिया (22)](https://rajasthanhistory.com/east-india-company-wins-india/): अंग्रेजों ने भारत हिन्दुओं से लिया या मुसलमानों से? इस विषय पर अंग्रेज इतिहासकारों एवं भारतीय इतिहासकारों में लम्बी बहस रही है। अंग्रेज मानते थे कि उन्होंने भारत हिन्दुओं अर्थात् मराठों, राजपूतों, सिक्खों एवं जाटों से लिया जबकि भारत के साम्यवादी इतिहासकार तथा मुस्लिम इतिहासकारों ने सिद्ध करने का प्रयास किया है कि अंग्रेजों ने […] - [महाराजा मानसिंह ने सिरोही के राजा को कैद कर लिया! (21)](https://rajasthanhistory.com/relations-of-sirohi-and-jodhpur-states/): जब सिरोही का राजा जोधपुर राज्य की सीमा में घुसकर वेश्या का नृत्य देख रहा था, तभी अचानक सेना भेजकर महाराजा मानसिंह ने सिरोही के राजा को कैद कर लिया! सिरोही रियासत राजपूताने और गुर्जरात्रा (गुजरात) की सीमाओं पर स्थित थी। इस पर सांभर के चौहानों में से निकली देवड़ा चौहानों की एक पुरानी शाखा […] - [मराठों ने धन प्राप्ति की आशा में बांसवाड़ा का महल खोद डाला ! (20)](https://rajasthanhistory.com/attack-of-marathas-on-banswara/): मात्र साढ़े तेरह वर्ष की आयु में महारावल उदयसिंह मर गया तथा उसका छोटा भाई पृथ्वीसिंह बांसवाड़ा का शासक हुआ। उसी समय मराठे फिर से बांसवाड़ा में घुस आए और जबर्दस्त लूटमार करने लगे। - [मैं नाथद्वारा जाकर सन्यासी हो जाउंगा, स्वामी पर हथियार नहीं उठाऊंगा ! (19)](https://rajasthanhistory.com/history-of-jhala-zalimsingh-of-kota/): महाराव किशोरसिंह कोटा से रंगबाड़ी चला गया और वहाँ से जालिमसिंह पर हमला करने की तैयारियां करने लगा। इस पर पोलिटिकल एजेण्ट ने जालिमसिंह से पूछा कि अब वह क्या करेगा? इस पर जालिमसिंह ने उत्तर दिया कि मैं नाथद्वारा जाकर सन्यासी हो जाउंगा किंतु अपने स्वामी पर हथियार नहीं उठाउंगा। जब ई.1817 में कोटा […] - [झाला जालिमसिंह लोहे के पिंजरे में भीतर से ताला लगाकर सोता था ! (18)](https://rajasthanhistory.com/history-of-jhala-jalim-singh-of-kota/): सामंत लोग ईर्ष्या-वश जालिमसिंह के विरुद्ध महाराव गुमानसिंह के कान भरने लगे। सामंतों के कहने पर महाराव गुमानसिंह ने झाला जालिमसिंह को देश निकाला दे दिया।  - [पिण्डारी अमीर खाँ को टोंक का नवाब बना दिया ! (17)](https://rajasthanhistory.com/pindari-amir-khan-becomes-nawab-of-tonk/): ईस्ट इण्डिया कम्पनी भी अमीर खाँ के जहरीले दांत तोड़कर पिण्डारियों और मराठों की बची-खुची शक्ति से शीघ्र ही छुटकारा चाहती थी। - [कर्नल टॉड राजपूताने का इतिहास सुनता रहा!(16)](https://rajasthanhistory.com/james-todd-loves-history-of-rajputana/): एक बार कर्नल टॉड ने जहाजपुर में मक्का की रोटी खाई जिसे खाते ही उसका सिर घूमने लगा, जीभ भारी हो गई और कंठ रुंध गया। किसी देशी वैद्य ने टॉड को सलाह दी कि उसकी तिल्ली बढ़ी हुई है। - [कर्नल टॉड की पुस्तक ने राजपूताने का नाम राजस्थान कर दिया (15)](https://rajasthanhistory.com/role-of-james-todd-in-history-of-rajputana/): कर्नल टॉड ने राजपुताना रियासतों से इतिहास की जो सामग्री जुटाई, उसके आधार पर उसने एनल्स एण्ड एण्टिक्विटीज ऑफ राजस्थान नामक पुस्तक लिखी। कर्नल टॉड की पुस्तक ने राजपूताने का नाम राजस्थान कर दिया। कर्नल जेम्स टॉड का जन्म 20 मार्च 1782 को इंगलैण्ड के इंग्लिस्टन नामक स्थान पर हुआ था। उसके किसी पूर्वज ने […] - [अंग्रेजी हुकूमत के लिए खतरा (14)](https://rajasthanhistory.com/rule-of-east-india-company-in-rajputana/): लॉर्ड हेस्टिंग्ज ने राजाओं को एक दूसरे से इतना अलग-थलग करने का निश्चय किया कि उनमें कोई भी मेल असम्भव हो जाए। राजा लोग इतने दुर्बल और पतित किए जाने थे कि वे अंग्रेजी हुकूमत के लिए खतरा न बन सकें बल्कि अपनी रक्षा के लिए ब्रिटिश सत्ता पर निर्भर भी हो जाएं। इसलिए राजाओं […] - [पालीवाल ब्राह्मणों ने जैसलमेर छोड़ दिया (13)](https://rajasthanhistory.com/history-of-paliwal-brahmins-of-jaisalmer/): सालिमसिंह की मृत्यु के बाद महारावल गजसिंह ने उसकी हवेली के तीन हिस्से उतरवाकर धरती पर रखवा दिए। - [भरतपुर ने अंग्रेजों को हिन्दुस्तानी तलवार का पानी पिलाया (12)](https://rajasthanhistory.com/victotry-of-bharatpur/): अक्टूबर 1805 में जनरल लेक के चौथे आक्रमण में भरतपुर दुर्ग का पतन हो गया तथा भरतपुर को फिर से अंग्रेजों से संधि करनी पड़ी जिसकी कुछ शर्तें अपमानजनक थीं। - [कोटा नरेश गुमानसिंह तथा झाला जालिमसिंह (11)](https://rajasthanhistory.com/history-of-jhala-jalim-singh-kota/): एक ही स्त्री से प्रेम करते थे कोटा नरेश गुमानसिंह तथा झाला जालिमसिंह और दुर्भाग्य से यही प्रेम कोटा के लिए शाप बन गया। यह झगड़ा इतना बढ़ा कि जालिमसिंह के लिए कोटा में रहना असंभव हो गया। डूंगरपुर एवं बांसवाड़ा रियासतों में किस प्रकार कलह मची हुई थी। जब इन रियासतों के शासकों ने […] - [डूंगरपुर राजमाता की हत्या ! (10)](https://rajasthanhistory.com/history-of-dungarpur-state-of-rajasthan/): जब ई.1818 में अंग्रेजों ने राजपूताना राज्यों से संधि की तब उसमें यह शर्त भी रखी गई कि कोई राजा, बिना अंग्रेजों की अनुमति के सिंधी, ईरानी, पठान, बलूच, फ्रैंच या पुर्तगाली को अपनी सेना अथवा राज्य की सेवा में नहीं रखेगा। - [जाझ फिरंगी ने राजपूतों से एक-एक कुंआँ छीन लिया (9)](https://rajasthanhistory.com/history-of-george-thomas/): जॉर्ज टॉमस जयपुर राज्य की सेना के पीछे भागता हुआ इसी प्रयास में था कि किसी तरह एक कुंआँ हाथ लग जाए। दोनों सेनाओं में काफी अंतर था इसलिए जयपुर की सेना कुंओं को पाटने में सफल हो रही थी और जॉर्ज किसी कुएँ पर अधिकार नहीं कर पा रहा था। बड़ी कठिनाई से वह […] - [पिण्डारियों के अत्याचार](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%97%e0%a5%8b%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a4%9f-%e0%a4%9c%e0%a4%be-%e0%a4%86%e0%a4%a0-%e0%a4%aa%e0%a4%bf%e0%a4%a3%e0%a5%8d%e0%a4%a1%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82/): युद्ध के दौरान पिण्डारियों ने मारवाड़ की स्त्रियों को दो-दो पैसे में तथा जयपुर की स्त्रियों को एक-एक पैसे में बेचा। यह काल राजपूताने के सर्वनाश का काल था। - [पोकरण ठाकुर की हत्या कर दी पिण्डारियों ने ! (7)](https://rajasthanhistory.com/pindaries-murdered-pokran-thakur/): जोधपुर नरेश मानसिंह पोकरण ठाकुर के उपद्रवों का सामना नहीं कर सका। इसलिए उसने पिण्डरी अमीर खाँ की सेवाएं प्राप्त कीं। पिण्डारी अमीर खाँ ने पोकरण ठाकुर की हत्या करके उसका कटा हुआ सिर महाराजा मानसिंह को भिजवाया! जैसलमेर की रेगिस्तानी रियासत में मची अंतर्कलह से छुटकारा न मिलते देखकर जैसलमेर के महारावल मूलराज भाटी […] - [मेहता सालिमसिंह ने जैसलमेर के तीन राजकुमारों को मार डाला ! (6)](https://rajasthanhistory.com/mehta-salim-singh-killed-three-princes-of-jaisalmer/): जब प्रतिशोध की ज्वाला में धधक रहे दीवान सालिमसिंह ने जैसलमेर के तीन राजकुमारों की हत्या कर दी तो महारावल मूलराज की आंखें खुलीं। - [भरतपुर की महारानी किशोरीदेवी ने कहा मराठा सैनिक मेरे बच्चे हैं ! (5)](https://rajasthanhistory.com/bharatpur-maharani-saved-maratha-soldiers/): जब पानीपत के युद्ध से जीवित बचे मराठा सैनिक पानीपत से महाराष्ट्र की तरफ भागे तो वे भरतपुर राज्य में भी घुसे। उन्हें भरतपुर राज्य के किसान लूटने लगे। इस पर भरतपुर की महारानी किशोरीदेवी ने प्रजा से अपील की कि वे मराठा सैनिकों को न लूटें। हिन्दू राज्यों में परम्परागत रूप से राजा का […] - [पासवान गुलाबराय को किसने मारा ? (4)](https://rajasthanhistory.com/who-killed-paswan-gulabrai/): अपनी प्रीतपात्री दासी की हत्या से महाराजा विजयसिंह को इतना आघात पहुँचा कि वह पागलों की तरह जोधपुर की गलियों में भटकने लगा। - [जयआपा सिंधिया का मारवाड़ पर आक्रमण ! (3)](https://rajasthanhistory.com/attack-of-jayappa-scindhia-on-marwar/): एक दिन दोनों ने आपस में झगड़ना आरम्भ कर दिया और लड़ते हुए जयआपा सिंधिया के तम्बू तक जा पहुँचे। जयआपा उस समय नहा रहा था, उसने इन्हें तम्बू के भीतर बुला लिया। मारवाड़ी सरदारों ने तम्बू के भीतर पहुंचकर जयआपा का काम तमाम कर दिया। जहांगीर के शासन काल में ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी […] - [इंगलैण्ड की महारानी जहांगीर के सामने मामूली सूबेदारनी दिखती थी ! (2)](https://rajasthanhistory.com/jahangir-was-richer-then-queen-of-england/): भारतीय रियासतों को इसलिए सहन किया गया था क्योंकि वे उन लोगों के लिए शरणस्थल थीं जिनकी युद्ध, षड़यंत्र और लूट-मार की आदत उन्हें ब्रिटिश भारत में शांतिपूर्ण नागरिकों के रूप में नहीं रहने देती थी। - [वास्कोडिगामा का भारत आगमन (1)](https://rajasthanhistory.com/gora-hat-ja-one/): विदेशी आक्रांता हर समय भारत को लूटने एवं भारत में अपना राज्य जमाने के लिए उत्सुक रहते थे जबकि भारतीय राजा, परस्पर रक्त एवं वैवाहिक सम्बन्ध रखते हुए भी राज्य विस्तार की लालसा के कारण, एक-दूसरे से लड़ते रहते थे। - [जानकी प्रसाद बगरहट्टा और मानवेन्द्रनाथ राय](https://rajasthanhistory.com/janaki-prasad-bagrahatta-and-manvendranath-rai-could-neither-belong-to-the-congress-nor-remain-communists/): बगरहट्टा ने रेवाड़ी के सफाईदारों और हरिजनों से सरकार को हड़ताल का अल्टीमेटम दिलवाया तथा निर्धारित तिथि को आधी रात से हड़ताल आरम्भ करवा दी। - [जालोर का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास](https://rajasthanhistory.com/jalore-ka-rajnitik-evam-sanskritik-itihas/): जालोर का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास, लेखक डॉ. मोहनलाल गुप्ताद्वितीय संस्करण, 2022 प्रकाशित जालोर जिले में तीन प्रमुख नगर हैं- जालोर, भीनमाल एवं सांचोर। इन तीनों नगरों का उल्लेख पुराणों में मिलता है। इससे पता चलता है कि इन नगरों की स्थापना उस समय हुई थी, जब धरती पर बहुत कम मानव-बस्तियां अस्तित्व में आई […] - [जौहर एवं साके](https://rajasthanhistory.com/jauhar-and-sake-in-ancient-forts/): राजस्थान के प्राचीन दुर्गों में हुए जौहर एवं साके राजस्थान के इतिहास का ऐसा दर्दनाक पृष्ठ हैं जिसे पढ़कर इंसान की आत्मा कांप जाती है। हिन्दू धर्म एवं राष्ट्रीय स्वतंत्रता की रक्षा करने के लिए लाखों ललनाओं एवं शिशुओं ने जौहर की भीषण ज्वाला में कूदकर अपने प्राण दे दिए। इस आलेख में राजस्थान के […] - [राष्ट्रीय राजनीति में मेवाड़ का प्रभाव - अनुक्रमणिका](https://rajasthanhistory.com/index-impact-of-mewar-on-national-politics/): राष्ट्रीय राजनीति में मेवाड़ का प्रभाव पुस्तक के दो संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। पाठक इस पुस्तक का पेपरबैक संस्करण अमेजन डॉट इन वैबसाइट से क्रय कर सकते हैं। - [प्रस्तावना - राष्ट्रीय राजनीति में मेवाड़ का प्रभाव](https://rajasthanhistory.com/preface-infulence-of-mewar-in-national-politics/): प्रस्तावना – राष्ट्रीय राजनीति में मेवाड़ का प्रभाव पृष्ठ पर डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित पुस्तक की विषय-वस्तु स्पष्ट की गई है। इस पुस्तक को लिखने का उद्देश्य मेवाड़ के महाराणाओं की राष्ट्रीय सेवाओं का मूल्यांकन करना है। प्राचीन आर्यों ने भारत में राजन्य व्यवस्था आरम्भ की थी जो सूर्यवंशी, चंद्रवंशी एवं यदुवंशी राजाओं के […] - [इक्ष्वाकु से गुहिल तक (3)](https://rajasthanhistory.com/histroy-from-ikshvaku-to-guhil/): इस प्रकार इक्ष्वाकु से गुहिल तक राजाओं की एक सुदीर्घ शृंखला भारत पर शासन करती रही तथा समय के अनुसार इक्ष्वाकु वंश का नाम भी बदलता रहा। - [गुहिल राज्य का उदय](https://rajasthanhistory.com/decline-of-gupta-empire-and-rise-of-guhil-kingdom/): गुप्त साम्राज्य का पतन एवं गुहिल राज्य का उदय लगभग एक साथ हुआ। इतिहासकारों की धारणा है कि गुप्त साम्राज्य के ध्वंसावशेषों पर ही गुहिल नामक किसी साहसी योद्धा ने गुहिल राजवंश की स्थापना की। पाँचवी शताब्दी ईस्वी में यूरोप में प्रबल पश्चिमी रोमन साम्राज्य का अंत हो गया तथा छठी शताब्दी ईस्वी का आगमन […] - [गुहिल काल में दक्षिण भारत की राजनीति (4)](https://rajasthanhistory.com/politics-of-south-india-in-guhil-period/): गुहिल काल में दक्षिण भारत की राजनीति, उत्तर भारत में घट रही घटनाओं से लगभग असंपृक्त थी। गुप्तों ने दक्षिण भारत के राजाओं को अपना करद राज्य बनाया था किंतु उन्हें अपने अधीन नहीं किया था। इस कारण गुप्त साम्राज्य के विध्वंस एवं गुहिल राज्य के उदय से दक्षिण भारत की राजनीति पर कोई प्रभाव […] - [पुष्यभूतियों का उदय एवं गुहिलों का गुजरात से राजस्थान की ओर आगमन (5)](https://rajasthanhistory.com/rise-of-pushyabhutis-and-arrival-of-guhils-from-gujarat-to-rajasthan/): छठी शताब्दी के आरम्भ में थानेश्वर में एक नये राजवंश की स्थापना हुई। इस वंश का संस्थापक पुष्यभूति था जो भगवान शिव का परम भक्त था। यद्यपि थाणेश्वर का पुष्यभूति मगध के गुप्तों का वैश्य सामंत प्रतीत होता है तथापि उसके काल से ही पुष्यभूतियों का उदय होना आरम्भ हो गया था। - [इस्लाम का जन्म](https://rajasthanhistory.com/rise-of-islam-in-arabia/): संसार में हजारों सालों से ना-ना धार्मिक विश्वासों को मानने वाले लोग रहते थे किंतु इस्लाम का जन्म पूरी दुनिया को इस्लाम के नीचे लाने के संकल्प के साथ हुआ। इस कारण इस्लाम का जन्म पूरी दुनिया के लिए एक नया संकट लेकर आया। मध्य एशिया में स्थित सउदी अरेबिया नामक देश के मक्का नामक […] - [बापा रावल द्वारा गुहिल राज्य का विस्तार (7)](https://rajasthanhistory.com/expansion-of-guhil-state-by-bapa-rawal/): गुहिल की आठवीं पीढ़ी में बापा रावल नामक राजा हुआ जो मेवाड़ के इतिहास में बप्पा रावल, वोप्प, बप्प, बाप्पा, बप्पक तथा बाष्प आदि नामों से विख्यात है। इस राजा का नाम, मेवाड़ के बहुत से शिलालेखों, दानपत्रों एवं ख्यातों आदि में मिलता है। श्यामलदास के अनुसार ‘बापा’ महेन्द्र नामक राजा की उपाधि थी। डी. […] - [रहस्यमय शासक बप्पा रावल (8)](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%ae%e0%a4%af-%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a4%95-%e0%a4%ac%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a4%be-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%b2/): राजस्थान के इतिहास में रहस्यमय शासक बप्पा रावल के बारे में अनगिनत बातें प्रचलित हैं। इनमें से बहुत सी बातें इतिहास की कसौटी पर खरी नहीं उतरतीं किंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि इन बातों में से कुछ बातें सत्य तथा विस्मयकारी हैं। जितनी अधिक किंवदन्तियां एवं दन्तकथाएं रहस्यमय शासक बप्पा रावल बारे में मिलती […] - [गुहिलों का प्रसार (9)](https://rajasthanhistory.com/national-level-spread-of-guhils/): गुहिल राजा युद्धों में भाग लेने के अभ्यस्त थे इस कारण राष्ट्रीय स्तर पर गुहिलों का प्रसार होने में अधिक समय नहीं लगा। समय के प्रवाह के साथ वे गुजरात से लेकर राजस्थान तथा अन्य प्रदेशों में भी अपने राज्य स्थापित करने में सफल रहे। आठवीं शताब्दी ईस्वी से लेकर 12वीं शताब्दी ईस्वी के काल […] - [खलीफा पर विजय (10)](https://rajasthanhistory.com/victory-over-caliph-by-guhil-ruler-khuman/): गुहिलों की खलीफा पर विजय एक अद्भुत बात थी। जब तक गुहिलों की तलवार में दम रहा वे खलीफा की सेनाओं से लोहा लेते रहे और उन्हें मरुस्थल के पार धकेलते रहे। सातवीं शताब्दी ईस्वी में अरब के मरुस्थल में इस्लाम का जन्म हुआ था और आठवीं शताब्दी ईस्वी से मुस्लिम आक्रांता, भारत भूमि पर […] - [अल्लट आहाड़ में राजधानी ले आया (11)](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%85%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%b2%e0%a4%9f-%e0%a4%86%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a1%e0%a4%bc-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82/): जिस समय पूर्वेशिया में तुर्क योद्धा, खलीफाओं का तख्ता पलटकर मध्येशिया में फैल रहे थे, मेवाड़ में अल्लट का शासन था जिसे ख्यातों में आलु रावल कहा गया है। - [महमूद गजनवी के आक्रमण (12)](https://rajasthanhistory.com/attacks-of-muhammad-bin-kasim-and-mehmood-gaznavi/): महमूद गजनवी के आक्रमण 1000 ईस्वी में आरम्भ हुए तथा 1027 ईस्वी तक चलते रहे। इन आक्रमणों से भारत के राजाओं ने कोई सबक नहीं लिया। मुहम्मद बिन कासिम के आक्रमण के लगभग 350 वर्ष बाद उत्तर-पश्चिमी दिशा से भारत भूमि पर तुर्क आक्रमण आरंभ हुए। माना जाता है कि ‘तुर्कों’ के पूर्वज ‘हूण’ थे। […] - [मुहम्मद गौरी के आक्रमण (13)](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%a6-%e0%a4%97%e0%a5%8c%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%86%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%ae%e0%a4%a3/): मुहम्मद गौरी के आक्रमण भारत भूमि के लिए भयानक दुर्दशा लेकर आए। भारत की आजादी छिन गई और भारत कई शताब्दियों के लिए गुलाम हो गया। हिन्दू धर्म के सामने महाविनाश का संकट खड़ा हो गया। महमूद गजनवी की मृत्यु के बाद उसका साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो गया तथा गजनी और हिरात के बीच गौर वंश […] - [गुहिल शक्ति का पुनरोत्थान (14)](https://rajasthanhistory.com/resurrection-of-guhil-power/): ग्यारहवीं शताब्दी में मालवा के परमारों ने गुहिलों से चित्तौड़ छीन लिया। इससे गुहिलों की शक्ति अत्यंत क्षीण हो गई। कुछ समय पश्चात् चौलुक्यों ने परमारों को हराकर चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया। बारहवीं शताब्दी ईस्वी में सामंतसिंह ने गुहिल शक्ति का पुनरोत्थान किया। जब ग्यारहवीं शताब्दी में महमूद गजनवी और बारहवीं शताब्दी में मुहम्मद […] - [गुहिलों का स्वर्णकाल (15)](https://rajasthanhistory.com/golden-age-of-medieval-guhils/): चित्तौड़ के रावल जैत्रसिंह का शासन काल गुहिलों का स्वर्णकाल था। उसने गुजरात, मालवा तथा राजस्थान की समस्त बड़ी शक्तियों को परास्त कर भारत के इतिहास में एक बार फिर से गुहिलों की धाक जमा दी। चीरवा से प्राप्त शिलालेख में कहा गया है- ‘जैत्रसिंह शत्रु राजाओं के लिये प्रलयमारुत के सदृश था, उसको देखते […] - [महारानी पद्मिनी एवं गोरा-बादल की राष्ट्रव्यापी ख्याति (16)](https://rajasthanhistory.com/nationwide-fame-of-maharani-padmini-and-gora-badal/): मेवाड़ के इतिहास में महारानी पद्मिनी तथा गोरा-बादल ऐसे चरित्र हो गए हैं जिनकी ख्याति शताब्दियों को पार करके आज भी पूरे संसार में व्याप्त है। गुहिलों का इतिहास ऐसी ही बलिदान गाथाओं से जगमगा रहा है। गुहिल वंश के राजाओं को मेवाड़ पर शासन करते हुए 550 वर्ष से अधिक समय हो गया था […] - [चित्तौड़ पर सिसोदियों का अधिकार (17)](https://rajasthanhistory.com/sisodias-take-over-the-fort-of-chittor/): चित्तौड़ दुर्ग पर गुहिलों की रावल शाखा शासन करती आई थी किंतु जब अल्लाउद्दीन खिलजी ने रावल रत्नसिंह को मारकर रावल शाखा का अंत कर दिया तब सीसोद के राणाओं ने अपने पुरखों के राज्य का उद्धार किया। इसके बाद से चित्तौड़ पर सिसोदियों का अधिकार हो गया। अलाउद्दीन खिलजी का पुत्र खिज्रखां ई.1313 से […] - [मंगोलों की विनाशलीला (18)](https://rajasthanhistory.com/mangol-attacks-on-india/): मध्यकालीन इतिहास में मंगोलों की विनाशलीला न केवल भारत ने अपितु समस्त ऐशिया एवं यूरोप ने देखी है। मंगोलों का सम्पूर्ण इतिहास खून और हिंसा से भरा हुआ है। ‘मंगोल’ चीन के उत्तर में स्थित ‘गोबी के रेगिस्तान’ में रहने वाली घुमंतू एवं अर्द्धसभ्य जाति थी जिसका मुख्य पेशा घोड़ों और अन्य पशुओं का पालन […] - [प्रांतीय मुस्लिम राज्य (19)](https://rajasthanhistory.com/rise-of-provincial-muslim-states/): ई. 1399 में तैमूर लंग के भारत से लौट जाने के बाद दिल्ली सल्तनत की चूलें हिल गईं तथा अनेक सूबेदारों ने स्वतंत्र राज्य बना लिये। इस कारण भारत में बड़ी संख्या में प्रांतीय मुस्लिम राज्य अस्तित्व में आ गए। तैमूर लंग चौदहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मध्य एशिया में स्थित समरकंद से 50 मील […] - [महाराणा लाखा एवं मोकल द्वारा मुस्लिम शासकों के विरुद्ध कार्यवाही (20)](https://rajasthanhistory.com/struggle-of-maharana-mokal-and-lakha-against-muslim-rulers/): महाराणा लाखा ने काशी, प्रयाग तथा गया को यवनों के कर से मुक्त करवाया।  इसके लिये उसने मुसलमान शासकों को विपुल धन एवं घोड़े प्रदान किये।  उसके शासन काल में मेवाड़ राज्य के जावर क्षेत्र में चांदी की खान निकल आई।  - [महाराणा कुम्भा एवं उत्तर भारत की राजनीति (21)](https://rajasthanhistory.com/contribution-and-success-of-maharana-kumbha/): चित्तौड़ के गुहिलों में महाराणा कुम्भकर्ण (1433-68 ई.), सर्वाधिक प्रतिभा सम्पन्न राजा हुआ। भारत के इतिहास में वह महाराणा कुम्भा के नाम से प्रसिद्ध है। जिस समय वह मेवाड़ का शासक बना, उस समय उसकी आयु केवल 6 वर्ष थी। अतः कुम्भा के 12-13 वर्ष की आयु होने तक, कुम्भा की दादी हंसाबाई का भाई […] - [महाराणा रायमल की मालवा राज्य पर विजय (22)](https://rajasthanhistory.com/maharana-raimal-wins-malwa/): जब रायमल को ज्ञात हुआ कि संग्रामसिंह जीवित है तथा श्रीनगर के जागीरदार कर्मचंद पंवार के पास है तो महाराणा रायमल ने संग्रामसिंह को अपने पास बुला लिया। - [महाराणा सांगा और इब्राहीम लोदी (23)](https://rajasthanhistory.com/rana-sanga-and-ibrahim-lodi/): महाराणा सांगा और इब्राहीम लोदी न केवल समकालीन थे, अपितु एक दूसरे के कट्टर शत्रु भी थे। दोनों ही एक दूसरे को समाप्त करके अपने राज्य का विस्तार करना चाहते थे। महाराणा सांगा नागौर, गुजरात, मालवा और दिल्ली के सुल्तानों को मारकर भारत भूमि को म्लेच्छों से मुक्त करवाना चाहता था। 24 मई 1503 को […] - [सांगा का मालवा अभियान (24)](https://rajasthanhistory.com/action-by-maharana-sangram-singh-against-malwa/): ग्रामसिंह ने अपने जीवन काल में ही कुंवर भोजराज की मृत्यु हो जाने पर अपने पुत्र रत्नसिंह को युवराज घोषित कर दिया तथा विक्रमादित्य एवं उदयसिंह को रणथंभौर का दुर्ग देकर बूंदी के हाड़ा सूरजमल को उनका संरक्षक नियुक्त कर दिया। - [बाबर का भारत आक्रमण (25)](https://rajasthanhistory.com/baburs-attack-on-india/): बाबर का भारत आक्रमण कोई अचानक घटने वाली घटना नहीं थी। बाबर तथा उसके मध्य ऐशियाई पूर्वज सदियों से भारत पर आक्रमण कर रहे थे। ये रक्त पिपासु लोग भारत के स्त्री-पुरुषों को गुलाम बनाते थे, भारत के पशुधन को लूटकर ले जाते थे, भारत के देवालयों एवं पुस्तकालयों को नष्ट करते थे और सोना-चांदी […] - [खानवा का युद्ध (26)](https://rajasthanhistory.com/battle-of-khanwa/): खानवा का युद्ध भारत के इतिहास में युगांतकारी मोड़ लेकर आया। पुरानी युद्ध तकनीक के कारण भारतीय राजाओं की इस युद्ध में बड़ी हार हुई जिसकी गूंज आज भी भारत की हवाओं में सुनाई देती है। 22 फरवरी 1527 को बाबर के मुख्य सेनापति अब्दुल अजीज की सेना खानवा के मैदान में आई। सांगा ने […] - [बाबर को निमंत्रण (27)](https://rajasthanhistory.com/did-maharana-invite-babur-to-invade-india/): बाबर ने अपनी जीवनी तुजुके बाबरी में लिखा है कि सांगा ने पहले भी मेरे पास दूत भेजकर मुझे भारत में बुलाया और कहलाया था कि आप दिल्ली तक का इलाका ले लें और मैं (सांगा) आगरे तक का ले लूं।  इस विवरण से लगता है कि सांगा ने बाबर को निमंत्रण भेजा था किंतु […] - [महाराणा रत्नसिंह का मालवा अभियान (28)](https://rajasthanhistory.com/malwa-campaign-of-maharana-ratna-singh/): महाराणा संग्रामसिंह के बाद महाराणा रत्नसिंह का मालवा अभियान (ई.1528-31), मेवाड़ का महाराणा हुआ। उसके गद्दी पर बैठते ही मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी ने अपने सेनापति शरजहखां को मेवाड़ का इलाका लूटने के लिये भेजा। महाराणा रत्नसिंह ने भी मालवा पर चढ़ाई कर दी और सम्भल को लूटता हुआ सारंगपुर तक पहुंच गया। इस […] - [महाराणा उदयसिंह एवं शेरशाह सूरी (29)](https://rajasthanhistory.com/maharana-udaisingh-and-shershah-suri/): महाराणा उदयसिंह एवं शेरशाह सूरी का इतिहास इस बात का भ्रम देता है कि महाराणा उदयसिंह एक कायर शासक था इसलिए उसने मेवाड़ पर चढ़कर आए शत्रु से युद्ध करने की बजाय उसे चित्तौड़ का दुर्ग समर्पित कर दिया। यदि हम उस काल में मेवाड़ की वास्तविक स्थिति पर विचार करें तो स्थिति स्पष्ट हो […] - [चित्तौड़ की निर्बलता (30)](https://rajasthanhistory.com/weakness-of-chittor/): महाराणा उदयसिंह के काल में चित्तौड़ की निर्बलता दिखाई देती है किंतु इसका कारण महाराणा उदयसिंह नहीं था अपितु खानवा के युद्ध में महाराणा सांगा की पराजय, महाराणा विक्रमसिंह की अयोग्यता, हुमायूं की धूर्त्तता, मालवा एवं गुजरात के सुल्तानों की मक्कारी, हिन्दू राजाओं द्वारा मेवाड़ की मित्रता त्यागकर अकबर की अधीनता आदि अनेक बड़े कारण […] - [महाराणा प्रताप और अकबर (31)](https://rajasthanhistory.com/maharana-pratap-and-akbar-the-great/): जब महाराणा उदयसिंह द्वारा भील क्षेत्रों में नवीन बस्तियां बसाने का कार्य चल रहा था, तब उदयसिंह का बड़ा पुत्र प्रतापसिंह छोटा बालक ही था। - [शक्तिपुंज प्रतापसिंह और अकबर (32)](https://rajasthanhistory.com/shaktipunj-pratap-singh-and-akbar-the-great/): जब मानसिंह अपने स्थान से नहीं हिला तो प्रतापसिंह ने आगे बढ़कर धावा बोलने का निर्णय लिया। - [हल्दीघाटी का युद्ध - अनुक्रमणिका](https://rajasthanhistory.com/index-battle-of-haldighati-and-maharana-pratap/): हल्दीघाटी का युद्ध – अनुक्रमणिका पृष्ठ पर डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित पुस्तक हल्दीघाटी का युद्ध और महाराणा प्रताप के अध्यायों के शीर्षक दिए गए हैं। इन शीर्षकों पर क्लिक करके सम्बन्धित अध्यायों को पढ़ा जा सकता है। प्रस्तावना – हल्दीघाटी का युद्ध और महाराणा प्रताप गुहिल वंश भारत में मुस्लिम सत्ता का प्रसार गुहिलों […] - [युग पुरुष भैंरोसिंह शेखावत - अनुक्रमणिका](https://rajasthanhistory.com/index-yug-purush-bhairon-singh-shekhawat/): युग पुरुष भैंरोसिंह शेखावत - अनुक्रमणिका पृष्ठ पर इस पुस्तक के अध्यायों का क्रम दिया गया है। - [युगनिर्माता सवाईजयसिंह - अनुक्रमणिका](https://rajasthanhistory.com/index-yug-nirmata-sawai-jai-singh/): युगनिर्माता सवाईजयसिंह - अनुक्रमणिका पर इस शृंखला के आलेखों की अनुक्रमणिका दी गई है। यह पुस्तक अमेजन डाॅट इन पर भी उपलब्ध है जिसे आप मुद्रित प्रति के रूप में क्रय कर सकते हैं। - [अनुक्रमणिका - युगनिर्माता रावजोधा](https://rajasthanhistory.com/index-yug-nirmata-rao-jodha/): अनुक्रमणिका – युगनिर्माता रावजोधा पृष्ठ पर इस पुस्तक के अध्यायों का क्रम दिया गया है। नीचे दिए गए अध्यायों के शीर्षकों पर क्लिक करके सीधे ही अध्याय तक पहुंचा जा सकता है। राव जोधा भारत के इतिहास में एक ऐसे अद्भुत राजा हो गए हैं जिन्होंने थार मरुस्थल से मुस्लिम शासकों को तलवार के बल […] - [महाराजा सूरजमल - अनुक्रमणिका](https://rajasthanhistory.com/index-era-and-trends-of-maharaja-surajmal/): महाराजा सूरजमल – अनुक्रमणिका पृष्ठ पर डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित पुस्तक महाराजा सूरजमल व्यक्तित्व एवं कृतित्व के अध्यायों का क्रम दिया गया है। नीचे दिए गए शीर्षकों पर क्लिक करके उन अध्यायों तक पहुंचा जा सकता है। इस पुस्तक का मुद्रित संस्करण तथा ई-बुक संस्करण अमेजन पर उपलब्ध है। भारत सरकार ने इस पुस्तक […] - [क्रांतिकारी बारहठ केसरीसिंह - अनुक्रमणिका](https://rajasthanhistory.com/index-revolutionary-barath-kesari-singh/): क्रांतिकारी बारहठ केसरीसिंह - अनुक्रमणिका पृष्ठ पर अध्यायों का क्रम दिया गया है। पाठक शीर्षकों पर क्लिक करके अध्यायों तक पहुंच सकते हैं। - [अकबर का मेवाड़ अभियान (33)](https://rajasthanhistory.com/akbar-attacks-on-mewar/): सैद्धांतिक रूप से अकबर का मेवाड़ अभियान तो हल्दीघाटी के युद्ध से पहले ही आरम्भ हो चुका था किंतु व्यावहारिक रूप में यह अभियान हल्दीघाटी के युद्ध के बाद आरम्भ हुआ। हल्दीघाटी के युद्ध से पहले अकबर ने महाराणा प्रताप पर विजय प्राप्त करना एक सरल कार्य समझ रखा था किंतु हल्दीघाटी में अकबर की […] - [अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान - अनुक्रमणिका](https://rajasthanhistory.com/last-hindu-emperor-prithviraj-chauhan/): हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान का इतिहास गौरवपूर्ण है। इस इतिहास के पीछे संघर्ष की कहानी है। पृथ्वीराज चौहान के इतिहास की प्रमुख घटनाएं। - [महाराणा अमरसिंह का जहांगीर से संघर्ष (34)](https://rajasthanhistory.com/war-and-treaty-between-maharana-amar-singh-and-jahangir/): महाराणा प्रताप की मृत्यु के बाद कुंअर अमरसिंह मेवाड़ का नया महाराणा हुआ। अमरसिंह के महाराणा बनने के कुछ समय बाद ही अकबर मर गया और जहांगीर बादशाह हुआ। महाराणा अमरसिंह ने अपने दादा उदयसिंह के समय आरम्भ हुआ संघर्ष जारी रखा। प्रतापसिंह के पश्चात् अमरसिंह (ई.1597-1620) महाराणा हुआ। उसे अपने पिता के द्वारा, मृत्यु […] - [मेवाड़-मुगल संधि (35)](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a1%e0%a4%bc-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%97%e0%a4%b2-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a4%bf/): महाराणा अमरसिंह के समय पहली बार मेवाड़-मुगल संधि हुई। मेवाड़-मुगल संधि ने मेवाड़ में शांति का मार्ग खोला। मेवाड़ के लिए यह संधि हर दृष्टि से सम्मानजनक थी तथा मुगलों के लिए यह एक सपने के साकार होने जैसी बात थी। खुर्रम ने अपनी सेना के चार विभाग किये तथा प्रत्येक विभाग को अलग-अलग दिशाओं […] - [महाराणा कर्णसिंह द्वारा विद्रोही खुर्रम को शरण (36)](https://rajasthanhistory.com/maharana-karan-singh-gives-refuge-to-rebel-khurram/): महाराणा अमरसिंह की मृत्यु का समाचार सुनकर जहांगीर ने कर्णसिंह के लिये राणा की पदवी का फरमान और राज्यतिलक के उपलक्ष्य में खिलअत, हाथी, घोड़ा आदि के साथ राजा कृष्णसिंह  को महाराणा अमरसिंह की मृत्यु की मातमपुरसी करने और महाराणा कर्णसिंह के राज्याभिषेक के उपलक्ष्य में बधाई देने उदयपुर भेजा। कर्णसिंह ने अपने राज्यकाल में […] - [महाराणा जगतसिंह द्वारा संधि का अंत (37)](https://rajasthanhistory.com/end-of-treaty-and-reconciliation-era-by-maharana-jagatsingh/): मार्च 1628 में महाराणा कर्णसिंह का निधन हो गया उसका पुत्र जगतसिंह महाराणा बना। शाहजहाँ ने महाराणा जगतसिंह को पांच हजारी जात, पांच हजार का मनसब, राणा का खिताब तथा बहुत से उपहार भिजवाये। उसके गद्दी पर बैठते ही देवलिया के रावत जसवंतसिंह ने मेवाड़ राज्य से अलग होने का प्रयास किया। महाराणा ने जसवंतसिंह […] - [महाराणा राजसिंह द्वारा शाहजहाँ को दण्ड (38)](https://rajasthanhistory.com/punishment-to-officers-of-shah-jahan-by-maharana-raj-singh/): महाराणा जगतसिंह के बाद 10 अक्टूबर 1652 को राजसिंह, महाराणा हुआ। महाराणा बनने के बाद उसने एकलिंजी जाकर रत्नों का तुलादान दिया। रत्नों के तुलादान का सम्पूर्ण भारत में अब तक यही एक लिखित उदाहरण मिला है।  शाहजहाँ ने महाराणा राजसिंह को राणा का खिताब, पांच हजारी जात, पांच हजार का मनसब, देकर जड़ाऊ जमधन […] - [Legislative Assembly Of Bikaner](https://rajasthanhistory.com/legislative-assembly-of-bikaner/): Princely state of Bikaner was founded by Rao Bika Rathore in 1465A.D. As in other states the system of government in Bikaner was originally unalloyed despotism. - [किराडू का परमार राज्य](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a1%e0%a5%82-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af/): ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी में किराडू भी परमारों का स्वतंत्र राज्य था किंतु किराडू को किसी भी इतिहासकार ने अलग राज्य नहीं माना है। - [राजस्थान में श्रीकृष्णभक्ति](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a3%e0%a4%ad%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf/): श्रीकृष्ण के लीलाकाल में उन्हें अवतार के रूप में नहीं देखा जाता था। उनका यह रूप पुराणों के अनुसरण में बहुत बाद में सामने आया है। - [मीराबाई के गिरधर गोपाल](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%88-%e0%a4%97%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a4%a7%e0%a4%b0-%e0%a4%97%e0%a5%8b%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%b2/): वर्तमान में जिस मंदिर को मीरा का मंदिर कहा जाता है, वास्तव में वह कर्नल टॉड की भूल का परिणाम है। टॉड ने मीराबाई को महाराणा कुम्भा की राणी मान लिया था। - [महाराजा मानसिंह का साहित्य](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%b9-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af/): मानसिंह ने शृंगार और भक्ति पदों में शास्त्रीयसंगीत के साथ लोकसंगीत को भी अपनाया। कवि-कल्पना और प्रेम-माधुर्य को उन्होंने संगीत का परिधान देकर संगीत और काव्यकला दोनों की सेवा की। - [राजस्थान के जैन ग्रंथभण्डार](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%9c%e0%a5%88%e0%a4%a8-%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%82%e0%a4%a5/): थार मरुस्थल तथा उससे लगते हुए गुजरात प्रांत में जैन पंथ का विस्तार अत्यंत प्राचीन काल में ही हो गया था। जैन मुनियों ने राजस्थान के जालोर, सांचोर, आबू, पाली, जैसलमेर, नागौर, बीकानेर, अजमेर, बूंदी, जयपुर आदि नगरों में रहकर विविध ग्रंथों का निर्माण किया। ये ग्रन्थ विभिन्न ग्रंथ भण्डारों में रखे गए। - [Madhyamika - Nagari](https://rajasthanhistory.com/madhyamika-nagari/): The discovery of Western Kshatrap coins from Madhyamika inclines to suggest their sway over this ancient town. - [Vijaypal Of Bayana](https://rajasthanhistory.com/vijaypal-of-bayana/): Bayana has a famous hill fortress, which is called Vijaymandir Garh or Bayana fort. This is said to have been constructed by the rulers Vijay Pal and his son Tirunpal. - [Maharaja Mansingh Vikramaditya - Reign in Rajasthan](https://rajasthanhistory.com/maharaja-mansingh-vikramaditya/): It indicates that Salhadi could not enjoy the confidence of Vikramaditya which forced him to leave Khandar. - [Rathore-Holkar Relations In 18th Century](https://rajasthanhistory.com/rathore-holkar-relations/): Rathore rulers of Marwar also had to pay tax to Maratha feuds. on the amount of tax to be collected from Marwar, Rathore-Holkar Relations became tense. - [Mahajani Panchayat System In MARWAR](https://rajasthanhistory.com/mahajani-panchayat/): At that time in Merta A dispute regarding the Kathe right Arose between the Dahima And Pareek Katho Vjar. The matter was taken over to the Mahajani Panchayat which decided the claims of the Katha dispute. - [महाराज सरदारसिंह का ताम्रपत्र](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%b9-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0/): यह ताम्रपत्र उदयपुर के विक्टोरिया हॉल संग्रहालय में सुरक्षित रखवाया गया था। ताम्रपत्र का आकार 12’’×19’’ है। व इसमें कुल 14 (शीर्षक सहित 16) पंक्तियां हैं। अन्तिम पंक्ति में ताम्रपत्र की तिथि वैशाख कृष्ण 5 संवत् 1882 दी गई है। - [तिलवाड़ा की सभ्यता](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%ad%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%a4%e0%a4%be/): तिलवाड़ा की ऊपरी सतह में लोहे के टुकड़े तथा कांच की चूड़ियों के टुकडे़ भी मिले हैं परन्तु कुछ नीचे से हड्डी के मनके, सीप की चूड़ी का एक टुकड़ा तथा लोहे के कुछ टुकडे़ मिले हैं। - [राजस्थान के भित्तिचित्र](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ad%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0/): जो चित्र भित्ति अर्थात् भींत (दीवार) पर बनते हैं, उन्हें भित्तिचित्र कहा जाता है। भित्तिचित्रों को अंग्रेजी में भित्तिचित्रों को 'फ्रैस्को' भी कहा जाता है। - [मारवाड़ में पंचायत व्यवस्था](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a1%e0%a4%bc-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%a4-%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%b5%e0%a4%b8/): मारवाड़ में पंचायत व्यवस्था अत्यंत प्राचीन काल से अस्तित्व में थी। वैदिक काल में ये पंचायतें पूरे जन की होती थीं किंतु उत्तर वैदिक काल में इन्होंने जाति आधारित पंचायतों का रूप ले लिया। मारवाड़ में पंचायत व्यवस्था आजादी के समय तक चलता रहा तथा कुछ जातियों में यह अब भी उसी रूप में प्रचलित […] - [राव मालदेव के अभिलेख](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b5-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b5-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%85%e0%a4%ad%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%96/): मालदेव ने अपने भुजबल से मरुस्थल के राठौड़ शासकों को अपने अधीन करके अपनी शक्ति बढ़ाई एवं तत्पश्चात् अपने राज्य का विस्तार करते हुए अजमेर को भी अपने राज्य में मिला लिया। राजस्थान का ऐसा कोई राज्य नहीं था, जिसका कुछ न कुछ भाग मालदेव ने न छीन लिया हो! - [ललित विग्रहराज तथा हरकेलि नाटक](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b2%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%a4-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c-%e0%a4%b9%e0%a4%b0%e0%a4%95%e0%a5%87%e0%a4%b2%e0%a4%bf/): ललित विग्रहराज का आशय एक ऐसे सुंदर नाटक से है जो अजमेर के 12वीं शताब्दी ईस्वी के चौहान शासक विग्रहराज (चतुर्थ) के सम्बन्ध में लिखा गया है जिसे इतिहास में वीसल देव भी कहा गया है। - [राव जगमाल का नगरअभिलेख](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%9c%e0%a4%97%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b2-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a4%97%e0%a4%b0%e0%a4%85%e0%a4%ad%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%96/): यह अभिलेख ‘नगर’ नामक एक प्राचीन नगर के ध्वंशावशेषों में रणछोड़ मन्दिर से प्राप्त हुआ था। इस लेख में कुल 8 पंक्तियां हैं। लेख की तिथि मंगलवार चैत्र कृष्णा सप्तमी संवत् 1686 है। - [Jain Writers Of Rajasthan In Rajput Period](https://rajasthanhistory.com/jain-writers-of-rajasthan/): The literary activities of the Jains during the period were very intense. Although they began writing their literature in Sanskrit as early as 1st-2nd century A.D. - [राजस्थान के शिलांकित ग्रन्थ](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%a4-%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a5/): राजस्थान में शिलांकित अभिलेखों की परम्परा अशोक के समय से प्राप्त होनी आरम्भ होती है। आज से लगभग दो हजार साल पहले मौर्य सम्राट अशोक ने अपने अभिलेख शिलाखंडों, स्तम्भों तथा गुफाओं पर उत्कीर्ण कराए। - [Recent Trends OF History In Rajasthan](https://rajasthanhistory.com/recent-trends-of-history-in-rajasthan/): Many new fields like socio economic, political and cultural history have been included in recent Trends OF History In Rajasthan. - [Archaeological Studies In Rajasthan](https://rajasthanhistory.com/archaeological-studies-rajasthan/): Aarchaeologists have done a commendable work in this sphere. With their findings, it has now become almost an established fact that besides Baluchistan, Sindh and the Punjab, Rajasthan also has been the cradle of the earliest civilization in India. - [Maharaja Ganga Singh and Sher-e- Rajasthan Jainarain Vyas](https://rajasthanhistory.com/maharaja-ganga-singh-and-jainarain-vyas/): Maharaja Ganga Singh and Sher-e- Rajasthan Jainarain Vyas were owing different personalities but there was a great connection between them for which history doesn't have any explanation. - [History of Rajasthan – A Brief Note](https://rajasthanhistory.com/history-of-rajasthan-a-brief-note/): Col. James Tod was pioner in this field, he wrote his Annals and Antiquities of Rajasthan which, though now out of date, is indispensable for further research in the history of Rajasthan. - [Late Stone Age In Rajasthan](https://rajasthanhistory.com/late-stone-age-in-rajasthan/): The most significant site so far known in western Rajasthan is that near Tilwara, some 23 kilometres to the west of the town of Balotra in district Barmer - [Ostrich in Prehistoric Rajasthan](https://rajasthanhistory.com/ostrich-in-prehistoric-rajasthan/): When Dr. V. S. Wakankar was studying ostrich egg shells from Patne, he noticed that one of the pieces was bearing engraved criss-cross design in between two parallel lines - [PRE-HISTORIC AGE IN SARASWATI VALLEY](https://rajasthanhistory.com/pre-historic-age/): The great Saraswati valley culture influenced the whole pre-historic world. Speiser, S.N. KramerAud H.R. Hall look to some eminent country of the East for the original home of Sumer. - [राजशाही का अन्त](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a4/): राजशाही का अन्त पुस्तक में राजपूताने की देशी रियासतों एवं सामंती ठिकाणों के शासनाधिकार जनता को स्थानांतरित होने का इतिहास लिखा गया है। - [राव जोधा](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%af%e0%a5%81%e0%a4%97-%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b5-%e0%a4%9c%e0%a5%8b%e0%a4%a7%e0%a4%be/): युग निर्माता राव जोधा शीर्षक से लिखी गई पुस्तक में मारवाड़ राज्य के अद्भुत राजा के जीवन संघर्ष, त्याग, तपस्या एवं बलिदान की गाथा लिखी गई है। - [राजस्थान में वन एवं वन्यजीवन](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b5%e0%a4%a8-%e0%a4%8f%e0%a4%b5%e0%a4%82-%e0%a4%b5%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%9c/): कहा जाता है कि जब तक बाघ जीवित है, तब तक ही जंगल जीवित हैं। बाघ जंगल को गति देता है, जीवन देता है, समृद्धि देता है और जंगल को जंगल बनाये रखता है। - [राजस्थान में पर्यटन प्रबन्धन](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%9f%e0%a4%a8-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%ac/): राजस्थान में पर्यटन प्रबन्धन विषय को लेकर लिखी गई पुस्तक राजस्थान में पर्यटन स्थलों का प्रबन्धन तथा लोककलाओं का संरक्षण एक शोधग्रंथ है। - [सम्राट पृथ्वीराज चौहान](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9f-%e0%a4%aa%e0%a5%83%e0%a4%a5%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c-%e0%a4%9a%e0%a5%8c%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8/): सम्राट पृथ्वीराज चौहान अपने समय का दुराधर्ष योद्धा था। उसकी वीरता के किस्से सुनकर प्रत्येक भारतीय का सीना गर्व से फूल उठता है। - [महाराजा सूरजमल का युग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a4%9c%e0%a4%ae%e0%a4%b2-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%af%e0%a5%81%e0%a4%97/): महाराजा सूरजमल का युग भारत भूमि के लिए सचमुच ही बड़ा संकटापन्न था। उस युग की प्रवृत्तियाँ भारत के इतिहास में गहन विपत्ति-की सूचना देती हैं। जो विपत्ति ई.1192 में सम्राट पृथ्वीराज चौहान की तराइन की दूसरी लड़ाई में भयानक पराजय से आरम्भ हुई थी, वह विपत्ति ईस्वी 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के समय […] - [युग निर्माता सवाई जयसिंह](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%af%e0%a5%81%e0%a4%97-%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%88-%e0%a4%9c%e0%a4%af%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%b9/): सवाई राजा जयसिंह अठारहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में उत्तर भारत के राजाओं में सर्वाधिक चर्चित, प्रशंसित, बुद्धिमान, दूरदर्शी और प्रभावशाली राजा हुआ। - [CULTURAL TOURISM IN MARWAR](https://rajasthanhistory.com/cultural-tourism-in-marwar/): This book reveals the new facts of different dimensions of cultural tourism in Marwar. - [राजपूताने के सक्षम राज्य - भारत संघ में विलय एवं राजस्थान में एकीकरण](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%ae-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af/): राजपूताने के सक्षम राज्य का आशय उन देशी रियासतों से है जो स्वतंत्र भारत में अपना अलग राज्य के रूप में अस्तित्व बनाए रखने में सक्षमता की पात्रता रखती थीं। यह पात्रता जनसंख्या, क्षेत्रफल एवं राजस्व संग्रहण पर निर्भर करती थी। - [ब्रिटिश शासन में राजपूताने की रोचक एवं ऐतिहासिक घटनाएँ](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%9f%e0%a4%bf%e0%a4%b6-%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a4%a8-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%a4%e0%a4%be/): ब्रिटिश शासन में राजपूताने की रोचक एवं ऐतिहासिक घटनाएँ को जितनी प्रसिद्धि मिली है, उतनी प्रसिद्धि किसी अन्य पुस्तक को नहीं मिली है। - [बीकानेर संभाग का जिलेवार सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक अध्ययन](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%97-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b0/): बीकानेर संभाग का जिलेवार सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक अध्ययन ग्रंथ में राजस्थान के बीकानेर संभाग में स्थित जिलों का राजनीतिक इतिहास, कला एवं संस्कृति, आर्थिक गतिविधियां, प्रशासनिक संरचनाएं तथा महत्वपूर्ण गांवों एवं कस्बों सहित विविध सूचनाएं संजोई गई हैं जो रुचिवान पाठक से लेकर विद्यार्थियों, शिक्षकों एवं प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रतिभागियों के लिए अत्यंत उपयोगी है। - [राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a4%a3%e0%a5%80%e0%a4%af-%e0%a4%b8/): राजस्थान की पर्यावरणीय संस्कृति ग्रंथ के लेखन का उद्देश्य राजस्थान प्रदेश में विगत हजारों वर्षों से पल्लवित एवं पुष्पित मानव सभ्यता द्वारा विकसित एवं स्थापित परम्पराओं, सिद्धांतों एवं व्यवहार में लाई जाने वाली बातों में से उन गूढ़ तथ्यों को रेखांकित करना है जिनके द्वारा राजस्थान की संस्कृति ने पर्यावरण को सुरक्षित रखते हुए मानव […] - [Agrarian Discontentment In Bikaner Riyasat](https://rajasthanhistory.com/agrarian-discontentment-in-bikaner/): This book is a real documentation of Agrarian Discontentment In Bikaner Riyasat. Centuries will come and go but the history of erstwhile princely states of India will remain interesting. In Mughal era and British era, some princely states of Rajputana gained fame for their gallant history. The princely state of Bikaner or Bikaner Riyasat was […] - [राष्ट्रीय राजनीति में मेवाड़ का प्रभाव](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%af-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ae%e0%a5%87/): गुहिलवंशी राजाओं ने कभी भी, किसी भी शक्ति के समक्ष हथियार नहीं रखे, न किसी से पराजय स्वीकार की। महाराणाओं ने मंदशक्ति के काल में भी अपने स्वाभिमान का त्याग नहीं किया, न अपनी मर्यादा के विपरीत आचरण किया। - [राजस्थान के तीज त्यौहार एवं व्रत](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a4%e0%a5%80%e0%a4%9c-%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8c%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%8f/): राजस्थान के तीज त्यौहार एवं व्रत लोगों का जीवन के प्रति दृष्टिकोण व्यक्त करते हैं तथा मनुष्य को परिवार एवं समाज के प्रति निष्ठावान बनाते हैं। - [राजस्थान के प्रमुख अभिलेखागार](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%96-%e0%a4%85%e0%a4%ad%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%87/): प्रस्तुत पुस्तक में राजस्थान के कतिपय प्रमुख अभिलेखागारों में संजोई गई सामग्री का परिचय दिया गया है। - [राजस्थान के प्रमुख संग्रहालय](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%96-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0/): संग्रहालय, विदेशी पर्यटकों के लिए सच्चे राजदूत का काम करते हैं। विदेशी पर्यटकों के साथ-साथ देशी पर्यटक, इतिहास, कला एवं विज्ञान के विद्यार्थी, शिक्षक एवं जनसाधारण भी अपने जीवन में संग्रहालयों का भ्रमण एवं अवलोकन अवश्य करते हैं। - [हल्दीघाटी का युद्ध और महाराणा प्रताप](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%80%e0%a4%98%e0%a4%be%e0%a4%9f%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%af%e0%a5%81%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a7-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be/): हल्दीघाटी का युद्ध और महाराणा प्रताप, एक-दूसरे के पर्याय हैं। हल्दीघाटी से लोग महाराणा प्रताप को जानते हैं और महाराणा प्रताप से हल्दीघाटी को। महाराणा प्रताप ‘हिन्दू स्वातंत्र्य’ और ‘राष्ट्रीय चेतना’ का प्रतीक बन गये हैं तो हल्दीघाटी ‘भारतीय शौर्य’ और ‘राष्ट्रीय पराक्रम’ का प्रतिबिम्ब। हल्दीघाटी, भारत के उन प्रसिद्ध समरांगणों में से एक है […] - [किशनगढ़ राज्य का इतिहास](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b6%e0%a4%a8%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%87%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b8/): प्रबल केन्द्रीय सत्ता के संरक्षण के बिना, जोधपुर, बीकानेर एवं जयपुर जैसी बड़ी रियासतों के बीच किशनगढ़ की छोटी सी रियासत का बने रहना, किसी भी प्रकार संभव नहीं था। - [नागौर का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%97%e0%a5%8c%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%8f%e0%a4%b5%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%82/): नागौर का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास महाभारत युद्ध से भी पहले आरम्भ होता है। यह क्षेत्र मानव सभ्यता में गणराज्यीय व्यवस्था के उदय होने का प्रारम्भिक गवाह है। नागौर का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास का प्रथम संस्करण वर्ष 1999 में प्रकाशित हुआ था। इस ग्रंथ को विपुल प्रसिद्धि प्राप्त हुई तथा अनेक विश्वविद्यालयों के शोधार्थियों […] - [बीकानेर का सामाजिक एवं आर्थिक इतिहास](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%8f%e0%a4%b5%e0%a4%82-%e0%a4%86%e0%a4%b0/): प्रस्तुत ग्रंथ में बीकानेर क्षेत्र का सामाजिक एवं आर्थिक इतिहास प्रस्तुत किया गया है जिससे इस रियासत की कठिन परिस्थितियों का वास्तविक चित्र सामने आता है। - [अजमेर का वृहत् इतिहास](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%85%e0%a4%9c%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b5%e0%a5%83%e0%a4%b9%e0%a4%a4%e0%a5%8d-%e0%a4%87%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b8/): अजमेर से ही राजपूताने के सारे राजाओं की नकेलें कसी गईं। जैसे-जैसे समय बीतता गया, अजमेर का महत्व बढ़ता गया। - [चौरासी खम्भा मंदिर](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%9a%e0%a5%8c%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%80-%e0%a4%96%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%ad%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b0/): कामां के चौरासी खम्भा मंदिर का पुराणों में विष्णु मंदिर के रूप में उल्लेख हुआ है। कामा ब्रजभूमि के चौरासी कोस के घेरे में स्थित है तथा भगवान श्रीकृष्ण की क्रीड़ास्थली है। - [दधिमती माता मंदिर गोठमांगलोद का इतिहास](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a6%e0%a4%a7%e0%a4%bf%e0%a4%ae%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b0/): दधिमती मंदिर गोठ, मांगलोद एवं दुगस्ताऊ गांवों की सीमा पर वनक्षेत्र में स्थित है। मंदिर के चारों ओर जिप्सम के विशाल भंडार हैं। - [दधिमती मंदिर के शिलालेख](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a6%e0%a4%a7%e0%a4%bf%e0%a4%ae%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%96/): दधिमती मंदिर अत्यंत प्राचीन काल में बना था। इसका गर्भगृह इसके गुप्तकालीन होने की पुष्टि करता है। - [मारवाड़ के प्रतिहार कालीन मंदिरों में रामकथा का शिल्पांकन](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a4%95%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%95%e0%a4%a8/): प्रतिहार कालीन मंदिरों में रामकथा के प्रसंगों का अंकन नहीं होता था किंतु ये तीनों ही मंदिर इस परम्परा के अपवाद हैं। - [एकलिंगजी मंदिर](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%8f%e0%a4%95%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a4%9c%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b0/): एकलिंग मंदिर हजारों साल पुराना है। मान्यता है कि मेवाड़ राज्य की स्थापना करने वाले राजा ने इस स्थान पर भगवान शिव की उपासना की थी। - [थार मरूस्थल](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%82%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%b2/): अफ्रीका का सहारा रेगिस्तान, अरब देशों का अरबी रेगिस्तान, पाकिस्तान का सिंध रेगिस्तान तथा राजस्थान का थार मरूस्थल एक ही मरूस्थल के भाग हैं। - [अरावली पर्वत](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%85%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%a4/): अरावली पर्वत शृंखला राजस्थान के ठीक मध्य में उत्तर-दक्षिण की लम्बाई में कर्णवत स्थित है। - [राजस्थान के पूर्वी मैदान](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%a8/): राजस्थान के पूर्वी मैदान प्रदेश के पूर्वी भाग में स्थित हैं। पूर्वी मैदान सम्पूर्ण राज्य का 23.3 प्रतिशत भू-भाग घेरे हुए है। - [राजस्थान के पठार](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a4%a0%e0%a4%be%e0%a4%b0/): पठार - [आजादी के गीत , नारे एवं कविताएं](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%86%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%97%e0%a5%80%e0%a4%a4/): स्वतंत्रता सेनानियों, समाज सुधारकों एवं कवियों ने अपने शब्दों से आजादी की अलख जगाई। उनकी भावनाएं आजादी के गीत , नारे एवं कविताएं आदि का रूप लेकर जन-जन में व्याप्त हो गईं। - [हाड़ौती की संगीत परम्परा](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a5%8c%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%80%e0%a4%a4-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%be/): हाड़ौती की संगीत परम्परा प्रारम्भ से ही काफी समृद्ध रही है। इस परम्परा का विकास मूलतः वैष्णव मंदिरों में हुआ तथा बाद में इस परम्परा को विभिन्न रियासातों के राजाओं द्वारा संरक्षण प्राप्त हुआ। इस आलेख में हाड़ौती की संगीत परम्परा का संक्षिप्त परिचय दिया गया है। कोटा की संगीत परम्परा कोटा का मंदिर संगीत […] - [सेवाड़ी के शिलालेख](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b8%e0%a5%87%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%96/): उस युग में पाली क्षेत्र के किसान अरहट से सिंचाई करते थे। गौ, स्त्री, और ब्राह्मण की हिंसा को सर्वाधिक गर्हित पाप समझा जाता था। - [उदयपुर संभाग के आदिवासी](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%89%e0%a4%a6%e0%a4%af%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%97-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%86%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%80/): उदयपुर संभाग मूलतः पहाड़ी एवं जंगली क्षेत्र है। इस कारण उदयपुर संभाग में बड़ी संख्या में आदिवासियों का अधिवास है। उदयपुर संभाग के आदिवासी अपनी विशिष्ट संस्कृति रखते हैं। उदयपुर संभाग के आदिवासी – गरासिया गरासिया उदयपुर संभाग के आदिवासी क्षेत्र का बड़ा हिस्सा हैं। इतना ही नहीं गरासिया राजस्थान की प्रमुख जनजाति है। इसकी […] - [राजस्थान में भूमि वन एवं कृषि शब्दावली](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ad%e0%a5%82%e0%a4%ae%e0%a4%bf/): इस आलेख में राजस्थान में भूमि वन एवं कृषि शब्दावली का परिचय दिया गया है। राजस्थान में वर्षा बहुत कम होती है फिर भी लगभग पूरे राजस्थान में किसी न किसी प्रकार की फसल उगाई जाती है। राजस्थान का किसान भारत के अन्य प्रांतों के किसानों की तुलना में अत्यधिक परिश्रमी, धैर्यवान एवं निर्धन है। […] - [वर्षा एवं जल संरक्षण शब्दावली](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%be-%e0%a4%8f%e0%a4%b5%e0%a4%82-%e0%a4%9c%e0%a4%b2-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%b0%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%a3/): पश्चिमी राजस्थान में इस तरह के कुएं खोदने की परम्परा ईसा की पहली शताब्दी के लगभग, शक जाति अपने साथ लेकर आई थी। जोधपुर व भीनमाल में आज भी 700-800 ईस्वी में बनी प्राचीन बावड़ियां स्थित हैं। - [राजस्थानी आभूषण](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%ad%e0%a5%82%e0%a4%b7%e0%a4%a3/): छोटे मोतियों से बने गजरे को कलाई पर पहनते हैं। यह चूड़ी की तरह ढीला न होकर कलाई से चिपका रहता है। यह छोटे बच्चों को अधिक पहनाया जाता है। - [राजस्थान की खेल शब्दावली](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%96%e0%a5%87%e0%a4%b2-%e0%a4%b6%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%b2%e0%a5%80/): राजस्थान की लोकसंस्कृति में राजस्थानी भाषा के कुछ रोचक एवं विशिष्ट शब्दों का प्रयोग किया जाता है। राजस्थान की खेल शब्दावली आलेख में हम राजस्थान के ग्रामीण अंचल के खेलों के नामों की संक्षिप्त जानकारी दी रहे हैं। अमर गाळियो और हींगदड़ो: इस खेल में खिलाड़ी कपड़े की गेंद से एक दूसरे को मारते हैं। […] - [राजस्थानी जनजीवन की शब्दावली](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a4%9c%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a4%a8/): राजस्थान की लोकसंस्कृति में जनसामान्य द्वारा दैनिक व्यवहार में कुछ विशिष्ट शब्दों का प्रयोग किया जाता है। ये शब्द हिन्दी भाषा से ही राजस्थानी भाषा में आए हैं। इस आलेख में ऐसी ही राजस्थानी जनजीवन की विशिष्ट शब्दावली का संक्षिप्त परिचय दिया गया है। राजस्थानी जनजीवन में दैनिक व्यवहार की शब्दावली अवाड़ा: कुम्हार का अलाव […] - [आदिवासियों की शब्दावली](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%86%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b6%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%b2%e0%a5%80/): राजस्थान में आदिवासियों के कई समूह रहते हैं जिनकी अपनी-अपनी बोलियां हैं। इस लेख में आदिवासियों की शब्दावली के कुछ शब्दों का परिचय दिया जा रहा है। - [राजस्थान के लोकनाट्य](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%95%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%af/): राजस्थान के लोकनाट्य राजस्थानी संस्कृति की सतरंगी आभा प्रस्तुत करते हैं। लोकनाट्यों की समृद्ध परंपरा में ख्याल, रम्मत, फड़, नौटंकी, स्वांग, गवरी, गंधर्व-नाट्य, भवाई, तमाशा, आदि प्रमुख हैं। - [राजस्थान के पाण्डुलिपि भण्डार](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a5%8d%e0%a4%a1%e0%a5%81%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%aa%e0%a4%bf/): राजस्थान के पाण्डुलिपि भण्डार राजस्थान के इतिहास की प्राचीन सामग्री उपलब्ध करवाते हैं। यह सामग्री संस्कृत तथा प्राकृत भाषाओं में मिलती है। पृथ्वीराज विजय महाकाव्यम् संस्कृत भाषा और कुवलय माला प्राकृत भाषा के अच्छे उदाहरण हैं। उसके बाद मध्यकाल की सामग्री संस्कृत, हिन्दी, राजस्थानी तथा अरबी-फारसी भाषा के ग्रंथों में प्राप्त होती है। राजस्थानी भाषा […] - [ताम्रपत्र एवं सिक्के](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%8f%e0%a4%b5%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a5%87/): राजस्थान में ताम्रपत्र एवं सिक्के बड़ी संख्या में प्राप्त हुए हैं जिनसे राजस्थान का लिखित इतिहास निर्मित करने में बड़ी सहायता मिली है। इस आलेख में उनका संक्षिप्त परिचय दिया गया है। - [राजस्थान के शिलालेख](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%96/): राजस्थान के शिलालेख राजस्थान का इतिहास लिखने के लिए प्रचुर सामग्री उपलब्ध करवाते हैं। प्राचीन दुर्गों, मंदिरों, सरोवरों, बावड़ियों एवं महत्वपूर्ण भवनों की दीवारों, देव प्रतिमाओं, लाटों एवं विजय स्तंभों आदि पर राजाओं, दानवीरों, सेठों और विजेता योद्धाओं द्वारा उत्कीर्ण करवाये गये शिलालेख मिलते हैं। ये लाखों की संख्या में हैं। कुछ प्रसिद्ध एवं महत्वपूर्ण […] - [राजस्थान का विस्तार](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%b0/): राजस्थान विश्व के अनेक राष्ट्रों से भी बड़ा है। पूरे विश्व में अपनी कीर्ति स्थापित करने वाले इजराइल से यह सत्रह गुना से भी अधिक बड़ा है। श्रीलंका से पाँच गुना, इंगलैण्ड से दो गुना तथा चेकोस्लोवाकिया से तीन गुना बड़ा है। इटली, बेल्जियम, स्विट्जरलैण्ड, यूगोस्लाविया, ईरान तथा ईराक जैसे राष्ट्र भी राजस्थान से क्षेत्रफल में कम हैं। जापान राजस्थान से कुछ ही बड़ा है। - [राजस्थान का भूगोल](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ad%e0%a5%82%e0%a4%97%e0%a5%8b%e0%a4%b2/): राजस्थान का भूगोल आज से करोड़ों वर्ष पहले प्रागैतिहासिक काल से आरम्भ होता है जब विश्व दो भूखण्डों- अंगारालैण्ड तथा गौंडवाना लैण्ड में बंटा हुआ था। इन दोनों भूखण्डों के बीच में टेथिस महासागर था। टेथिस महासागर राजस्थान का अधिकांश उत्तर-पश्चिमी मरुप्रदेश एवं उत्तर पूर्वी मैदानी भाग टेथिस महासागर के अवशेष हैं जो नदियों द्वारा […] - [राजस्थान की जलवायु](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a4%b2%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a5%81/): किसी भी क्षेत्र में मौसम की औसत दशाओं को जलवायु कहा जाता है। मौसमी दशाओं में किसी क्षेत्र का तापमान, वायुदाब, वर्षा, आर्द्रता आदि सम्मिलित किये जाते हैं। मौसमी दशाओं का निर्माण उस क्षेत्र की अक्षांशीय स्थिति, समुद्र तट से दूरी, समुद्र तल से ऊँचाई, धरातलीय स्वरूप, जलीय भागों की स्थिति, वायु दिशा एवं गति आदि से निर्धारित होता है। सामान्यतः समुद्र तल से लगभग 300 फुट ऊपर जाने पर तापमान में 1 0 सेंटीग्रेड की गिरावट आती है। - [राजस्थान की मिट्टियाँ](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%81/): राजस्थान की मिट्टियाँ भारत के अन्य प्रांतों की मिट्टियों से कई अर्थों में अलग हैं। राजस्थान में पायी जाने वाली अधिकांश मिट्टियाँ जलोढ़ एवं वातोढ़ वर्ग की हैं। किसी भी क्षेत्र की मिट्टियों का वर्गीकरण कई प्रकार से किया जाता है। यथा रासायनिक संरचना की दृष्टि से, रंग, गठन एवं कणाकार की दृष्टि से, कृषि […] - [राजस्थान की नदियाँ](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%a8%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%81/): राजस्थान की अधिकांश नदियाँ प्रदेश के मध्य में स्थित अरावली पर्वत माला से निकल कर पश्चिम अथवा पूर्व की ओर बहती हैं। पश्चिम भाग की नदियाँ अरब सागर की ओर जाने वाले ढलान पर बहती हुई या तो खंभात की खाड़ी में गिरती हैं या विस्तृत मरु प्रदेश में विलीन हो जाती हैं। पूर्व की ओर बहने वाली नदियाँ एक दूसरे से मिलती हुई अंततः यमुना नदी में मिल जाती हैं। - [राजस्थान के बांध](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%a7/): राजस्थान के बांध तीन श्रेणियों में रखे जा सकते हैं- पहली श्रेणी में उन बांधों को रखा जा सकता है जो राजस्थान में बाहर से बहकर आने वाली नदियों पर बने हैं। - [राजस्थान की झीलें](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%9d%e0%a5%80%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%82/): खारे पानी की झीलें किसी समय इस क्षेत्र में स्थित खारे समुद्र के सूख जाने से बने रेगिस्तान के बीच-बीच में झीलों के रूप में रह गई हैं जिनमें प्रतिवर्ष बरसात का नया जल आता रहता है। मीठे पानी की झीलें रेगिस्तान के बनने के बाद इस क्षेत्र में बहकर आने वाली सरस्वती नदी के बहाव क्षेत्र में स्थित हैं जो सरस्वती नदी के सूख जाने से स्थान-स्थान पर बनी रह गई हैं। इनमें भी प्रतिवर्ष बरसात का नया जल आता रहता है। - [राजस्थान की सिंचाई परियोजनाएँ](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%88-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b/): देश की लगभग 14 प्रतिशत कृषि योग्य भूमि राजस्थान में है तथा देश के 11 प्रतिशत भूभाग पर खेती राजस्थान में होती है किंतु राज्य में कुल 13 नदी बेसिनों में उपलब्ध सतही जल, देश में उपलब्ध कुल सतही जल का मात्र 1.16 प्रतिशत है। राज्य में सतही जल की संभावित मात्रा 16.05 बी.सी.एम. है। - [राजस्थान की पेयजल परियोजनाएँ](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%aa%e0%a5%87%e0%a4%af%e0%a4%9c%e0%a4%b2-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%8f%e0%a4%81/): राजस्थान की पेयजल परियोजनाएँ राज्य में अत्यंत अल्प मात्रा में उपलब्ध जल के आधार पर बनाई गई हैं। इन पेयजल परियोजनाओं के अतिरिक्त अन्य स्थानीय साधनों से भी राज्य में रहने वाले मनुष्यों एवं पशुओं को पेयजल उपलब्ध करवाया जाता है। यहाँ पर कुछ बड़ी पेयजल परियोजनाओं का परिचय दिया गया है। - [राजस्थान का नामकरण](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a4%a3/): राजस्थान का नामकरण किसी एक दिन में या किसी निश्चित समय पर नहीं हुआ। यह एक युग- युगीन प्रक्रिया थी जिससे गुजरने के बाद राजस्थान को अपना वर्तमान नाम मिला। जिस प्रदेश को आजकल राजस्थान कहा जाता है, वह स्वातंत्र्योत्तर एकीकरण के पूर्व न तो एक राजनीतिक इकाई था और न ही एक भौगोलिक इकाई। […] - [राजस्थान की प्रमुख सूचनाएँ](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%96-%e0%a4%b8%e0%a5%82%e0%a4%9a%e0%a4%a8%e0%a4%be/): विश्व के अनेक देश विस्तार एवं जनसंख्या के मामले में राजस्थान प्रांत से भी छोटे हैं। थार रेगिस्तान, अरावली पर्वत तथा गंगा-यमुना की मिट्टी से बना यह प्रदेश अपने आप में बहुत सी विशेषताएं रखता है। - [राजस्थान में 15वीं जनगणना](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-15%e0%a4%b5%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a4%97%e0%a4%a3%e0%a4%a8%e0%a4%be/): राजस्थान में 15वीं जनगणना वर्ष 2011 में हुई थी। इसके बाद वर्ष 2021 में होनी थी किंतु देशव्यापी कोरोना के कारण इसमें तीन-चार साल का विलम्ब चल रहा है। वर्ष 2011 की जनगणना के आधार पर राजस्थान की जनसंख्या के मुख्य आंकड़े इस प्रकार हैं- राजस्थान में 15वीं जनगणना – प्रदेश की सकल जनसंख्या 2011 […] - [राजस्थान में नगर-गांव-जिले](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a8%e0%a4%97%e0%a4%b0-%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%b5-%e0%a4%9c%e0%a4%bf%e0%a4%b2/): राज्य में एक लाख से अधिक जनसंख्या वाले कुल 30 नगर हैं। इनमें से उदयपुर में सर्वाधिक 89.52 प्रतिशत साक्षर लोग रहते हैं। उदयपुर नगर में पुरुष साक्षरता 94.40 प्रतिशत तथा महिला साक्षरता 84.31 प्रतिशत है। टोंक नगर में न्यूनतम 68.62 प्रतिशत साक्षरता है। यहाँ पुरुष साक्षरता  77.68 प्रतिशत तथा स्त्री साक्षरता  59.18 प्रतिशत है। - [राजस्थान के गौरव](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%97%e0%a5%8c%e0%a4%b0%e0%a4%b5/): वीरभूमि राजस्थान अपने आप में कई गौरव समेटे हुए है। इस आलेख में राजस्थान के गौरव शीर्षक के अंतर्गत राजस्थान के राजकीय प्रतीक एवं लोक में प्रसिद्ध प्रतीकों की जानकारी दी गई है। - [राजस्थान के कृषि-जलवायु क्षेत्र](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a4%bf-%e0%a4%9c%e0%a4%b2%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a5%81-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a5%87%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0/): इस आलेख में राजस्थान के कृषि-जलवायुवीय क्षेत्र , उनके अंतर्गत आने वाले जिले तथा उनमें उत्पन्न होने वाली खरीफ एवं रबी की फसलों की जानकारी दी गई है। - [राजस्थान का भारत में स्थान](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8/): राजस्थान देश का सबसे बड़ा प्रांत है। इसका लगभग 61 प्रतिशत हिस्सा थार मरुस्थल से निर्मित है। यह रेगिस्तान प्राचीन कालीन सरस्वती नदी से लाई गई मिट्टी से बना है जबकि राजस्थान के पूर्वी भाग में स्थित मैदानी क्षेत्र गंगा, यमुना के मैदानी भूभाग का हिस्सा है। इसके मध्य में संसार का सबसे प्राचीन पर्वत […] - [राजस्थान में कहाँ क्या?](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%81-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be/): राजस्थान भारत का सबसे बड़ा प्रदेश है। इसके प्रमुख शासकीय उपक्रम एवं अकादमियाँ पूरे राज्य में कई नगरों में स्थित हैं। बहुत से लोगों को अक्सर ‘राजस्थान में कहाँ पर क्या’ जानने की आवश्यकता पड़ती है। इस आलेख में महत्वपूर्ण शासकीय उपक्रमों एवं अकादमियों तथा उनके मुख्यालयों की संक्षिप्त सूची दी गई है। प्रमुख शासकीय […] - [राजस्थान का पशुधन देश की अर्थव्यवस्था में](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a4%b6%e0%a5%81%e0%a4%a7%e0%a4%a8/): देश की अर्थव्यवस्था में राजस्थान का पशुधन अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। प्रदेश में देश के सबसे बड़े मरुस्थल क्षेत्र स्थित होने, मरुस्थलीय क्षेत्रों में कई-कई वर्षों तक वर्षा न होने, भूसतह पर जलस्रोतों की कमी होने तथा भूगर्भ में जल का स्तर नीचे होने के उपरांत भी राजस्थान में बड़े स्तर पर पशुपालन किया […] - [राजस्थान में सड़क परिवहन](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a4%95-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%b9%e0%a4%a8/): राजस्थान भारत का सबसे बड़ा राज्य है। यद्यपि यह भारत के पश्चिमी क्षेत्र में विकट मरुस्थलीय भूमि पर स्थिति है तथा राजस्थान के मध्यम में अरावली प्रर्वत शृंखला फैली हुई है तथापि राजस्थान में सड़क परिवहन की व्यवस्था बहुत अच्छी है। मरुस्थलीय क्षेत्र होने पर भी पूरे राज्य में सड़कों का विशाल जाल बिछा हुआ […] - [राजस्थान के प्रमुख मेले एवं उत्सव](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%96-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b2%e0%a5%87/): राजस्थान के प्रमुख मेले एवं उत्सवों की सूची बहुत लम्बी है जिनमें से कुछ प्रमुख मेले एवं उत्सव इस सूची में दिए गए हैं। इन मेलों एवं उत्सवों में लोकनृत्यों एवं लोकगीतों की धूम रहती है। क्रम उत्सव एवं मेले      जिला विक्रम संवत तिथि 1.       ऊंट मेला                 बीकानेर पौष शुक्ला 14 व 15 2.       रामदेव […] - [राजस्थान के पदाधिकारी](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%a7%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80/): 1. प्रथम मुख्यमंत्री : श्री हीरालाल शास्त्री 2. प्रथम निर्वाचित मुख्यमंत्री : श्री टीकाराम पालीवाल 3. सर्वाधिक कार्यकाल वाले मुख्यमंत्री : श्री मोहनलाल सुखाड़िया 4. प्रथम महिला मुख्यमंत्री : श्रीमती वसुंधरा राजे 5. प्रथम राज्यपाल : श्री गुरुमुख निहाल सिंह - [ऐतिहासिक वक्तव्य हैं राजस्थान का दर्पण](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%90%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b5%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%b9%e0%a5%88%e0%a4%82/): राजस्थान की भूमि में कोई ऐसा फूल नहीं उगा, जो राष्ट्रीय वीरता और त्याग की सुगन्ध से आप्लावित होकर न झूमा हो; वायु का एक भी ऐसा झोंका नहीं उठा, जिसकी झंझा के साथ युद्ध-देवी के चरणों में साहसी युवकों का प्रयाण न हुआ हो; ऐसी एक भी कुटी नहीं थी, जिसमें मातेश्वरियों की गोद में निःस्वार्थ समर्पण और वीरता की ममत्वभरी लोरियाँ न गाई गई हों; न कोई एक भी घर था, जिसमें ऐसे वीर की सृष्टि न हुई हो, जिसने अपने देश के तूफानों का त्तपरता से सामना न किया हो। - [राजस्थान के लोकनृत्य](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%95%e0%a4%a8%e0%a5%83%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af/): राजस्थान के लोकनृत्य रूपी गुलदस्ते में मारवाड़ का डांडिया, मारवाड़ व मेवाड़ का गैर, शेखावाटी का गींदड़, जालोर का ढोल नृत्य, जसनाथी सिद्धों का अग्नि नृत्य, अलवर-भरतपुर क्षेत्र का बम नृत्य, लगभग पूरे प्रदेश में होने वाले घूमर, चंग व डांडिया नृत्य देखते ही बनते हैं। - [ढोल नृत्य](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a2%e0%a5%8b%e0%a4%b2-%e0%a4%a8%e0%a5%83%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af/): जालोर का ढोल नृत्य प्रसिद्ध है। यह नृत्य प्रायः विवाह एवं होली के अवसर पर किया जाता है। इस नृत्य के साथ बजने वाले ढोल की ताल और गति अति कठिन है। - [गैर नृत्य](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%97%e0%a5%88%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a5%83%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af/): गोल घेरे में इस नृत्य की संरचना होने के कारण यह 'घेर' और कालांतर में 'गैर' कहा जाने लगा। नृत्य करने वाले कलाकारों को 'गैरिया' कहते हैं। - [गींदड़ नृत्य है शेखावाटी की शान!](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%97%e0%a5%80%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a4%a1%e0%a4%bc-%e0%a4%a8%e0%a5%83%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af/): यदि यह कहा जाए कि गींदड़ नृत्य शेखावाटी अंचल की शान है तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। राजस्थान के थार मरुस्थल में स्थित शेखावाटी अंचल में वसंत पंचमी से ही ढफ बजने लगते हैं तथा धमालें गाई जाने लगती हैं। कुछ धमाल भक्ति प्रधान एवं कुछ धमाल शृंगार प्रधान होती हैं। जब होली में […] - [घूमर नृत्य है लोकनृत्यों की रानी](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%98%e0%a5%82%e0%a4%ae%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a5%83%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af/): घूमर नृत्य होली, दीपावली, नवरात्रि, गणगौर जैसे बड़े त्यौहारों एवं विवाह आदि मांगलिक प्रसंगों पर घर, परिवार एवं समाज की महिलाओं द्वारा किया जाता है। यह विशुद्ध रूप से महिलाओं का नृत्य है। - [घुड़ला नृत्य](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%98%e0%a5%81%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a5%83%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af/): संध्या के समय कन्याएँ एवं सुहागन स्त्रियाँ टोली बनाकर, सिर पर छोटे-बड़े तीन चार कलश रखकर, गीत गाती हुई जलाशय, कुएँ या बावड़ी पर जाती थीं। जलाशय से जल भर कर उसमें दूब, पुष्प आदि रखकर गाजे-बाजे के साथ लौटती थीं। - [प्रतापगढ़ दुर्ग, देवलिया दुर्ग, छोटी मांजी साहिबा का किला, शेवना दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%aa%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): प्रतापगढ़ 889 वर्गमील क्षेत्रफल वाला एक छोटा सा राज्य था जिसे अंग्रेजों ने 15 सैल्यूट वाली स्टेट में शामिल किया था। - [सज्जनगढ़](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b8%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc/): दुर्ग के बारे में एक कहावत कही जाती है- ‘सज्जनगढ़ की हवा, सौ रोगों की दवा।’ - [ऊंटाला दुर्ग (वल्लभ नगर)](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%8a%e0%a4%82%e0%a4%9f%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): ई. 1952 में सरदार वल्लभभाई पटेल के नाम पर ऊंटाला का नाम बदलकर वल्लभनगर कर दिया गया। अब लोग इसे वल्लभनगर के नाम से ही जानते हैं और ऊंटाला दुर्ग का इतिहास नेपथ्य में चला गया है। - [एकलिंग गढ़](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%8f%e0%a4%95%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%97-%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc/): जब मराठा सरदार माधोजी सिंधिया ने उदयपुर पर आक्रमण किया तब महारणा अरिसिंह (द्वितीय) (ई.1761-73) ने एकलिंग गढ़ पर दुश्मनभंजन नामक तोप चढ़वाई। - [रमथेड़ा दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%ae%e0%a4%a5%e0%a5%87%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): वर्तमान समय में रमथेड़ा दुर्ग में एक होटल चलता है जिसमें देश-विदेश के पर्यटक आकर ठहरते हैं। - [शेरगढ़ दुर्ग (धौलपुर जिला)](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b6%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): शेरगढ़ दुर्ग के दरवाजे पर रखी ‘हनुहुंकार’ नामक विशालकाय तोप थी जो जनता ने वहाँ से लाकर शहर के मुख्य बाजार में इन्दिरा पार्क में पर्यटकों के लिये रख दी है। - [मण्डरायल दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ae%e0%a4%a3%e0%a5%8d%e0%a4%a1%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%b2-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): दिल्ली सल्तनत के काल में तथा मुगल सल्तनत के काल में मण्डरायल दुर्ग सैन्य छावनी की स्थापना की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता था। - [ऊँटगिरि दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%8a%e0%a4%81%e0%a4%9f%e0%a4%97%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a4%bf-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): दुर्ग परिसर में महाराजा गोपालदास का बनवाया हुआ दो मंजिला नृत्य-गोपाल भवन नामक मंदिर स्थित है। इस मंदिर में स्थापित श्रीकृष्ण प्रतिमा दौलताबाद के दुर्ग से लाई गई। - [तिमनगढ़ दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%ae%e0%a4%a8%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc/): तिमनगढ़ दुर्ग करौली जिले में मासलपुर के निकट बना हुआ है। यह दुर्ग बयाना से 15 किलोमीटर दूर है एवं करौली जिले के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में स्थित है। यह दुर्ग अरावली की पहाड़ियों के बीच में, समुद्रतल से 1309 फुट की ऊंचाई पर निर्मित है। तिमनगढ़ नौ किलोमीटर की लम्बाई-चौड़ाई में फैला हुआ है। मध्यकाल […] - [नाहरगढ़ का किला - बारां](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%b0%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a4%be/): नाहरगढ़ का किला नाहरगढ़ का किला बारां से 54 किलोमीटर दूर बारां-शाहबाद मार्ग पर भंवरगढ़ ग्राम से 21 किलोमीटर दूर स्थित नाहरगढ़, राजस्थान तथा मध्यप्रदेश की सीमा पर स्थित है। मध्यप्रदेश का गुुना शहर यहाँ से 80 किलोमीटर दूर स्थित है। नाहरगढ़ का किला ई.1712 में नाहरदल राठौड़ के पुत्र कुतुबुद्दीन ने बनवाया था जो […] - [मऊ-मेडाना के दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ae%e0%a4%8a-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%a1%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): मऊ दुर्ग का स्वामी रायसल खींची, अकबर का समकालीन था। रायसल ने गागरोन पर अधिकार करने की चेष्टा की किंतु वह सफल नहीं हो सका। - [बौंली दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ac%e0%a5%8c%e0%a4%82%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): मध्य काल में इस प्रकार के दुर्ग राजपरिवार तथा प्रजा के लिए सुरक्षा स्थल के रूप में तथा राजा एवं सैनिकों के लिए मोर्चाबंदी के लिए उपयुक्त स्थल के रूप में प्रयुक्त होते थे। - [बनेड़ा दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ac%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): ई.1730 से 1735 की अवधि में जोधपुर नरेश की सलाह पर बनेड़ा के जागीरदार सरदारसिंह ने कस्बे के निकट स्थित पहाड़ी पर नया बनेड़ा दुर्ग बनवाया जो आज भी मौजूद है। - [नीमराणा दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a8%e0%a5%80%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): नीमराणा दुर्ग का निर्माण ई.1464 में चौहान राजपूतों द्वारा करवाया गया। नीमराणा के चौहान शासक, अजमेर के चौहान शासक पृथ्वीराज (तृतीय) के वंशज थे। - [बेगूं दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ac%e0%a5%87%e0%a4%97%e0%a5%82%e0%a4%82-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): गोविन्ददास का पुत्र मेघसिंह, उदयपुर के महाराणा से नाराज होकर मुगल बादशाह जहांगीर की सेवा में रहता था। बादशाह की सेवा में रहते समय वह केवल काले कपड़े पहना करता था। इसलिये जहांगीर उसे कालीमेघ कहा करता था। - [नाहरगढ़ दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%b0%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): लोक किंवदन्ती है कि जब इस दुर्ग का निर्माण आरम्भ किया गया तब नाहरसिंह भोमिया ने विघ्न उत्पन्न किया। दिन के समय जो भी निर्माण किया जाता, वह रात के समय स्वतः ही टूट जाता। - [जयगढ़ दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%9c%e0%a4%af%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): जयगढ़ दुर्ग के तीन प्रमुख प्रवेश द्वार हैं- डूंगर द्वार, अवनि द्वार तथा भैंरू द्वार (सागर द्वार)। डूंगर द्वार नाहरगढ़ की ओर, अवनि द्वार आम्बेर स्थित फूलों की घाटी की तरफ तथा भैंरू द्वार सागर नामक जलाशय की तरफ स्थित है। - [आम्बेर दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%86%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%ac%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): आम्बेर दुर्ग में कई सौ सालों तक कच्छवाहा शासकों की प्रमुख राजधानी रही। यह दुर्ग एक दुर्गम पहाड़ी पर स्थित है। कच्छवाहों का ढूंढाढ़ में आगमन ढूंढाढ़ प्रदेश में आने से पहले कच्छवाहे ग्वालियर के निकट नरवर में निवास करते थे। नरवर के कच्छवाहा राजकुमार दूल्हेराव ने ई.1006 से 1036 तक ढूंढाड़ में अपने राज्य […] - [कांकवाड़ी दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%95%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a5%80-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): कांकवाड़ी दुर्ग के लिये सरिस्का से टहला जाते समय काली घाटी से कच्चा रास्ता मिलता है। इस कच्चे रास्ते के निकट ही दुर्ग में प्रवेश करने के लिये पहला द्वार दिखाई देता है। - [भानगढ़ दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): अलवर जिले में सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान से कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित भानगढ़ दुर्ग तीन तरफ पहाड़ियों से घिरा हुआ है। सम्पूर्ण दुर्ग मतबूत प्राचीर से घिरा हुआ है जिसे दोनों तरफ की पहाड़ियों से जोड़ा गया है। भानगढ़ दुर्ग का स्थापत्य भानगढ़ दुर्ग की मुख्य प्राचीर में प्रवेश द्वार पर हनुमानजी विराजमान हैं। […] - [जैसलमेर दुर्ग सोनारगढ़](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%9c%e0%a5%88%e0%a4%b8%e0%a4%b2%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): राजस्थान में मुख्यतः दो दुर्ग ऐसे हैं जिनमें आज भी बड़ी संख्या में लोग निवास करते हैं। उनमें से एक चित्तौड़ का दुर्ग है तथा दूसरा जैसलमेर का दुर्ग है। - [देवरावर दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): देवरावर दुर्ग का निर्माण राय जज्जा भाटी द्वारा 9वीं शताब्दी ईस्वी में लोद्रवा के राजा देवराज अथवा देव रावल  की स्मृति में करवाया गया था। यह विशाल दुर्ग अब पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के बहावलपुर जिले में स्थित है। - [तन्नोट दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a8%e0%a5%8b%e0%a4%9f-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): तन्नोट दुर्ग अब अस्तित्व में नहीं है। अब इसका केवल इतिहास ही रह गया है। राव तन्नूजी भाटी ने आठवीं शताब्दी ईस्वी में तन्नोट दुर्ग बनवाया। - [भटनेर दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ad%e0%a4%9f%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): भटनेर दुर्ग आसपास की समतल भूमि से 100 फुट ऊंचा है। इसका निर्माण सरस्वती नदी के किनारे पर स्थित एक ऊंचे थेड़ पर करवाया गया था। - [मालकोट - मेड़ता का दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%9f/): वर्तमान में मालकोट पूरी तरह क्षतिग्रस्त है। मालकोट के भीतर अकबर के दरबारी अबुल फजल एवं फैजी का बनवाया हुआ एक सभा भवन भी बताया जाता है। रियासती काल के कुछ महल भी हैं जो अब क्षतिग्रस्त होने से बंद पड़े हैं। - [मेहरानगढ़ दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b9%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): राव जोधा ने मण्डोर से 6 मील दूर दक्षिण में चिड़ियानाथ की टूंक पर 12 मई 1459 को नया दुर्ग की नींव रखी। - [गोगून्दा दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%97%e0%a5%8b%e0%a4%97%e0%a5%82%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): जब अकबर स्वयं सेना लेकर गोगून्दा के लिये रवाना हुआ तो महाराणा प्रताप गोगून्दा का दुर्ग छोड़कर घने पहाड़ों में चले गये। अकबर ने गोगूंदा पहुँचकर कुतुबुद्दीन खाँ, राजा भगवंतदास और कुंवर मानसिंह को राणा के पीछे पहाड़ों में भेजा। - [कोटा दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%9f%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): कर्नल टॉड ने लिखा है कि आगरा के किले को छोड़कर किसी भी किले का परकोटा इतना बड़ा नहीं है जितना कि कोटा गढ़ का। - [रणथम्भौर दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%a3%e0%a4%a5%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%ad%e0%a5%8c%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): इस दुर्ग का वास्तविक नाम रणतःपुर है जिसका अर्थ होता है- ‘रण की घाटी में स्थित नगर।’ इस दुर्ग का प्रचलित नाम रणथम्भौर है जो रण तथा थंभ नामक दो पहाड़ियों के नाम पर है। रण उस पहाड़ी का नाम है जो किले से ठीक नीचे स्थित है तथा थंभ उस पहाड़ी का नाम है जिस पर यह दुर्ग स्थित है। - [गढ़ बीठली (तारागढ़)](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc-%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%a0%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc/): अजमेर का तारागढ़ अथवा गढ़ बीठली अजमेर जिला मुख्यालय पर अरावली की पहाड़ियों पर स्थित है। - [बालाथल दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%a5%e0%a4%b2-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): बालाथल दुर्ग नुमा भवन है तथा यहाँ से ग्यारह कमरों वाले विशाल भवन प्राप्त हुए हैं। ये संरचनाएं बताती हैं कि बालाथल सभ्यता में मुखिया अथवा राजा जैसी संस्था विद्यमान थी जो दुर्ग एवं प्रासाद जैसे भवनों का प्रयोग करता था। - [राजगढ़ दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): राजगढ़ दुर्ग का निर्माण गुर्जर प्रतिहार राजा बाघसिंह ने आरम्भ करवाया था। इस राजा की सिर कटी प्रतिमा आज भी दुर्ग के नीचे देखी जा सकती है। - [बयाना दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ac%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): विजयमंदिर गढ़ की स्थापना कब हुई, यह कहना कठिन है किंतु यह वैदिक अथवा उत्तर वैदिक कालीन स्थल होना अनुमानित है। - [आहड़ का धूलकोट](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%86%e0%a4%b9%e0%a4%a1%e0%a4%bc-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a7%e0%a5%82%e0%a4%b2%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%9f/): आहड़ का धूलकोट आहड़ सभ्यता के इतिहास का भूला-बिसरा पन्ना है। आहड़ सभ्यता दक्षिणी राजस्थान में आहड़, बनास, बेड़च आदि नदियों के प्रवाह क्षेत्र में बसी थी। यह ऋग्वैदिक सभ्यता से लेकर महाभारत काल की सभ्यता के किसी काल में अस्तित्व में आई होगी। इसने हड़प्पा सभ्यता अर्थात् सिंधु सभ्यता को भी अपनी आंखों से […] - [कालीबंगा दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%80%e0%a4%ac%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): हड़प्पा तथा मोहेनजोदड़ो के निचले नगरों के रक्षा-प्राचीर से घिरे होने के एक स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं किंतु कालीबंगा में निचला नगर भी रक्षा प्राचीर से घिरा था। इस कारण निचला नगर एक अलग दुर्ग की तरह दिखाई देता था। - [दुर्ग निर्माण का इतिहास](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97-%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a3-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%87%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b8/): राजस्थान में दुर्ग निर्माण के समय दुर्गा का मंदिर अथवा थान अवश्य बनाया जाता था। दुर्ग की अधिष्ठात्री देवी दुर्गा है, जो दुर्ग तथा दुर्ग-वासियों की रक्षा करती है। - [दुर्गों की श्रेणियाँ](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%a3%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%81/): महाभारत के शांति पर्व के अध्याय 56 के श्लोक संख्या 35 में छः प्रकार के दुर्ग बताये गए हैं। मनु स्मृति में भी छः प्रकार के दुर्ग बताये गए हैं। मनु ने गिरि दुर्ग को सर्वश्रेष्ठ बताया है जहाँ देवता निवास करते हैं। - [राजस्थान के दुर्ग : परम्परा एवं विकास](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): सिंधु सभ्यता की प्रांतीय राजधानी कहे जा सकने वाले कालीबंगा की खुदाई से प्राप्त दुर्ग के अवशेष राजस्थान में अब तक प्राप्त प्राचीनतम दुर्ग के अवशेष हैं। - [राजस्थान में दुर्ग - जिलेवार स्थिति](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): राजस्थान में दुर्ग अत्यंत प्राचीन काल में बनने लगे थे, इनमें से सैंकडों दुर्ग काल के प्रवाह में बह गए किंतु कुछ दुर्ग जीर्णोद्धार एवं विस्तार के कारण आज भी अस्तित्व में हैं। - [कोटकास्तां दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%9f%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%82-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): मानसिंह ने नाथों को अनेक जागीरें प्रदान कीं तथा प्रत्येक परगने में नाथों का मंदिर बनवाया। - [कामां दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%82-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): आठवीं शताब्दी ईस्वी में कामां में एक दुर्ग का निर्माण करवाया गया। संभवतः इससे पहले भी यहाँ कोई दुर्ग यहाँ रहा हो किंतु अब उसके प्रमाण प्राप्त नहीं होते। - [विजय स्तम्भ चित्तौड़गढ़](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%9c%e0%a4%af-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%ad/): यह भारत में पाया जाने वाला एक मात्र विजय स्तम्भ है जो भीतर और बाहर, मूर्तियों से लदा हुआ है। - [कालिका माता मंदिर](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b0/): चित्तौड़गढ़ दुर्ग में स्थित कालिका माता मंदिर वस्तुतः आठवीं शताब्दी का सूर्य मंदिर है जिसे परवर्ती काल में कालिका माता मंदिर में परिवर्तित कर दिया गया। सम्पूर्ण संसार में सूर्यपूजा की परम्परा आदिकाल से चलती आई है। इस कारण एशिया एवं यूरोप के बहुत से देशों में सूर्यमंदिरों के खण्डहर प्राप्त होते हैं। वस्तुतः जहाँ-जहाँ […] - [चित्तौड़गढ़ दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8c%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): चित्तौड़गढ़ दुर्ग का वास्तविक नाम ज्ञात नहीं है किंतु चित्रांगद मौर्य के काल में पुनर्निर्माण के बाद इसे चित्रकूट कहा जाने लगा जो बाद में अपभ्रंश होकर चित्तौड़गढ़ कहलाया। - [कुम्भलगढ़ दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%ad%e0%a4%b2%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): कुंभलगढ़ मेवाड़ राज्य का नैसर्गिक सुरक्षा कवच था तथा इसे राजस्थान के सर्वाधिक सुरक्षित किलों में से माना जाता था। - [मधुपुरगढ़](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ae%e0%a4%a7%e0%a5%81%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc/): यह दुर्ग अरावली पर्वत शृंखला से मालवा की तरफ जाने वाले मार्ग को रोककर खड़ा है। - [शाहाबाद दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): शाहाबाद का भू-भाग, बुन्देलखण्ड का भाग है। यहाँ बुन्देलखण्डी भाषा बोली जाती है। शाहाबाद के धंधेरा शासकों के, बुन्देलखण्ड के बुन्देल शासकों से विवाह सम्बन्ध होते थे। - [अजमेर दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%85%e0%a4%9c%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/):  इस दुर्ग के वास्तविक निर्माताओं एवं दुर्ग के निर्माण काल की अब कोई जानकारी उपलब्ध नहीं होती है। संभवतः चौहानों के काल में इसका निर्माण नहीं हुआ क्योंकि किसी भी चौहान लेख में इसका उल्लेख नहीं है। - [तारागढ़ दुर्ग (बूंदी)](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): तारागढ़ के नाम से विख्यात यह दुर्ग, बूंदी नगर से बाहर अरावली की पहाड़ियों में कोटा-जयपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित 182 मीटर की ऊँचाई पर निर्मित है। - [सिरोही दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%b9%e0%a5%80-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): देवड़ा शाखा में उत्पन्न शिवभान के पुत्र सहसमल ने ई.1425 में सिरोही का दुर्ग तथा राजप्रासाद बनवाये। लाखा अखैराज (द्वितीय) तथा अन्य राजाओं ने भी इस दुर्ग में अनेक निर्माण करवाये। - [खण्डार दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%96%e0%a4%a3%e0%a5%8d%e0%a4%a1%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): खण्डार दुर्ग अरावली की पहाड़ियों एवं सघन जंगलों के बीच एक खड़ी चट्टान पर बना हुआ है। - [जालोर दुर्ग (स्वर्णगिरि)](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): जालोर दुर्ग का निर्माण मण्डोर के परिहार शासक नागभट्ट (प्रथम) (शासन काल ई.730-60) ने करवाया। - [भीमगढ़ दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ad%e0%a5%80%e0%a4%ae%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): सारथल से लगभग तीन किलोमीटर दूर परवन नदी के बायें तट पर एक लुप्त प्रायः भीमगढ़ दुर्ग के प्राचीन खण्डहर बिखरे पड़े हैं। यह परवर्ती मौर्यकालीन दुर्ग माना जाता है। - [कोषवर्द्धन दुर्ग (शेरगढ़)](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%b7%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a7%e0%a4%a8-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): कोषवर्द्धन दुर्ग की स्थापना कब हुई, इस सम्बन्ध में अब कुछ भी तथ्य ज्ञात नहीं हैं किंतु दुर्ग की प्राचनता एवं ऐतिहासिकता को देखते हुए यह अनुमान लगाया जा सकता है कि मूलतः यह एक परवर्ती र्मार्य कालीन दुर्ग था। - [जहाजपुर दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%9c%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): अकबर ने जगमाल को चित्तौड़ का दुर्ग दिया था किंतु मेवाड़ी सरदारों ने उसे महाराणा मानने से मना कर दिया। इस पर वह अकबर के दरबार में चला गया और अकबर ने उसे जहाजपुर दुर्ग दे दिया। - [नागौर दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%97%e0%a5%8c%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): नागौर दुर्ग काले नागों द्वारा ईसा की दूसरी अथवा तीसरी शताब्दी में बनवाया गया और उसके चारों और (विशेषतः पृष्ठभाग में) नागौर नगर बस गया। नागौर थार रेगिस्तान के द्वार पर बसा है। उस काल में जो नागौर का स्वामी होता था, वह सारे रेगिस्तान का अधिपति होता था। जब मगध में गुप्तों का शासन […] - [गागरोण दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%97%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%a3-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): गागरोण दुर्ग की समुद्रतल से ऊँचाई 1654 फुट है। यह मालवा के पठार पर स्थित मुकुंदरा पर्वतमाला की 340 मीटर ऊँची पहाड़ी पर बना हुआ है। - [मण्डोर दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ae%e0%a4%a3%e0%a5%8d%e0%a4%a1%e0%a5%8b%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): मण्डोर दुर्ग गुप्तों से भी पहले के काल में अरावली की दुर्गम पहाड़ियों के बीच बहने वाली नागाद्रि नदी के तट पर स्थित था। - [वसंतगढ़ दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b5%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): सिरोही जिले में पिण्डवाड़ा रेलवे स्टेशन से लगभग आठ किलोमीटर तथा अजारी से तीन किलामीटर दूर, सड़क मार्ग पर वसंतगढ़ नामक प्राचीन गांव स्थित है। लाहिणी बावड़ी से प्राप्त एक शिलालेख के अनुसार इस गांव का प्राचीन नाम वटपुर है। इसे वसिष्ठपुर भी कहते हैं। बाद में यहाँ एक दुर्ग बनने पर यह वसंतगढ़ के नाम से विख्यात हुआ। - [केसरोली दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%95%e0%a5%87%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): यह दुर्ग धरती से डेढ़-दो सौ फुट ऊंची चट्टान जैसी पहाड़ी पर बना हुआ है। दुर्ग के भीतर कई महल हैं। एक विशाल कुंआ भी बना हुआ है। दुर्ग के उत्तर की ओर एक तालाब है। - [भैंसरोड़गढ़ दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ad%e0%a5%88%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): कर्नल टॉड के अनुसार भैंसरोड़गढ़ का नाम भैंसाशाह नामक व्यापारी तथा रोड़ा नाम के बंजारा के नाम पर पड़ा। उन्होंने इस दुर्ग का निर्माण अपने व्यापारी काफिलों को वर्षाकाल में पहाड़ी लुटेरों से बचाने के लिये करवाया। - [नाडौल का दुर्ग, जयकल दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%a1%e0%a5%8c%e0%a4%b2-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): नाडोल कस्बे में नीलकंठ महादेव मंदिर के पीछे नाडोल दुर्ग के नाम मात्र के अवशेष स्थित हैं। जब महमूद गजनवी अफगानिस्तान से चलकर थार का रेगिस्तान पार करके अन्हिलवाड़ा तथा सोमनाथ को लूटने के लिये जा रहा था, तब उसने मार्ग में इस दुर्ग को तोड़ा। बाद में कुतुबुद्दीन ऐबक ने इस दुर्ग को नष्ट कर दिया। - [सांचोर तथा रतनुपर दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a5%8b%e0%a4%b0-%e0%a4%a4%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a5%81%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): भीमदेव अपनी राजधानी अन्हिलवाड़ा को छोड़कर सांचोर चला आया तथा मुहम्मद गजनवी के विरुद्ध मोर्चाबंदी करके बैठ गया। गजनवी ने सांचोर पर आक्रमण किया। कई दिनों की लड़ाई के बाद भीमदेव को सांचौर छोड़कर भाग जाना पड़ा। - [लोद्रवा दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): प्रतिहारों की लोद्रवा शाखा इस दुर्ग पर शासन करती थी। नौवीं शताब्दी ईस्वी में यह दुर्ग भाटियों के हाथों में चला गया। - [लोहियाणा दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): ई.1883 में जोधपुर नरेश महाराजा जसवंतसिंह (द्वितीय) ने लोहियाणा पर आक्रमण करके दुर्ग को नष्ट कर दिया तथा वहाँ हल चलवा दिया। - [थूण की गढ़ैया](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a5%e0%a5%82%e0%a4%a3-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc%e0%a5%88%e0%a4%af%e0%a4%be/): व्यापारी बुरी तरह लुट-पिटकर गढ़ैया से बाहर निकल गये। इसके बाद चूड़ामन ने इस क्षेत्र से होकर जाने वाले व्यापारियों को भी लूट लिया। - [टॉडगढ़](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%9f%e0%a5%89%e0%a4%a1%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc/): ई.1911 की असफल क्रांति के नायक राव गोपालसिंह खरवा तथा विजयसिंह पथिक को उनके साथियों सहित इसी दुर्ग में बंद करके रखा गया था। - [Bikaner Maharaja Ganga Singh : Approach To Reforms](https://rajasthanhistory.com/bikaner-maharaja-ganga-singh/): Maharaja Ganga Singh was one of the leading princes in Rajputana who expressed an opinion representing others also. - [Judicial Reforms In Marwar in Nineteenth Century](https://rajasthanhistory.com/judicial-reforms-in-marwar/): Traditional Judicial system prevailed in Marwar for centuries but in consequence of Maratha invasions and internal disorders even this rough and ready system disintegrated and the judgment seat became vacant. - [Marwar Lok Parishad And Jai Narayan Vyas](https://rajasthanhistory.com/marwar-lok-parishad/): In May 1938, the Marwar Lok Parishad was born. It was to establish responsible objective as expressed in its constitution, government under the Aegis of the Maharaja. - [Legitimacy Of Dhokal Singh](https://rajasthanhistory.com/legitimacy-of-dhokal-singh/): hese evidences of Rajput and British sources area positive proof that the Rajput nobles and the British authorities believed that Dhokal Singh was the rightful heir of Marwar throne and he was a posthumous son of late Bheem Singh Raja of Jodhpur. - [Uprising Of 1857 In Marwar State](https://rajasthanhistory.com/uprising-of-1857/): There is hardly any doubt that the writer has drawn at first hand. - [Rajputana Agency (1832-1858 A.D.)](https://rajasthanhistory.com/rajputana-agency/): The Indian Princes began to consider the appointment of a British Political Officer, at Jaipur Courts as a source of strength and cordial ties with the East India Company, whose military might was now recognised by all native powers. - [Anglo-Jaipur Treaty Of 1818](https://rajasthanhistory.com/anglo-jaipur-treaty/): Jaipur in the then political conditions acquired a very important position and its inclusion in the system of Lord Hastings was tantamount to its success. - [Anglo-Mewar Treaty Of 1818](https://rajasthanhistory.com/anglo-mewar-treaty/): It was the troubled internal situation and the desire to restore order and establish his authority that prompted the Maharana to conclude the treaty. - [Battle Of Sipra](https://rajasthanhistory.com/battle-of-sipra/): Battle of Sipra was fought in 1769 A.D. between the forces of Maharana Arsi of Mewar and Mahadaji Sindhia a Maratha General. Shipra river is known as Kshipra also. This river rises in the north of Dhar district of Madhya Pradesh and flows north across the Malwa Plateau to join the Chambal River at Madhya Pradesh – Rajasthan border in […] - [Cultural Hisory of Tonk State](https://rajasthanhistory.com/cultural-hisory-of-tonk/): The founder of this state was a cruel Pindari leader of Central India. - [Ranthambhor Fort Under Attaks of Turk Sultans Of Delhi](https://rajasthanhistory.com/ranthambhor-fort/): Ranthambhor Fort was founded in 944 A.D. by Chauhan Rajputs. On account of its strategic position it played an important part in the history of Northern India. Ranthambhor became the centre of Chauhan power after the defeat and death of Prithviraj Chauhan of Ajmer in 1192 A.D. Govindraja, the son and successor of Prithviraj established himself […] - [Coronation Ceremony of Hindu Princes](https://rajasthanhistory.com/coronation-ceremony-of-hindu-princes/): In Hindu Epics we find instance of the Rajyabhishek of Lord Rama and of Maharaj Yudhishter. King was seated on the throne with his principal queen. - [Jai Jangaldhar Badshah Episode](https://rajasthanhistory.com/jai-jangaldhar-badshah-episode/): लादड़ियो गांव लादयो नहीं, डेलू रहगी दूर। जालोत सर का चोधरया, कुओ दीन्यो बूर।। - [British Administration In Ajmer-Merwara Province](https://rajasthanhistory.com/british-administration-in-ajmer/): Lord Lytton had noted that the attempt to create British Administration In Ajmer-Merwara Province into a model would be like maintaining a show farm by a wealthy gentleman. - [Ameer Nama](https://rajasthanhistory.com/ameer-nama/): The Ameer Nama is an unpublished Persian manuscript which throws light not only on the history of Rajasthan, but on the history of India as well, because it is the history of an epoch which is full of a series of outstanding events, directly or indirectly interrelated and interwoven. The Ameer Nama is a narrative […] - [Tareekhe Qilad Ranthambore](https://rajasthanhistory.com/tareekhe-qilad-ranthambore/): Tareekhe Qilad Ranthambore [1] is an unpublished Persian Manuscript on the history of Ranthambore. - [Tareekh-e-Rajasthan](https://rajasthanhistory.com/tareekh-e-rajasthan/): It is a valuable and richly informative compilation on the history of the rulers of Jaipur, Mewar, Marwar and Hadauti. - [Sawai Jaisingh and Ajitsingh – The Changing Relations](https://rajasthanhistory.com/sawai-jaisingh-and-ajitsingh/): The families of Sawai Jaisingh and Ajitsingh had marital relations with each other since so many centuries but their relations were never cordial. - [Mirza Raja Jai Singh and his Deccan Policy](https://rajasthanhistory.com/mirza-raja-jai-singh/): Jai Singh's invasion of Bijapur was a military failure. Not an inch of territory, notA stone of fortress, nor a pice of indemnity was gained by it. - [बुंदेला राजाओं के पत्र - सवाई जयसिंह के नाम](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ac%e0%a5%81%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%93%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0/): जयसिंह-बुंदेला सहायोग के इतिहास की पुष्टि विलियम इरविन द्वारा लिखे गए फर्रखाबाद के बंगश नवाब और बुंदेला छत्रसाल के बीच हुए युद्ध ‘‘बंगंश-बुंदेला युद्ध’ के वर्णन से भी होती है। - [Shahpura-Baneda Conflicts](https://rajasthanhistory.com/shahpura-baneda-conflicts/): From the very beginning these two estates could not pull on well with each other although they belonged to one house. - [Bharmal and Akbar Relations](https://rajasthanhistory.com/bharmal-and-akbar-relations/): This steadiness pleased the lofty glance of the emperor, and he made enquires about the Raja and said with his mystery interpreting tongue- We will make you happy - [Punchmarked Coins Of Ismilpur Hoard](https://rajasthanhistory.com/punchmarked-coins-of-ismilpur-hoard/): Punchmarked Coins Of Ismilpur Hoard were found in 1964 A.D. on the slope of a hillock near village Ismailpur in Bairath Tehsil of Jaipur. - [Origin of Chalukya Rajputs](https://rajasthanhistory.com/origin-of-chalukya-rajputs/): According to another bardic account recorded by Cunningham only the Chalukyas came out of the fire-pit, the Agni-kunda. - [महाराणा प्रताप कालीन हस्तलिखितग्रंथ](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%aa-%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%80%e0%a4%a8-%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0/): छे रांगो प्रतापसींघजी इणे मगरे आया। सुर तांग चकतो पातिमाह रो भाई गांम देवेर रे थाणे थो। सो रांगाजी पर आयो। उठे वेढ़ हुई। तठे राणांजी रा साथ री गोली सुरतारण चकतो रे लागी। रांणाजी लड़ाई जीती। बीजी तरफ सहबाजखान कांबो थो। सो पण न्हासे गयो। राणाजी रे धरती वली। - [Trade In mediaeval Rajasthan](https://rajasthanhistory.com/trade-in-mediaeval-rajasthan/): No doubt, the small artisans, craftsmen and farmers were the back bone of supply of various consumable items and different commodities but without the traders and merchants. no trade was possible. - [Nobility in Marwar](https://rajasthanhistory.com/nobility-in-marwar/): To the Sirayats 'Khas Rukhas' were written by the private Secretary. They were imprinted with the special sign manual-of the Maharaja and they were sealed with his signet finger ring. - [Administrative Institutions Of Mewar In The Pre-Mughal Times](https://rajasthanhistory.com/administrative-institutions-mewar/): The panchakulas also granted certificates of sale and concessions to traders, farmed out villages, collected the state revenue, registered the grants and arbitrated between disputing parties. - [Inscriptions of Pali District](https://rajasthanhistory.com/inscriptions-of-pali-district/): In village Khadagura two Sati tablets, bearing the date V. S. 1819 and in Jawali five Sati tablets of the same period could be noticed. - [Malava Plaques From Nagar (Uniara)](https://rajasthanhistory.com/malava-plaques/): Malava Nagar was founded by the Malavas about the beginning of the Christian era and continued in occupation till the mediaeval period. - [जैसलमेर दुर्ग की स्थापना](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%9c%e0%a5%88%e0%a4%b8%e0%a4%b2%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a4%be/): प्रकार जैसलमेर दुर्ग का निर्माण काल वि.सं.1234 (ई.1178) के पश्चात् होना चाहिए किन्तु सभी राजस्थानी ख्यातें तथा इतिहास की पुस्तकें जैसलमेर की स्थापना वि.सं.1212 (ई.1155) में हुई बतलाती है। - [भट्टिक संवत्](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ad%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%b5%e0%a4%a4%e0%a5%8d/): जैसलमेर के राजाओं के प्रसिद्ध पूर्वज भट्टी अथवा भाटी ने इस संवत् को चलाया था। राजा भट्टी के नाम से इस वंश के शासक 'भाटी' कहलाए। - [British Paramountcy In Rajasthan](https://rajasthanhistory.com/british-paramountcy-in-rajasthan/): The British Government, by incurring the responsibility of protecting the States against rebellion and insurrection, assumed paramountcy over them. - [आगर की पुरातात्विक सामग्री](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%86%e0%a4%97%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80/): कोटा जिले में स्थित आगर की पुरातात्विक सामग्री करई नदी के बाईं ओर के तट पर स्थित एक ऊंचे स्थान पर बिखरी पड़ी है। इस सामग्री में मूर्तियां एवं मंदिरों के अवशेष प्रमुख हैं। हिन्दू राजाओं के अधीन होने के कारण हाड़ौती क्षेत्र में मूर्तिशिल्प कला एवं मन्दिर-वास्तु कला का सदियों तक विकास हुआ। हाड़ौती […] - [Gaps in Rajasthan History](https://rajasthanhistory.com/gaps-in-rajasthan-history/): From eighteenth century A.D., the historians are working on the history of Rajasthan. But the history of Rajasthan is far much older than the origin of the name of Rajasthan. We know that  Rajasthan was not a political unit before independence of India. Rajasthan was divided in small Rajput Principalities. So the work of historians […] - [निष्कलंक सम्प्रदाय के संस्थापक मावजी](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a4%b2%e0%a4%82%e0%a4%95-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%af/): राजस्थान के वागड़ क्षेत्र में मावजी ने वैष्णव धर्म के अंतर्गत जो सम्पदाय स्थापित किया उसे निष्कलंक सम्प्रदाय कहते हैं किंतु स्थानीय लोग इसे निकलंग उच्चारित करते हैं। 13वीं एवं 14वीं शताब्दी ईस्वी में राजस्थान के राज्यों पर दिल्ली के लगभग सभी शक्तिशाली सुल्तानों, यथा कुतुबुद्दीन ऐबक, इल्तुतमिश, बलबन, जलालुद्दीन खिलजी, अलाउद्दीन खिलजी आदि ने […] - [परमारों की उत्पत्ति ब्रह्मक्षत्र के रूप में हुई थी!](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%89%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf/): परमारों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में प्रायः सभी इतिहासकारों ने उन्हें अग्निवंशीय माना है और सभी ने आबू पर्वत पर वशिष्ठ ऋषि के अग्निकुण्ड को उनके जन्मस्थल के रूप में निर्दिष्ट किया है। परम्परा के आधार पर परमारों को अग्निवंशी कहने में कोई आपत्ति नहीं, परंतु अग्निकुण्ड से किसी पुरुष की उत्पत्ति मानना असंभव है। […] - [राजस्थान पर सातवाहन अधिकार](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%a8/): राजस्थान पर सातवाहन अधिकार कहाँ से कहाँ तक और कब से कब तक रहा, इसके बारे में कोई निश्चित जानकारी अब तक नहीं मिल सकी है किंतु राजस्थान के कुछ हिस्से पर तथा कुछ समय के लिए सातवाहनों का अधिकार अवश्य ही रहा था, इसके पुष्ट संकेत मिलते हैं।  सातवाहनों का उत्कर्ष कण्व वंश के […] - [मधुकरगढ़ - एक भूला बिसरा दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ae%e0%a4%a7%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc/): मध्यकाल में मालवा क्षेत्र से हाड़ौती क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए दो मार्ग उपलब्ध थे। इनमें से पहला मार्ग मुकन्दरा होकर आता था और दूसरा मार्ग मधुकरगढ़ होकर आता था। कोटा महाराव मुकन्दसिंह ने मराठा आक्रमणकारियों को रोकने के लिये इनमें से पहिले मार्ग पर किलेबन्दी करायी थी तथा अपनी मीणी रानी अबली के […] - [नौकोटि मारवाड़](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a8%e0%a5%8c%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%9f%e0%a4%bf-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a1%e0%a4%bc/): पश्चिमी राजस्थान में यह आम धारणा है कि मारवाड़ राज्य नौ परमार भाइयों में बंटा हुआ था जिसे नौकोटि मारवाड़ कहते थे। ऐतिहासिक स्तर पर नौकोटि मारवाड़ जैसी कोई इकाई किसी भी काल में अस्तित्व में होनी सिद्ध नहीं होती। नौकोटि मारवाड़ की अवधारणा नौकोटि मारवाड़ की अवधारणा का मूल स्रोत किसी कवित द्वारा रचित […] - [भाटबहियाँ इतिहास लेखन में विश्वसनीय क्यों नहीं मानी जातीं!](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%9f%e0%a4%ac%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%81/): भाटबहियाँ राजस्थान के शासकों के आश्रित बहीभाटों द्वारा लिखी गई थीं। इन भाटबहियों में सैंकड़ों साल का इतिहास लिखा हुआ है। इस इतिहास में बहीभाटों ने अपने आश्रयदाताओं की वंशावलियों के साथ-साथ उनके द्वारा किए गए महत्वपूर्ण कार्यों का भी भी उल्लेख किया गया है। बहीभाटों ने भाटबहियाँ लिखकर राजस्थान के राजपूत राजाओं एवं सामंतों […] - [बहीभाट परम्परा](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ac%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%9f-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%be/): राजस्थान में बहीभाट परम्परा सामंती युग की देन थी जो सामंती युग के समापन के साथ ही समाप्त हो गई। एक समय था जब बहीभाट का होना किसी भी राजपूत परिवार के लिए जीवन-मरण के प्रश्न जैसा था किंतु आधुनिक इतिहास लेखन में बहीभाट परम्परा को अधिक आदर नहीं दिया गया। भारत के प्राचीन आर्य […] - [बांकीदास री ख्यात](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%95%e0%a5%80%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%96%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a4/): बांकीदास री ख्यात अठारहवीं शताब्दी ईस्वी में मारवाड़ राज्य में चारण कवि बांकीदास द्वारा लिखा गया था। इस ग्रंथ से उस काल की राजनीतिक, सामाजिक एवं धार्मिक घटनाओं एवं तथ्यों की महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। बांकीदास का जन्म ईस्वी 1781 में जोधपुर राज्य में हुआ था। ये अठारहवीं सदी के राजपूताना में विख्यात कवि एवं […] - [रघुनाथगढ़ तथा मानपुर दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%98%e0%a5%81%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%a5%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc-%e0%a4%a4%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0/): रघुनाथगढ़ के पुराने दुर्ग से ईस्वी 1093 का एक शिलालेख मिला है। रेवासा से भी चंदेलों के ई.1186 के तीन अभिलेख मिले हैं। - [बड़ी सादड़ी के राजराणा](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ac%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a4%be/): बड़ी सादड़ी के राजराणा मेवाड़ के 16 प्रमुख रजवाड़ों में स्थान रखते थे। बड़ी सादड़ी दुर्ग मेवाड़ राज्य के प्रमुख दुर्गों में से था। इस मध्यकालीन दुर्ग का निर्माण बड़ी सादड़ी के राजराणा ने करवाया था। बड़ी सादड़ी के राजराणा चंद्रवंशी झाला राजपूत थे जो गुजरात के ध्रांग्धरा राज्य के शासक थे। पंद्रहवीं शताब्दी ईस्वी […] - [महाराणा प्रताप के साथी](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%aa-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a5%e0%a5%80/): आज संसार में जिस श्रद्धा एवं विश्वास के साथ महाराणा प्रताप (ई.1540-ई.1597) का स्मरण किया जाता है, उसे देखकर ऐसा लगता है कि जिस समय महाराणा प्रताप अकबर से संघर्षरत थे, उस समय उन्हें समस्त हिन्दू शक्तियों का साथ मिला होगा किंतु वास्तविकता इससे उलट है महाराणा प्रताप के साथी बहुत कम थे। ईस्वी 1568 […] - [राठौड़ों के दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a0%e0%a5%8c%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): राठौड़ों का शासन थार मरुस्थल में रहा इस कारण राठौड़ों के दुर्ग पश्चिमी राजस्थान में अधिक संख्या में मिलते हैं। मेवाड़ एवं आम्बेर आदि रियासतों में कुछ राठौड़ सामंत नियुक्त हुए थे, उस कारण उन क्षेत्रों में भी राठौड़ सामंतों के बनाए दुर्ग मिलते हैं। वैदिक काल से ही हिन्दू राजा धरती, कोष एवं सेना […] - [डिग्गी दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%97%e0%a5%80-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): जयपुर से 80 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में स्थित डिग्गी दुर्ग जयपुर के कच्छवाहा शासक वंश में उत्पन्न राव खंगार के पुत्र भाखरसी के वंशजों ने बनवाया। भाखरसी के वंशज भी खंगारोत कहलाते हैं। डिग्गी दुर्ग भव्य एवं दर्शनीय है। पूरा दुर्ग मजबूत प्राकार अर्थात् परकोटे से घिरा हुआ है। वर्तमान समय में डिग्गी दुर्ग टोंक जिले […] - [जाटों की गढ़ैयाएँ](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%9f%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc%e0%a5%88%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%8f%e0%a4%81/): जाटों की गढ़ैयाएँ प्राचीरों पर लगी तोपों से भी सुरक्षित थीं। ये तोपें मुगल सेनाओं से लूटी गई थीं। ताकि शत्रु को दूर से ही मार गिराया जा सके। - [सिनसिनी](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%80/): ई.1704 में चूड़ामन ने सिनसिनी का दुर्ग पुनः जीत लिया किंतु ई.1705 में यह दुर्ग फिर से मुगलों के अधिकार में चला गया। - [सांगानेर दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): जिला मुख्यालय भीलवाड़ा से चार किलोमीटर दूर स्थित सांगानेर दुर्ग का निर्माण अठारहवीं शताब्दी ईस्वी में मेवाड़ के महाराणा संग्रामसिंह द्वितीय (ई.1711-34) ने करवाया था। महाराणा संग्राम सिंह (द्वितीय) ने भी अपने पूर्वजों की तरह मुगलों के पतन में भूमिका निभाई थी और मुगलों से युद्ध की नीति जारी रखी थी। इस कारण महाराणा संग्रामसिंह […] - [बदनौर दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ac%e0%a4%a6%e0%a4%a8%e0%a5%8c%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): बदनौर दुर्ग मध्यकालीन हिन्दू दुर्ग स्थापत्य शैली का अच्छा उदाहरण है जिसे राजपूत स्थापत्य शैली भी कहा जाता है। यह दुर्ग एक ऊंची पहाड़ी पर बना हुआ है तथा इसके कुछ भवन सात मंजिला ऊंचे हैं। दुर्ग परिसर में कई स्मारक एवं मंदिर भी बने हुए हैं। दुर्ग खण्डहर प्रायः अवस्था में है। महाराणा उदयसिंह […] - [गढ़-पैलेस झालावाड़ तथा नवलखा दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc-%e0%a4%aa%e0%a5%88%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%b8-%e0%a4%9d%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a1%e0%a4%bc/): गढ़-पैलेस झालावाड़ के चारों ओर एक पराकोटा खींचकर उसके बीच में महल का निर्माण करवाया गया। यह नगर तान्त्रिक पद्धति के आधार पर त्रिकोणाकृति में बसाया गया था किन्तु इसका महल आयताकार बनाया गया। झाला राजपूत ई.1838 से पहले राजपूताना में किसी स्वतंत्र रियासत के राजा नहीं रहे। ई.1838 में राजराणा मदनसिंह, झालावाड़ राज्य का […] - [बादलगढ़ - बाघोर दुर्ग - बवाई दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a4%b2%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc/): बादलगढ़ झुंझुनूं स्थित बादलगढ़ का निर्माण 17वीं शताब्दी ईस्वी के अंतिम वर्षों में नवाब फजल खाँ द्वारा करवाया गया। यह दुर्ग मूलतः घोड़ों तथा ऊंटों के अस्तबल के रूप में बनवाया गया था। बाद में इसमें सेना भी रखी जाने लगी। इस दुर्ग में शीश महल, बारादरियां और बरामदे नहीं बने हुए हैं जैसे कि […] - [रोहट दुर्ग देसूरी दुर्ग सेवाड़ी दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%b9%e0%a4%9f-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): रोहट दुर्ग जोधपुर-पाली मार्ग पर जोधपुर से लगभग 40 किलोमीटर दूर स्थित रोहट में रियासती काल में रोहतास दुर्ग बना हुआ था जो लूनी नदी के किनारे स्थित था। रोहतास ही अब रोहट दुर्ग कहलाता है। जब औरंगजेब का पुत्र अकबर अपने पिता से बगावत करने के बाद असफल होकर भारत से ईरान चला गया […] - [दूनी दुर्ग भोमगढ़ एवं उनियारा दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a6%e0%a5%82%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): दूनी के शासक, हाथी पर जयपुर नरेश के पीछे बैठते थे तथा राजा पर चंवर ढुलाते थे। - [झिलाय दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%9d%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%af-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): रियासती काल में झिलाय आमेर के कच्छवाहा राजवंश की प्रमुख जागीर थी। इसे छोटी आमेर भी कहा जाता था। - [जैतारण दुर्ग तथा अगेवा दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%9c%e0%a5%88%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a3-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): जैतारण दुर्ग तथा कुछ अन्य भवन अब भी यहाँ मौजूद हैं। अब इस किले की प्राचीर तथा बुर्ज ही शेष हैं। - [करकेड़ी दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a4%95%e0%a5%87%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a5%80-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): करकेड़ी किशनगढ़ के राठौड़ों का एक  महत्वपूर्ण ठिकाणा था तथा करकेड़ी दुर्ग किशनगढ़ राज्य के प्रमुख दुर्गों में से एक था। ईस्वी 1756 में जब सावंतसिंह के पुत्र सरदारसिंह तथा सावंतसिंह के भाई बहादुरसिंह में किशनगढ़ राज्य का बंटवारा हुआ तब रूपनगढ़, अरांई, सलेमाबाद और करकेड़ी सरदारसिंह के अधिकार में रहे तथा किशनगढ़, कुचील, बांदर, […] - [पीपलूद दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%aa%e0%a5%80%e0%a4%aa%e0%a4%b2%e0%a5%82%e0%a4%a6-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): पीपलूद दुर्ग बालोतरा जिले में सिवाना से लगभग 9 किलोमीटर दूर पीपलूद गांव के समीप छप्पन की पहाड़ियों में स्थित है। गहन मरुस्थल से घिरे हुए होने के कारण यह मरु-दुर्ग श्रेणी में आता है तथा पहाड़ी पर स्थित होने के कारण इसे गिरि-दुर्ग श्रेणी में रखा जा सकता है। इस दुर्ग का निर्माण मारवाड़ […] - [कोटड़ा दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%9f%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): बाड़मेर जिले की शिव तहसील के कोटड़ा गांव में, किराड़ू के परमार शासकों द्वारा निर्मित एक लघु दुर्ग स्थित है जिसे कोटड़ा दुर्ग कहते हैं। कोटड़ा दुर्ग एक छोटी पहाड़ी पर बना हुआ है जो चारों ओर से रेगिस्तान से घिरी हुई है। इस कारण यह दुर्ग मरु-दुर्ग की श्रेणी में आता है। पहाड़ी पर […] - [सलूम्बर दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b8%e0%a4%b2%e0%a5%82%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%ac%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): सलूम्बर से कुछ दूर स्थित एक पहाड़ी पर बीसवीं सदी में निर्मित एक छोटा दुर्ग दर्शनीय है। इसे सलूम्बर दुर्ग कहते हैं। इस दुर्ग को अंग्रेज सरकार ने सेना रखने के उद्देश्य से बनाया था ताकि इस क्षेत्र में पनप रहे डाकुओं पर लगाम लगाई जा सके। अंग्रेजों ने राजपूताना के देशी राज्यों से सहायता […] - [बीकाजी की टेकड़ी](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%9f%e0%a5%87%e0%a4%95%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a5%80/): जोधपुर नरेश राव जोधा के पुत्र राव बीका ने ई.1485 में कच्ची ईंटों के एक दुर्ग की नींव रखी। इस दुर्ग को बीकाजी की टेकड़ी कहते हैं। बाद में बीकाजी की टेकड़ी में लाल बलुआ पत्थर से भी निर्माण करवाए गए। इस पत्थर को दुलमेरा पत्थर भी कहते हैं। तीन साल बाद जब ई.1488 में […] - [जोधपुर तथा शैफशोयुन - दो रेगिस्तानों में बसे जुड़वां शहर](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%9c%e0%a5%8b%e0%a4%a7%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%b0-%e0%a4%a4%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%b6%e0%a5%88%e0%a4%ab%e0%a4%b6%e0%a5%8b%e0%a4%af%e0%a5%81%e0%a4%a8/): जोधपुर तथा शैफशोयुन – दो रेगिस्तानों में बसे जुड़वां शहर हैं। जोधपुर एशिया के थार रेगिस्तान के पूर्वी छोर पर स्थित है जबकि शैफशोयुन (Chefchaouen) अफ्रीका के सहारा रेगिस्तान के पश्चिमी छोर पर स्थित मोरक्को नाम देश में स्थित है। जोधपुर तथा शैफशोयुन एक जैसी कई विशेषताएं एवं साम्यताएं लिये हुए हैं जिन्हें देखकर हैरानी […] - [राजस्थान का प्रशासनिक एकीकरण](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%8f%e0%a4%95/): संयुक्त राजस्थान संघ, बड़ी तेजी से एकीकरण की प्रक्रिया से गुजरा। 2 मार्च 1952 तक इस राज्यसंघ में लोकप्रिय सरकारें काम करती रहीं। 3 मार्च 1952 को मुख्यमंत्री टीकाराम पालीवाल के नेतृत्व में जनता द्वारा चुनी हुई पहली सरकार अस्तित्व में आई और लोकतांत्रिक राजस्थान अस्तित्व में आ गया। - [राजस्थान में सांस्कृतिक पर्यटन की संभावनाएं](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%9f%e0%a4%a8/): ऐसे बहुत से उदाहरण हो सकते हैं जिनमें छिपी संभावनाओं का पता लगा कर उन्हें टूरिज्म-प्रोडक्ट के रूप में तैयार किया जा सकता है और राजस्थान में सांस्कृतिक पर्यटन का विकास किया जा सकता है। - [कमलताल](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%95%e0%a4%ae%e0%a4%b2%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%b2/): धौलपुर नगर से बाहर एक उजड़ी हुई सी बस्ती में लोहे की ग्रिल से घिरा हुआ एक स्थान कमलताल कहलाता है। यह एक छोटा सा सरोवर है जो एक कुण्ड की तरह पक्के निर्माण से घिरा हुआ है। कभी इस कुण्ड में कमल पुष्प खिलते होंगे, इसी कारण इसे कमलताल कहते होंगे। यह छोटा सा […] - [लोहागढ़ दुर्ग भरतपुर](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc/): लोहागढ़ दुर्ग भरतपुर नगर के दक्षिणी हिस्से में स्थित है तथा आयताकार बना हुआ है। दुर्ग का विस्तार 6.4 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में है। - [कुम्हेर दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%b9%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): कुम्हेर दुर्ग डीग से 18 किलोमीटर तथा भरतपुर से 16 किलोमीटर दूर है। सिनसिनी गांव यहाँ से 10 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में स्थित है। - [चूरू जिले के दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%9a%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a5%82-%e0%a4%9c%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): रियासती काल में चूरू जिला बीकानेर रियासत के अंतर्गत स्थित था जिस पर राठौड़ राजवंश का शासन था। इसलिए चूरू जिले के दुर्ग राठौड़ राजाओं एवं सामंतों द्वारा निर्मित हैं। चूरू जिले के दुर्ग मस्थलीय श्रेणी के दुर्ग हैं जो अपने निर्माण के समय गहन थार मरुस्थल में स्थित थे। इनमें से कुछ दुर्ग छोटी […] - [शेखावतों के लघु दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b6%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%a4%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b2%e0%a4%98%e0%a5%81-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): शेखावत आम्बेर के कच्छवाहा शासक वंश की ही एक शाखा है। इनका कोई बड़ा स्वतंत्र राज्य नहीं था। ये स्थानीय शासकों की तरह शासन करते थे। शेखावाटी क्षेत्र में शेखावतों के लघु दुर्ग बड़ी संख्या में बने हुए हैं। शेखावतों के लघु दुर्ग सीकर एवं झुंझुनूं जिलों में स्थित हैं। ये दुर्ग शेखावाटी क्षेत्र के […] - [झालावाड़ की बौद्ध गुफाएं](https://rajasthanhistory.com/boddh-caves-of-jhalawar/): झालावाड़ की बौद्ध गुफाएं आसानी से शत्रुओं अथवा आक्रमणकारियों की दृष्टि में नहीं आतीं। - [भूमिका - राजस्थान में बौद्ध स्मारक तथा मूर्तियाँ](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ad%e0%a5%82%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ac%e0%a5%8c%e0%a4%a6%e0%a5%8d/): भूमिका – राजस्थान में बौद्ध स्मारक तथा मूर्तियाँ पृष्ठ पर डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित पुस्तक राजस्थान में बौद्ध स्मारक तथा मूर्तियाँ की भूमिका स्पष्ट की गई है। करुणा और दया के अवतार भगवान बुद्ध के उपदेशों से भारत भूमि ही नहीं, मध्य और दक्षिण एशिया का विस्तृत भूभाग भी अपार श्रद्धा से नतमस्तक हो […] - [अकेलगढ़](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%85%e0%a4%95%e0%a5%87%e0%a4%b2%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc/): अकेलगढ़ नाम से दो दुर्ग मिलते हैं। ये दोनों दुर्ग हाड़ौती क्षेत्र में चम्बल के किनारे हैं तथा भीलों के बनाए हुए हैं। अब इन दुर्गों के केवल खण्डहर ही मौजूद हैं। - [माण्डलगढ़ दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a5%8d%e0%a4%a1%e0%a4%b2%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): मेवाड़ के महाराणा अड़सी (अरिसिंह द्वितीय) (ई.1761-73) ने मेहता अगरचंद को माण्डलगढ़ दुर्ग का दुर्गपति नियुक्त किया। - [मनोहरथाना दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ae%e0%a4%a8%e0%a5%8b%e0%a4%b9%e0%a4%b0%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): मनोहरथाना दुर्ग की मुख्य प्राचीर में तीन प्रवेश द्वार बने हुए हैं। दुर्ग के मुख्य प्रवेश द्वार के बायीं ओर एक सुरंग बताई जाती है जिसका निकास दुर्ग से पांच किलोमीटर दूर एक गांव में है। - [वैर दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b5%e0%a5%88%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): वैर दुर्ग अठारहवीं शताब्दी ईस्वी का लघु स्थल दुर्ग है। इसे राजा बदनसिंह ने बनवाया। राजा बदनसिंह को जयपुर नरेश ने अपने हाथों से तिलक करके भरतपुर का राजा स्वीकार किया था। - [डीग दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a1%e0%a5%80%e0%a4%97-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): आगरा तथा मथुरा के निकट होने के कारण डीग पर शत्रुओं के आक्रमण होते ही रहते थे। - [किलोण दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%a3-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): किलोण दुर्ग की दीवारें साधारण बनाई गई क्योंकि चारों तरफ की पहाड़ियां एक प्राकृति दीवार के रूप में कार्य करती थीं तथा दुर्ग तक अचानक ही शत्रु का आ धमकना आसान नहीं था। - [फलौदी दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ab%e0%a4%b2%e0%a5%8c%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): संस्कृत शिलालेखों में फलौदी नगर का प्राचीन नाम फलवर्द्धिका तथा विजयपुर मिलता है। फलौदी नगर जोधपुर के शासक राव सूजा के पुत्र नरा ने बसाया। - [रूपनगढ़ दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a5%82%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): रूपनगढ़ दुर्ग की प्राचीर में नौ बुर्ज बनी हुई हैं। दुर्ग के भीतर राजसी महल, शस्त्रागार, बारूदखाना भूमिगत गलियारे, जेल तथा अन्य निर्माण देखे जा सकते हैं। - [किशनगढ़ दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b6%e0%a4%a8%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): महाराजा किशनसिंह के वंशज ई.1948 तक किशनगढ़ राज्य पर शासन करते रहे। छोटी रियासत के सीमित संसाधन होने पर भी किशनगढ़ के राजाओं ने कई दुर्ग बनवाये। - [भूकरका दुर्ग नोहरगढ़ तथा जसाना दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ad%e0%a5%82%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): भूकरका दुर्ग स्थल श्रेणी का मरुस्थलीय दुर्ग है। यह लघु दुर्ग सामंती काल में स्थानीय शासक का निवास स्थल था। - [महनसर दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%a8%e0%a4%b8%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): अंग्रेजों के समय में महनसर के ठाकुर को न्यायिक अधिकार प्राप्त थे। उसे जयपुर राज्य की तरफ से राजश्री तथा सोनानरेश की उपाधियां प्राप्त थीं। - [नवलगढ़ एवं दलेलगढ़](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a8%e0%a4%b5%e0%a4%b2%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc-%e0%a4%8f%e0%a4%b5%e0%a4%82-%e0%a4%a6%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%b2%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc/): नवलगढ़ एवं मंडावा के ठाकुरों ने उदयसिंह के नेतृत्व में पिलानी पर आक्रमण किया तथा दलेल गढ़ घेर लिया। लक्ष्मणसिंह को गढ़ खाली करके भागना पड़ा। संभवतः इसके बाद नवलगढ़ का दुर्ग पुनः नवलगढ़ के ठिकाणेदार उदयसिंह के ही अधीन हो गया। - [दांतारामगढ़ दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): ई.1755 में जोधपुर नरेश रामसिंह की विमाता, जीणमाता के दर्शन करने के लिये सीकर ठिकाणे में आई, तब ठाकुर गुमानसिंह ने उसे लूट लिया। ठाकुर को दण्ड देने के लिये जयपुर की सेना ने दांतारामगढ़ दुर्ग पर आक्रमण किया। - [लालगढ़ दुर्ग एवं महल](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): लालगढ़ दुर्ग-महल में लगभग 100 आवासीय कक्ष बने हुए हैं जो रियासती काल में राजपरिवार एवं उनके अनुचरों के निवास स्थल हुआ करते थे। इस महल में एक समृद्ध पुस्तकालय भी है। इसमें कई मूल दस्तावेज एवं दुर्लभ ग्रंथ संजोये गये हैं। - [चूरू दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%9a%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a5%82-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): फरवरी 1816 में पृथ्वीसिंह ने तीन हजार आदमी एकत्रित करके चूरू दुर्ग पर आक्रमण किया किंतु उसके बहुत से आदमी मारे गये और पृथ्वीसिंह रामगढ़ चला गया। - [जूनागढ़ बीकानेर](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%9c%e0%a5%82%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc/): जूनागढ़ में स्थित महाराजा गंगासिंह का कार्यालय आज भी ज्यों का त्यों रखा गया है। उनकी मेज, कुर्सी, मुहर, वेषभूषा, तस्वीरें, घड़ियां, उनके शिक्षक का फोटो, दिल्ली दरबार में जो कुर्सी उन्हें बैठने के लिये दी गई, महाराजा का टेलिफोन आदि भी इस कार्यालय में रखे हैं। - [आऊवा दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%86%e0%a4%8a%e0%a4%b5%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): ई.1857 की सैनिक क्रांति के समय क्रांतिकारी सैनिक, आउवा ठिकाणे में एकत्रित हुए। इस समय राजाओं ने अंग्रेजों का साथ दिया तथा भारतीय क्रांतिकारी सैनिकों का दमन किया। - [बाली दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): यह भी कहा जाता है कि इस दुर्ग का निर्माण विक्रम संवत् 1240 में चौहान राजा बलदेव ने करवाया तथा अपने अपने नाम पर यहाँ बाली नाम का गांव बसाया। - [सोजत दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b8%e0%a5%8b%e0%a4%9c%e0%a4%a4-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): माना जाता है कि ई.1460 में राव जोधा राठौड़ के पुत्र नीम्बा ने नानी सीरड़ी नामक पहाड़ी पर सोजत दुर्ग बनवाया। - [भोपालगढ़ दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ad%e0%a5%8b%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): भोपालगढ़ दुर्ग कई सौ वर्ष पुराना है। इस दुर्ग के मूल निर्माणकर्ता एवं निर्माण समय की अब कोई जानकारी नहीं मिलती। भोपालगढ़ दुर्ग पूरी तरह खण्डहरों में बदल गया है तथा प्राचीन अवशेष इधर-उधर बिखरे पड़े हैं। स्थापत्य एवं शिल्प की दृष्टि से बहुमूल्य सामग्री गत वर्षों में तस्करों द्वारा चुरा ली गई है। रियासत […] - [भाद्राजून दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a5%82%e0%a4%a8-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): भाद्राजून जागीरदार के अधीन भाद्राजून दुर्ग था जो यहाँ की पहाड़ियों पर बना हुआ है। - [भूगर्भीय जलस्तर में वृद्धि हेतु झालावाड़ जिले में ठोस कार्ययोजना](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ad%e0%a5%82%e0%a4%97%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ad%e0%a5%80%e0%a4%af-%e0%a4%9c%e0%a4%b2%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b5%e0%a5%83%e0%a4%a6%e0%a5%8d/): झालावाड़ जिले में भूगर्भीय जलस्तर में वृद्धि हेतु मुख्यमंत्री जलस्वावलम्बन योजना के तहत वर्ष 2016 में महत्वपूर्ण कदम उठाए गए। इन उपायों से धरती के रीते गर्भ को हर साल 67 करोड़ घनफुट जल मिलेगा ।  - [झालावाड़ की बुनकर महिलाएं](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%9d%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a1%e0%a4%bc-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a5%81%e0%a4%a8%e0%a4%95%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%8f/): झालावाड़ की बुनकर महिलाएं अपने हथकरघे पर तरह-तरह के कपड़े बुनकर देश-विदेश में निर्यात कर रही हैं। झालावाड़ जिले के असनावर, रायपुर, झालरापाटन, झिरी, सुनेल, मोलक्या, देवरी तथा निकटवर्ती गांवों में 200 से अधिक बुनकर महिलाएं, महिला सशक्तीकरण की मिसाल बनकर उभरी हैं। वे अपने घरों में बैठकर साड़ी, खेस, सफेद फैब्रिक, तौलिये, बुनती हैं […] - [मारवाड़ में साहित्य संरक्षण एवं संवर्द्धन की परम्परा](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a1%e0%a4%bc-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af/): मारवाड़ के अनेक राजा, रानी एवं राजकुमारियों में भी अनेक कवि, संत एवं साहित्यकार हुए जिन्होंने डिंगल, ब्रज, संस्कृत एवं हिन्दी भाषा के खजाने को समृद्ध किया। - [अनुक्रमणिका - पासवान गुलाबराय](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%ae%e0%a4%a3%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%b2%e0%a4%be/): इस उपन्यास के कई संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। राजस्थान के प्रमुख समाचार पत्र दैनिक नवज्योति ने इसे धारावाहिक के रूप में भी प्रकाशित किया था। - [राजस्थानी भाषा का साहित्य](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d/): राजस्थान का संत साहित्य विश्व का सर्वाधिक समृद्ध साहित्य है। राजस्थान के भक्ति आंदोलन में वैष्णव भक्तों, दादू पंथियों तथा राम स्नेही साधुओं ने विपुल मात्रा में संत साहित्य का सृजन किया। भक्ति, अध्यात्म, नीति एवं तत्व विवेचन इस साहित्य का प्रमुख आधार है। - [राजस्थानी भाषा की बोलियाँ](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a5%8b%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be/): राजस्थानी भाषा की इतनी अधिक बोलियाँ हैं कि प्रत्येक 10-12 किलोमीटर की दूरी पर बोली बदल जाती है। राजस्थान में रहने वाली प्रत्येक जाति की अपनी बोली है जो कुछ अंतर के साथ बोली जाती है। - [राजस्थानी भाषा](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a4%be/): राजस्थानी भाषा का इतिहास प्राचीन भाषाओं से आरम्भ होता है। उस समय न तो राजस्थान शब्द का उद्भव हुआ था और न भाषा शब्द का ही जन्म हुआ था। उस काल के लोग अपने मन के भावों को व्यक्त करने के लिए शब्दों को गढ़ रहे थे। बोली और भाषा में अंतर होता है। जब […] - [खींची चौहानों के ठिकाणे](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%96%e0%a5%80%e0%a4%82%e0%a4%9a%e0%a5%80-%e0%a4%9a%e0%a5%8c%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a0%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a5%87/): लाखनराव के पुत्र खींवराज के वंशज खींची चौहान कहलाए।  राजस्थान और मध्यप्रदेश के बीच का क्षेत्र जिसकी सीमाएं हाड़ौती से लगती हैं, खींचीवाड़ा कहलाता था क्योंकि खींचियों का बड़ा राज्य उसी क्षेत्र में स्थापित हुआ। खींची चौहानों की राजधानी गढ़ गागरौन थी जिसे गुग्गर तथा गुगोर भी कहते थे। - [SALT MANAGEMENT IN RAJPUTANA](https://rajasthanhistory.com/salt-management-in-rajputana/): In Rajasthan salt has been lavishly provided by nature and spread out in salt-impregnated lakes and marshes. Geologically the age of salt is still undecided. - [OPIUM TRADE OF RAJPUTANA IN 19TH CENTURY](https://rajasthanhistory.com/opium-trade-of-rajputana/): Extensive cultivation of poppy, from which juice was extracted and opium prepared, was practiced in the south-eastern States of Rajputana. Climatic conditions and rich soil of these States were especially suited for its production. - [MEDICAL EDUCATION IN RAJPUTANA](https://rajasthanhistory.com/medical-education-in-rajputana/): The need for medical education in Rajputana on modern lines was first felt in the nineteenth century when trained Indian doctors were required for the British Army in India. - [Modern Education In Princely States Of Rajputana](https://rajasthanhistory.com/modern-education-in-princely-states/): Rajputana states had a mix pattern of ancient and medieval education system which fulfilled the basic educational needs of a common man. But in English era, a need of modern Education in Princely States Of Rajputana was felt. - [Freedom Movements In Princely States And Attitude Of Rulers](https://rajasthanhistory.com/freedom-movements-in-princely-states/): Freedom Movements in princely states and attitude of rulers towards it is a very interesting and very disgusting era of Indian history. - [अजमेर का स्थापना काल](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%85%e0%a4%9c%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b2/): भारत के इतिहास में प्रमुख भूमिका निभाने वाले अजमेर का स्थापना काल अभी तक निश्चित नहीं हो पाया है। लोक किम्वदंती है कि अजमेर के तारागढ़ नामक दुर्ग की स्थापना बाली की पत्नी तारा ने की थी[1]  किंतु इस सम्बन्ध में कोई प्राचीन साक्ष्य नहीं मिलता है। अतः यह धारणा मिथ्या जान पड़ती है। यह […] - [मध्यकालीन मेवाड़ में ओसवाल](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ae%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%80%e0%a4%a8-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a1%e0%a4%bc-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%93%e0%a4%b8%e0%a4%b5/): मध्यकालीन रियासतों एवं ब्रिटिश कालीन रियासतों में भी ओसवालों को दीवान, प्रधानमंत्री एवं सेनापति जैसे महत्वपूर्ण पद दिए जाते थे। - [टहला दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%9f%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): सम्पूर्ण दुर्ग प्राचीर से घिरा हुआ है जिसमें आठ बुर्जियां बनी हुई हैं। टहला दुर्ग तक पहुंचने के लिये काले पत्थरों का खुर्रा बना हुआ है। - [लक्ष्मणगढ़ दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b2%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%a3%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): लक्ष्मणगढ़ दुर्ग पूरी दुनिया में वास्तुकला का एक अनूठा नमूना है क्योंकि यह संरचना विशाल चट्टानों के बिखरे हुए टुकड़ों पर बनी है। - [खाचरियावास दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%96%e0%a4%be%e0%a4%9a%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): ठाकुर विजयसिंह ने दुर्ग के चारों ओर बुर्जों का तथा दुर्ग के भीतर महलों का निर्माण करवाया। उसने चारों कोनों पर चार बुर्ज बनवाईं जहाँ से तोपें चलाई जाती थीं। - [फतहपुर दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ab%e0%a4%a4%e0%a4%b9%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): फतेहपुर दुर्ग ई.1453 में नवाब फतेह खाँ ने बनवाया। उसने किले का अंतःभाग तथा प्राचीर का ही निर्माण करवाया। - [कुचामन दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a4%a8-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): कुचामन और उसके निकटवर्ती क्षेत्र यथा हिराणी, मीठड़ी, लिचाणा आदि से गौड़ शासकों के शिलालेख प्राप्त होते हैं। - [चौमूं दुर्ग (रघुनाथगढ़)](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%9a%e0%a5%8c%e0%a4%ae%e0%a5%82%e0%a4%82-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): चौमूं का किला स्थल दुर्ग, पारिख दुर्ग तथा धान्वन दुर्ग की श्रेणी में आता है। निर्माण के समय यह चारों ओर से वन प्रदेश से घिरा हुआ था इस कारण ऐरण श्रेणी का दुर्ग था। अब दुर्ग के चारों ओर के वन कट गये हैं। - [सहर दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b8%e0%a4%b9%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): पहले यहाँ मीणाओं का शासन था किन्तु बाद में आम्बेर रियासत के अधीन पच्याणोत कछवाहों का ताजीमी ठिकाना बन गया। - [माधोराजपुरा दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a7%e0%a5%8b%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): माधोराजपुरा दुर्ग स्थल दुर्ग, पारिघ दुर्ग तथा पारिख दुर्ग की श्रेणी में आता है। - [बोराज दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ac%e0%a5%8b%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): किसी समय बोराज दुर्ग जैसे छोटे-छोटे दुर्ग राजस्थान से लेकर महाराष्ट्र तक हजारों की संख्या में स्थित थे। इनमें से अब बहुत से दुर्ग नष्ट हो गए हैं अथवा उपेक्षित अवस्था में खण्डहरों के रूप में पड़े हैं। - [राजौरगढ़ दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a5%8c%e0%a4%b0%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): बड़गूजरों ने राजस्थान में आठवीं से दसवीं शताब्दी के आस-पास राजौरगढ़, देवती, माचेड़ी, टहला, दौसा, भाण्डारेज, तीतरवाड़ा, कोलासर, शंकरगढ़, भानगढ़, राजगढ़, बयाना आदि स्थानों पर अधिकार किया। - [दौसा दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a6%e0%a5%8c%e0%a4%b8%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): दौसा दुर्ग एक ऊंची और विशाल पहाड़ी पर बना हुआ है। लगभग 1000 साल पुराना यह दुर्ग, समुद्र तल से लगभग 1643 फुट ऊंचा है तथा पांच किलोमीटर की परिधि में बना हुआ है। - [मांच दुर्ग (जमवा रामगढ़)](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%9a-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): मांच दुर्ग के बारे में यह उक्ति कही जाती है- जारूड़ो ज्यूं जोधपुर सांऊ ज्यूं सांगानेर। मांच तखत को बैठबो, ज्यूं आमेर।। - [गलियाकोट दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%97%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%9f-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): गलियाकोट का प्राचीन नाम कोटनगर, कोट महादुर्ग तथा श्रीकोट है। यह वागड़ क्षेत्र का प्रमुख दुर्ग है तथा माहीसागर और महिये के बीच की पहाड़ी पर बना हुआ है। गलियाकोट दुर्ग का निर्माण 12वीं सदी में परमारों द्वारा करवाया गया। वागड़ के परमार, गुजरात के चौलुक्यों (सोलंकियों) के अधीन थे। जब नाडौल के चौहान राजकुमार […] - [बीकमपुर दुर्ग एवं जांगलू दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%95%e0%a4%ae%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): बीकमपुर गढ़ के मुख्य द्वार की तरफ एक शनिदेव मंदिर बना हुआ है जो अब लगभग 7-8 फुट धरती में धंस गया है। - [जूना बाहड़मेर](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%9c%e0%a5%82%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b0/): जूना बाहड़मेर, बाड़मेर-मुनाबाव रेलमार्ग पर स्थित जसाई रेल्वे स्टेशन से लगभग छः किलोमीटर दूर स्थित है। इसे प्राचीन समय में बाहड़मेरु, बाहड़गिरि, बाप्पड़ाऊ तथा जूना बाहड़मेर के नाम से जाना जाता था। - [चन्द्रावती दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%9a%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): चन्द्रावती नगरी 11-12वीं सदी ईस्वी में बहुत समृद्ध थी। जैन मुनि सौभाग्यनंदि सूरि द्वारा ई.1515 में रचित ग्रंथ ‘विमल चरित्र’ के अनुसार इस क्षेत्र में परमारों के 1800 गांव थे। - [अचलगढ़ (आबू दुर्ग)](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%85%e0%a4%9a%e0%a4%b2%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc/): आबूगढ़ पर परमारों का किला है, इस किले का कोट कुंभा ने बनवाया था। कुंभा स्वयं भी प्रायः इस दुर्ग में रहता था। - [सिवाना दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): अकबर के आदेश पर जोधपुर नरेश मोटा राजा उदयसिंह ने सिवाना पर आक्रमण किया। जब दुर्ग की रक्षा का कोई उपाय नहीं रहा तो कल्ला रायमलोत ने साका करने का निर्णय लिया। कल्ला की नवविवाहित हाड़ी रानी जो कि बूंदी के राव सुरजन हाड़ा की पुत्री थी, के नेतृत्व में जौहर का आयोजन किया गया। - [खण्डेला दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%96%e0%a4%a3%e0%a5%8d%e0%a4%a1%e0%a5%87%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): मुगल बादशाह अकबर के समय खण्डेला पर निर्वाण राजपूत शासन करते थे। वे लम्बे समय से यहाँ शासन करते आ रहे थे। - [सूरतगढ़ दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b8%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): सूरतगढ़ दुर्ग के लिए अधिकतर ईंटें रंगमहल से लाई गई थीं। रंगमहल भी यौधेयों का प्राचीन एवं महत्वपूर्ण स्थल था - [अनूपगढ़ दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a5%82%e0%a4%aa%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): ई.1678 में जोहियों द्वारा निर्मित पुराने दुर्ग के स्थान पर एक नया दुर्ग बनवाया गया जिसका नाम बीकानेर नरेश अनूपसिंह के नाम पर अनूपगढ़ दुर्ग रखा गया। - [इंदौर दुर्ग - टपूकड़ा दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%87%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%8c%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): निकुंभ क्षत्रियों द्वारा बनवाये जाने के बाद इंदौर दुर्ग तब तक हिन्दुओं के अधिकार में रहा जब तक कि दिल्ली पर मुसलमानों की सत्ता स्थापित नहीं हो गई। - [अलवर दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%85%e0%a4%b2%e0%a4%b5%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): प्रतापसिंह ने उसकी बात मान ली तथा अलवर दुर्ग पर अधिकार कर लिया। 25 दिसम्बर 1775 को प्रतापसिंह ने दुर्ग में प्रवेश किया। - [वागड़ के दुर्ग](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%97%e0%a4%a1%e0%a4%bc-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a6%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97/): डूंगरपुर में दक्षिण की ओर धनमाता की पहाड़ी पर लघु दुर्ग बना हुआ है। इस दुर्ग का निर्माण डूंगरपुर नगर की रक्षा के लिये सैनिक रखने के लिये किया गया था। - [ज्येष्ठाधिकार का सिद्धांत और राजपूत राज्यों में उत्तराधिकार विवाद](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%87%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a0%e0%a4%be%e0%a4%a7%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%82/): ज्येष्ठाधिकार का सिद्धांत (Law of Primogeniture) प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत के विभिन्न हिन्दू राज्यों में उत्तराधिकार विवादों (Succession Disputes) का एक प्रमुख कारण यह था कि तत्कालीन राज्यशास्त्रीय ग्रंथों (Political Texts) में ज्येष्ठाधिकार का सिद्धांत और उत्तराधिकार के नियमों (Law of Succession) का विस्तृत एवं स्पष्ट विवेचन उपलब्ध नहीं था। सामान्यतः राजवंशों में ज्येष्ठाधिकार का सिद्धांत (Law of Primogeniture) मान्य था, जिसके अनुसार शासक का ज्येष्ठ पुत्र (Eldest Son) अपने पिता के पश्चात् सिंहासन का उत्तराधिकारी बनता था। किन्तु इस सिद्धांत के विभिन्न पक्षों की व्यवस्थित व्याख्या कहीं नहीं मिलती। विशेष रूप से दो प्रश्न सदैव विवादास्पद बने रहे— इन […] - [भाटी गोयन्ददास का मारवाड़ की राजनीति में महत्व](https://rajasthanhistory.com/bhati-goyand-das-in-politics-of-marwar/): भाटी गोयन्ददास (गोविन्ददास) ने साधारण राजपूत परिवार में जन्म लिया किंतु अपनी स्वामिभक्ति, शौर्य एवं बुद्धि-चातुर्य के बल पर वह मारवाड़ राज्य (Princely State of Marwar) की शासन व्यवस्था में एक प्रमुख व्यक्ति बन गया। 1. भाटी गोयन्ददास का मारवाड़ की राजनीति में महत्व भाटी गोयन्ददास (Bhati Goyand Das) उसने जागीरदारों की वरिष्ठता के नियमों व दरबारी शिष्टाचारों-डावी व जीमणी मिसलों- की व्यवस्था के स्थान पर मारवाड़ की मुख्य खांपों के जागीरदारों को सिरायत पद से नवाजा। कुरब कायदे, विभिन्न प्रकार की ताजीमें, सिरोपाव के विभिन्न स्तर, अगवानी के नियम-कायदे, भाईबंट की व्यवस्था को बदला तथा जागीरदारों के साथ मारवाड़ […] - [आमेट जागीर में उत्तराधिकार की समस्या और ब्रिटिश नीति](https://rajasthanhistory.com/amet-jagir-mewar/): यह आलेख ब्रिटिश शासन काल में मेवाड़ राज्य की आमेट जागीर में हुए उत्तराधिकार संबंधी विवाद पर आधारित है जिसके माध्यम से यह समझने का प्रयास किया गया है कि ब्रिटिश पॉलिटिकल अधिकारी देशी राज्यों एवं जागीरों में किस प्रकार हस्तक्षेप करते थे। भारत के बड़े से बड़े हिन्दू राजाओं एवं सामंतों में उत्तराधिकार के झगड़े चलते रहते थे जिससे राज्य एवं जागीर के शत्रु इन झगड़ों का लाभ उठाने का प्रयास करते थे। इस स्थिति के कारण राज्य और जागीर दोनों की शक्ति क्षीण होती थी। मुगलों ने राजाओं एवं जागीरदारों की इसी कमजोरी का लाभ उठाकर भारत पर […] - [जोधपुरा उत्खनन: स्तर विन्यास और मृदभांड अनुक्रम](https://rajasthanhistory.com/jodhpura-excavation/): यह आलेख राजस्थान सरकार के पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग द्वारा जयपुर जिले के जोधपुरा नामक पुरास्थल पर किए गए उत्खनन के निष्कर्षों और उनके ऐतिहासिक महत्व का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत करता है। जोधपुरा के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संदर्भ 1. परिचय और भौगोलिक स्थिति जोधपुरा (27° 31′ उत्तरी अक्षांश और 76° 5′ पूर्वी देशांतर) राजस्थान के जयपुर जिले की कोटपूतली तहसील में स्थित एक अत्यंत महत्वपूर्ण पुरातात्विक टीला है। यह स्थल जयपुर-दिल्ली राजमार्ग पर जयपुर से लगभग 98 किमी की दूरी पर साबी नदी के दाहिने तट पर स्थित है। भौगोलिक और ऐतिहासिक दृष्टि से यह क्षेत्र प्राचीन ‘मत्स्य देश’ का […] - [पश्चिमी मालवा का वर्धन राजवंश और राजस्थान की संप्रभुता](https://rajasthanhistory.com/pashchimi-malwa-ka-vardhan-rajvansh-aur-rajasthan-ki-samprabhuta/): पश्चिमी मालवा का वर्धन राजवंश छठी शताब्दी ईस्वी के पूर्वार्ध में राजस्थान के इतिहास से जुड़ गया था। ऐसी स्थिति में राजस्थान के समक्ष संप्रभुता का संकट खड़ा हो गया था। इस काल से पूर्व, चौथी शताब्दी के उत्तरार्ध से लेकर पाँचवीं शताब्दी के पूर्वार्ध तक पश्चिमी मालवा और दक्षिणी राजस्थान के कई हिस्सों पर वर्मन या औलिकर राजवंश का शासन था, जिसकी स्थापना चौथी शताब्दी के मध्य में इसके पहले शासक जयवर्मन ने गुप्त सम्राट समुद्रगुप्त के आशीर्वाद से की थी [1] इसके बाद क्रमशः सिंहवर्मन, नरवर्मन (ज्ञात तिथि 404 ई.)[2] , विश्ववर्मन (अंतिम ज्ञात तिथि 423 ई.)[3] और […] - [दादूपंथ के पंचवाणी संग्रह](https://rajasthanhistory.com/dadupanth-panchvani-sangrah/): दादूपंथ के पंचवाणी संग्रह ठीक उसी प्रकार अनेक संतों, कवियों और भक्तों की वाणियाँ संग्रहीत हैं जिस प्रकार गुरुग्रंथ साहब में देखने को मिलती हैं। इनमें निर्गुण भक्ति, योग, वैराग्य, सामाजिक समता तथा आध्यात्मिक अनुभूति के विविध स्वर मिलते हैं। प्रस्तुत आलेख में दादूपंथ के पंचवाणी संग्रह परंपरा, उनकी संरचना, विभिन्न काव्यकारों की रचनाएँ, भाषा-शैली, दार्शनिक आधार तथा विशेष रूप से कांवड़िया, लड्डावरा, बारहठ और अन्य संत कवियों की वाणी का समालोचनात्मक अध्ययन किया गया है। दादूपंथ राजस्थान की संत परंपरा में दादूपंथ का विशिष्ट स्थान है। दादूदयाल के उपदेशों और निर्गुण भक्ति पर आधारित इस परंपरा ने केवल धार्मिक […] - [नाथ सम्प्रदाय का मारवाड़ की राजनीति में वर्चस्व](https://rajasthanhistory.com/marwar-me-nath-sampraday/): नाथ सम्प्रदाय का मारवाड़ की राजनीति में वर्चस्व उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वाद्ध की एक आश्चर्यजनक और महत्वपूर्ण घटना थी। राजपूताना की किसी अन्य रियासत में इस तरह का साम्प्रदायिक वर्चस्व नहीं देखा गया। मध्यकालीन भारत के हिन्दू राज्यों में वैष्णव, शैव एवं शाक्त मतों के विभिन्न सम्प्रदायों की राजनीतिक भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। 19वीं सदी के पूर्वार्द्ध में मारवाड़ राज्य में नाथ सम्प्रदाय ने राज्य की राजनीति, प्रशासन, आर्थिक नीतियों और सत्ता संरचना को गहराई से प्रभावित किया। महाराजा मानसिंह के शासनकाल (1803–1843 ई.) में नाथ संतों, विशेषतः आयस देवनाथ और उनके परिवार, ने राज्य की सत्ता पर व्यापक […] - [वीसलदेव रासो: रासो काव्य परंपरा का अनूठा श्रृंगारिक रत्न](https://rajasthanhistory.com/veesaldev-raso/): हिन्दी साहित्य के आदिकाल (वीरगाथा काल) में जहाँ एक ओर ‘पृथ्वीराज रासो’ जैसी रचनाएँ युद्ध और शौर्य के वर्णन से ओत-प्रोत थीं, वहीं नरपति नाल्ह द्वारा रचित ‘वीसलदेव रासो’ (1155 ई.) एक प्रेम-प्रधान और विरह-प्रधान काव्य के रूप में उभरा। यह काव्य अजमेर के चौहान राजा वीसलदेव (विग्रहराज चतुर्थ) और मालवा के परमार राजा भोज की पुत्री राजमती के प्रेम, विवाह, विरह और पुनर्मिलन की कथा है। वीसलदेव रासो (VEESALDEO RASO) विशेषता (Feature) विवरण (Description) कवि (Poet) नरपति नाल्ह (Narpatinalh) समय (Time) 1155 ई. (संवत् 1212) मुख्य रस (Main Sentiment) श्रृंगार (विशेषकर विप्रलंभ) प्रमुख पात्र (Protagonists) वीसलदेव और राजमती काव्य […] - [नाग कौन थे](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%97-%e0%a4%95%e0%a5%8c%e0%a4%a8-%e0%a4%a5%e0%a5%87/): नागौर शहर का नाम नागों पर क्यों पड़ा? नागौर शब्द से भान होता है कि इसे नागों ने बसाया किंतु ये नाग कौन थे? कहाँ से आए थे? भारत के इतिहास में कब से अपना स्थान बनाए हुए थे? इन शब्दों के उत्तर अब काल के प्रवाह में खो गए हैं किंतु फिर भी कुछ सांस्कृतिक उल्लेख नागों के अत्यंत प्राचीन अस्तित्व की ओर संकेत करते हैं। नाग वंश की उत्पत्ति और इतिहास नाग शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख रामकथा से जुड़ा हुआ है जहाँ लक्ष्मणजी को शेषनाग का अवतार माना गया है। यह शेषनाग सूर्यवंशी इक्ष्वाकुओं का ही एक अत्यंत […] - [अनुक्रमणिका - राजस्थान में वन एवं वन्य जीवन](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%ae%e0%a4%a3%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%ae%e0%a5%87/): अनुक्रमणिका – राजस्थान में वन एवं वन्य जीवन पृष्ठ पर मूल पुस्तक के अध्यायों की सूची दी जा रही है। इस पुस्तक का लेखन डॉ. मोहनलाल गुप्ता ने किया है तथा यह पुस्तक बिक्री के लिए डॉ. मोहनलाल गुप्ता डॉट कॉम तथा अमेजन डॉट इन दोनों पर उपलब्ध है। 1. राजस्थान का संक्षिप्त परिचय     7 2. राजस्थान का भौगोलिक परिचय 10 3. राजस्थान प्रदेश की जलवायु   16 4. राजस्थान में नदियाँ, बांध एवं झीलें   19 5. राजस्थान की मिट्टियाँ 34 6. राजस्थान का नैसर्गिक पादप जगत   39 7. राजस्थान में वन    47 8. वन संरक्षण एवं वन संवर्द्धन    62 9. अरावली […] - [मेवाड़ भील कोर](https://rajasthanhistory.com/mewar-bheel-corps/): मेवाड़ भील कोर की स्थापना ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा मेवाड़ के महाराणा की सहमति पर की गई थी। इससे मेवाड़ राज्य भीलों के उपद्रवों को शांत करने में काफी हद तक सफल हो गया। मेवाड़ में मगरा नामक जिले का एक हिस्सा भोमट कहलाता था और यहाँ के सरदारों को ‘भोमट के सरदार’ कहा जाता था। भोमट के सरदारों की दो श्रेणियाँ थीं— भोमिया सरदार तथा गिरासिया सरदार। भोमिया वे सरदार थे, जिन्हें अपने उत्तराधिकार के मामले में महाराणा से कोई स्वीकृति नहीं लेनी पड़ती थी और न ही ये महाराणा की सेवा में उपस्थित होते थे। आवश्यकता पड़ने पर […] - [अजमेर का वृहत् इतिहास - अनुक्रमणिका](https://rajasthanhistory.com/ajmer-ka-vrhat-itihaas-anukramanik/): इस पृष्ठ पर डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित पुस्तक अजमेर का वृहत् इतिहास – अनुक्रमणिका दी जा रही है। आप यह पुस्तक अमेजन डॉट इन से प्राप्त कर सकते हैं। लेखक: डॉ. मोहनलाल गुप्ता, प्रकाशक: शुभदा प्रकाशन, प्रकाशन वर्ष – 2022, ISBN : 978-81-956418-1-9 अनुक्रमणिका  प्राक्कथन          3 अजमेर का वृहत् इतिहास – अनुक्रमणिका    5 भारत का सबसे सुंदर नगर अजमेर 9 प्रागैतिहासिक काल से गुप्तकाल तक          15 अजमेर के चौहान शासक 19 भारत का अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान          42 चौहान कालीन अजमेर     54 ललित विग्रहराज तथा हरकेलि नाटकों का परिचय     61 अजमेर के चौहान शासकों के प्रमुख शिलालेख         66 […] - [डिंगल कोश और उनके रचनाकार](https://rajasthanhistory.com/dingal-kosh/): डिंगल भाषा के साहित्य को समझने के लिए विविधि रचनाकारों ने अलग-अलग कालखण्डों में अनेक प्रकार के ‘ डिंगल कोश ‘ तैयार किए। यहाँ कुछ प्रसिद्ध डिंगल कोश तथा उनके रचनाकारों की एक संक्षिप्त सूची दी जा रही है। डिंगल भाषा में ‘कोश’ को ‘कोष’ लिखा जाता है किंतु हिन्दी भाषा में ‘शब्दकोश’आदि के साथ ‘कोश’ शब्द का प्रयोग किया जाता है। हिन्दी भाषा में कोष का अर्थ खजाना होता है। वर्तमान समय में यद्यपि राजस्थानी भाषा को बोलने वालों की संख्या तो बहुत अधिक है तथापि राजस्थानी टैक्स्ट पढ़ने वालों की संख्या बहुत कम है। इस कारण डिंगल कोशों […] - [राजस्थानी भाषा के सात ग्रंथ](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%82%e0%a4%a5/): राजस्थानी भाषा के प्राचीन ग्रंथ मुख्यतः डिंगल‑पिंगल परंपरा, ख्यात और रासो साहित्य के रूप में मिलते हैं। नीचे राजस्थानी भाषा के सात ग्रंथ संक्षिप्त विवरण के साथ दिए गए हैं। राजस्थानी भाषा के सात ग्रंथ 1. कुवलयमाला – उद्योतनसूरी (प्राकृत) 2. खुमाण रासो – दलपत विजय 3. पृथ्वीराज रासो – चंदबरदाई 4. राव जैतसी रो छंद – बीठू सूजाजी 5. हम्मीर रासो – जोधराज 6. बीकानेर रा राठौड़ री ख्यात – दयालदास सिंधायाच 7.  डिंगल कोश – मुरारिदान इस आलेख में राजस्थानी भाषा के सात प्रमुख ग्रंथ ही विवेचित किए गए हैं। राजस्थानी भाषा के प्रमुख ग्रंथों की सूची बहुत […] - [राजस्थान में सूखे की समस्या और समाधान](https://rajasthanhistory.com/drought-in-rajasthan/): राजस्थान में सूखे की समस्या सदियों पुरानी है। इस आलेख में राजस्थान में सूखे और अकाल की समस्या के कारण, प्रभाव और पारंपरिक जल संरक्षण विधियों पर संक्षेप में सारगर्भित जानकारी दी गई है। साथ ही यह भी बताया गया है कि कैसे आधुनिक तकनीक और प्राचीन ज्ञान को मिलाकर इस संकट को टाला जा सकता है। राजस्थान में सूखे की समस्या और समाधान राजस्थान की धरती जहाँ अपने शौर्य के लिए जानी जाती है, वहीं प्रकृति के साथ इसके संघर्ष की गाथा भी उतनी ही पुरानी है। यहाँ ‘सूखा’ (Drought) कोई अचानक आने वाली आपदा नहीं, बल्कि एक स्थायी […] - [डिंगल भाषा: योद्धाओं में उत्साह भरने वाले गीतों की जननी](https://rajasthanhistory.com/dingal-bhasha/): डिंगल भाषा विगत तेरह शताब्दियों से भी अधिक समय से अस्तित्व में है। इस लोकप्रिय भाषा में सैंकड़ों सालों तक वीर योद्धाओं के रक्त में उत्साह भरने वाले गीतों की रचना हुई। उद्भव, विकास, मुख्य ग्रंथ, महत्व और अन्य तथ्य डिंगल भाषा (Dingal Bhasha), जिसे मरु-भाषा (Maru Bhasha), मरु-गुर्जरी (Maru Gurjari) , चारणी भाषा (Charani Bhasha) या प्राचीन पश्चिमी राजस्थानी (Old Western Rajasthani) भी कहा जाता है, वीरभूमि राजस्थान की शौर्यपरक संस्कृति की उद्घोषक भाषा है। यह नागरी लिपि (Devnagri Script) में लिखी जाने वाली प्राचीन हिन्द-आर्य (Hind-Arya Bhasha) परिवार की भाषा है, जिसमें गद्य और पद्य दोनों रूपों में […] - [हल्दीघाटी युद्ध पर पुस्तकें](https://rajasthanhistory.com/haldighati-books/): हल्दीघाटी युद्ध पर पुस्तकें अनेक मूर्धन्य इतिहासकारों द्वारा हिन्दी, अंग्रेजी एवं अन्य भाषाओं में लिखी गई हैं। यहाँ हिन्दी में लिखी गई पुस्तकों का संक्षिप्त परिचय दिया जा रहा है। हल्दीघाटी के युद्ध (Battle of Haldighati) 1576 ई. में मेवाड़ राज्य के हल्दीघाटी नामक स्थान पर हुआ था जो एक संकरे पहाड़ी दर्रे के बीच में स्थित है।  और महाराणा प्रताप के इतिहास पर पर हिन्दी में कई अच्छी पुस्तकें उपलब्ध हैं, जिनमें इतिहासपरक शोध‑ग्रंथ, लोकप्रिय विवरण और काव्य–रचनाएँ सब शामिल हैं। ये पुस्तकें ऐतिहासिक विश्लेषण, महाराणा प्रताप की जीवनी, युद्ध का विस्तृत वर्णन, या काव्यात्मक रूप में लिखी गई […] - [चारण साहित्य: राजस्थान की गौरवशाली वाचिक और लिखित परंपरा](https://rajasthanhistory.com/charan-sahitya/): चारण साहित्य भारतीय वाङ्मय की एक ऐसी अनूठी और ओजस्वी परंपरा है, जिसने सदियों तक उत्तर-पश्चिमी भारत, विशेषकर राजस्थान और गुजरात के इतिहास, संस्कृति और वीरता को जीवंत रखा है। नामवरसिंह जैसे वामपंथी चिंतक चारण साहित्य को स्तुति गायन समझकर इसकी उपेक्षा करते हैं किंतु  यह मध्यकालीन समाज का दर्पण और हिन्दू शौर्य का उद्घोष है। चारण कवियों ने न केवल अपनी लेखनी से युद्धों का सजीव चित्रण किया, बल्कि स्वयं भी रणक्षेत्र में योद्धा के रूप में उतरकर अपने आदर्शों की रक्षा की। चारण साहित्य चारण साहित्य राजस्थानी साहित्य का एक प्रमुख अंग है, जो मुख्य रूप से वीर […] - [सिद्ध साहित्य: हिंदी साहित्य के आदिकाल में आध्यात्मिक चेतना](https://rajasthanhistory.com/siddh-sahitya-adikal/): सिद्ध साहित्य भारतीय संस्कृति का अमूल्य खजाना है। इसमें योग, ध्यान, रहस्यवाद और सामाजिक चेतना का अद्भुत संगम मिलता है। इस आलेख में सिद्ध कवियों द्वारा रचे गए साहित्य और हिंदी भाषा के विकास में उनके योगदान की चर्चा की गई है। हिंदी साहित्य के इतिहास में सिद्धों के साहित्य का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह न केवल हिंदी की प्रारंभिक काव्य परंपरा का आधार है, बल्कि भारतीय धर्म, दर्शन और साधना पद्धति के संक्रमण काल का काव्य भी है। जब हम हिंदी साहित्य के आदिकाल (वीरगाथा काल) का अध्ययन करते हैं, तो सिद्धों की वाणियाँ उस समय की लोकभाषा, […] - [हम्मीर रासो](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%8b/): हिन्दी साहित्य में हम्मीर रासो नाम से तीन अलग-अलग रचनाएँ मिलती हैं, जिनके रचयिता, भाषा और काल भिन्न-भिन्न हैं। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य 13वीं शताब्दी के अंत में दिल्ली सल्तनत का विस्तार हो रहा था। अलाउद्दीन खिलजी ने 1299 ई. में रणथंभौर पर आक्रमण किया, जो चौहानों का अभेद्य किला था। हम्मीर, पृथ्वीराज चौहान के वंशज, ने स्वतंत्रता की रक्षा हेतु प्राणपण संघर्ष किया। हम्मीर रासो के अनुसार, हम्मीर ने 36 वर्ष की आयु में खिलजी की विशाल सेना का सामना किया। कथा में हम्मीर की रानी वीरमती, पुत्र बिमदेव और अन्य योद्धाओं के बलिदान का वर्णन है। ऐतिहासिक रूप से यह […] - [वीरगाथा काल : हिंदी साहित्य का आदिकाल](https://rajasthanhistory.com/veer-gatha-kaal/): वीरगाथा काल (Veer Gatha Kaal) हिंदी साहित्य का वह युग है जिसमें राजपूत वीरों की शौर्यगाथाएँ रची गईं। इस काल के ग्रंथों में वीर रस, इतिहास और तत्कालीन भारतीय संस्कृति का अद्वितीय चित्रण मिलता है। प्रस्तावना हिन्दी साहित्य के इतिहास में 10वीं से 14वीं शताब्दी के बीच का कालखण्ड आदिकाल (Adi Kaal) कहलाता है। इसे ‘वीरगाथा काल’ के नाम से भी जाना जाता है। यह वह समय था जब राजपूत शासकों और योद्धाओं के पराक्रम, युद्धों और शौर्यगाथाओं को काव्य के रूप में प्रस्तुत किया गया। इस काल की रचनाएँ न केवल साहित्यिक दृष्टि से मूल्यवान हैं, बल्कि इतिहास और […] - [पृथ्वीराजविजयमहाकाव्यम्: ऐतिहासिक-काव्यात्मक ग्रंथ](https://rajasthanhistory.com/prithvira-jvijay-mahakavyam/): भारतीय संस्कृत साहित्य में महाकाव्य एक ऐसी विधा है जो केवल काव्य-सौंदर्य ही नहीं, बल्कि तत्कालीन युग की सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और धार्मिक परिस्थितियों की झलक भी प्रस्तुत करती है। इसी परंपरा की एक अनमोल कड़ी है पृथ्वीराजविजयमहाकाव्यम् (Prithvirajavijaya Mahakavyam)। यह ग्रंथ 12वीं शताब्दी के अंत में रचित एक ऐतिहासिक महाकाव्य है, जो दिल्ली-आजमेर के प्रसिद्ध चौहान शासक पृथ्वीराज चौहान (पृथ्वीराज तृतीय) के जीवन, वंश-परंपरा, युद्ध-विजयों और व्यक्तित्व का जीवंत चित्रण करता है। पृथ्वीराजविजयमहाकाव्यम् : रचयिता और रचना-काल पृथ्वीराजविजयमहाकाव्यम् के रचयिता महाकवि जयानक (Jayanaka) मूल रूप से कश्मीर के विद्वान कवि थे। वे पृथ्वीराज (Prithviraj Chouhan) के दरबार में आश्रित […] - [राजस्थानी साहित्य की विरासत](https://rajasthanhistory.com/rajasthani-sahitya-ki-virasat/): राजस्थानी साहित्य की विरासत अत्यंत विशाल है तथा यह ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी से आरम्भ होकर आज तक चली आ रही है। इस विरासत में राजस्थानी भाषा के लाखों ग्रंथ समाहित हैं। राजस्थानी साहित्य भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण शाखा है, जो राजस्थान की रेगिस्तानी भूमि, वीरता, भक्ति और लोक-जीवन की जीवंत अभिव्यक्ति करता है। इसकी जड़ें अपभ्रंश (Apbhramsa) और प्राकृत (Prakrit) भाषाओं से जुड़ी हैं, और यह ईस्वी 1000 से विभिन्न विधाओं में विकसित हुआ है। राजस्थानी साहित्य मुख्यतः डिंगल (पुरानी राजस्थानी) और पिंगल (ब्रजभाषा प्रभावित) में रचा गया है, जिसमें चारण कवियों का योगदान प्रमुख है। चारण जाति ने […] - [रासो साहित्य : वीरगाथा लेखन की अनूठी परम्परा](https://rajasthanhistory.com/raso-sahitya/): रासो साहित्य वीरगाथा काल (Veer Gatha Kaal) में रचित वह काव्य है जिसमें राजपूत शासकों और योद्धाओं की वीरता, पराक्रम और संस्कृति का वर्णन मिलता है। इसका सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ पृथ्वीराज रासो  (Prithviraj Raso) है, जिसे चंदबरदाई (Chand Bardai) ने रचा। भारतीय साहित्य की विविध परंपराओं में रासो ग्रंथों का विशिष्ट स्थान है। यह साहित्य मुख्यतः वीरगाथा काल  (10वीं से 14वीं शताब्दी) में लिखा गया, जब राजपूत शासकों और योद्धाओं के पराक्रम को काव्य रूप में प्रस्तुत किया गया। रासो ग्रंथ न केवल ऐतिहासिक घटनाओं का लेखा-जोखा बताते हैं, अपितु तत्कालीन समाज की संस्कृति, भाषा और भावनाओं का भी वर्णन […] - [खुमाण रासो का डिंगल साहित्य पर प्रभाव](https://rajasthanhistory.com/impact-of-khuman-raso-on-dingal-literature/): खुमाण रासो का डिंगल साहित्य पर प्रभाव है, इस बात में कोई संदेह नहीं किया जा सकता। खुमाण रासो हिंदी साहित्य का आदिकालीन ग्रंथ है जिसने डिंगल साहित्य पर गहरा प्रभाव डाला। यह वीर रस, भाषा-शैली और ऐतिहासिक परंपरा का आधार बनकर राजस्थानी साहित्य को समृद्ध करता है। प्रस्तावना हिंदी साहित्य के आदिकाल में रचित खुमाण रासो वीरगाथा परंपरा का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। यह ग्रंथ न केवल वीर रस का उत्कृष्ट उदाहरण है, अपितु राजस्थानी साहित्य की डिंगल परंपरा पर भी गहरा प्रभाव डालता है। डिंगल साहित्य, जो मुख्यतः राजस्थान के कवियों द्वारा रचित वीरगाथा और ऐतिहासिक काव्य का […] - [खुमाण रासो : आदिकालीन हिंदी साहित्य का वीरगाथा ग्रंथ](https://rajasthanhistory.com/khuman-raso/): खुमाण रासो आदिकालीन हिंदी साहित्य का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जिसमें चित्तौड़ के नरेश खुमाण के युद्धों और जीवन का वर्णन मिलता है। यह रचना वीरगाथा काल की परंपरा को दर्शाती है और हिंदी साहित्य के विकास में इसकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। हिन्दी साहित्य और राजस्थानी संस्कृति का इतिहास वीरगाथाओं से भरा पड़ा है। आदिकालीन हिंदी साहित्य के रासो ग्रंथों में पृथ्वीराज रासो (Prithviraj Raso) के साथ-साथ ‘खुमाण रासो’ (Khuman Raso) का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। ‘खुमाण रासो’ न केवल हिन्दू शौर्य का प्रतीक है, अपितु मेवाड़ के गौरवशाली इतिहास का महत्वपूर्ण स्रोत भी है। […] - [वेलि क्रिसन रुक्मणि री: राजस्थानी लोककाव्य और भक्ति का अद्भुत ग्रंथ](https://rajasthanhistory.com/veli-krishan-rukmani-ri/): वेलि क्रिसन रुक्मणि री राजस्थानी लोककाव्य और भक्ति का अद्भुत ग्रंथ है, जिसमें श्रीकृष्ण और रुक्मिणी की प्रेमगाथा को भक्ति और सांस्कृतिक रंगों में पिरोया गया है। इसे राजस्थान के प्रमुख कृष्ण-भक्ति ग्रंथों में सम्मिलित किया जाता है। राजस्थानी साहित्य की अमूल्य निधि वेलि क्रिसन रुक्मणि री पर यह विस्तृत आलेख साहित्य प्रेमियों, शोधार्थियों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए एक संपूर्ण मार्गदर्शिका है। 📚 प्रस्तावना : वेलि क्रिसन रुक्मणि री राजस्थानी साहित्य के डिंगल काव्य में महाकवि पृथ्वीराज राठौड़ (Prithvi Raj Rathore) द्वारा रचित वेलि क्रिसन रुक्मणि री (Veli Krishan Rukmani Ri) का नाम सबसे […] - [कुवलयमाला में प्रयुक्त भाषाएँ](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%b5%e0%a4%b2%e0%a4%af%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%af%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4-%e0%a4%ad/): प्राकृत साहित्य के विशाल भंडार में जैन आचार्य उद्योतन सूरि द्वारा चंपू काव्य शैली (गद्य और पद्य मिश्रण) में रचित ‘कुवलयमाला’ (8वीं शताब्दी, रचना वर्ष विक्रम संवत 835, ई. 778-779 ) एक मील का पत्थर मानी जाती है। यद्यपि यह एक धार्मिक ग्रंथ है तथापि कुवलयमाला में प्रयुक्त भाषाएँ इसे प्राचीन भारत के भाषाकोश के रूप में प्रस्तुत करती हैं।  कुवलयमाला न केवल एक उत्कृष्ट कथा ग्रंथ है, बल्कि तत्कालीन भारत की सांस्कृतिक, सामाजिक और भाषाई विविधता का एक जीवंत साक्ष्य भी है। इस ग्रंथ की सबसे बड़ी विशेषता इसका ‘बहुभाषावाद’ है। उद्योतन सूरि ने तत्कालीन भारत में प्रचलित 18 […] - [नागौर के इतिहासकार](https://rajasthanhistory.com/historians-of-nagaur/): नागौर के इतिहासकार इस क्षेत्र के इतिहास को गहराई के साथ लिखने में सफल रहे हैं। इन इतिहासकारों ने नागौर के राजनीतिक, सांस्कृतिकऔर धार्मिक इतिहास को बड़ी सूक्ष्मता से लिखा किया है। नागौर का ऐतिहासिक परिदृश्य राजस्थान का नागौर शहर उत्तर–पश्चिम राजस्थान में स्थित है, जिसका प्राचीन नाम अहिच्छत्रपुर (Ahichhatrapur) या अहिच्छत्र नगर बताया जाता है और इसका उल्लेख महाभारत के उद्योग पर्व में भी मिलता है। इतिहासकारों के अनुसार यह क्षेत्र कभी ‘जंगल देश’ की राजधानी रहा, जहाँ नागवंशी शासकों, चौहानों, दिल्ली सल्तनत, मेवाड़ और मारवाड़ के राजपूतों तथा बाद में मुगलों और राठौड़ों ने सत्ता स्थापित की। नागौर […] - [कुवलयमाला: आचार्य उद्योतनसूरि का प्राकृत ग्रंथ](https://rajasthanhistory.com/kuvalayamala-udyotansuri-jalore-history/): भारतीय साहित्य में अनेक ग्रंथ ऐसे हैं जो केवल धार्मिक या ऐतिहासिक महत्व ही नहीं रखते, अपितु समाज और संस्कृति की गहरी झलक भी प्रस्तुत करते हैं। कुवलयमाला  ऐसा ही एक अद्वितीय ग्रंथ है। इस आलेख में हम कुवलयमाला के रचनाकार, इसकी ऐतिहासिक प्रासंगिकता, भाषाई विविधता और साहित्यिक सौंदर्य पर विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत कर रहे हैं। कुवलयमाला (Kuvalayamala) एक प्राचीन साहित्यिक कृति है । यह प्राचीन भारत की सामाजिक, भाषाई और सांस्कृतिक विरासत का एक जीवंत विश्वकोश है। 8वीं शताब्दी में रचित यह ग्रंथ न केवल जैन साहित्य में, अपितु संपूर्ण भारतीय साहित्य में अपना विशिष्ट स्थान रखता है। 📚 […] - [जालोर के इतिहासकार](https://rajasthanhistory.com/historians-of-jalore/): जालोर का इतिहास अत्यंत प्राचीन और गौरवशाली रहा है, जिसे समय-समय पर विभिन्न मध्यकालीन कवियों और आधुनिक इतिहासकारों ने अपनी लेखनी के माध्यम से सुरक्षित किया है। जालोर के इतिहासकार विषय पर जानकारी प्राप्त करने से पहले हमें जालोर के इतिहास के कालखण्डों को जानना होगा। जालोर के इतिहास को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है- 📚 जालोर क्षेत्र के प्राचीन रचनाकार उद्योतन सूरी: इन्होंने 8वीं शताब्दी में जालोर (जाबालिपुर) में बैठकर प्रसिद्ध जैन ग्रंथ ‘कुवलयमाला’ (Kuvlayamala) की रचना की थी, जो तत्कालीन सामाजिक स्थिति पर प्रकाश डालता है। महाकवि माघ: माघ ने संस्कृत काव्य […] - [कान्हड़दे प्रबंध: जालौर के स्वाभिमान और हिन्दू शौर्य का अद्भुत ग्रंथ](https://rajasthanhistory.com/kanharde-prabandh-jalore-history/): कान्हड़दे प्रबंध (Kanhadde Prabandh) कवि पद्मनाभ (Padmanabh) द्वारा रचित अपभ्रंश ग्रंथ है, जिसमें जालौर के चहमान शासक रावल कान्हड़देव की वीरता, अलाउद्दीन खिलजी (Alauddin Khilji) के आक्रमण और तत्कालीन समाज-संस्कृति का सजीव चित्रण मिलता है। 👉 कान्हड़दे प्रबंध मध्यकालीन भारतीय साहित्य की ऐसी अनमोल कृति है, जो न केवल वीर रस का उत्कृष्ट उदाहरण है, अपितु राजस्थान के गौरवशाली इतिहास का एक प्रामाणिक स्रोत भी है। 15वीं शताब्दी (1455 ई. ) में कवि पद्मनाभ द्वारा रचित यह ग्रंथ जालौर के चहमान शासक रावल कान्हड़दे चौहान और दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के बीच हुए भीषण युद्धों का सजीव वर्णन करता […] - [जालौर की मंदिर शैली](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%8c%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b0-%e0%a4%b6%e0%a5%88%e0%a4%b2%e0%a5%80/): जालौर की मंदिर शैली गुप्तकाल में ही आकार लेने लगी थी। इस क्षेत्र में गुप्तकाल से लेकर प्रतिहारकाल तक के कालखण्ड में इस क्षेत्र में विष्णु के वराह अवतार की पूजा सर्वाधिक लोकप्रिय थी और इस क्षेत्र में भगवान के वराह अवतार के कई मंदिर स्थित थे। जालौर की मंदिर शैली (Jalor temple style) पर विचार करने से पहले हमें इस क्षेत्र के राजनीतिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक इतिहास के साथ-साथ भौगोलिक परिस्थितियों पर भी किंचित् विचार करना होगा। जालौर क्षेत्र का भू-भाग राजस्थान के पूर्वी भू-भाग की अपेक्षा काफी बाद का है। मध्य राजस्थान में स्थित अरावली की पहाड़ियां किसी […] - [पोतेदार संग्रह में उपलब्ध है रियासती काल का वाणिज्यिक इतिहास](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%aa%e0%a5%8b%e0%a4%a4%e0%a5%87%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b9-potedar-collection/): आधुनिक एवं मध्यकालीन राजस्थान के प्रतिष्ठित व्यापारिक परिवारों में रियासती काल का वाणिज्यिक इतिहास बहियों, पत्राचार संग्रहों एवं अन्य दस्तावेजों के रूप में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। ये दस्तावेज राजस्थान के इतिहास लेखन के लिए महत्वपूर्ण स्रोत का कार्य करते हैं। इन्हीं प्रतिष्ठित व्यापारिक परिवारों में से एक तत्कालीन बीकानेर रियासत के सेठ मिर्जामल पोतेदार (Seth Mirjamal Potedar) के परिवार का पोतेदार संग्रह (Potedar Collection) अत्यधिक महत्वपूर्ण है। चूरु का पोतेदार परिवार चूरु (Churu) का पोतेदार परिवार राजस्थान के उन इने-गिने प्रमुख व्यापारिक परिवारों में से एक था जिसके सदस्यों ने ईसा की 18वीं एवं 19वीं शताब्दियों में संचार, […] - [राजस्थान में पर्यटन स्थलों का प्रबंधन तथा लोककलाओं का संरक्षण](https://rajasthanhistory.com/rajasthan-me-paryatan-sthalon-ka-prabandhan/): राजस्थान भारतीय संस्कृति और इतिहास का जीवंत प्रतीक है। यहाँ के पर्यटन स्थल (Tourist Places) और लोककलाएँ (Folk Arts) न केवल देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित करती हैं, बल्कि राज्य की आर्थिक और सामाजिक संरचना को भी सुदृढ़ बनाती हैं। डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक “राजस्थान में पर्यटन स्थलों का प्रबंधन तथा लोककलाओं का संरक्षण” इसी विषय पर केंद्रित है। यह पुस्तक राजस्थान के पर्यटन विकास, प्रबंधन की चुनौतियों और लोककलाओं के संरक्षण की आवश्यकता को गहराई से प्रस्तुत करती है। राजस्थान में पर्यटन स्थलों का प्रबंधन तथा लोककलाओं का संरक्षण ✍️ 1. पर्यटन स्थलों का महत्व राजस्थान के प्रमुख […] - [अजमेर का वृहत् इतिहास पुस्तक - भारतीय इतिहास की अमूल्य धरोहर](https://rajasthanhistory.com/ajmer-ka-vrihat-itihas/): “डॉ. मोहनलाल गुप्ता की अजमेर का वृहत् इतिहास पुस्तक (Ajmer ka Vrihat Itihas) अजमेर नगर के प्राचीन वैभव, पृथ्वीराज चौहान के संघर्ष, अजमेर शरीफ दरगाह की आस्था और आधुनिक शिक्षा व संस्कृति का समग्र चित्रण करती है। राजस्थान की धरोहर (Rajasthan Heritage) और अजमेर का इतिहास (Ajmer History) जानने के लिए यह पुस्तक अनमोल स्रोत है।” अजमेर का वृहत् इतिहास – पुस्तक परिचय 📌प्रस्तावना डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित अजमेर का वृहत् इतिहास पुस्तक भारतीय इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण कृति है। लेखक ने इस पुस्तक में अजमेर नगर की ऐतिहासिक यात्रा को अत्यंत रोचक और शोधपूर्ण शैली में प्रस्तुत किया […] - [Agrarian Discontentment in Bikaner Riyasat - An introduction to Book](https://rajasthanhistory.com/agrarian-discontentment-in-bikaner-riyasat-an-introduction-to-book/): Agrarian Discontentment in Bikaner Riyasat – An important historical document of history of Thar desert Dr. Mohanlal Gupta’s scholarly work Agrarian Discontentment in Bikaner Riyasat (Agrarian History of Bikaner) is a significant contribution to the study of Rajasthan’s socio‑economic past. The book explores the roots of peasant unrest, the agrarian economy, and the political responses of the princely state of Bikaner during the late medieval and colonial periods. By focusing on the lived realities of cultivators, landlords, and administrators, Gupta provides a nuanced picture of how Agrarian Discontentment in Bikaner shaped the trajectory of rural society in western Rajasthan. 1. […] - [किशनगढ़ राज्य का इतिहास](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%b6%e0%a4%a8%e0%a4%97%e0%a4%a2%e0%a4%bc-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af/): डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक किशनगढ़ राज्य का इतिहास राजस्थान की एक छोटी किंतु गौरवशाली रियासत के उत्थान, संघर्ष और सांस्कृतिक योगदान का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करती है। इसमें मुगलकालीन राजनीति, राजपूताना की परम्पराएँ, उत्तराधिकार संघर्ष और किशनगढ़ की कलात्मक धरोहर को विशेष रूप से रेखांकित किया गया है। किशनगढ़ राज्य का इतिहास – विषय-वस्तु ✍️ 1. परिचय डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित किशनगढ़ राज्य का इतिहास (Kishangarh State History) राजस्थान की सबसे छोटी रियासत के संघर्षपूर्ण अतीत को उजागर करती है। यह पुस्तक बताती है कि कैसे किशनगढ़ राज्य मध्यकालीन राजपूताना (Rajputana) में जयपुर (आम्बेर), जोधपुर, बीकानेर और मेवाड़ […] - [नागौर का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास: एक गौरवशाली विरासत का जीवंत दस्तावेज](https://rajasthanhistory.com/nagaur-ka-rajnitik-evam-sanskritik-itihas/): राजस्थान की वीर प्रसूता भूमि में नागौर (Nagaur) का अपना एक विशिष्ट स्थान है। डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा रचित ग्रंथ ‘नागौर का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास‘ केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि अहिछत्रपुर (नागौर का प्राचीन नाम) की सदियों पुरानी सभ्यता और संस्कृति का एक प्रामाणिक संकलन है। यदि आप राजस्थान के गौरवशाली इतिहास (Glorious History of Rajasthan) को गहराई से समझना चाहते हैं, तो यह ग्रंथ आपके लिए एक अनिवार्य मार्गदर्शिका सिद्ध होगा। ग्रन्थ की विषय-वस्तु और ऐतिहासिक विस्तार (Content and Historical Scope) डॉ. मोहनलाल गुप्ता ने इस पुस्तक में नागौर का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास लिखने के लिए व्यापक […] - [जालौर का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास – समीक्षात्मक परिचय](https://rajasthanhistory.com/jalore-rajnitik-evam-sanskritik-itihas/): डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक जालौर का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक (Jalore Ka Rajnitik Evam Sanskritik Itihas) इतिहास राजस्थान के इतिहास (History of Rajasthan) के अध्ययन में एक विशिष्ट स्थान रखती है। जालौर का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास 📌 प्रस्तावना यह ग्रंथ जालौर क्षेत्र की राजनीतिक परंपराओं (Political Traditions), सांस्कृतिक धरोहर (Cultural Heritage) और सामाजिक जीवन (Social Life) का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। लेखक ने इस पुस्तक में जालौर की ऐतिहासिक यात्रा को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य से जोड़ते हुए यह दिखाया है कि किस प्रकार यह क्षेत्र राजपूताना (Rajputana) की गौरवशाली परंपरा का हिस्सा रहा है। 🏰 ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य जालौर (Jalore) […] - [बीकानेर का सामाजिक एवं आर्थिक इतिहास – समीक्षात्मक परिचय](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%87%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b8/): बीकानेर का सामाजिक एवं आर्थिक इतिहास – समीक्षात्मक परिचय 📌 प्रस्तावना डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक बीकानेर का सामाजिक एवं आर्थिक इतिहास राजस्थान के इतिहास (History of Rajasthan) के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण योगदान है। यह ग्रंथ बीकानेर राज्य की सामाजिक संरचना (Social Structure), आर्थिक गतिविधियाँ (Economic Activities) और सांस्कृतिक जीवन (Cultural Life) का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इस पुस्तक का समीक्षात्मक परिचय हमें न केवल बीकानेर की ऐतिहासिक यात्रा से जोड़ता है, बल्कि यह समझने में भी मदद करता है कि किस प्रकार एक मरुस्थलीय क्षेत्र ने अपनी विशिष्ट सामाजिक एवं आर्थिक पहचान बनाई। 🏰 ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य बीकानेर […] - [राजपूताना के सक्षम राज्य: भारत संघ में विलय एवं राजस्थान में एकीकरण](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%ae-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%af/): राजपूताना के सक्षम राज्य (Viable States) वे थे जो स्वतंत्र भारत में अलग प्रशासनिक इकाई (Administrative Units) बने रहने की पात्रता रखते थे। सरदार पटेल ने उन्हें आश्वासन दिया था कि यदि वे भारत में सम्मिलित होते हैं तो उनके राज्य ज्यों के त्यों बने रहेंगे। राजपूताना के सक्षम राज्यों का भारत संघ में विलय एवं राजस्थान में एकीकरण 📌 पुस्तक परिचय राजपूताना के सक्षम राज्य: भारत संघ में विलय एवं राजस्थान में एकीकरण विषय पर डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित पुस्तक राजपूताना के सक्षम राज्यों का भारत संघ में विलय एवं राजस्थान में एकीकरण स्वतंत्रता-प्राप्ति के समय राजपूताना की […] - [राजशाही का अंत: राजस्थान के इतिहास का एक स्वर्णिम दस्तावेज](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a4-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95/): राजस्थान का इतिहास केवल किलों और महलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संघर्ष और परिवर्तन की एक लंबी गाथा है। इतिहासकार डॉ. मोहनलाल गुप्ता (Dr. Mohanlal Gupta) की पुस्तक ‘राजशाही का अंत‘ (Rajshahi Ka Ant) इसी परिवर्तन को गहराई से समझने का एक बेहतरीन जरिया है। यदि आप Rajasthan History, रियासतों के एकीकरण (Integration of Princely States) और लोकतंत्र की स्थापना में रुचि रखते हैं, तो यह पुस्तक आपके लिए एक ‘मस्ट-रीड’ (Must-read) है। मुख्य विषय: राजशाही का अंत – सामंतवाद से लोकतंत्र तक (Transition from Feudalism to Democracy) ‘राजशाही का अंत’ मुख्य रूप से 20वीं सदी के उस […] - [मारवाड़ में सांस्कृतिक पर्यटन](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a1%e0%a4%bc-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%9f%e0%a4%a8/): मारवाड़ में सांस्कृतिक पर्यटन मारवाड़ में सांस्कृतिक पर्यटन विषय पर आधारित डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक राजस्थान प्रांत के थार मरुस्थल में स्थित मारवाड़ सांस्कृतिक क्षेत्र के विशिष्ट पर्यटन स्थलों से जुड़ी हुई ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को स्पष्ट करती है। यह पुस्तक अंग्रेजी भाषा में लिखी गई है। यहाँ इस पुस्तक का संक्षिप्त परिचय हिन्दी भाषा में दिया जा रहा है। ‘थार मरुस्थल के मारवाड़ क्षेत्र में सांस्कृतिक पर्यटन’ (Cultural Tourism in Marwar Region of Thar Desert) प्रसिद्ध राजस्थानी इतिहासकार डॉ. मोहनलाल गुप्ता की एक विद्वत्तापूर्ण और सुलभ रचना है, जो वर्ष 2019 में प्रकाशित हुई थी। 322 पृष्ठों […] - [Cultural Tourism in Marwar: Dr. Gupta’s Insightful Study](https://rajasthanhistory.com/cultural-tourism-in-marwar-2/): Cultural Tourism in Marwar Region of Thar Desert (थार मरुस्थल) is a scholarly yet accessible work by the prolific Rajasthani historian Dr. Mohanlal Gupta, published in 2019. Spanning 322 pages, the book serves as both a comprehensive guide and an academic analysis of how the unique cultural fabric of the Marwar region—primarily Jodhpur and its surrounding districts like Nagaur, Pali, Jalore, and Barmer—acts as a catalyst for modern tourism. It underscores the immense potential of cultural tourism as a driver of economic growth, heritage preservation, and community empowerment. Dr. Mohanlal Gupta has written numerous research-based books on the history of […] - [मेड़ता उपखण्ड के गांव](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%89%e0%a4%aa%e0%a4%96%e0%a4%a3%e0%a5%8d%e0%a4%a1/): मेड़ता उपखण्ड में 128 गांव हैं जिनकी सूची यहाँ दी जा रही है। साथ ही कुछ प्रमुख गांवों के बारे में अन्य विवरण भी दिया गया है। मेड़ता उपखण्ड के कुछ गांवों के विवरण इसी वैबसाइट पर अलग ब्लॉग के रूप में लिखे गए हैं। मेड़ता उपखण्ड के गांव जारोड़ा जारोड़ा (Jaroda) मेड़ता उपखण्ड में है। जारोडा गांव के आसपास के 30 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को भी आखेट निषिद्ध क्षेत्र घोषित किया गया है। यहाँ भी हिरण आदि कोमल वन्यपशुओं को बड़ी संख्या में विचरण करते देखा जा सकता है। नोखा चान्दावतां नोखा चान्दावतां (Nokha Chandawatan) मेड़ता उपखण्ड में है। […] - [जायल उपखण्ड के गांव](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%b2-%e0%a4%89%e0%a4%aa%e0%a4%96%e0%a4%a3%e0%a5%8d%e0%a4%a1/): जायल क्षेत्र में आज से हजारों साल पहले आदिमानव का निवास था जिससे अनुमान लगाया जा सकता है कि उस काल में इस क्षेत्र में जल एवं जंगल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थे। जायल से प्रस्तर युगीन एवं ताम्र युगीन सभ्यताओं के अवशेष प्राप्त हुए हैं। जायल नागौर जिले में है। जायल में तहसील एवं पंचायत समिति मुख्यलय भी कार्यरत हैं। वर्तमान समय में जायल उपखण्ड में 142 गांव हैं। जायल उपखण्ड के गांव  1 जायल  2 बरसूणा  3 रोटू  4 गुजरियावास  5 रोहिणा  6 अजबपुरा  7 जानवास  8 शिवनगर  9 गौराऊ  10 कठौती  11 डेहरोली  12 खिंयाला  13 नोखाजोधा […] - [खींवसर उपखण्ड के गांव](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%96%e0%a5%80%e0%a4%82%e0%a4%b5%e0%a4%b8%e0%a4%b0-%e0%a4%89%e0%a4%aa%e0%a4%96%e0%a4%a3%e0%a5%8d%e0%a4%a1/): नागौर जिले के विभाजन के बाद खींवसर उपखण्ड नागौर जिले में ही रहा। खींवसर उपखण्ड में 96 गांव हैं। खींवसर उपखण्ड की भूमि अपेक्षाकृत रेतीली है। कुछ गांवों में तो बड़े-बड़े रेतीले टीले पसरे हुए हैं। देशी-विदेशी पर्यटक इन रेगिस्तानी टीलों में ऊंटों की सवारी करने आते हैं। खींवसर उपखण्ड के गांवों की सूची क्रम गांव/कस्बा क्रम गांव/कस्बा क्रम गांव/कस्बा 1 खींवसर 2 गोधन 3  शिवपुरा 4 भादूओं की ढाणी 5 पांचलासिद्धा 6 बेराथलकलां 7 आकला 8 विश्नोईयों की ढाणी 9 बेराथल खुर्द 10 हमीराणा 11 थांबड़िया 12 जगरामपुरा 13 महेशपुरा 14 मगराबास 15 बिरलोका 16 कांटिया 17 सैनिक नगर […] - [नागौर उपखण्ड के गांव](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%97%e0%a5%8c%e0%a4%b0-%e0%a4%89%e0%a4%aa%e0%a4%96%e0%a4%a3%e0%a5%8d%e0%a4%a1/): नागौर जिले में 856 गांव हैं जिन्हें राजस्व प्रशासन की दृष्टि से उपखण्डों, तहसीलों, उपतहसीलों एवं राजस्व निरीक्षक वृत्तों में विभक्त किया गया है। ग्रामीण विकास के लिए गांवों को पंचायत समितियों एवं ग्राम पंचायतों में नियोजित किया गया है। नागौर उपखण्ड में 200 गांव हैं। नागौर उपखण्ड के गांव नागौर उपखण्ड के गांवों की सूची इस प्रकार से है- क्रम गांव/नगर क्रम गांव क्रम गांव क्रम गांव 1 नागौर 51 नयागांव 101 सिणोद 151 संखवास 2 नकास 52 कूकणों की ढाणी 102 बूढी 152 मोड़ी 3 मानासर 53 धूधवालों की ढाणी 103 चकबूढी 153 खेड़ा धांधलावास 4 इन्दास 54 […] - [मकराना](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ae%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%be/): मकराना शब्द ‘मकरान’से बना हुआ है जो मध्य एशिया में स्थित एक रेगिस्तानी क्षेत्र की ओर संकेत करता है। मध्य एशिया का मकरान ईरान से लेकर बलूचिस्तान के दक्षिणी हिस्से तक फैला हुआ है। अनुमान होता है कि जब भारत में मुसलमान शासन करने लगे, तब किसी समय मकरान क्षेत्र से आए मुसलमान भारत में आए तथा उन्होंने वर्तमान मकराना में निवास करना आरम्भ किया। वे लोग पत्थर का काम करने में सिद्धहस्त थे। रियासती काल में यह मारवाड़ राज्य के अधीन राठौड़ राजपूतों का ठिकाना था। मकराना का ठाकुर परिवार अब भी यहाँ निवास करता है। वर्तमान समय में […] - [मारवाड़ मूण्डवा](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a1%e0%a4%bc-%e0%a4%ae%e0%a5%82%e0%a4%a3%e0%a5%8d%e0%a4%a1%e0%a4%b5%e0%a4%be/): मान्यता है कि मारवाड़ मूण्डवा की स्थापना 7वीं से 13वीं शताब्दी के बीच मुंडेल जाटों ने की थी। जाटों की यह शाखा मण्डोर के परिहारों से निकली थी। वर्तमान समय में यह नागौर जिले में स्थित है। मारवाड़ मूण्डवा मध्यकाल में प्रमुख व्यापारिक केन्द्रों में से था। आज भी मारवाड़ मूण्डवा के व्यापारी देश के बड़े नगरों में व्यापारिक प्रतिष्ठान स्थापित किये हुए हैं। जोधपुर राज्य में मूण्डवा को लकड़ी के खिलौने तथा अन्य सजावटी सामग्री के उत्पादन के लिए अच्छी प्रतिष्ठा प्राप्त थी। मूण्डवा का भुजिया (नमकीन सेव) दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। मारवाड़ मूण्डवा कस्बे की स्थापना वि.1123 वैशाख […] - [नागौर](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%97%e0%a5%8c%e0%a4%b0/): नागौर नगर के अस्तित्व में आने का काल निर्धरित नहीं किया जा सकता किंतु माना जाता है कि इसे नागों ने बसाया। नाग जाति का वर्णन महाभारत में भी मिलता है। यह एक क्षत्रिय जाति थी। महाभारत के युद्ध के पश्चात् कुरूवंश की सत्ता कमजोर हो जाने से नाग जाति जांगल प्रदेश में अपना नवीन राज्य स्थापित करने में सफल रही। उनके शासनकाल में जांगल प्रदेश की राजधानी अहिच्छत्रपुर अथवा नागपत्तन थी। राजस्थान में नागजाति के शासन करने का उल्लेख दूसरी शताब्दी ईस्वी से आठवीं शताब्दी ईस्वी तक मिलता है। इस क्षेत्र के नागों को चौहानों ने विस्थापित किया। इस […] - [मेड़ता](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a4%a4%e0%a4%be/): जोधपुर से 107 किलोमीटर उत्तर में मेड़ता स्थित है। इसके प्राचीन नाम मेड़न्तक तथा मेड़तापुर मिलाते हैं। मध्यकाल में इसे मेदनीपुर भी कहा जाता था। वर्तमान में यह मेड़तासिटी कहलाता है। इसी नाम का एक रेल्वे स्टेशन भी बनाया गया है जो मेड़ता रोड – मेड़तासिटी शाखा लाइन पर स्थित है। इसका सबसे प्राचीन उल्लेख ई.837 के प्रतिहार सामंत बाउक के शिलालेख में प्राप्त हुआ है। मण्डोर के प्रतिहार सामन्त बाउक के वि.सं. 894 (ई.837) के इस लेख में कहा गया है कि बाउक के 8वें पूर्वपुरुष नागभट्ट ने मेडन्तक को अपनी राजधानी बनाया। यह नागभट्ट राज्जिल का पोता था। […] - [डीडवाना](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a1%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%be/): नागौर से 96 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में तथा जोधपुर से 209 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में स्थित डीडवाना 270 24′ उत्तरी अक्षांश तथा 740 35′ पूर्वी देशान्तर पर स्थित है। वर्ष 2023 में यहाँ अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट कार्यालय, उपखण्ड मजिस्ट्रेट कार्यालय, तहसील तथा पंचायत समिति कार्यालय स्थित थे। वर्ष 2023 में राजस्थान सरकार ने डीडवाना-कुचामन को नया जिला बना दिया जिससे यहाँ जिला कलक्टर कार्यालय लग गया है। जोधपुर-दिल्ली रेलमार्ग डीडवाना से होकर निकलता है। यह कस्बा दो हजार वर्ष से भी अधिक पुराना बताया जाता है। यहाँ से प्राप्त खुदाई में वि.सं. 252 (ई.195) की एक मूर्ति मिली है। कुओं तथा घरों […] - [गोगेलाव](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%97%e0%a5%8b%e0%a4%97%e0%a5%87%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%b5/): गोगेलाव ओसवाल महाजनों का गांव है। यह गोगाजी तथा जाहिर पीर के नाम से विख्यात लोकदेवता गोगाजी चौहान के नाम पर बसा हुआ है। मान्यता है कि गोगेलाव में गोगाजी की बारात ठहरी थी। गोगाजी चौहान किसी मुसलमान आक्रांता की सेना से गायों की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे। राजस्थान में गोगाजी के थान गांव-गांव में बने हुए हैं। इस गांव में लगभग 150 द्वार बने हुए हैं जो पोल कहलाते हैं। कई द्वार पत्थर पर खुदाई करके बहुत सुन्दर बनाये गये हैं। ओसवालों की पुरानी हवेलियां भी काफी बड़ी एवं सुन्दर हैं। किशनलाल कांकरिया की हवेली […] - [भावण्डा](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%a3%e0%a5%8d%e0%a4%a1%e0%a4%be/): भावण्डा गांव खींवसर तहसील में है। मालदेव के समय जोधपुर राज्य की सीमा भावण्डा तक थी और यहाँ मालदेव का थाना लगता था। एक बार नागौर के खानजादा शासक ने अजमेर की तरफ से आकर भावंडा को घेर लिया। मालदेव ने भावण्डा थाने को बचा लिया। वह खानजादा को खदेड़ता हुआ नागौर तक चढ़ आया और नागौर दुर्ग के किवाड़ लूटकर जोधपुर ले गया। इस अभियान का नेतृत्व राठौड़ अखैराज के पौत्र तथा पंचायण के पुत्र अचलसिंह ने किया था। अचलसिंह युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुआ तो जैता और कूंपा ने मोर्चा संभाला और नागौर तक चढ़ आये। ये […] - [मोररा](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ae%e0%a5%8b%e0%a4%b0%e0%a4%b0%e0%a4%be/): मेड़ता-डेगाना मार्ग पर मेड़ता तहसील में स्थित मोररा गांव के निवासी मानते हैं कि लगभग डेढ़ हजार वर्ष पहले राजा मोरध्वज ने मोररा गांव बसाया और यहीं अपनी राजधानी स्थापित की। मारवाड़ में राजा मोरध्वज के सम्बन्ध में अनेक कहानियां कही जाती हैं, कहा नहीं जा सकता कि इन कहानियों का नायक राजा मोरध्वज कौन था और किस काल में हुआ था! मान्यता है कि राजा मोरध्वज के समय में यह गांव मेड़ता शहर से भी बड़ा था किंतु किसी कारण गांव उजड़ता चला गया और वर्तमान स्वरूप में आ गया। किसी समय यहाँ धोबियों तथा ठठेरों की अच्छी बस्ती […] - [रोल](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%b2/): जिला मुख्यालय नागौर से 19 किलोमीटर दूर स्थित रोल गांव आज से सैंकड़ों साल पहले महेश्वरियों ने बसाया था। मुस्लिम काल में यह काजी मुसलमानों को जागीर में मिला। तब से लेकर आजादी मिलने तक यह गांव मुसलमानों के अधीन ही रहा। रोल गांव की तरह मारवाड़ में महेश्वरी बनियों के बसाए हुए बहुत से गांव और भी थे। मारवाड़ के राजा एवं जागीरदार बनियों को प्रोत्साहित करके उन्हें अपने क्षेत्र में बसाते थे ताकि उनका क्षेत्र व्यापारिक गतिविधियों के कारण सम्पन्न हो सके। बहुत से महेश्वरी बनियों को मारवाड़ राज्य में मंत्री भी बनाया जाता था और उन्हें जिम्मेदारी […] - [मून्दियाड़](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ae%e0%a5%82%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a1%e0%a4%bc/): जिला मुख्यालय नागौर से 25 किलोमीटर दक्षिण में कई सौ वर्ष पुराना मून्दियाड़ गांव बसा हुआ है। मूंदड़ा महेश्वरियों द्वारा बसाये जाने से यह मून्दियाड़ कहलाता है। इस गांव में कई सौ वर्ष पुराना ब्रह्माणी माता का मंदिर है जिसकी एक दीवार पर वि.सं.1535 का एक शिलालेख उत्कीर्ण है। अब यह मून्दड़ों की माता का मंदिर कहलाता है। मंदिर लाल पत्थरों से निर्मित है जिन पर उत्कृष्ट शिल्प किया गया है। मंदिर के पास लाल पत्थर की एक खण्डित मूर्ति विशेष रूप से दर्शनीय है। यह मूर्ति ब्रह्माजी की है। गांव के उत्तर-दक्षिण में स्थित सरोवर के पश्चिम में स्थित […] - [हरसोलाव](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b9%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a5%8b%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%b5/): हरसोलाव गांव, गोटन से जोधपुर जाने वाले सड़क मार्ग पर स्थित है। कहा जाता है कि आज से लगभग 1000 वर्ष पहले रूण गांव से आये हरसाराज टाडा ने इस स्थान पर छड़ी रोप कर अपना परिवार बसाया जिसने आगे चलकर एक गांव का रूप ले लिया। हरसोलाव गांव चाम्पावत राजपूतों की जागीर में था। इस गांव के जागीरदारों के पास कुल 12 गांवों की जागीर थी जिसमें हरसोलाव, कुचेरा, बोडवा, सेधणी तथा जोधपुर जिले का बिसलपुर गांव सम्मिलित थे। पांच गांव पंजाब में थे। हरसोलाव का चाम्पावत जागीरदार बलवन्तसिंह (ई.1591 में जन्म एवं ई.1644 में मृत्यु) बड़ा प्रसिद्ध हुआ। […] - [भवाल](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ad%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b2/): भवाल गांव जिला मुख्यालय नागौर से 105 किलोमीटर दक्षिण में स्थित हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व यह जिला कुचामन ठिकाने की जागीर में था। मेड़ता-जैतारण सड़क से एक मार्ग रियां की ओर जाता है। उसी मार्ग पर यह गांव स्थित है। भवाल गांव को ‘भुवाल’ भी कहा जाता है, यह भूपाल शब्द का अपभ्रंश है। भवाल गांव की प्रसिद्धि गांव से एक किलोमीटर दूर बने काली के प्राचीन मंदिर के कारण है। काली का मंदिर 13वीं शताब्दी का है। इसमें एक प्राचीन शिलालेख भी लगा है जो पढ़ने में नहीं आता। यह शिलालेख विक्रम की 12वीं अथवा 14वीं शताब्दी का […] - [खाटू](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%96%e0%a4%be%e0%a4%9f%e0%a5%82/): खाटू का प्राचीन नाम षट्कप है। जब शक शासक भारत में आये थे, तब वे अपने साथ दो नवीन प्रकार के कूप (कुएं) भारत में लाये थे, जिन्हें शकन्धु (बावड़ी) तथा कर्कन्ध (रहट) कहा जाता था। अब इन्हें बावड़ी तथा रहट कहा जाता है। खाटू में 6 बावड़ियां बनवाई गई थीं जिन्हें षट्कप वाड़ी कहा जाता था। पृथ्वीराज रासो में खाटू को खट्टवन कहा गया है। कान्हड़दे प्रबन्ध में इसे षटूकड़ी वाड़ी कहा गया है। चौहान काल में यह एक समृद्ध स्थान था। प्राचीन खाटू नष्ट हो गया है तथा उसके स्थान पर अब खाटू नाम के दो गांव हैं […] - [फलवर्द्धिका (फलौदी)](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ab%e0%a4%b2%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a7%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be/): मेड़ता रोड़ रेल्वे स्टेशन से लगभग दो किलोमीटर दूर स्थित फलवर्द्धिका गांव अब मेड़ता रोड कस्बे में ही सम्मिलित हो गया है। फलवर्द्धिका 10वीं शताब्दी ईस्वी अथवा उससे भी पूर्व किसी शताब्दी में फलवर्द्धिका देवी के नाम पर बसा। यहाँ स्थित ब्रह्माणी माता का मंदिर मूलतः फलवर्द्धिका देवी का मंदिर है। इस मंदिर के कुछ शिखरों की खुदाई 10वीं शताब्दी ईस्वी अथवा उससे भी पूर्व की प्रतीत होती है। मंदिर का निर्माण प्रतिहार काल में हुआ होगा। मंदिर गांव के पूर्व में स्थित है। इसके सभामण्डप का बाहरी भाग तथा शिखर नवीन हैं किंतु भीतर के स्तंभ एवं बाहरी दीवारों […] - [कुचामन](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a4%a8/): जहाँ आज कुचामन बसा हुआ है, वहाँ किसी समय कुचबन्धियों की ढाणी थी। शाहजहाँ के शासनकाल में कुचामन मारोठ के गौड़ों के अधीन था। हिराणी, मीठड़ी, लिचाणा, मारोठ तथा अन्य स्थानों से मिले शिलालेखों से इस तथ्य की पुष्टि होती है। औरंगजेब ने गौड़ाटी का पूरा क्षेत्र राठौड़ रघुनाथसिंह को दे दिया। ई.1727 में जोधपुर नरेश अभयसिंह ने रघुनाथसिंह के पौत्र जालिमसिंह को कुचामन की जागीर बख्शी। वैब ने 1725 से लेकर 1893 के कुचामन के ठाकुरों की सूची दी है। जालिमसिंह के बाद सभासिंह ठाकुर हुआ जिसने ई.1757 से शासन किया। उसके उत्तराधिकारी सूरजमल ई.1793 तक, शिवनाथसिंह 1827 तक […] - [मारोठ](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%a0/): मारोठ कुचामन रोड रेलवे स्टेशन से 11 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में स्थित है। यह गांव किसी समय बहुत बड़ा कस्बा था। मूथा नैणसी ने 17वीं शताब्दी में लिखित मारवाड़ रा परगनां री विगत में मारोठ परगना का अलग से विवरण दिया है। इससे स्पष्ट है कि महाराज जसवंतसिंह के शासन काल में मारोठ प्रसिद्ध एवं महत्वपूर्ण स्थान था तथा इसे परगना (जिसकी तुलना आधुनिक जिले से की जा सकती है) का दर्जा दिया गया। कहा जाता है कि मारोठ पहले गराका भैरव के नाम से प्रसिद्ध था। वि.सं. 1010 भाद्रपद सुदि 10 को माठा गुर्जर ने अपने नाम पर यह गांव […] - [हरसौर](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b9%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a5%8c%e0%a4%b0/): हरसौर डेगाना-पुष्कर मार्ग पर स्थित है। यह एक प्राचीन गांव है। इसका पुराना नाम हर्षपुर है। आज से सवा सौ वर्ष पहले इस गांव में महेश्वरियों के पांच सौ परिवार तथा ओसवालों के एक सौ तेरह परिवार रहते थे। 17वीं शताब्दी ईस्वी में रचित विनय विजय की कल्पसूत्र सुबोधिनी टीका, धर्मसागर की किरणावली टीका तथा उपाध्याय विनय विजय की सुबोधिका टीका आदि जैन ग्रंथों के अनुसार ईसा से एक शताब्दी पहले प्रियग्रंथ के समय में इस गांव में तीन सौ जैन मंदिर, चार सौ हवेलियां, आठ सौ ब्राह्मणों के घर, छत्तीस हजार बनियों के घर, नौ सौ उद्यान तथा वाटिकायें, […] - [खींवसर](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%96%e0%a5%80%e0%a4%82%e0%a4%b5%e0%a4%b8%e0%a4%b0/): जोधपुर-नागौर मार्ग पर नागौर से 40 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में स्थित खींवसर मुख्य सड़क से आधा किलोमीटर दूर बसा हुआ है। जैन धर्म के अनुयायियों के अनुसार यह ग्राम आज से ढाई हजार वर्ष पूर्व भगवान महावीर स्वामी के समय में सेमसर के नाम से आबाद था। यह भी उल्लेख मिलता है कि खींवसर गांव का नाम हस्तनगरी और अस्तिग्राम था। जैनियों के अनसुार भगवान महावीर ने दीक्षा प्राप्त करने के बाद खींवसर गांव में अपना पहला चातुर्मास किया। गांव के पूर्व में भगवान महावीर का मंदिर है जिसमें भगवान महावीर के पगलिये हैं। सामान्यतः महावीर की प्रतिमा पूजी जाती है […] - [रेण](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%a3/): रामस्नेही सम्प्रदाय की प्रसिद्ध पीठ के कारण रेण को पूरे देश में जाना जाता है। रामस्नेही संप्रदाय के आदि आचार्य दरियावजी ने रेण में तप किया था। गांव के उत्तर में स्थित पक्के सरोवर की पश्चिम दिशा में दरियावजी महाराज का रामद्वारा बना हुआ है।  रेण के इसी रामद्वारे में दरियावजी की समाधि स्थित है। यह समाधि संगमरमर से निर्मित है। इस पर वि.सं. 1733 भाद्रपद कृष्णाष्टमी को दरियावजी का जन्म होना तथा मार्गशीर्ष पूर्णिमा संवत 1815 को मोक्ष होना अंकित है। दरियावजी के दीक्षा ग्रहण की तिथि संवत 1769 कार्तिक शुक्ला एकादशी दी गई है। प्रतिवर्ष चैती पूनम (चैत्र […] - [तरणाऊ](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a4%e0%a4%b0%e0%a4%a3%e0%a4%be%e0%a4%8a/): नागौर-डीडवाना मार्ग पर स्थित तरणाऊ ‘तृष्ण’ ऋषि के नाम पर बसा। इस गांव की बसावट मध्यकालीन भारतीय समाज की अनोखी झलक प्रस्तुत करती है। गांव गोलाई में बसा हुआ है। इसके दक्षिणी भाग में तेली, पूर्व में भांबी तथा हरिजन और उत्तर तथा पश्चिम में जाट रहते हैं। गांव के बीच में ब्राह्मण तथा बनियों के परिवार रहते हैं। गांव के दक्षिण में एक गौशाला है जिसमें असहाय गायें रखी जाती हैं। गांव में आठ मंदिर है जिनमें रघुनाथ मंदिर, चारभुजा मंदिर, हनुमान मंदिर एवं रामदेव मंदिर प्रमुख हैं। गऊशाला के पास स्थित चावण्डा माता के मंदिर की भी बड़ी […] - [केकिंद - जस नगर](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%95%e0%a5%87%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%9c%e0%a4%b8-%e0%a4%a8%e0%a4%97%e0%a4%b0/): केकिंद मेड़ता से 23 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है। यहाँ से प्राप्त शिलालेखों में इस स्थान का पुराना नाम किष्किंधा दिया गया है। ईसा की बारहवीं शताब्दी में किष्किंधा पर नाडोल के चौहानों के सामन्त शासन करते थे जिन्हें राणा की उपाधि प्राप्त थी। वर्तमान में केकिंद को जसनगर कहा जाता है। केकिंद की ख्याति यहाँ स्थित 11वीं शताब्दी के शिवमंदिर के कारण है। यह मंदिर संभवतः चौहानों द्वारा बनवाया गया। यह मंदिर मुसलमानों के बड़े आक्रमण का शिकार हुआ जिसके कारण मंदिर में काफी टूट-फूट हुई। मंदिर के बाहर की प्रायः सभी मूर्तियां या तो पूरी तरह से या […] - [जायल](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%b2/): जायल नागौर से 53 किलोमीटर पूर्व में नागौर-डीडवाना मार्ग पर स्थित है। सुप्रसिद्ध पुरातत्व विज्ञानी डॉ. वीरेन्द्रनाथ मिश्र के अनुसार जायल से वींठड़ी ऊंचायड़ा तक का 10 किलोमीटर का क्षेत्र पाषाण युगीन मानव की कर्मस्थली था। इसे सेठू जायल भी कहा जाता है जिससे स्पष्ट है कि किसी समय यह गांव सेठों के द्वारा बसाया गया था। जायल (Jayal) को प्राचीन ख्यातों में जायलवाड़ा, जायलवाटक तथा जायलवाटी भी कहा गया है। यह क्षेत्र पहले चौहान साम्राज्य के अधीन तथा बाद में राठौड़ों के अधीन रहा। यहाँ के सामन्त सपादलक्ष के चौहानों के अधीन थे। जायल के चौहान सामन्त गूंदल राव […] - [झोरड़ा](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%9d%e0%a5%8b%e0%a4%b0%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a4%be/): नागौर से 30 किलोमीटर उत्तर में स्थित झोरड़ा गांव बाबा हरिराम के कारण विख्यात हुआ। बाबा हरिराम का जन्म विक्रम 1959 में तथा परलोकगमन विक्रम 2000 में हुआ। मात्र 41 वर्ष के छोटे से जीवन में बाबा ने दीन-दुखियों की सेवा करके स्वयं को सामाजिक प्रतिष्ठा के उस पद पर आसीन किया जहाँ वे लोकदेवता माने जाते हैं। दायमा ब्राह्मण परिवार में जन्मे हरिराम आजीवन ब्रह्मचारी रहे। अपना पूरा जीवन उन्होंने ईश स्मरण में निकाला। इस रेगिस्तानी क्षेत्र में सांप-बिच्छुओं की बहुतायत थी। बाबा हरिराम इन विषैले प्राणियों द्वारा डंसे गये प्राणियों को झाड़ा लगाकर ठीक कर देते थे। बाबा […] - [लाडनूं](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%a1%e0%a4%a8%e0%a5%82%e0%a4%82/): वि.सं.1201 के शिलालेख में लाडनूं को ‘गीणगणो देवरान्’ कहा गया है। पुष्कर के नाग पर्वत की तरह गीणगणोद के द्रोणगिरि की अगम्यता दसवीं सदी तक बनी हुई थी। डॉ. परमेश्वर लाल सोलंकी ने इसे प्राचीन भारत में परमाणु विस्फोट की परीक्षण स्थली माना है तथा पास स्थित बांकापट्टी के अस्वास्थ्यकर वातावरण का कारण अत्यन्त प्राचीनकाल में हुए परमाणु विस्फोट को माना है। जनश्रुतियों में लाडनूं को बूढ़ी चन्देरी कहा गया है तथा इसे महाभारतकालीन नगरी माना गया है। डॉ. परमेश्वर लाल सोलंकी का मानना है कि यह खंडिल्लपालवंशीय महाजनों का नगर था जो नडूल क्षेत्र के धलोपग्राम की तरह एक […] - [खरनाल](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%96%e0%a4%b0%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b2/): नागौर जिले में स्थित खरनाल गांव एक हजार साल पहले खोजा जाट ने बसाया। पुराना गांव वर्तमान गांव के दक्षिण में आधा किलोमीटर दूर था वहाँ चिकनी मिट्टी थी जो कम वर्षा होने तथा हिरणों के उछल-कूद मचाने से उड़ती थी। अतः पुराने गांव से हटकर यह गांव बसाया गया। खरनाल गांव लोकदेवता वीर तेजाजी का जन्म स्थल है। जायल के चौहान शासक गूंदल राव खींची की 5वीं पीढ़ी के वंशज धवल खींची खरनाल आकर बसे। वीर तेजा को इन्हीं धवल खींची का पुत्र बताया जाता है। धवल खींची को धोलिया वीर भी कहते हैं। गांव में स्थित भाटों की […] - [चम्पाखेड़ी](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%9a%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%96%e0%a5%87%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a5%80/): राजपुरोहितों की जागरवाल उपजाति का गांव चम्पाखेड़ी नागौर जिले की डेगाना पंचायत समिति में स्थित है। विक्रम संवत 1591 की वैशाख शुक्ला तृतीया को चाम्पोजी पुरोहित ने खेजड़ी का वृक्ष रोपकर इस गांव की स्थापना की। इस अवसर पर मेड़ता का राव वीरमदेव भी उपस्थित था। लगभग पांच सौ साल पुराना गांव होने से इस गांव का मारवाड़ के इतिहास में विशेष महत्व है। इस गांव में तथा आस-पास इतनी खेजड़ियां लगाई गईं कि यह पूरा गांव खेजड़ियों का बाग दिखाई देता है। वि.सं. 1956 के अकाल में ये खेजड़ियां लोगों को जीवित रखने में सहायक सिद्ध हुईं। ग्रामीणों ने […] - [मोलासर](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ae%e0%a5%8b%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a4%b0/): मोलासर गांव ई.986 में बणजारों ने बसाया था। ये बणजारे गजनी से आये आक्रमणकारी सुबुक्तगीन की सेना से अपनी जान बचाकर पंजाब से मारवाड़ की तरफ भाग आये थे। सुबुक्तगीन पंजाब के महाराजा जयपाल को परास्त करके जनता को लूट रहा था। बणजारों का यह काफिला भटिण्डा से भागकर इस सुनसान क्षेत्र में आया तथा कुछ दिन रहकर आगे चला गया। यह सुनसान क्षेत्र चारों ओर जंगल से घिरा हुआ था, आक्रमणकारियों के यहाँ तक पहुंचने की संभावना कम थी। अतः कुछ बणजारे वहीं रुक गये। इनमें से मोलाराम नामक कुंभकार ने उसी स्थान पर मोलासर गांव बसाया। ई.1206 से […] - [रोटू](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a5%8b%e0%a4%9f%e0%a5%82/): नागौर से 70 कि.मी. पूर्व में स्थित रोटू (Rotu) ग्राम जायल तहसील में हैं। इस गांव के आसपास 50 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को आखेट निषिद्ध क्षेत्र घोषित किया गया है जहाँ हजारों की संख्या में काले हिरण एवं चिंकारा विचरण करते है। इस गांव की सीमा में सघन वृक्ष हैं। वि.सं. 1572 वैशाख सुदि अक्षय तृतीया के दिन भगवान जाम्भोजी इस गांव में उमाबाई का भात (मायरा) भरने के लिए हजारों लोगों के साथ आये थे। उनके साथ जोधपुर नरेश राव जोधाजी, चित्तौड़गढ़ नरेश राणा सांगा, मलेरकोटड़ा (पंजाब) के शेख सद्दू और एक हजार पांच सौ साधु थे। ग्राम में […] - [नागौर के ऐतिहासिक सिक्के](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%97%e0%a5%8c%e0%a4%b0-%e0%a4%90%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a5%87/): नागौर के ऐतिहासिक सिक्के चांदी एवं ताम्बे के हैं। नागौर क्षेत्र का सबसे पहला सिक्का नागौर के प्रथम स्वतंत्र राजा अमरसिंह राठौड़ द्वारा चलाया गया। राजस्थान में मिलने वाले सबसे प्राचीन सिक्के पंचमार्क तथा आहत सिक्के कहलाते हैं। मारवाड़ में भी किसी समय इन सिक्कों का प्रचलन रहा। इन मुद्राओं पर धार्मिक एवं ज्योतिष सम्बन्धी प्रतीक चिह्न उपलबध होते हैं। इन्हें ईसा की कई शताब्दियों पहले राजाओं तथा विभिन्न श्रेणी निगमों (व्यापारी मण्डलों) द्वारा जारी किया गया था। नागौर जिले की दक्षिणी सीमा पर स्थित नलियासर (जयपुर जिला) से कई मुद्रायें प्राप्त हुई हैं। इनमें आहत मुद्रायें, उत्तर इण्डो सेसेनियन […] - [कुचामन के सिक्के](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a5%87/): कुचामन के सिक्के मारवाड़ राज्य के इतिहास का अभिन्न अंग हैं। कुचामनी सिक्के ढालने के लिए टकसाल जोधपुर के राजा के आदेश से स्थापित की गई थी, अंग्रेज सरकार ने भी इस टकसाल को जारी रखा। जोधपुर राज्य में मुद्रा चलाने की अनुमति केवल कुचामन ठाकुर को ही प्राप्त थी। कुचामन ठिकाने द्वारा केवल चान्दी की मुद्रा ढाली गई। ठिकाने द्वारा एक रुपया, आठ आना तथा चार आना के सिक्के ढाले गये। प्राचीन कुचामन मुद्रा इकतीसंदा अथवा ’31 सन्दा’ अनुकृति की थी। प्रिंसेप के यूजफुल टेबल्स में इन्हें बोपूशाही कहा गया है। इन्हें बोरसी रुपया भी कहा जाता था। मारवाड़ […] - [डीडवाना-कुचामन जिले के शिलालेख](https://rajasthanhistory.com/didwana-kuchaman-shilalekh/): डीडवाना-कुचामन जिले के शिलालेख : इस ब्लॉग में प्रयुक्त सामग्री डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ग्रंथ नागौर जिले का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास से ली गई है। अमरसर से प्राप्त लेख स्मृति स्तम्भ अभिलेख, भाषा: देशज तिथि – 1111 (ई.1699-1700) विवरण – महाराजा इन्द्रसिंह के काल में डूंगरसी के पुत्र जीवनदास द्वारा एक कूप एवं उद्यान बनवाने का उल्लेख है। दौलतपुरा से प्राप्त ताम्रपत्र प्रतिहार भोजदेव का ताम्रपत्र, भाषा: संस्कृत तिथि – फाल्गुन सुदि 10, 3 (13) वि.सं. 900 (ई.843) विवरण – ताम्रपत्र में प्रतिहार शासकों की महाराज देवशक्ति से लेकर भोजदेव प्रथम तक की वंशावली दी गई है तथा […] - [नागौर जिले के शिलालेख](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%97%e0%a5%8c%e0%a4%b0-%e0%a4%9c%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%96/): नागौर जिले के शिलालेख : इस ब्लॉग में प्रयुक्त सामग्री डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ग्रंथ नागौर जिले का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास से ली गई है। लोहरपुर से प्राप्त अभिलेख पीर जुहूरूद्दीन की दरगाह का लेख, भाषा: अरबी-फारसी तिथि – सफर हि. 745 (अक्षरों में) (जून-जुलाई ई.1344 ई.) विवरण – किसी की मृत्यु का उल्लेख हुआ है। (मृत व्यक्ति का नाम पढ़ा नहीं जा सकता) (संदर्भ, ए.रि.ई.ए. 1965-66 संख्या डी 358) पीर जुहूरूद्दीन की दरगाह का दूसरा लेख, भाषा: अरबी-फारसी तिथि – हि. 1008 (ई.1599-1600) विवरण – मीर बुजुर्ग द्वारा अपने पिता नवाब अमीर मुहम्मद मासूम नामी के साथ […] - [नागौर का हस्तशिल्प](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%97%e0%a5%8c%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%aa/): नागौर का हस्तशिल्प भारतीय इतिहास की मुख्य धारा से जुड़ा हुआ है। मकराना के संगमरमर ने संसार को आगरा का ताजमहल तथा कलकत्ता का विक्टोरिया मेमोरियल जैसे भवन दिये तो लोहारपुरा के मुल्तानी लोहारों ने मध्यकालीन इतिहास को भारी भरकम जंगी तोपें बनाकर दीं जिन्होंने भारतीय इतिहास के कई पृष्ठ लिखे। नागौर का हस्तशिल्प इतनी उत्कृष्ट कोटि का है कि अलौह धातुओं- कांसी तथा पीतल के नागौर में बने कलात्मक बर्तनों की प्रतिस्पर्धा तो कदाचित ही मुरादाबाद या कहीं और के बर्तन कर सकें। किशनगढ़ की बनी-ठनी चित्रशैली को समुद्र पार तक ख्याति दिलवाने वाले कुमावत कलाकार मूलतः नागौर जिले […] - [मकराना से प्राप्त शिलालेख](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ae%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%a4-%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%87/): मकराना से प्राप्त शिलालेख : इस ब्लॉग में प्रयुक्त सामग्री डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ग्रंथ नागौर जिले का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास से ली गई है। मकरान क्षेत्र प्राचीन काल में ईरान के हख़ामनी साम्राज्य का हिस्सा था जिसे माका नामक सात्रापी कहा जाता था। यह क्षेत्र भारत और ईरान के बीच व्यापार, तीर्थयात्रा और सैन्य मार्ग के रूप में उपयोग होता था। यह अरब सागर से लगा एक तटीय, अर्ध-रेगिस्तानी क्षेत्र है। वर्तमान समय में मकरान नाम से एक क्षेत्र ईरान में तथा दूसरा क्षेत्र पाकिस्तान में है। ईरान में मकरान का विस्तार सिस्तान व बलूचिस्तान प्रान्त के […] - [केकींद से प्राप्त अभिलेख](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%95%e0%a5%87%e0%a4%95%e0%a5%80%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%a4-%e0%a4%85%e0%a4%ad%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%96/): केकींद से प्राप्त अभिलेख : इस ब्लॉग में प्रयुक्त सामग्री डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ग्रंथ नागौर जिले का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास से ली गई है। किष्किंधा के चौहान रुद्र का अभिलेख, भाषा: संस्कृत तिथि – वैशाख सुदि 15 गुरुवार सम्वत 1176 (15 अप्रेल 1120) चन्द्रग्रहण। विवरण – राजपुत्र राणा महिपाल तथा किष्किंधा (केकिंद) के चौहान रुद्र का उल्लेख है। (संदर्भ, भण्डारकर द्वारा प्रो. रि.आ.स., वे.स. 1910 पृ. 35 पर निर्दिष्ट) पिप्पल राज का अभिलेख, भाषा: संस्कृत तिथि – चैत्र वदि 1 सम्वत् 1178 विवरण – किष्किंधा पर महामण्डलीक श्री राणक पिप्पलराज एवं श्री रांहामुसक देवी के संयुक्त शासन […] - [नागौर से प्राप्त शिलालेख](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%97%e0%a5%8c%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%a4-%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%96/): नागौर से प्राप्त शिलालेख : इस ब्लॉग में प्रयुक्त सामग्री डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ग्रंथ नागौर जिले का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास से ली गई है। विट्टल प्रतिमा पादासन अभिलेख, भाषा: देशज तिथि – मार्गशीर्ष वदि 5 बुधवार वि.सं. 1533 शाके 1399 (ई.1476) विवरण- यह लेख बंशीवाले के मंदिर में लगा है। नागौर नगर से प्राप्त शिलालेखों में यह सबसे पुराना है। इसमें कहा गया है कि मार्गशीर्ष वदि 5 बुधवार वि.सं. 1533 शाके 1399 को नागौर में श्री विट्टलजी की प्रतिमा का निर्माण हुआ। बरमायां मंदिर के शिलालेख बंशीवाले मंदिर के पास बरमायां के मंदिर में तीन अभिलेख […] - [बड़ी खाटू के शिलालेख](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ac%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a5%80-%e0%a4%96%e0%a4%be%e0%a4%9f%e0%a5%82-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%87%e0%a4%96/): बड़ी खाटू के शिलालेख : बड़ी खाटू को खाटू कलां भी कहते हैं। बड़ी खाटू नागौर जिले की जायल तहसील में स्थित है। बड़ी खाटू नागौर जिले की जायल तहसील में स्थित है। बड़ी खाटू के शिलालेख में सबसे प्राचीन शिलालेख तेरहवीं शताब्दी ईस्वी का है। इस ब्लॉग में प्रयुक्त सामग्री डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ग्रंथ नागौर जिले का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास से ली गई है। बड़ी खाटू के शिलालेख ध्वंस मस्जिद का अभिलेख, भाषा: अरबी-फारसी तिथि – हि.सं. 599 (ई.1203) विवरण – सम्बन्धित मस्जिद के उक्त तिथि को निर्मित होने का उल्लेख है। (संदर्भ, इं.आ. 1962-63 पृष्ठ […] - [लाडनूं से प्राप्त शिलालेख](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%a1%e0%a4%a8%e0%a5%82%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%a4-%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%87/): लाडनूं से प्राप्त शिलालेख : राजस्थान बनने के बाद से लाडनूं नागौर जिले में था किंतु कुछ वर्ष पूर्व ही इसे नवनिर्मित डीडवाना-कुचामन जिले में सम्मिलित किया गया है। इस ब्लॉग में प्रयुक्त सामग्री डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित ग्रंथ नागौर जिले का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास से ली गई है। लाडनूं एवं उसके आसपास के क्षेत्र पर कभी नागों का शासन था जिनका एक राजा मुसलमान हो गया था। उसके बाद यह क्षेत्र मुसलमानों के अधीन रहा। इस कारण लाडनूं से प्राप्त शिलालेख अधिकतर मुसलमान जागीरदारों के हैं। राजा साधारण का अभिलेख, भाषा: संस्कृत तिथि – भाद्रपद वदि 3, […] - [मेड़ता से प्राप्त शिलालेख](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%a4-%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%87/): प्रस्तुत आलेख में मेड़ता से प्राप्त शिलालेख दिए गए हैं। यह सामग्री डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक नागौर जिले का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास से ली गई है। राणा करमसी का अभिलेख, भाषा: संस्कृत तिथि – कार्तिक सुदि 11 रविवाद वि.सं. 1405 (2 नवम्बर 1348) विवरण – अभिलेख में राणा गुहिलौत मेदड़ के नाम का उल्लेख हुआ है। (सदंर्भ, भण्डारकर द्वारा प्रो. रि.आ.स., वे.स. 1909-10 पृ. 63) मीर मुहम्मद का सूम नामी का अभिलेख, भाषा: अरबी-फारसी तिथि – हिजरी 1014 (ई.1605-06) विवरण – अभिलेख में मासूम द्वारा सृजित 3 छन्द दिए गए हैं। पीर मुहम्मद मासूम नामी द्वारा सृजित एवं […] - [डीडवाना से प्राप्त शिलालेख](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a1%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%a4-%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%b2/): डीडवाना पहले नागौर जिले का अंग था किंतु कुछ वर्ष पहले इसे डीडवाना–कुचामन नाम से अलग जिला बना दिया गया है। प्रस्तुत आलेख में डीडवाना से प्राप्त शिलालेख दिए गए हैं। यह सामग्री डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तक नागौर जिले का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास से ली गई है। दिल्ली दरवाजा अभिलेख, भाषा: अरबी-फारसी तिथि – (1) धुल-हिज्ज 15 हि. 606 (10 जून 1210), (2) द्वितीय रबी 15 हि. 608 (26 सितम्बर 1211) विवरण – ख्वाजगी के पौत्र एवं महमूद के पुत्र महान एवं विद्वान इमाम रशीदुद्दीन झाऊ की मृत्यु प्रथम तिथि को हुई तथा द्वितीय तिथि को उस पर […] - [विविध स्थलों से प्राप्त अभिलेख](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a7-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%a4-%e0%a4%85/): विविध स्थलों से प्राप्त अभिलेख : नागौर जिले के बहुत से कस्बों एवं नगरों से बड़ी संख्या में शिलालेख आदि प्राप्त हुए हैं। कुछ कस्बों एवं नगरों से प्राप्त शिलालेखों की जानकारी इस लेख में दी गई है। विविध स्थलों से प्राप्त अभिलेख स्मारक अभिलेख, भाषा: देशज स्थान – रीयां। तिथि – माघ सुदि 15, गुरुवार वि.सं. 1844 विवरण – इस छतरी की नींव फाल्गुन सुद 1, वि.सं. 1841 को गोरधनदास ने रखवाई तथा निर्माण रघुनाथ हरजीमल ने करवाया। सेठ जीवणदास ने माघ सुदि 15, गुरुवार वि.सं. 1844 को इस छतरी पर कलश चढ़वाया। (संदर्भ, शिवसिंह चोयल, राजस्थान भारती, पृ. […] - [नागौर का संदर्भ साहित्य](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%97%e0%a5%8c%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ad-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af/): नागौर का संदर्भ साहित्य नागौर का इतिहास लिखने के लिए अत्यंत उपयोगी सामग्री उपलब्ध करवाता है। इस आलेख में डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखित पुस्तक नागौर जिले का इतिहास से प्रकाश डाला गया है। नागौर जिले से सम्बन्धित इतिहास की प्राचीन सामग्री संस्कृत, हिन्दी, राजस्थानी तथा अरबी-फारसी ग्रंथों में यथाप्रसंग प्राप्त होती है। ये ग्रन्थ ख्यात, वंशावली, वचनिका, बात, वार्ता, नीसाणी, कुर्सीनामा, झूलणा, झमाल, छप्पय, कवित्त, गीत तथा विगत आदि नामों से प्राप्त होते हैं। जोधपुर, बीकानेर तथा जयपुर राज्य के शासकों द्वारा समय-समय पर जारी किये गये फरमान, रुक्के, खरीते तथा तहरीरें भी नागौर जिले के विभिन्न नगरों, गांवों, […] - [राजस्थान में कुषाण आधिपत्य](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%b7%e0%a4%be%e0%a4%a3-%e0%a4%86%e0%a4%a7%e0%a4%bf%e0%a4%aa%e0%a4%a4/): बहुत से विद्वान राजस्थान में कुषाण आधिपत्य का होना स्वीकार करते हैं किंतु इस सम्बन्ध में उनके द्वारा जो तर्क दिए जाते हैं, वे अकाट्य नहीं हैं। प्राप्त प्रमाणों के आधार पर केवल इतना ही सिद्ध होता है कि राजस्थान के कुछ हिस्से उनके प्रभाव में रहे होंगे। जिस समय मागध साम्राज्य बिखर रहा था, उस काल में भारत में कुछ विदेशी जातियों ने प्रवेश किया। कुषाण भी इसी काल में भारत में प्रविष्ट हुए। कुषाणों का साम्राज्य शकों एवं पह्लवों के राज्यों की अपेक्षा अधिक विस्तृत था। इतिहासकारों की धारणा है कि उत्तरी राजस्थान का अधिकांश भाग कुषाण साम्राज्य […] - [बहज की महाभारतकालीन सभ्यता](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ac%e0%a4%b9%e0%a4%9c-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%ad%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%a4%e0%a4%be/): ब्रजभूमि के चौरासी कोस परिक्रमा मार्ग में गोवर्धन से डीग आते समय बहज गांव में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा बहज की महाभारतकालीन सभ्यता खोजी गई है। कालीबंगा के उत्खनन के कई दशकों बाद राजस्थान में वृहद स्तर पर ऐसा उत्खनन हुआ है। भरतपुर जिले के नोह गांव तथा डीग जिले के बहज की महाभारतकालीन सभ्यता से मिले पुरातात्विक अवशेष इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि महाभारत काल से लेकर उसके बाद कई शताब्दियों तक ब्रजभूमि में आर्य-सभ्यता निवास करती थी। बहज की महाभारतकालीन सभ्यता चौरासी कोस परिक्रमा मार्ग से सटे बहज गांव के ऊंचे टीले पर मिली है। इस […] - [Rajasthani Miniature Painting During 13th To 17th Century](https://rajasthanhistory.com/rajasthani-miniature-painting/): A lot of work has been done in the last few decades on the history of Rajasthani miniature painting, which gives us knowledge not only about the development of miniature painting but also about the history of Rajasthan.  There is a great controversy about Rajput Painting’s origin, development, characteristic features and relationship with Mughal painting. The earliest evidence of Rajasthani painting belongs to the close of the 13th century in the form of book illustration found in the Suvaga Parikamna Sutta Chun,[1] a Jain scripture illustrated in Mewar during the reign of Maharawal Tej Singh. Subsequently another Jain scripture Supasana […] - [महाराजा विजयसिंह राठौड़ का वल्लभ सम्प्रदाय को संरक्षण](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%be-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%9c%e0%a4%af%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%b9-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a0%e0%a5%8c%e0%a4%a1%e0%a4%bc/): जोधपुर नरेश बखतसिंह (जीवनकाल ई.1706-52) की मृत्यु के बाद वि.सं.1809 माघ कृष्णा 12 (30 जनवरी 1753) को उसका ज्येष्ठ कुंवर विजयसिंह मारवाड़ राज्य का शासक हुआ। उसने लगभग चालीस वर्ष (ईस्वी 1753-1793) तक मारवाड़ पर शासन किया। [1] यद्यपि मारवाड़ का राठौड़ राजवंश आरम्भ से ही वैष्णव धर्म का पालन करता आया था तथापि वि.स.1822 में महाराजा विजयसिंह राठौड़ ने अपनी पासवान गुलाबराय से प्रभावित होकर नाथद्वारे के गुसाइयों का शिष्यत्व ग्रहण किया जो कि गोकुलिए गुसाईं कहलाते थे और वल्लभ सम्प्रदाय[2] के प्रसद्धि आचार्य थे। गुसाइयों के प्रभाव से विजयसिंह ने मारवाड़ राज्य में मांस और मदिरा का उपयोग […] - [Folk Literature of Rajasthan](https://rajasthanhistory.com/folk-literature-of-rajasthan/): The folk literature of Rajasthan not only represents the Rajasthani culture and traditions, but it also provides reliable references to the history of that time. The political, social and cultural narratives can conveniently be drawn on the accounts or facts preserved in the Inscriptions, histories and state papers. Coins and paintings also throw flood of light on various events of history.[1] In the case of Rajasthan, things are different. It was deprived of these sources due to invasions occurring from 8th to the 18th century in an organized manner by the alians. It is needless on my part to recount […] - [Maharana Mokal and his Date of Accession](https://rajasthanhistory.com/maharana-mokal/): Maharana Mokal ascended the throne of Mewar in V.S. 14761 /1419 A D.[1] after the death of his father Maharana Lakha. Former historians disagreed about the date of his accession, but the later findings have now settled the matter almost finally.[2] But there still exists a wide divergence about the age of Maharana Mokal at the time of his accession. According to Tod he was just a child of five only and Ranmal, his maternal uncle, used to sit on the throne of Bappa Rawal with Maharana Mokal on his knees [3] Reu, the historian from Marwar, disagrees with Tod. […] - [Gopala-Krishna sub-sect in Rajasthan](https://rajasthanhistory.com/gopala-krishna-sub-sect-in-rajasthan/): The lyrical expression and the graphic description of Gopala-Krishna in the Gopala stavas of the same text are the representations of vivid iconic imagery of Gopala-Krishna sub-sect that have been carved in various temples of Rajasthan as well as other Vaishnava-shrines of India. A large number of iconographical representation depicting the various incidents in the early life of Krishna unmistakably point to the emergence of the Gopala-Krishna sub-sect of Vaishnavism [1] in the early centuries of the Christian era. The discovery of these sculptural reliefs from different parts of India, like Mathura, Rajputana, Paharpur, Deogarh etc., clearly prove the popularity […] - [मारवाड़ की उत्तराधिकार राजनीति में पासवान गुलाबराय](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a1%e0%a4%bc-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%89%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a7%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0/): अठारहवीं शताब्दी ईस्वी में मारवाड़ की उत्तराधिकार राजनीति में पासवान गुलाबराय की भूमिका कुछ समय के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई थी किंतु वह न तो अपने पुत्र तेजकरण को और न अपनी पसंद के किसी भी राजकुमार को मारवाड़ का उत्तराधिकारी नहीं बनवा सकी। उत्तर मध्यकालीन राजपूताना के हिन्दू राजाओं के रनिवास में मुगल बादशाहों की तरह अनेक  रानियाँ एवं दासियां रहने लगी थीं। इन दासियों में खवास, पड़दायत एवं पासवान आदि भी होती थीं जो राजाओं, राजकुमारों एवं सामंतों की उपपत्नियों की तरह रहती थीं। डॉ. गोपीनाथ शर्मा ने उस काल के हिन्दू राजाओं की रानियों एवं उपपत्नियों […] - [मारवाड़ी बनियों का स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान](https://rajasthanhistory.com/%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82/): अंग्रेजों द्वारा अनेक मारवाड़ी बनियों पर कठोर कार्यवाही की गई। मारवाड़ी बनियों का मानना था कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद उनके विकास के मार्ग में अवरोध था। ब्रिटिश साम्राज्यवाद मारवाड़ी बनियों को अपने मार्ग से हटाने के लिये देशी रियासतों के शासकों से सहयोग की अपेक्षा रखता था। भारत को स्वतंत्र कराने में किसी एक राजनैतिक दल, संगठन या वर्ग का नहीं अपितु समस्त भारतीयों का योगदान रहा है। राजस्थान का वैश्य वर्ग जिसे ब्रिटिश भारत में मारवाड़ी नाम से जाना जाता था तथा जो मुख्य रूप से वाणिज्य व्यापार प्रधान था, किसी प्रदेश तक सीमित न होकर समग्र भारत में फैला […] ## Pages - [डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तकें](https://rajasthanhistory.com/books-of-mohan-lal-gupta/): डॉ. मोहनलाल गुप्ता विगत चालीस वर्षों से साहित्य, इतिहास, संस्कृति, राजनीति आदि विविध विषयों पर लेखन कर रहे हैं। डॉ. मोहनलाल गुप्ता की पुस्तकें देश-विदेश में चर्चित एवं प्रशंसित रही हैं। ऑन लाइन उपलब्ध पुस्तकें विश्व इतिहास 1. हिन्दुत्व की छाया में इण्डोनेशिया 2. पोप के देश में ग्यारह दिन 3. कैसे बना था पाकिस्तान  भारत का इतिहास 4. भारत की लुप्त सभ्यताएं 5. दिल्ली सल्तनत की दर्दभरी दास्तान  6. बाबर के बेटों की दर्दभरी दास्तान  7. लाल किले की दर्दभरी दास्तान  8. तीसरा मुगल जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर  9. भारत के मुगलकालीन प्रमुख भवन  10. भारत की सभ्यता एवं संस्कृति […] - [Home](https://rajasthanhistory.com/) - [Privacy Policy](https://rajasthanhistory.com/privacy-policy/): Who we are Our website address is: http://www.rajasthanhistory.com/ What personal data we collect and why we collect it We collect visitor’s name, email id and contact number which is used by us for our marketing purposes. 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The Gravatar service privacy policy is available […] - [Recent Blogs](https://rajasthanhistory.com/recent-blogs/): Follow My Blog Get new content delivered directly to your inbox. - [Contact](https://rajasthanhistory.com/contact/): Get in Touch madhubalagupta1965@gmail.com 63, Sardar Club Scheme Air Force Area Jodhpur, Rajasthan 342011 India +91-9414076061 - [सत्यं वद् धर्मम् चर](https://rajasthanhistory.com/mohanlal-gupta/): डॉ. मोहनलाल गुप्ता सत्यं वद् धर्मम् चर भारतीय संस्कृति के मूल सिद्धांतों में से है जिसका अर्थ है सत्य बोल और धर्म के पथ पर चल। डॉ. मोहनलाल गुप्ता का सम्पूर्ण लेखन भारतीय संस्कृति के इसी सिद्धांत को आधार बनाकर लिखा गया है। डॉ. मोहनलाल गुप्ता आधुनिक युग के बहुचर्चित एवं प्रशंसित लेखकों में अलग पहचान रखते हैं। उनकी लेखनी से सौ से अधिक पुस्तकें निृःसृत हुई हैं जिनमें से अधिकांश पुस्तकों के कई-कई संस्करण प्रकाशित हुए हैं।  डॉ. गुप्ता हिन्दी साहित्य के जाने-माने व्यंग्यकार, कहानीकार, उपन्यासकार एवं नाट्यलेखक हैं। यही कारण है कि उनकी सैंकड़ों रचनाएं मराठी, तेलुगु आदि […] ## Optional - [Agent (MCP protocol)](websites-agents.hostinger.com/rajasthanhistory.com/mcp) [comment]: # (Generated by Hostinger Tools Plugin)